*गोमती पुस्तक महोत्सव में गूंजी अंतरिक्ष की उड़ान की कहानी* ___________________________ 👉*ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का हुआ लोकार्पण* *लखनऊ।* राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत की ओर से आयोजित गोमती पुस्तक महोत्सव में मंगलवार को ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला के साथ विशेष संवाद सत्र ‘धरती से अंतरिक्ष तक सपनों की उड़ान’ आयोजित किया गया। इस अवसर पर उनकी अंग्रेजी पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का लोकार्पण उन्होंने अपने परिजनों के साथ संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम में भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने वीडियो संदेश से शुभांशु शुक्ला की पुस्तक और उनकी अंतरिक्ष यात्रा की सराहना करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं। पुस्तक के लोकार्पण के बाद शुभांशु शुक्ला ने छात्र-छात्राओं से संवाद किया और अपने बचपन, शिक्षा, भारतीय वायुसेना में सेवा, प्रशिक्षण तथा अंतरिक्ष तक पहुंचने की पूरी यात्रा के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने के बाद इंसान की सोच और नजरिया पूरी तरह बदल जाता है। उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष से न कोई देश दिखाई देता है, न कोई शहर और न ही कोई क्षेत्रीय सीमा। वहां से केवल एक सुंदर और एकीकृत पृथ्वी दिखाई देती है। उन्होंने विद्यार्थियों को समझाते हुए कहा कि यदि अंतरिक्ष में कोई एलियन उनसे पूछे कि वे कहां से आए हैं और वे अपने शहर या देश का नाम बताएं, तो शायद वह उसे न समझ पाए। लेकिन यदि वे कहें कि वे पृथ्वी से आए हैं, तो वह बात तुरंत समझ में आ जाएगी। अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने पर यह एहसास होता है कि धरती पर खींची गई सीमाएं कितनी छोटी हैं और हम सभी एक ही ग्रह के निवासी हैं। शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष यात्रा के शुरुआती क्षणों को याद करते हुए कहा कि जब वह पहली बार अंतरिक्ष की ओर रवाना हुए तो उनके मन में उत्साह के साथ एक तरह का डर भी था। उन्होंने उस स्थिति की तुलना परीक्षा कक्ष से की। जिस तरह परीक्षा शुरू होने से पहले कई बार सब कुछ जानते हुए भी कुछ क्षणों के लिए दिमाग खाली-सा हो जाता है, वैसा ही अनुभव उन्हें भी हुआ। हालांकि, उन्होंने खुद को संभाला और मानसिक रूप से मजबूत होकर मिशन पर आगे बढ़े। अंतरिक्ष में रहने के दौरान शरीर और दैनिक जीवन में कई तरह के बदलाव महसूस होते हैं। सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण के कारण शरीर की लंबाई कुछ बढ़ सकती है और पृथ्वी पर लौटने के बाद शरीर धीरे-धीरे अपनी सामान्य स्थिति में वापस आता है। वहां उठने-बैठने और चलने-फिरने का तरीका भी पृथ्वी से बिल्कुल अलग होता है। उन्होंने बताया कि यदि अंतरिक्ष में पानी गिराया जाए तो वह पृथ्वी की तरह नीचे नहीं गिरता, बल्कि छोटी-छोटी गोल बूंदों के रूप में तैरता रहता है। यही परिस्थितियां अंतरिक्ष में वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। शुभांशु शुक्ला ने बताया कि अपने मिशन के दौरान उन्होंने कई प्रयोग किए, जिनके माध्यम से सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण का मानव शरीर और आसपास के वातावरण पर प्रभाव समझने का प्रयास किया गया। लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने से मांसपेशियों पर भी असर पड़ता है। पृथ्वी की तरह शरीर को गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध काम नहीं करना पड़ता, इसलिए मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। इसी कारण अंतरिक्ष यात्रियों को नियमित व्यायाम करना पड़ता है। अंतरिक्ष यान के भीतर हवा, तापमान और पर्यावरण को भी नियंत्रित परिस्थितियों में रखा जाता है। पृथ्वी पर लौटने के बाद शरीर को दोबारा गुरुत्वाकर्षण के अनुकूल होने में समय लगता है। शुरुआत में चलना, बैठना और यहां तक कि लेटना भी असहज लग सकता है। शुक्ला ने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी पर लौटना भी उनके लिए एक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत अनुभव रहा। शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से कहा कि भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को लगातार नई ऊंचाइयों तक ले जा रहा है। देश गगनयान मिशन की तैयारी कर रहा है और भविष्य में चंद्रमा पर भारतीय मानव मिशन की दिशा में भी आगे बढ़ने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि यह सपना केवल कुछ वैज्ञानिकों या अंतरिक्ष यात्रियों का नहीं, बल्कि पूरे देश का सपना है। उन्होंने लखनऊ के युवाओं का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि इसी शहर का युवा भी अंतरिक्ष यात्री बन सकता है। इसके लिए निरंतर मेहनत, अनुशासन, समर्पण और मानसिक मजबूती जरूरी है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत का संकल्प तभी पूरा होगा, जब देश का प्रत्येक युवा अपनी जिम्मेदारी समझे और अपने क्षेत्र में पूरी ईमानदारी से योगदान दे। राकेश शर्मा के प्रसिद्ध संदेश ‘सारे जहां से अच्छा’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज भारत को अंतरिक्ष से दुनिया के सामने एक नई दृष्टि से प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी नई पीढ़ी की है। अंतरिक्ष से पृथ्वी की सुंदरता, शहरों की रोशनी, हिमालय और सीमाओं से परे एक साझा दुनिया दिखाई देती है। यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि हम सभी एक ही ग्रह का हिस्सा हैं। अपने जीवन की कहानी बताते हुए शुभांशु शुक्ला ने कहा कि उनके विद्यालय के दिनों का लखनऊ आज के लखनऊ से काफी अलग था। उस समय सुविधाएं सीमित थीं और अक्सर बिजली भी चली जाती थी। ऐसे माहौल में अंतरिक्ष तक पहुंचने का सपना देखना आसान नहीं था। उन्होंने कहा कि उन्होंने भी कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह अंतरिक्ष की यात्रा करेंगे, लेकिन बड़े सपने और लगातार मेहनत ने असंभव लगने वाले लक्ष्य को संभव बना दिया। उन्होंने कहा कि आज के युवाओं के पास शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में पहले से कहीं अधिक सुविधाएं हैं। जरूरत केवल इन संसाधनों का सही उपयोग करने और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि अंतरिक्ष यात्री भी आम इंसानों की तरह ही होते हैं। उनमें कोई जादुई शक्ति नहीं होती। अंतर केवल उनकी सोच, सपनों और उन्हें पूरा करने की दृढ़ता में होता है। शुभांशु शुक्ला ने बताया कि वर्ष 2019 उनके जीवन का बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव था। उस समय वह बेंगलुरु में थे, जब उन्हें अपने चयन का संदेश मिला। उन्होंने बताया कि संदेश मिलने के बाद वह कुछ देर तक अपनी गाड़ी के पास खड़े रहे और उस खुशी को महसूस करते रहे। सबसे पहले उन्होंने यह खबर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ साझा की। परिवार की खुशी ने उन्हें एहसास कराया कि यह उपलब्धि केवल उनकी नहीं, बल्कि पूरे परिवार की है। भारतीय वायुसेना में सेवा के दौरान मिले अनुभवों को याद करते हुए उन्होंने अपनी पत्नी कामना के योगदान को भी विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हर चुनौतीपूर्ण दौर में परिवार का सहयोग और विश्वास उनकी ताकत बना। उन्होंने युवाओं से कहा कि किसी भी व्यक्ति की सफलता के पीछे परिवार, मित्र, शिक्षक और सहयोगियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए सफलता के साथ उन लोगों का सम्मान करना भी जरूरी है, जिन्होंने यात्रा में साथ दिया। अंत में शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में कोई भी सपना असंभव नहीं है। जरूरत है कि लक्ष्य बड़ा हो, मेहनत ईमानदार हो और प्रयास लगातार जारी रहे। उन्होंने कहा, “बड़ा सपना देखने से मत डरिए। कई बार जो सपना असंभव लगता है, वही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाता है।” उन्होंने युवाओं से देश के विकास में योगदान देने और भारत के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया। *गोमती पुस्तक महोत्सव में गूंजी अंतरिक्ष की उड़ान की कहानी* ___________________________ 👉*ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का हुआ लोकार्पण* *लखनऊ।* राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत की ओर से आयोजित गोमती पुस्तक महोत्सव में मंगलवार को ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला के साथ विशेष संवाद सत्र ‘धरती से अंतरिक्ष तक सपनों की उड़ान’ आयोजित किया गया। इस अवसर पर उनकी अंग्रेजी पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का लोकार्पण उन्होंने अपने परिजनों के साथ संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम में भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने वीडियो संदेश से शुभांशु शुक्ला की पुस्तक और उनकी अंतरिक्ष यात्रा की सराहना करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं। पुस्तक के लोकार्पण के बाद शुभांशु शुक्ला ने छात्र-छात्राओं से संवाद किया और अपने बचपन, शिक्षा, भारतीय वायुसेना में सेवा, प्रशिक्षण तथा अंतरिक्ष तक पहुंचने की पूरी यात्रा के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने के बाद इंसान की सोच और नजरिया पूरी तरह बदल जाता है। उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष से न कोई देश दिखाई देता है, न कोई शहर और न ही कोई क्षेत्रीय सीमा। वहां से केवल एक सुंदर और एकीकृत पृथ्वी दिखाई देती है। उन्होंने विद्यार्थियों को समझाते हुए कहा कि यदि अंतरिक्ष में कोई एलियन उनसे पूछे कि वे कहां से आए हैं और वे अपने शहर या देश का नाम बताएं, तो शायद वह उसे न समझ पाए। लेकिन यदि वे कहें कि वे पृथ्वी से आए हैं, तो वह बात तुरंत समझ में आ जाएगी। अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने पर यह एहसास होता है कि धरती पर खींची गई सीमाएं कितनी छोटी हैं और हम सभी एक ही ग्रह के निवासी हैं। शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष यात्रा के शुरुआती क्षणों को याद करते हुए कहा कि जब वह पहली बार अंतरिक्ष की ओर रवाना हुए तो उनके मन में उत्साह के साथ एक तरह का डर भी था। उन्होंने उस स्थिति की तुलना परीक्षा कक्ष से की। जिस तरह परीक्षा शुरू होने से पहले कई बार सब कुछ जानते हुए भी कुछ क्षणों के लिए दिमाग खाली-सा हो जाता है, वैसा ही अनुभव उन्हें भी हुआ। हालांकि, उन्होंने खुद को संभाला और मानसिक रूप से मजबूत होकर मिशन पर आगे बढ़े। अंतरिक्ष में रहने के दौरान शरीर और दैनिक जीवन में कई तरह के बदलाव महसूस होते हैं। सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण के कारण शरीर की लंबाई कुछ बढ़ सकती है और पृथ्वी पर लौटने के बाद शरीर धीरे-धीरे अपनी सामान्य स्थिति में वापस आता है। वहां उठने-बैठने और चलने-फिरने का तरीका भी पृथ्वी से बिल्कुल अलग होता है। उन्होंने बताया कि यदि अंतरिक्ष में पानी गिराया जाए तो वह पृथ्वी की तरह नीचे नहीं गिरता, बल्कि छोटी-छोटी गोल बूंदों के रूप में तैरता रहता है। यही परिस्थितियां अंतरिक्ष में वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। शुभांशु शुक्ला ने बताया कि अपने मिशन के दौरान उन्होंने कई प्रयोग किए, जिनके माध्यम से सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण का मानव शरीर और आसपास के वातावरण पर प्रभाव समझने का प्रयास किया गया। लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने से मांसपेशियों पर भी असर पड़ता है। पृथ्वी की तरह शरीर को गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध काम नहीं करना पड़ता, इसलिए मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। इसी कारण अंतरिक्ष यात्रियों को नियमित व्यायाम करना पड़ता है। अंतरिक्ष यान के भीतर हवा, तापमान और पर्यावरण को भी नियंत्रित परिस्थितियों में रखा जाता है। पृथ्वी पर लौटने के बाद शरीर को दोबारा गुरुत्वाकर्षण के अनुकूल होने में समय लगता है। शुरुआत में चलना, बैठना और यहां तक कि लेटना भी असहज लग सकता है। शुक्ला ने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी पर लौटना भी उनके लिए एक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत अनुभव रहा। शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से कहा कि भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को लगातार नई ऊंचाइयों तक ले जा रहा है। देश गगनयान मिशन की तैयारी कर रहा है और भविष्य में चंद्रमा पर भारतीय मानव मिशन की दिशा में भी आगे बढ़ने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि यह सपना केवल कुछ वैज्ञानिकों या अंतरिक्ष यात्रियों का नहीं, बल्कि पूरे देश का सपना है। उन्होंने लखनऊ के युवाओं का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि इसी शहर का युवा भी अंतरिक्ष यात्री बन सकता है। इसके लिए निरंतर मेहनत, अनुशासन, समर्पण और मानसिक मजबूती जरूरी है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत का संकल्प तभी पूरा होगा, जब देश का प्रत्येक युवा अपनी जिम्मेदारी समझे और अपने क्षेत्र में पूरी ईमानदारी से योगदान दे। राकेश शर्मा के प्रसिद्ध संदेश ‘सारे जहां से अच्छा’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज भारत को अंतरिक्ष से दुनिया के सामने एक नई दृष्टि से प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी नई पीढ़ी की है। अंतरिक्ष से पृथ्वी की सुंदरता, शहरों की रोशनी, हिमालय और सीमाओं से परे एक साझा दुनिया दिखाई देती है। यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि हम सभी एक ही ग्रह का हिस्सा हैं। अपने जीवन की कहानी बताते हुए शुभांशु शुक्ला ने कहा कि उनके विद्यालय के दिनों का लखनऊ आज के लखनऊ से काफी अलग था। उस समय सुविधाएं सीमित थीं और अक्सर बिजली भी चली जाती थी। ऐसे माहौल में अंतरिक्ष तक पहुंचने का सपना देखना आसान नहीं था। उन्होंने कहा कि उन्होंने भी कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह अंतरिक्ष की यात्रा करेंगे, लेकिन बड़े सपने और लगातार मेहनत ने असंभव लगने वाले लक्ष्य को संभव बना दिया। उन्होंने कहा कि आज के युवाओं के पास शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में पहले से कहीं अधिक सुविधाएं हैं। जरूरत केवल इन संसाधनों का सही उपयोग करने और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि अंतरिक्ष यात्री भी आम इंसानों की तरह ही होते हैं। उनमें कोई जादुई शक्ति नहीं होती। अंतर केवल उनकी सोच, सपनों और उन्हें पूरा करने की दृढ़ता में होता है। शुभांशु शुक्ला ने बताया कि वर्ष 2019 उनके जीवन का बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव था। उस समय वह बेंगलुरु में थे, जब उन्हें अपने चयन का संदेश मिला। उन्होंने बताया कि संदेश मिलने के बाद वह कुछ देर तक अपनी गाड़ी के पास खड़े रहे और उस खुशी को महसूस करते रहे। सबसे पहले उन्होंने यह खबर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ साझा की। परिवार की खुशी ने उन्हें एहसास कराया कि यह उपलब्धि केवल उनकी नहीं, बल्कि पूरे परिवार की है। भारतीय वायुसेना में सेवा के दौरान मिले अनुभवों को याद करते हुए उन्होंने अपनी पत्नी कामना के योगदान को भी विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हर चुनौतीपूर्ण दौर में परिवार का सहयोग और विश्वास उनकी ताकत बना। उन्होंने युवाओं से कहा कि किसी भी व्यक्ति की सफलता के पीछे परिवार, मित्र, शिक्षक और सहयोगियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए सफलता के साथ उन लोगों का सम्मान करना भी जरूरी है, जिन्होंने यात्रा में साथ दिया। अंत में शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में कोई भी सपना असंभव नहीं है। जरूरत है कि लक्ष्य बड़ा हो, मेहनत ईमानदार हो और प्रयास लगातार जारी रहे। उन्होंने कहा, “बड़ा सपना देखने से मत डरिए। कई बार जो सपना असंभव लगता है, वही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाता है।” उन्होंने युवाओं से देश के विकास में योगदान देने और भारत के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया।
*गोमती पुस्तक महोत्सव में गूंजी अंतरिक्ष की उड़ान की कहानी* ___________________________ 👉*ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का हुआ लोकार्पण* *लखनऊ।* राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत की ओर से आयोजित गोमती पुस्तक महोत्सव में मंगलवार को ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला के साथ विशेष संवाद सत्र ‘धरती से अंतरिक्ष तक सपनों की उड़ान’ आयोजित किया गया। इस अवसर पर उनकी अंग्रेजी पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का लोकार्पण उन्होंने अपने परिजनों के साथ संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम में भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने वीडियो संदेश से शुभांशु शुक्ला की पुस्तक और उनकी अंतरिक्ष यात्रा की सराहना करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं। पुस्तक के लोकार्पण के बाद शुभांशु शुक्ला ने छात्र-छात्राओं से संवाद किया और अपने बचपन, शिक्षा, भारतीय वायुसेना में सेवा, प्रशिक्षण तथा अंतरिक्ष तक पहुंचने की पूरी यात्रा के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने के बाद इंसान की सोच और नजरिया पूरी तरह बदल जाता है। उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष से न कोई देश दिखाई देता है, न कोई शहर और न ही कोई क्षेत्रीय सीमा। वहां से केवल एक सुंदर और एकीकृत पृथ्वी दिखाई देती है। उन्होंने विद्यार्थियों को समझाते हुए कहा कि यदि अंतरिक्ष में कोई एलियन उनसे पूछे कि वे कहां से आए हैं और वे अपने शहर या देश का नाम बताएं, तो शायद वह उसे न समझ पाए। लेकिन यदि वे कहें कि वे पृथ्वी से आए हैं, तो वह बात तुरंत समझ में आ जाएगी। अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने पर यह एहसास होता है कि धरती पर खींची गई सीमाएं कितनी छोटी हैं और हम सभी एक ही ग्रह के निवासी हैं। शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष यात्रा के शुरुआती क्षणों को याद करते हुए कहा कि जब वह पहली बार अंतरिक्ष की ओर रवाना हुए तो उनके मन में उत्साह के साथ एक तरह का डर भी था। उन्होंने उस स्थिति की तुलना परीक्षा कक्ष से की। जिस तरह परीक्षा शुरू होने से पहले कई बार सब कुछ जानते हुए भी कुछ क्षणों के लिए दिमाग खाली-सा हो जाता है, वैसा ही अनुभव उन्हें भी हुआ। हालांकि, उन्होंने खुद को संभाला और मानसिक रूप से मजबूत होकर मिशन पर आगे बढ़े। अंतरिक्ष में रहने के दौरान शरीर और दैनिक जीवन में कई तरह के बदलाव महसूस होते हैं। सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण के कारण शरीर की लंबाई कुछ बढ़ सकती है और पृथ्वी पर लौटने के बाद शरीर धीरे-धीरे अपनी सामान्य स्थिति में वापस आता है। वहां उठने-बैठने और चलने-फिरने का तरीका भी पृथ्वी से बिल्कुल अलग होता है। उन्होंने बताया कि यदि अंतरिक्ष में पानी गिराया जाए तो वह पृथ्वी की तरह नीचे नहीं गिरता, बल्कि छोटी-छोटी गोल बूंदों के रूप में तैरता रहता है। यही परिस्थितियां अंतरिक्ष में वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। शुभांशु शुक्ला ने बताया कि अपने मिशन के दौरान उन्होंने कई प्रयोग किए, जिनके माध्यम से सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण का मानव शरीर और आसपास के वातावरण पर प्रभाव समझने का प्रयास किया गया। लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने से मांसपेशियों पर भी असर पड़ता है। पृथ्वी की तरह शरीर को गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध काम नहीं करना पड़ता, इसलिए मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। इसी कारण अंतरिक्ष यात्रियों को नियमित व्यायाम करना पड़ता है। अंतरिक्ष यान के भीतर हवा, तापमान और पर्यावरण को भी नियंत्रित परिस्थितियों में रखा जाता है। पृथ्वी पर लौटने के बाद शरीर को दोबारा गुरुत्वाकर्षण के अनुकूल होने में समय लगता है। शुरुआत में चलना, बैठना और यहां तक कि लेटना भी असहज लग सकता है। शुक्ला ने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी पर लौटना भी उनके लिए एक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत अनुभव रहा। शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से कहा कि भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को लगातार नई ऊंचाइयों तक ले जा रहा है। देश गगनयान मिशन की तैयारी कर रहा है और भविष्य में चंद्रमा पर भारतीय मानव मिशन की दिशा में भी आगे बढ़ने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि यह सपना केवल कुछ वैज्ञानिकों या अंतरिक्ष यात्रियों का नहीं, बल्कि पूरे देश का सपना है। उन्होंने लखनऊ के युवाओं का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि इसी शहर का युवा भी अंतरिक्ष यात्री बन सकता है। इसके लिए निरंतर मेहनत, अनुशासन, समर्पण और मानसिक मजबूती जरूरी है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत का संकल्प तभी पूरा होगा, जब देश का प्रत्येक युवा अपनी जिम्मेदारी समझे और अपने क्षेत्र में पूरी ईमानदारी से योगदान दे। राकेश शर्मा के प्रसिद्ध संदेश ‘सारे जहां से अच्छा’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज भारत को अंतरिक्ष से दुनिया के सामने एक नई दृष्टि से प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी नई पीढ़ी की है। अंतरिक्ष से पृथ्वी की सुंदरता, शहरों की रोशनी, हिमालय और सीमाओं से परे एक साझा दुनिया दिखाई देती है। यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि हम सभी एक ही ग्रह का हिस्सा हैं। अपने जीवन की कहानी बताते हुए शुभांशु शुक्ला ने कहा कि उनके विद्यालय के दिनों का लखनऊ आज के लखनऊ से काफी अलग था। उस समय सुविधाएं सीमित थीं और अक्सर बिजली भी चली जाती थी। ऐसे माहौल में अंतरिक्ष तक पहुंचने का सपना देखना आसान नहीं था। उन्होंने कहा कि उन्होंने भी कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह अंतरिक्ष की यात्रा करेंगे, लेकिन बड़े सपने और लगातार मेहनत ने असंभव लगने वाले लक्ष्य को संभव बना दिया। उन्होंने कहा कि आज के युवाओं के पास शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में पहले से कहीं अधिक सुविधाएं हैं। जरूरत केवल इन संसाधनों का सही उपयोग करने और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि अंतरिक्ष यात्री भी आम इंसानों की तरह ही होते हैं। उनमें कोई जादुई शक्ति नहीं होती। अंतर केवल उनकी सोच, सपनों और उन्हें पूरा करने की दृढ़ता में होता है। शुभांशु शुक्ला ने बताया कि वर्ष 2019 उनके जीवन का बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव था। उस समय वह बेंगलुरु में थे, जब उन्हें अपने चयन का संदेश मिला। उन्होंने बताया कि संदेश मिलने के बाद वह कुछ देर तक अपनी गाड़ी के पास खड़े रहे और उस खुशी को महसूस करते रहे। सबसे पहले उन्होंने यह खबर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ साझा की। परिवार की खुशी ने उन्हें एहसास कराया कि यह उपलब्धि केवल उनकी नहीं, बल्कि पूरे परिवार की है। भारतीय वायुसेना में सेवा के दौरान मिले अनुभवों को याद करते हुए उन्होंने अपनी पत्नी कामना के योगदान को भी विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हर चुनौतीपूर्ण दौर में परिवार का सहयोग और विश्वास उनकी ताकत बना। उन्होंने युवाओं से कहा कि किसी भी व्यक्ति की सफलता के पीछे परिवार, मित्र, शिक्षक और सहयोगियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए सफलता के साथ उन लोगों का सम्मान करना भी जरूरी है, जिन्होंने यात्रा में साथ दिया। अंत में शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में कोई भी सपना असंभव नहीं है। जरूरत है कि लक्ष्य बड़ा हो, मेहनत ईमानदार हो और प्रयास लगातार जारी रहे। उन्होंने कहा, “बड़ा सपना देखने से मत डरिए। कई बार जो सपना असंभव लगता है, वही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाता है।” उन्होंने युवाओं से देश के विकास में योगदान देने और भारत के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया। *गोमती पुस्तक महोत्सव में गूंजी अंतरिक्ष की उड़ान की कहानी* ___________________________ 👉*ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का हुआ लोकार्पण* *लखनऊ।* राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत की ओर से आयोजित गोमती पुस्तक महोत्सव में मंगलवार को ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला के साथ विशेष संवाद सत्र ‘धरती से अंतरिक्ष तक सपनों की उड़ान’ आयोजित किया गया। इस अवसर पर उनकी अंग्रेजी पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का लोकार्पण उन्होंने अपने परिजनों के साथ संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम में भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने वीडियो संदेश से शुभांशु शुक्ला की पुस्तक और उनकी अंतरिक्ष यात्रा की सराहना करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं। पुस्तक के लोकार्पण के बाद शुभांशु शुक्ला ने छात्र-छात्राओं से संवाद किया और अपने बचपन, शिक्षा, भारतीय वायुसेना में सेवा, प्रशिक्षण तथा अंतरिक्ष तक पहुंचने की पूरी यात्रा के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने के बाद इंसान की सोच और नजरिया पूरी तरह बदल जाता है। उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष से न कोई देश दिखाई देता है, न कोई शहर और न ही कोई क्षेत्रीय सीमा। वहां से केवल एक सुंदर और एकीकृत पृथ्वी दिखाई देती है। उन्होंने विद्यार्थियों को समझाते हुए कहा कि यदि अंतरिक्ष में कोई एलियन उनसे पूछे कि वे कहां से आए हैं और वे अपने शहर या देश का नाम बताएं, तो शायद वह उसे न समझ पाए। लेकिन यदि वे कहें कि वे पृथ्वी से आए हैं, तो वह बात तुरंत समझ में आ जाएगी। अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने पर यह एहसास होता है कि धरती पर खींची गई सीमाएं कितनी छोटी हैं और हम सभी एक ही ग्रह के निवासी हैं। शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष यात्रा के शुरुआती क्षणों को याद करते हुए कहा कि जब वह पहली बार अंतरिक्ष की ओर रवाना हुए तो उनके मन में उत्साह के साथ एक तरह का डर भी था। उन्होंने उस स्थिति की तुलना परीक्षा कक्ष से की। जिस तरह परीक्षा शुरू होने से पहले कई बार सब कुछ जानते हुए भी कुछ क्षणों के लिए दिमाग खाली-सा हो जाता है, वैसा ही अनुभव उन्हें भी हुआ। हालांकि, उन्होंने खुद को संभाला और मानसिक रूप से मजबूत होकर मिशन पर आगे बढ़े। अंतरिक्ष में रहने के दौरान शरीर और दैनिक जीवन में कई तरह के बदलाव महसूस होते हैं। सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण के कारण शरीर की लंबाई कुछ बढ़ सकती है और पृथ्वी पर लौटने के बाद शरीर धीरे-धीरे अपनी सामान्य स्थिति में वापस आता है। वहां उठने-बैठने और चलने-फिरने का तरीका भी पृथ्वी से बिल्कुल अलग होता है। उन्होंने बताया कि यदि अंतरिक्ष में पानी गिराया जाए तो वह पृथ्वी की तरह नीचे नहीं गिरता, बल्कि छोटी-छोटी गोल बूंदों के रूप में तैरता रहता है। यही परिस्थितियां अंतरिक्ष में वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। शुभांशु शुक्ला ने बताया कि अपने मिशन के दौरान उन्होंने कई प्रयोग किए, जिनके माध्यम से सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण का मानव शरीर और आसपास के वातावरण पर प्रभाव समझने का प्रयास किया गया। लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने से मांसपेशियों पर भी असर पड़ता है। पृथ्वी की तरह शरीर को गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध काम नहीं करना पड़ता, इसलिए मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। इसी कारण अंतरिक्ष यात्रियों को नियमित व्यायाम करना पड़ता है। अंतरिक्ष यान के भीतर हवा, तापमान और पर्यावरण को भी नियंत्रित परिस्थितियों में रखा जाता है। पृथ्वी पर लौटने के बाद शरीर को दोबारा गुरुत्वाकर्षण के अनुकूल होने में समय लगता है। शुरुआत में चलना, बैठना और यहां तक कि लेटना भी असहज लग सकता है। शुक्ला ने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी पर लौटना भी उनके लिए एक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत अनुभव रहा। शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से कहा कि भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को लगातार नई ऊंचाइयों तक ले जा रहा है। देश गगनयान मिशन की तैयारी कर रहा है और भविष्य में चंद्रमा पर भारतीय मानव मिशन की दिशा में भी आगे बढ़ने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि यह सपना केवल कुछ वैज्ञानिकों या अंतरिक्ष यात्रियों का नहीं, बल्कि पूरे देश का सपना है। उन्होंने लखनऊ के युवाओं का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि इसी शहर का युवा भी अंतरिक्ष यात्री बन सकता है। इसके लिए निरंतर मेहनत, अनुशासन, समर्पण और मानसिक मजबूती जरूरी है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत का संकल्प तभी पूरा होगा, जब देश का प्रत्येक युवा अपनी जिम्मेदारी समझे और अपने क्षेत्र में पूरी ईमानदारी से योगदान दे। राकेश शर्मा के प्रसिद्ध संदेश ‘सारे जहां से अच्छा’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज भारत को अंतरिक्ष से दुनिया के सामने एक नई दृष्टि से प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी नई पीढ़ी की है। अंतरिक्ष से पृथ्वी की सुंदरता, शहरों की रोशनी, हिमालय और सीमाओं से परे एक साझा दुनिया दिखाई देती है। यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि हम सभी एक ही ग्रह का हिस्सा हैं। अपने जीवन की कहानी बताते हुए शुभांशु शुक्ला ने कहा कि उनके विद्यालय के दिनों का लखनऊ आज के लखनऊ से काफी अलग था। उस समय सुविधाएं सीमित थीं और अक्सर बिजली भी चली जाती थी। ऐसे माहौल में अंतरिक्ष तक पहुंचने का सपना देखना आसान नहीं था। उन्होंने कहा कि उन्होंने भी कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह अंतरिक्ष की यात्रा करेंगे, लेकिन बड़े सपने और लगातार मेहनत ने असंभव लगने वाले लक्ष्य को संभव बना दिया। उन्होंने कहा कि आज के युवाओं के पास शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में पहले से कहीं अधिक सुविधाएं हैं। जरूरत केवल इन संसाधनों का सही उपयोग करने और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि अंतरिक्ष यात्री भी आम इंसानों की तरह ही होते हैं। उनमें कोई जादुई शक्ति नहीं होती। अंतर केवल उनकी सोच, सपनों और उन्हें पूरा करने की दृढ़ता में होता है। शुभांशु शुक्ला ने बताया कि वर्ष 2019 उनके जीवन का बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव था। उस समय वह बेंगलुरु में थे, जब उन्हें अपने चयन का संदेश मिला। उन्होंने बताया कि संदेश मिलने के बाद वह कुछ देर तक अपनी गाड़ी के पास खड़े रहे और उस खुशी को महसूस करते रहे। सबसे पहले उन्होंने यह खबर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ साझा की। परिवार की खुशी ने उन्हें एहसास कराया कि यह उपलब्धि केवल उनकी नहीं, बल्कि पूरे परिवार की है। भारतीय वायुसेना में सेवा के दौरान मिले अनुभवों को याद करते हुए उन्होंने अपनी पत्नी कामना के योगदान को भी विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हर चुनौतीपूर्ण दौर में परिवार का सहयोग और विश्वास उनकी ताकत बना। उन्होंने युवाओं से कहा कि किसी भी व्यक्ति की सफलता के पीछे परिवार, मित्र, शिक्षक और सहयोगियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए सफलता के साथ उन लोगों का सम्मान करना भी जरूरी है, जिन्होंने यात्रा में साथ दिया। अंत में शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में कोई भी सपना असंभव नहीं है। जरूरत है कि लक्ष्य बड़ा हो, मेहनत ईमानदार हो और प्रयास लगातार जारी रहे। उन्होंने कहा, “बड़ा सपना देखने से मत डरिए। कई बार जो सपना असंभव लगता है, वही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाता है।” उन्होंने युवाओं से देश के विकास में योगदान देने और भारत के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया।
- गरीबों के मुंह से छीन रहे निवाला / गरीबों के हक पर डाल रहे डाका लोटन ब्लाक के ग्राम पंचायत बनियाडीह में सरकार द्वारा दिया जा रहा सस्ता गला को कोटेदार द्वारा बांटा भी जा रहा है और वहीं से बेचा भी जा रहा है जैसा की वीडियो में साथ दिखाई दे रहा है बोरी भर कर रखा हुआ अब देखना है खबर वायरल होने पर विभाग क्या कहता है जबकि ग्रामीणों का आरोप है कि इसमें ऊपर से लेकर नीचे तक सब लोग मिले हुए हैं3
- नैनो उर्वरक अपनाने पर जोर, बिक्री केंद्र प्रभारियों को दिया प्रशिक्षण सिद्धार्थनगर जिले के कृषि भवन सभागार में मंगलवार को इफको की ओर से नैनो उर्वरक एवं अन्य कृषि उत्पादों को लेकर बिक्री केंद्र प्रभारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता इफको डेलिगेट हनुमंत प्रताप सिंह ने की, जबकि मुख्य अतिथि उप कृषि निदेशक राजेश कुमार रहे। प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों ने बिक्री केंद्र प्रभारियों से किसानों को संतुलित उर्वरक प्रयोग के प्रति जागरूक करने का आह्वान किया। अधिकारियों ने कहा कि किसान यूरिया और डीएपी का आवश्यकता से अधिक प्रयोग न करें। मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने के लिए नैनो यूरिया प्लस और नैनो डीएपी जैसे उत्पादों के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाए। जिला कृषि अधिकारी रवि शंकर पाण्डेय ने कहा कि बिक्री केंद्र प्रभारी किसानों को दानेदार उर्वरकों का अनावश्यक एवं अधिक मात्रा में प्रयोग करने से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी दें। उन्होंने किसानों को यूरिया और डीएपी की मात्रा कम करने तथा नैनो उर्वरकों के उपयोग के लिए प्रेरित करने पर जोर दिया। इफको एमसी के क्षेत्रीय अधिकारी योगेंद्र कुमार ने कृषि दवाओं की जानकारी देते हुए बताया कि किसानों को उचित मूल्य पर गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इफको एमसी की दवाओं की खरीद पर निःशुल्क बीमा की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी। कार्यक्रम में इफको के क्षेत्रीय अधिकारी शिशुपाल, आईएफएफडीसी के आलोक दीक्षित, संजय मौर्य समेत करीब 60 इफको बिक्री केंद्रों के प्रभारी मौजूद रहे।1
- संतकबीरनगर- दलित महिला पर अत्याचार से बौखलाए मेहदावल विधायक अनिल त्रिपाठी, थाने पहुंचकर पुलिस को लगाई जमकर फटकार: थानाध्यक्ष से तीखी नोकझोंक, थाने में मचा हड़कंप। फरीदाबाद मेहदावल क्षेत्र में एक दलित महिला पर हुए कथित अत्याचार के मामले ने तूल पकड़ लिया है। मामले की जानकारी मिलते ही मेहदावल विधायक अनिल त्रिपाठी आगबबूला हो गए और तुरंत अपने समर्थकों के साथ मेहदावल थाने पहुंच गए। थाने पहुंचते ही विधायक अनिल त्रिपाठी ने पुलिस अधिकारियों की कार्यशैली पर कड़ा रोष जताया और जमकर फटकार लगाई। उन्होंने दलित महिला के मामले में पुलिस की लापरवाही और हीलाहवाली पर सवाल उठाते हुए तत्काल सख्त कार्रवाई की मांग की। बताया जा रहा है कि जनता की समस्याओं और महिला के साथ हुए अत्याचार को लेकर विधायक त्रिपाठी की मेहदावल थाना अध्यक्ष से तीखी नोकझोंक भी हुई। थाने के अंदर चले इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के दौरान थाने में हड़कंप का माहौल बना रहा। विधायक अनिल त्रिपाठी ने कहा कि गरीब, दलित और असहाय महिला पर अत्याचार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि दोषियों पर तत्काल कार्रवाई नहीं हुई तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा। इस घटना के बाद क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म है और पुलिस प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है।1
- मिशन शक्ति फेज-5.0: महिलाओं और बालिकाओं को किया जागरूक | महिला सुरक्षा व साइबर अपराध से बचाव महराजगंज के कोठीभार थाना क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय में मिशन शक्ति फेज-5.0 के तहत जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। पुलिस टीम ने महिलाओं और बालिकाओं को महिला सुरक्षा, साइबर अपराध, नए कानून, बाल विवाह, दहेज प्रथा और घरेलू हिंसा के प्रति जागरूक किया। साथ ही 112, 1090, 181 और 1930 हेल्पलाइन नंबरों की जानकारी दी गई।1
- फरेंदा क्षेत्र के सेमरा महराज गांव में चार मकान पर चला बुलडोजर, हाईकोर्ट के आदेश एवं तहसीलदार न्यायिक मजिस्ट्रेट की बेदखली फरेंदा सर्किल के चार थाने की फोर्स मौके पर मौजूद रहीं। धारा 67 के तहत हुई कार्रवाई - फरेंदा एसडीएम #mahararagnj #police #sdm1
- सोनौली में कांग्रेस का कार्यकर्ता सम्मेलन, संगठन की मजबूती और आगामी रणनीति पर मंथन — सुरेश मणि त्रिपाठी, बरिष्ठ कांग्रेस नेता सोनौली में कांग्रेस का कार्यकर्ता सम्मेलन, संगठन की मजबूती और आगामी रणनीति पर मंथन — सुरेश मणि त्रिपाठी, बरिष्ठ कांग्रेस नेता1
- शिकायत है❗ 15-9-2026 ई०, ‼️ लघु शंकर ( पेशाब) करने के लिए ₹5 लगता है ⁉️✍️ स्थान ( Location📍) :- खलीलाबाद ( खलीलाबाद नगर निगम) क्षेत्र , जनपद :- संत कबीर नगर , उत्तर प्रदेश! यह खलीलाबाद शहर है । खलीलाबाद बाईपास के नजदीक, दक्षिण दिशा में चलता फिरता शौचालय बनाया गया है। यहां पर लघुशंका करने की कोई व्यवस्था नहीं है । इस शौचालय को चलाने वाला इसका ठेकेदार पेशाब करने के लिए ₹5 की वसूली करता है।। नगर निगम खलीलाबाद को क्या पता नहीं है ❓ खलीलाबाद नगर निगम को इसकी जानकारी नहीं है ❓ शौचालय निर्माण के लिए यहां पर जगह मौजूद है❗ लेकिन अधिकारी हाथ पर हाथ करें बैठे हुऎ हैं❗✅ खलीलाबाद नगर निगम (खलीलाबाद शहर ) जनपद:- संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश!1
- अपर निदेशक ने संयुक्त चिकित्सालय की परखी स्वास्थ्य सेवाएं, कमियां सुधारने के दिए निर्देश सिद्धार्थनगर जिले के बांसी स्थित 50 शैय्यायुक्त संयुक्त चिकित्सालय का सोमवार को बस्ती मंडल के अपर निदेशक चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग नीरज कुमार पांडेय ने निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने अस्पताल की व्यवस्थाओं और मरीजों को उपलब्ध कराई जा रही स्वास्थ्य सुविधाओं का जायजा लेने के साथ चिकित्सकों व स्वास्थ्य कर्मियों के साथ विभागीय कार्यों की समीक्षा बैठक भी की। निरीक्षण के दौरान अपर निदेशक ने अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड, ओपीडी, मेडिसिन विभाग, पैथोलॉजी लैब, आयुष्मान कार्ड केंद्र और आयुष्मान आरोग्य दवा वितरण केंद्र व एक्सरे विभाग का गहनता से निरीक्षण किया। उन्होंने संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों से व्यवस्थाओं और सेवाओं की जानकारी लेते हुए आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। अपर निदेशक ने अस्पताल में भर्ती मरीजों से भी बातचीत कर उन्हें मिल रही स्वास्थ्य सुविधाओं, दवाओं और उपचार की स्थिति के बारे में जानकारी ली। उन्होंने स्वास्थ्य कर्मियों को मरीजों को बेहतर उपचार एवं सुविधाएं उपलब्ध कराने तथा अस्पताल में मिली कमियों को तत्काल दूर करने के निर्देश दिए। इस दौरान डॉ. रविकांत सिंह, डॉ. एमके चौधरी, डॉ. ध्रुव चौधरी, डॉ. अश्वनी चौधरी, डॉ. अफरोज नैयर, डॉ. राक्शा मुमताज, डॉ. संजय शर्मा, दीपक वर्मा, चीफ फार्मासिस्ट रत्न शंकर चौधरी, राजेंद्र चौधरी, राजेश बाबू, बिंदु, रेनू भारती, गीता भारती, अर्चना मैसी, केके पांडेय, भानु प्रताप, प्रदीप मिश्रा, प्रियंका, मनोज मिश्रा, कंचन यादव सहित अन्य स्वास्थ्य कर्मी मौजूद रहे।1