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पड़खुरी 586 में दिन दहाड़े गुंडा राज अखिल कब होगा न्याय यह आदमी पदखुरी 586 तहसील चुरहट के निवासी अभिमान पटेल और उनके मम्मी को जान से मारने के लिए धमकी दे रहा है, तो आगे जो भी होगा उसका जिम्मेदार अमरजीत पटेल पिता राजबहोर पटेल पदखुरी 586 पोस्ट पचोखर तहसील चुरहट सीधी #Mppolice #cmmadhyapradesh #churhat
Abhi Singh
पड़खुरी 586 में दिन दहाड़े गुंडा राज अखिल कब होगा न्याय यह आदमी पदखुरी 586 तहसील चुरहट के निवासी अभिमान पटेल और उनके मम्मी को जान से मारने के लिए धमकी दे रहा है, तो आगे जो भी होगा उसका जिम्मेदार अमरजीत पटेल पिता राजबहोर पटेल पदखुरी 586 पोस्ट पचोखर तहसील चुरहट सीधी #Mppolice #cmmadhyapradesh #churhat
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- सीधी: राजनीति में शब्द कभी सिर्फ शब्द नहीं होते, वे आने वाले तूफानों का संकेत होते हैं। विंध्य के कद्दावर नेता और चुरहट के 'टाइगर' कहे जाने वाले अजय सिंह 'राहुल' ने हाल ही में जो कहा, उसने मध्य प्रदेश की सियासी फिजां में एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी है। क्या यह एक अनुभवी नेता की अपनी पार्टी को खरी-खरी चेतावनी है, या फिर विंध्य के आसमान में किसी नए राजनीतिक सूर्योदय की आहट? अजय सिंह ने कैमरे के सामने बेहद गंभीर लहजे में एक 'डेडलाइन' खींचते हुए कहा कि "28 में यदि हम लोग हारे, तो उसके बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का कोई चांस नहीं है।" राजनैतिक गलियारों में इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं। जहां कांग्रेस कार्यकर्ता इसे 'अस्तित्व के संकट' के तौर पर देख रहे हैं, वहीं विश्लेषक इसे राहुल भैया का अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को दिया गया एक कड़ा 'अल्टीमेटम' मान रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह हार का डर है, या संगठन को जगाने के लिए आखिरी शंखनाद? मजे की बात यह है कि अजय सिंह अब राजनीति में 'विपक्ष' और 'सत्ता' के बीच की लकीरों को धुंधला करते नजर आ रहे हैं। उनका यह कहना कि "ऐसी लाइन न खींचो कि विपक्ष और सत्ता अलग-अलग दिखे", कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है। कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और उमा भारती से लेकर शिवराज सिंह चौहान तक से उनके 'बेहतर संबंधों' का सार्वजनिक बखान क्या केवल शिष्टाचार है, या फिर ये 'मधुर संबंध' किसी नई राजनीतिक केमिस्ट्री की ओर इशारा कर रहे हैं? जब बात गुटबाजी की आई, तो उन्होंने इसे छिपाने के बजाय बड़ी बेबाकी से स्वीकार किया। यह स्वीकारोक्ति कांग्रेस की अंदरूनी कलह को उजागर तो करती ही है, साथ ही यह भी बताती है कि अजय सिंह अब किसी भी 'दबाव' से मुक्त होकर अपनी अलग राह की टोह ले रहे हैं। उनकी बातों में अपनी 'उपेक्षा' की टीस भी साफ़ झलकती है। उनका यह कहना कि "जब राय मांगी जाती है तभी देता हूँ", उनकी खामोश नाराजगी को बयां करता है। लेकिन असली सस्पेंस तब शुरू होता है जब वे वर्तमान सरकार के काम की तारीफ करते हुए कहते हैं कि "सरकार जमीनी स्तर पर अच्छा काम कर रही है।" हालांकि उन्होंने 'गांधी जी की फोटो' (भ्रष्टाचार का सांकेतिक तंज) का जिक्र कर संतुलन बनाने की कोशिश की, लेकिन तारीफ के सुर कहीं ज्यादा ऊंचे सुनाई दिए। विंध्य की जनता और राजनीतिक पंडित अब एक ही सवाल पूछ रहे हैं—क्या चुरहट के 'टाइगर' का मन वाकई बदल रहा है? 2028 की हार का डर महज एक 'एग्जिट प्लान' की भूमिका है या कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का कोई कड़वा नुस्खा? अजय सिंह राहुल के ये बदले हुए तेवर किसी बड़े उलटफेर का संकेत हैं या सिर्फ एक अनुभवी नेता का अपनी जमीन सुरक्षित करने का तरीका, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, विंध्य की राजनीति का यह ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका सस्पेंस बरकरार है।2
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