राजस्थान के बारां जिले की छबड़ा तहसील में तेलनी ग्राम पंचायत के निकट प्रकृति के बीच स्थित ऐतिहासिक कोटड़ा मेघनाथ का किला आज सरकारी उपेक्षा के चलते महज खंडहर के रूप में तब्दील हो चुका है। छबड़ा कस्बे से करीब 20 किलोमीटर दूर हिंगलोट और नियामतपुर बाँधों के बीच पहाड़ी पर बना यह दुर्ग अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। जंगलों से होकर जाने वाले दुर्गम रास्तों के बीच स्थित इस मौन गवाह को इतिहास की किताबों में भले ही जगह नहीं मिल सकी हो, लेकिन यह स्थानीय लोगों की स्मृतियों में आज भी जीवित है। स्थानीय जनश्रुतियों और इसकी स्थापत्य शैली के अनुसार, इस किले का निर्माण संभवतः 11वीं से 15वीं शताब्दी के बीच खींची चौहानों द्वारा कराया गया था। यह किला गागरोन दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। बड़े-बड़े पत्थरों को चूने से जोड़कर बने इस किले के मुख्य दुर्ग क्षेत्र, आवासीय व मंदिर परिसर और गुप्त सुरंगों व जल स्रोतों के अवशेष आज भी दिखाई देते हैं। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, यह किला खींची चौहानों की संकटकालीन राजधानी और सैन्य छावनी था, जहां से आसपास के क्षेत्रों पर नजर रखी जाती थी। इसके साथ ही, अंग्रेजी शासनकाल में भी इस किले से कर वसूला जाता था। यहाँ हनुमान जी के मंदिर के साथ-साथ राजस्थान का एकमात्र मेघनाथ मंदिर भी स्थित है, जहां हर चतुर्दशी को विशेष पूजा की जाती है और मान्यता है कि यहाँ आने से हर समस्या का समाधान हो जाता है। वर्तमान समय में प्राकृतिक क्षरण और देखरेख के अभाव में इस किले की दीवारें गिर चुकी हैं। इस प्राचीन धरोहर को बचाने के लिए सेवानिवृत्त व्याख्याता और भूगोलवेत्ता एस.एल. नागर ने छबड़ा तहसील की प्राचीन विरासतों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया है। लेखक व अध्यापक अरविंद गुर्जर का कहना है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राजस्थान पर्यटन विभाग को इस किले का अध्ययन कर इसे संरक्षित करना चाहिए और पर्यटन के रूप में विकसित करना चाहिए। उन्होंने स्थानीय युवाओं और इतिहास प्रेमियों से भी इस अमूल्य धरोहर को बचाने के लिए आगे आने की अपील की है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस विरासत को सुरक्षित रखा जा सके।
राजस्थान के बारां जिले की छबड़ा तहसील में तेलनी ग्राम पंचायत के निकट प्रकृति के बीच स्थित ऐतिहासिक कोटड़ा मेघनाथ का किला आज सरकारी उपेक्षा के चलते महज खंडहर के रूप में तब्दील हो चुका है। छबड़ा कस्बे से करीब 20 किलोमीटर दूर हिंगलोट और नियामतपुर बाँधों के बीच पहाड़ी पर बना यह दुर्ग अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। जंगलों से होकर जाने वाले दुर्गम रास्तों के बीच स्थित इस मौन गवाह को इतिहास की किताबों में भले ही जगह नहीं मिल सकी हो, लेकिन यह स्थानीय
लोगों की स्मृतियों में आज भी जीवित है। स्थानीय जनश्रुतियों और इसकी स्थापत्य शैली के अनुसार, इस किले का निर्माण संभवतः 11वीं से 15वीं शताब्दी के बीच खींची चौहानों द्वारा कराया गया था। यह किला गागरोन दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। बड़े-बड़े पत्थरों को चूने से जोड़कर बने इस किले के मुख्य दुर्ग क्षेत्र, आवासीय व मंदिर परिसर और गुप्त सुरंगों व जल स्रोतों के अवशेष आज भी दिखाई देते हैं। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, यह किला खींची चौहानों की संकटकालीन राजधानी और सैन्य
छावनी था, जहां से आसपास के क्षेत्रों पर नजर रखी जाती थी। इसके साथ ही, अंग्रेजी शासनकाल में भी इस किले से कर वसूला जाता था। यहाँ हनुमान जी के मंदिर के साथ-साथ राजस्थान का एकमात्र मेघनाथ मंदिर भी स्थित है, जहां हर चतुर्दशी को विशेष पूजा की जाती है और मान्यता है कि यहाँ आने से हर समस्या का समाधान हो जाता है। वर्तमान समय में प्राकृतिक क्षरण और देखरेख के अभाव में इस किले की दीवारें गिर चुकी हैं। इस प्राचीन धरोहर को बचाने के लिए सेवानिवृत्त व्याख्याता
और भूगोलवेत्ता एस.एल. नागर ने छबड़ा तहसील की प्राचीन विरासतों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया है। लेखक व अध्यापक अरविंद गुर्जर का कहना है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राजस्थान पर्यटन विभाग को इस किले का अध्ययन कर इसे संरक्षित करना चाहिए और पर्यटन के रूप में विकसित करना चाहिए। उन्होंने स्थानीय युवाओं और इतिहास प्रेमियों से भी इस अमूल्य धरोहर को बचाने के लिए आगे आने की अपील की है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस विरासत को सुरक्षित रखा जा सके।
- राजस्थान के बारां जिले की छबड़ा तहसील में तेलनी ग्राम पंचायत के निकट प्रकृति के बीच स्थित ऐतिहासिक कोटड़ा मेघनाथ का किला आज सरकारी उपेक्षा के चलते महज खंडहर के रूप में तब्दील हो चुका है। छबड़ा कस्बे से करीब 20 किलोमीटर दूर हिंगलोट और नियामतपुर बाँधों के बीच पहाड़ी पर बना यह दुर्ग अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। जंगलों से होकर जाने वाले दुर्गम रास्तों के बीच स्थित इस मौन गवाह को इतिहास की किताबों में भले ही जगह नहीं मिल सकी हो, लेकिन यह स्थानीय लोगों की स्मृतियों में आज भी जीवित है। स्थानीय जनश्रुतियों और इसकी स्थापत्य शैली के अनुसार, इस किले का निर्माण संभवतः 11वीं से 15वीं शताब्दी के बीच खींची चौहानों द्वारा कराया गया था। यह किला गागरोन दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। बड़े-बड़े पत्थरों को चूने से जोड़कर बने इस किले के मुख्य दुर्ग क्षेत्र, आवासीय व मंदिर परिसर और गुप्त सुरंगों व जल स्रोतों के अवशेष आज भी दिखाई देते हैं। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, यह किला खींची चौहानों की संकटकालीन राजधानी और सैन्य छावनी था, जहां से आसपास के क्षेत्रों पर नजर रखी जाती थी। इसके साथ ही, अंग्रेजी शासनकाल में भी इस किले से कर वसूला जाता था। यहाँ हनुमान जी के मंदिर के साथ-साथ राजस्थान का एकमात्र मेघनाथ मंदिर भी स्थित है, जहां हर चतुर्दशी को विशेष पूजा की जाती है और मान्यता है कि यहाँ आने से हर समस्या का समाधान हो जाता है। वर्तमान समय में प्राकृतिक क्षरण और देखरेख के अभाव में इस किले की दीवारें गिर चुकी हैं। इस प्राचीन धरोहर को बचाने के लिए सेवानिवृत्त व्याख्याता और भूगोलवेत्ता एस.एल. नागर ने छबड़ा तहसील की प्राचीन विरासतों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया है। लेखक व अध्यापक अरविंद गुर्जर का कहना है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राजस्थान पर्यटन विभाग को इस किले का अध्ययन कर इसे संरक्षित करना चाहिए और पर्यटन के रूप में विकसित करना चाहिए। उन्होंने स्थानीय युवाओं और इतिहास प्रेमियों से भी इस अमूल्य धरोहर को बचाने के लिए आगे आने की अपील की है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस विरासत को सुरक्षित रखा जा सके।4
- राजस्थान के बारां जिले के छीपाबड़ौद स्थित स्टेडियम में समुद्र मंथन प्राणायाम के सांध्यकालीन सत्र का आयोजन किया गया।1
- झालावाड़ के खानपुर में मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर शहीद मुकुट बिहारी मीणा को शत-शत नमन किया जा रहा है। वीरों के इस महान बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। शहीद मुकुट बिहारी मीणा का अद्वितीय साहस, त्याग और राष्ट्रप्रेम हम सभी के लिए सदैव एक प्रेरणास्रोत बना रहेगा। देश की रक्षा में सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीर शहीद को याद करते हुए 'शहीद मुकुट बिहारी मीणा अमर रहें' और 'जय हिंद' के उद्घोष के साथ उनके प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त की जा रही है।1
- मध्य प्रदेश में ऐतिहासिक गोदावर्मन बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। भ्रष्टाचार विरोधी संस्था 'सिस्टम परिवर्तन अभियान' (Crusaders Against Corruption) ने मध्य प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद राज्य में अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई है। संस्था ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि 15 मई 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने गोदावर्मन प्रकरण में महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए राज्यों को निर्देश दिए थे कि वास्तविक रूप से वन श्रेणी में आने वाली सभी जमीनों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाए। इसके तहत वन भूमि से अवैध कब्जे हटाने, अवैध उपयोग की स्थिति में संबंधितों से भूमि का मूल्य वसूलने और उस राशि का उपयोग वनीकरण व वन संरक्षण में करने का निर्देश था। संगठन का आरोप है कि इस आदेश के लगभग 14 महीने बीत जाने के बाद भी मध्य प्रदेश में न तो अतिक्रमण हटाया गया है और न ही अवैध उपयोगकर्ताओं से भूमि की कीमत वसूली गई है, जबकि कई क्षेत्रों में वन भूमि पर निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियां लगातार जारी हैं। पत्र में सीहोर वनमंडल के एक मामले को प्रमुखता से उठाते हुए आरोप लगाया गया है कि लगभग 50 लाख वर्गफुट वन भूमि पर्यटन विभाग को हस्तांतरित कर दी गई, जहां अब एक निजी होटल और रिसॉर्ट परियोजना विकसित की जा रही है। संस्था का दावा है कि इस वन क्षेत्र में बड़ी संख्या में पेड़ मौजूद थे और निर्माण के चलते यह क्षेत्र प्रभावित हुआ है। संगठन ने पूरे प्रदेश में वन भूमि का सर्वे कराने, अवैध कब्जे हटाने, भूमि का मूल्य वसूलने और दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की मांग की है। हालांकि, इन आरोपों की वन विभाग या किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा पुष्टि नहीं की गई है और इस मामले पर फिलहाल वन विभाग की प्रतिक्रिया आना बाकी है।1
- कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस हवाई अड्डे (दमदम हवाई अड्डा) की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा कदम उठाते हुए रनवे के बेहद करीब स्थित सदी पुरानी गौरीपुर जामे मस्जिद को स्थानांतरित करने की योजना बनाई जा रही है। इस सिलसिले में शुक्रवार को उत्तर 24 परगना के जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) कार्यालय में स्थानीय विधायक और मस्जिद समिति के सदस्यों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इसके बाद हवाई अड्डा प्राधिकरण के प्रतिनिधियों और सुरक्षा समिति के सदस्यों की मौजूदगी वाले एक विशेष निरीक्षण दल ने मस्जिद का दौरा किया। हवाई अड्डा सुरक्षा समिति ने भी इस मुद्दे पर अलग से बैठक की है। करीब 136 साल पुरानी यह मस्जिद, जिसे 'बांकड़ा मस्जिद' भी कहा जाता है, हवाई अड्डे की सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि रनवे से बिल्कुल सटीक दूरी पर स्थित होने के कारण, भारी बारिश या घने कोहरे में कम दृश्यता के दौरान यह मस्जिद पायलटों के लिए 'विजुअल इल्यूजन' (दृष्टिभ्रम) पैदा करती है, जिससे किसी गंभीर दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। इसके अलावा, इस मस्जिद की वजह से पिछले 30 वर्षों से हवाई अड्डे के दूसरे रनवे के विस्तार का काम रुका हुआ है। हालांकि मस्जिद स्थानांतरण का मामला पिछले तीन दशकों से चर्चा में है, लेकिन स्थानीय बाधाओं और पिछली वामपंथी व तृणमूल कांग्रेस सरकारों की ढिलाई के कारण हवाई अड्डे की सुरक्षा के बजाय धार्मिक भावनाओं की राजनीति हावी रही। इस ऐतिहासिक स्थल का इतिहास पुराना है। कोलकाता हवाई अड्डा 1924 में शुरू हुआ था और 1962 में एअरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने हवाई अड्डे के विस्तार के लिए इस प्राचीन वक्फ संपत्ति का अधिग्रहण किया था। उस समय इसके पास से गुजरने वाले यशोर रोड को 1965 में मुख्य मार्ग से ढाई किलोमीटर घुमाकर गौरीपुर मोड़ से जोड़ दिया गया, जिससे अब मस्जिद यशोर रोड से करीब 3 किलोमीटर दूर हवाई अड्डे की चारदीवारी के अंदर सुरक्षित है। नमाजियों के लिए यहाँ जाने की एक विशेष और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है; गौरीपुर काली मंदिर के विपरीत बने एक छोटे लोहे के गेट पर CISF वॉच टावर तैनात है। यहाँ घंटी बजाने के बाद नमाज पढ़ने वालों का आधार कार्ड जांचा जाता है और फिर हवाई अड्डा प्राधिकरण उन्हें विशेष बसों के जरिए मस्जिद तक ले जाता है। दैनिक तीन शिफ्टों में ऐसी 4 बसों की व्यवस्था होती है। यदि भविष्य में इस मस्जिद को हटाने या ढहाने का काम शुरू होता है, तो बाहरी दुनिया को इसका पता भी नहीं चलेगा क्योंकि हवाई अड्डे के अपने उपकरण सीधे रनवे के रास्ते पुराने टर्मिनल के कार्गो विभाग से वहाँ तक पहुँच सकते हैं।1
- गुना के बमोरी विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाली ग्राम पंचायत झागर के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में साइकिल वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम के दौरान कक्षा 9 में नवीन प्रवेश लेने वाले छात्र-छात्राओं को साइकिलें प्रदान की गईं। इस अवसर पर विद्यालय के प्राचार्य नरेंद्र भार्गव, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी आशुतोष श्रीवास्तव और स्कूल का समस्त स्टाफ विशेष रूप से उपस्थित रहा। विद्यालय के प्राचार्य नरेंद्र भार्गव ने बताया कि दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले नौवीं कक्षा के विद्यार्थियों को निशुल्क साइकिल वितरण का कार्य लगातार जारी है। शासन की इस कल्याणकारी योजना से दूरस्थ क्षेत्रों के छात्र-छात्राओं को विद्यालय आने-जाने में काफी सुविधा मिलेगी। प्राचार्य ने छात्रों को नियमित रूप से स्कूल आने और अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होकर अपना भविष्य संवारने की सीख दी। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षा ही जीवन का मूल आधार है और शिक्षित होकर ही हम अपना जीवन सुधार सकते हैं। इस मौके पर विद्यालय के स्टाफ ने सभी अभिभावकों से अपने बच्चों को नियमित रूप से स्कूल भेजने की अपील की। स्टाफ ने जानकारी दी कि शासन द्वारा छात्रों के हित में साइकिल के साथ-साथ निशुल्क छात्रवृत्ति और पुस्तकों का भी वितरण किया जा रहा है, जिसका लाभ विद्यार्थियों को समय पर मिल रहा है।1
- वैष्णव मान्यता के अनुसार आज 11 जुलाई, शनिवार को योगिनी एकादशी का व्रत मनाया जा रहा है। इस अवसर पर भुवाखेड़ी बाबा खाटूश्याम मंदिर और सादली की प्राचीन पहाड़ी और गोशाला की पैदल परिक्रमा का आयोजन दिन के 11 बजे किया गया है। श्रद्धालुओं से आग्रह किया गया है कि वे इस दिन को यादगार बनाने के लिए किसी फलदार या छायादार पौधे का रोपण भी करें। इस दौरान खाटूश्याम बाबा भुवाखेड़ी धाम में पहली निशान यात्रा भी पहुँच चुकी है। सनातन परंपरा में आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की इस एकादशी का विशेष महत्व है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि मार्कण्डेय की सलाह पर कुबेर के माली हेममाली ने यह व्रत रखा था, जिससे उसे श्राप से मुक्ति और स्वस्थ शरीर प्राप्त हुआ। माना जाता है कि इस व्रत के पालन से जाने-अनजाने हुए पापों का नाश होता है और 88,000 ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत स्वास्थ्य, समृद्धि, यश और अंततः बैकुंठ धाम प्राप्ति का मार्ग माना गया है। धार्मिक अनुष्ठान के तहत सुबह स्नान कर पीले वस्त्र धारण करने, भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की पूजा करने, पीले फूल, तुलसी दल व पंचामृत अर्पित करने और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र के जाप का विधान बताया गया है। श्रद्धालुओं को सात्विक रहने और व्रत कथा सुनने की सलाह दी गई है। व्रत का पारण 12 जुलाई को दोपहर 1:50 बजे से 4:36 बजे के बीच किया जाएगा। तिथि के संबंध में स्पष्ट किया गया है कि जहां गृहस्थों ने 10 जुलाई को व्रत रखा, वहीं वैष्णव संप्रदाय के अनुसार मुख्य व्रत आज 11 जुलाई को मनाया जा रहा है।4
- बारां के कवाई थाना क्षेत्र में कवाई-खानपुर मार्ग पर ग्राम शोलाहेड़ी के पास दो मोटरसाइकिलों की आमने-सामने टक्कर हो गई, जिसमें पांच लोग घायल हो गए। यह हादसा शनिवार शाम करीब 4:00 बजे हुआ। हादसे में पहली मोटरसाइकिल पर सवार छीपाबड़ौद थाना क्षेत्र के पचाड़ निवासी 45 वर्षीय सुरेशचंद नगर, उनकी पत्नी भगवती बाई और उनका पौत्र आरू घायल हुए हैं। वहीं, दूसरी मोटरसाइकिल पर सवार हरनावदा शाहजी थाना क्षेत्र के हरिपुरा टांडा निवासी 45 वर्षीय रामनाथ और झनझनी निवासी 30 वर्षीय त्रिलोक भी चोटिल हुए हैं। दुर्घटना के बाद सभी घायलों को तुरंत उपचार के लिए सीएचसी कवाई लाया गया। प्राथमिक उपचार के बाद सुरेशचंद, रामनाथ और त्रिलोक की गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें बेहतर इलाज के लिए जिला चिकित्सालय बारां रेफर किया गया है। शेष दो घायलों का उपचार कवाई में ही चल रहा है। घटनास्थल पर फिलहाल कानून एवं शांति व्यवस्था सामान्य है और पुलिस मामले की जांच कर रही है।3