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तरुण हो या साहिल, जान सबकी बराबर होती है। लेकिन क्या हमारा सिस्टम भी यही मानता है? आज सदन में उन गुमनाम नामों की गूँज है जिन्हें अक्सर भुला दिया जाता है। सवाल कड़वा है पर ज़रूरी है: क्या कानून अंधा है, या जानबूझकर दोहरा बन गया है? क्या भारत में कानून सबके लिए बराबर है......?
Yusuf Khan
तरुण हो या साहिल, जान सबकी बराबर होती है। लेकिन क्या हमारा सिस्टम भी यही मानता है? आज सदन में उन गुमनाम नामों की गूँज है जिन्हें अक्सर भुला दिया जाता है। सवाल कड़वा है पर ज़रूरी है: क्या कानून अंधा है, या जानबूझकर दोहरा बन गया है? क्या भारत में कानून सबके लिए बराबर है......?
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