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विंध्य के 'टाइगर' के बदले सुर: अजय सिंह राहुल की 2028 वाली 'भविष्यवाणी' या किसी बड़े सियासी धमाके की पदचाप? अपनों को आईना या विपक्ष से 'मधुर' नाता? अजय सिंह राहुल के बयानों ने कांग्रेस खेमे में मचाया हड़कंप, क्या बदलने वाली है विंध्य की सियासी तस्वीर! 2028 का डर या 'सुरक्षित रनवे' की तलाश? अजय सिंह राहुल की बेबाकी के पीछे छिपे हैं राजनीति के कई अनसुलझे सवाल! सीधी: राजनीति में शब्द कभी सिर्फ शब्द नहीं होते, वे आने वाले तूफानों का संकेत होते हैं। विंध्य के कद्दावर नेता और चुरहट के 'टाइगर' कहे जाने वाले अजय सिंह 'राहुल' ने हाल ही में जो कहा, उसने मध्य प्रदेश की सियासी फिजां में एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी है। क्या यह एक अनुभवी नेता की अपनी पार्टी को खरी-खरी चेतावनी है, या फिर विंध्य के आसमान में किसी नए राजनीतिक सूर्योदय की आहट? अजय सिंह ने कैमरे के सामने बेहद गंभीर लहजे में एक 'डेडलाइन' खींचते हुए कहा कि "28 में यदि हम लोग हारे, तो उसके बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का कोई चांस नहीं है।" राजनैतिक गलियारों में इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं। जहां कांग्रेस कार्यकर्ता इसे 'अस्तित्व के संकट' के तौर पर देख रहे हैं, वहीं विश्लेषक इसे राहुल भैया का अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को दिया गया एक कड़ा 'अल्टीमेटम' मान रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह हार का डर है, या संगठन को जगाने के लिए आखिरी शंखनाद? ​मजे की बात यह है कि अजय सिंह अब राजनीति में 'विपक्ष' और 'सत्ता' के बीच की लकीरों को धुंधला करते नजर आ रहे हैं। उनका यह कहना कि "ऐसी लाइन न खींचो कि विपक्ष और सत्ता अलग-अलग दिखे", कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है। कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और उमा भारती से लेकर शिवराज सिंह चौहान तक से उनके 'बेहतर संबंधों' का सार्वजनिक बखान क्या केवल शिष्टाचार है, या फिर ये 'मधुर संबंध' किसी नई राजनीतिक केमिस्ट्री की ओर इशारा कर रहे हैं? जब बात गुटबाजी की आई, तो उन्होंने इसे छिपाने के बजाय बड़ी बेबाकी से स्वीकार किया। यह स्वीकारोक्ति कांग्रेस की अंदरूनी कलह को उजागर तो करती ही है, साथ ही यह भी बताती है कि अजय सिंह अब किसी भी 'दबाव' से मुक्त होकर अपनी अलग राह की टोह ले रहे हैं। ​उनकी बातों में अपनी 'उपेक्षा' की टीस भी साफ़ झलकती है। उनका यह कहना कि "जब राय मांगी जाती है तभी देता हूँ", उनकी खामोश नाराजगी को बयां करता है। लेकिन असली सस्पेंस तब शुरू होता है जब वे वर्तमान सरकार के काम की तारीफ करते हुए कहते हैं कि "सरकार जमीनी स्तर पर अच्छा काम कर रही है।" हालांकि उन्होंने 'गांधी जी की फोटो' (भ्रष्टाचार का सांकेतिक तंज) का जिक्र कर संतुलन बनाने की कोशिश की, लेकिन तारीफ के सुर कहीं ज्यादा ऊंचे सुनाई दिए। विंध्य की जनता और राजनीतिक पंडित अब एक ही सवाल पूछ रहे हैं—क्या चुरहट के 'टाइगर' का मन वाकई बदल रहा है? 2028 की हार का डर महज एक 'एग्जिट प्लान' की भूमिका है या कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का कोई कड़वा नुस्खा? अजय सिंह राहुल के ये बदले हुए तेवर किसी बड़े उलटफेर का संकेत हैं या सिर्फ एक अनुभवी नेता का अपनी जमीन सुरक्षित करने का तरीका, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, विंध्य की राजनीति का यह ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका सस्पेंस बरकरार है।

21 hrs ago
user_पत्रकार रुद्र प्रताप सिंह
पत्रकार रुद्र प्रताप सिंह
Photographer गोपदबनास, सीधी, मध्य प्रदेश•
21 hrs ago
7741d2c3-60c0-4a29-8019-b5b06fc0d535

विंध्य के 'टाइगर' के बदले सुर: अजय सिंह राहुल की 2028 वाली 'भविष्यवाणी' या किसी बड़े सियासी धमाके की पदचाप? अपनों को आईना या विपक्ष से 'मधुर' नाता? अजय सिंह राहुल के बयानों ने कांग्रेस खेमे में मचाया हड़कंप, क्या बदलने वाली है विंध्य की सियासी तस्वीर! 2028 का डर या 'सुरक्षित रनवे' की तलाश? अजय सिंह राहुल की बेबाकी के पीछे छिपे हैं राजनीति के कई अनसुलझे सवाल! सीधी: राजनीति में शब्द कभी सिर्फ शब्द नहीं होते, वे आने वाले तूफानों का संकेत होते हैं। विंध्य के कद्दावर नेता और चुरहट के 'टाइगर' कहे जाने वाले अजय सिंह 'राहुल' ने हाल ही में जो कहा, उसने मध्य प्रदेश की सियासी फिजां में एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी है। क्या यह एक अनुभवी नेता की अपनी पार्टी को खरी-खरी चेतावनी है, या फिर विंध्य के आसमान में किसी नए राजनीतिक सूर्योदय की आहट? अजय सिंह ने कैमरे के सामने बेहद गंभीर लहजे में एक 'डेडलाइन' खींचते हुए कहा कि "28 में यदि हम लोग हारे, तो उसके बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का कोई चांस नहीं है।" राजनैतिक गलियारों में इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं। जहां कांग्रेस कार्यकर्ता इसे 'अस्तित्व के संकट' के तौर पर देख रहे हैं, वहीं विश्लेषक इसे राहुल भैया का अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को दिया गया एक कड़ा 'अल्टीमेटम' मान रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह हार का डर है, या संगठन को जगाने के लिए आखिरी शंखनाद? ​मजे की बात यह है कि अजय सिंह अब राजनीति में 'विपक्ष' और 'सत्ता' के बीच की लकीरों को धुंधला करते नजर आ रहे हैं। उनका यह कहना कि "ऐसी लाइन न खींचो कि विपक्ष और

सत्ता अलग-अलग दिखे", कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है। कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और उमा भारती से लेकर शिवराज सिंह चौहान तक से उनके 'बेहतर संबंधों' का सार्वजनिक बखान क्या केवल शिष्टाचार है, या फिर ये 'मधुर संबंध' किसी नई राजनीतिक केमिस्ट्री की ओर इशारा कर रहे हैं? जब बात गुटबाजी की आई, तो उन्होंने इसे छिपाने के बजाय बड़ी बेबाकी से स्वीकार किया। यह स्वीकारोक्ति कांग्रेस की अंदरूनी कलह को उजागर तो करती ही है, साथ ही यह भी बताती है कि अजय सिंह अब किसी भी 'दबाव' से मुक्त होकर अपनी अलग राह की टोह ले रहे हैं। ​उनकी बातों में अपनी 'उपेक्षा' की टीस भी साफ़ झलकती है। उनका यह कहना कि "जब राय मांगी जाती है तभी देता हूँ", उनकी खामोश नाराजगी को बयां करता है। लेकिन असली सस्पेंस तब शुरू होता है जब वे वर्तमान सरकार के काम की तारीफ करते हुए कहते हैं कि "सरकार जमीनी स्तर पर अच्छा काम कर रही है।" हालांकि उन्होंने 'गांधी जी की फोटो' (भ्रष्टाचार का सांकेतिक तंज) का जिक्र कर संतुलन बनाने की कोशिश की, लेकिन तारीफ के सुर कहीं ज्यादा ऊंचे सुनाई दिए। विंध्य की जनता और राजनीतिक पंडित अब एक ही सवाल पूछ रहे हैं—क्या चुरहट के 'टाइगर' का मन वाकई बदल रहा है? 2028 की हार का डर महज एक 'एग्जिट प्लान' की भूमिका है या कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का कोई कड़वा नुस्खा? अजय सिंह राहुल के ये बदले हुए तेवर किसी बड़े उलटफेर का संकेत हैं या सिर्फ एक अनुभवी नेता का अपनी जमीन सुरक्षित करने का तरीका, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, विंध्य की राजनीति का यह ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका सस्पेंस बरकरार है।

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  • 💥 *बड़ी खबर*💥 नेपाल की राजनीति में ऐतिहासिक क्षण, बालेन शाह ने ली नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ 35 वर्षीय रैपर और पूर्व मेयर बालेन शाह ने देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेकर नेपाल की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत की। काठमांडू के मेयर रहते हुए संघ सरकार से सीधे टकराव के लिए पहचाने जाने वाले बालेन शाह अब दुनिया के सबसे युवा प्रधानमंत्रियों में शामिल हो गए हैं।
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    💥 *बड़ी खबर*💥
नेपाल की राजनीति में ऐतिहासिक क्षण, बालेन शाह ने ली नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ
35 वर्षीय रैपर और पूर्व मेयर बालेन शाह ने देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेकर नेपाल की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत की। काठमांडू के मेयर रहते हुए संघ सरकार से सीधे टकराव के लिए पहचाने जाने वाले बालेन शाह अब दुनिया के सबसे युवा प्रधानमंत्रियों में शामिल हो गए हैं।
    user_शेखर तिवारी
    शेखर तिवारी
    Journalist गुढ़, रीवा, मध्य प्रदेश•
    22 min ago
  • Post by Bablu Namdev
    1
    Post by Bablu Namdev
    user_Bablu Namdev
    Bablu Namdev
    Photographer मऊगंज, रीवा, मध्य प्रदेश•
    10 hrs ago
  • मिडिल ईस्ट युद्ध की आंच पहुँची मऊगंज तक: पेट्रोल-डीजल के लिए मची अफरा-तफरी लाइनों में खड़े लोग। खेत तैयार, मशीनें खामोश: मऊगंज में पेट्रोल-डीजल की मार से जूझते किसान। दीपक सिंह गहरवार ✍️ विस्तार न्यूज़ मऊगंज मो.8965074130
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    मिडिल ईस्ट युद्ध की आंच पहुँची मऊगंज तक: पेट्रोल-डीजल के लिए मची अफरा-तफरी लाइनों में खड़े लोग। खेत तैयार, मशीनें खामोश: मऊगंज में पेट्रोल-डीजल की मार से जूझते किसान।
दीपक सिंह गहरवार ✍️
विस्तार न्यूज़ मऊगंज
मो.8965074130
    user_Lavkesh singh
    Lavkesh singh
    Voice of people मऊगंज, रीवा, मध्य प्रदेश•
    23 hrs ago
  • देवी स्थल के नाम पर वसूली का खेल! कुंदवार चौकी क्षेत्र में बैरिकेडिंग लगाकर ₹300 वसूली का आरोप, वीडियो बनाते ही पुलिसकर्मी बौखलाए सिंगरौली। मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। चितरंगी क्षेत्र के कुंदवार चौकी अंतर्गत बैनाकुंनण्ड पहाड़ी स्थित देवी स्थल जाने वाले मार्ग पर पुलिस द्वारा कथित रूप से अवैध वसूली किए जाने का मामला सामने आया है। जानकारी के अनुसार, कुंदवार चौकी में पदस्थ पुलिसकर्मी दिलीप कुमार त्रिपाठी, जो स्वयं को चौकी प्रभारी का रिश्तेदार बताकर कार्यवाही कर रहे थे, देवी स्थल से करीब 2 किलोमीटर पहले बैरिकेडिंग लगाकर बाइक सवारों को रोकना शुरू कर दिया। आरोप है कि मंदिर तक वाहन ले जाने के नाम पर प्रत्येक बाइक चालक से ₹300 की मांग की जा रही थी। इसी दौरान सी न्यूज के एक पत्रकार भी बाइक से देवी स्थल की ओर जा रहे थे। पुलिसकर्मियों ने उन्हें पहचान नहीं पाया और उनसे भी अन्य लोगों की तरह ₹300 की मांग की। जब पत्रकार ने पैसे देने से इनकार किया और इस वसूली पर सवाल उठाए, तो मौके पर तीखी बहस शुरू हो गई। मामला तब और गर्मा गया जब पत्रकार ने पूरी घटना का वीडियो बनाना शुरू कर दिया। आरोप है कि वीडियो बनता देख पुलिसकर्मी भड़क गए और पहले तो पत्रकार का ही वीडियो बनाने लगे, इसके बाद दौड़कर उनका कैमरा छीन लिया। पत्रकार ने मौके पर ही बैरिकेडिंग, सुरक्षा व्यवस्था और वसूली के संबंध में लिखित आदेश की मांग की, लेकिन पुलिसकर्मी कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे सके। इस पूरी घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिससे पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। सवालों के घेरे में व्यवस्था इस घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या वास्तव में देवी स्थल के नाम पर वसूली की जा रही थी? क्या बैरिकेडिंग और चेकिंग के लिए कोई वैध आदेश था? और सबसे बड़ा सवाल, क्या आम जनता के साथ इस तरह का व्यवहार जायज है? प्रशासन से कार्रवाई की मांग सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के बाद स्थानीय लोगों और पत्रकारों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
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    देवी स्थल के नाम पर वसूली का खेल!
कुंदवार चौकी क्षेत्र में बैरिकेडिंग लगाकर ₹300 वसूली का आरोप, वीडियो बनाते ही पुलिसकर्मी बौखलाए
सिंगरौली।
मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। चितरंगी क्षेत्र के कुंदवार चौकी अंतर्गत बैनाकुंनण्ड पहाड़ी स्थित देवी स्थल जाने वाले मार्ग पर पुलिस द्वारा कथित रूप से अवैध वसूली किए जाने का मामला सामने आया है।
जानकारी के अनुसार, कुंदवार चौकी में पदस्थ पुलिसकर्मी दिलीप कुमार त्रिपाठी, जो स्वयं को चौकी प्रभारी का रिश्तेदार बताकर कार्यवाही कर रहे थे, देवी स्थल से करीब 2 किलोमीटर पहले बैरिकेडिंग लगाकर बाइक सवारों को रोकना शुरू कर दिया। आरोप है कि मंदिर तक वाहन ले जाने के नाम पर प्रत्येक बाइक चालक से ₹300 की मांग की जा रही थी।
इसी दौरान सी न्यूज के एक पत्रकार भी बाइक से देवी स्थल की ओर जा रहे थे। पुलिसकर्मियों ने उन्हें पहचान नहीं पाया और उनसे भी अन्य लोगों की तरह ₹300 की मांग की। जब पत्रकार ने पैसे देने से इनकार किया और इस वसूली पर सवाल उठाए, तो मौके पर तीखी बहस शुरू हो गई।
मामला तब और गर्मा गया जब पत्रकार ने पूरी घटना का वीडियो बनाना शुरू कर दिया। आरोप है कि वीडियो बनता देख पुलिसकर्मी भड़क गए और पहले तो पत्रकार का ही वीडियो बनाने लगे, इसके बाद दौड़कर उनका कैमरा छीन लिया।
पत्रकार ने मौके पर ही बैरिकेडिंग, सुरक्षा व्यवस्था और वसूली के संबंध में लिखित आदेश की मांग की, लेकिन पुलिसकर्मी कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे सके। इस पूरी घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिससे पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं।
सवालों के घेरे में व्यवस्था
इस घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या वास्तव में देवी स्थल के नाम पर वसूली की जा रही थी? क्या बैरिकेडिंग और चेकिंग के लिए कोई वैध आदेश था? और सबसे बड़ा सवाल, क्या आम जनता के साथ इस तरह का व्यवहार जायज है?
प्रशासन से कार्रवाई की मांग
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के बाद स्थानीय लोगों और पत्रकारों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
    user_Mithilesh Kumar Yadav
    Mithilesh Kumar Yadav
    Artist Singrauli, Madhya Pradesh•
    7 hrs ago
  • *शिखा सुसाइड केस पार्ट 2:- पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व विधायक देवतालाव गिरीश गौतम के पीए की धमकी:- बचाना हो तो बचा लो...*🫵
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    *शिखा सुसाइड केस पार्ट 2:- पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व विधायक देवतालाव गिरीश गौतम के पीए की धमकी:- बचाना हो तो बचा लो...*🫵
    user_ब्यंकटेश कुमार तिवारी
    ब्यंकटेश कुमार तिवारी
    पत्रकार नैगढ़ी, रीवा, मध्य प्रदेश•
    22 hrs ago
  • हमारा चैनल वीडियो की पुष्टि नहीं करता,
    1
    हमारा चैनल वीडियो की पुष्टि नहीं करता,
    user_Prime 24 News
    Prime 24 News
    पत्रकार Huzur Nagar, Rewa•
    1 hr ago
  • सीधी: राजनीति में शब्द कभी सिर्फ शब्द नहीं होते, वे आने वाले तूफानों का संकेत होते हैं। विंध्य के कद्दावर नेता और चुरहट के 'टाइगर' कहे जाने वाले अजय सिंह 'राहुल' ने हाल ही में जो कहा, उसने मध्य प्रदेश की सियासी फिजां में एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी है। क्या यह एक अनुभवी नेता की अपनी पार्टी को खरी-खरी चेतावनी है, या फिर विंध्य के आसमान में किसी नए राजनीतिक सूर्योदय की आहट? अजय सिंह ने कैमरे के सामने बेहद गंभीर लहजे में एक 'डेडलाइन' खींचते हुए कहा कि "28 में यदि हम लोग हारे, तो उसके बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का कोई चांस नहीं है।" राजनैतिक गलियारों में इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं। जहां कांग्रेस कार्यकर्ता इसे 'अस्तित्व के संकट' के तौर पर देख रहे हैं, वहीं विश्लेषक इसे राहुल भैया का अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को दिया गया एक कड़ा 'अल्टीमेटम' मान रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह हार का डर है, या संगठन को जगाने के लिए आखिरी शंखनाद? ​मजे की बात यह है कि अजय सिंह अब राजनीति में 'विपक्ष' और 'सत्ता' के बीच की लकीरों को धुंधला करते नजर आ रहे हैं। उनका यह कहना कि "ऐसी लाइन न खींचो कि विपक्ष और सत्ता अलग-अलग दिखे", कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है। कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और उमा भारती से लेकर शिवराज सिंह चौहान तक से उनके 'बेहतर संबंधों' का सार्वजनिक बखान क्या केवल शिष्टाचार है, या फिर ये 'मधुर संबंध' किसी नई राजनीतिक केमिस्ट्री की ओर इशारा कर रहे हैं? जब बात गुटबाजी की आई, तो उन्होंने इसे छिपाने के बजाय बड़ी बेबाकी से स्वीकार किया। यह स्वीकारोक्ति कांग्रेस की अंदरूनी कलह को उजागर तो करती ही है, साथ ही यह भी बताती है कि अजय सिंह अब किसी भी 'दबाव' से मुक्त होकर अपनी अलग राह की टोह ले रहे हैं। ​उनकी बातों में अपनी 'उपेक्षा' की टीस भी साफ़ झलकती है। उनका यह कहना कि "जब राय मांगी जाती है तभी देता हूँ", उनकी खामोश नाराजगी को बयां करता है। लेकिन असली सस्पेंस तब शुरू होता है जब वे वर्तमान सरकार के काम की तारीफ करते हुए कहते हैं कि "सरकार जमीनी स्तर पर अच्छा काम कर रही है।" हालांकि उन्होंने 'गांधी जी की फोटो' (भ्रष्टाचार का सांकेतिक तंज) का जिक्र कर संतुलन बनाने की कोशिश की, लेकिन तारीफ के सुर कहीं ज्यादा ऊंचे सुनाई दिए। विंध्य की जनता और राजनीतिक पंडित अब एक ही सवाल पूछ रहे हैं—क्या चुरहट के 'टाइगर' का मन वाकई बदल रहा है? 2028 की हार का डर महज एक 'एग्जिट प्लान' की भूमिका है या कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का कोई कड़वा नुस्खा? अजय सिंह राहुल के ये बदले हुए तेवर किसी बड़े उलटफेर का संकेत हैं या सिर्फ एक अनुभवी नेता का अपनी जमीन सुरक्षित करने का तरीका, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, विंध्य की राजनीति का यह ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका सस्पेंस बरकरार है।
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    सीधी:
राजनीति में शब्द कभी सिर्फ शब्द नहीं होते, वे आने वाले तूफानों का संकेत होते हैं। विंध्य के कद्दावर नेता और चुरहट के 'टाइगर' कहे जाने वाले अजय सिंह 'राहुल' ने हाल ही में जो कहा, उसने मध्य प्रदेश की सियासी फिजां में एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी है। क्या यह एक अनुभवी नेता की अपनी पार्टी को खरी-खरी चेतावनी है, या फिर विंध्य के आसमान में किसी नए राजनीतिक सूर्योदय की आहट? अजय सिंह ने कैमरे के सामने बेहद गंभीर लहजे में एक 'डेडलाइन' खींचते हुए कहा कि "28 में यदि हम लोग हारे, तो उसके बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का कोई चांस नहीं है।" राजनैतिक गलियारों में इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं। जहां कांग्रेस कार्यकर्ता इसे 'अस्तित्व के संकट' के तौर पर देख रहे हैं, वहीं विश्लेषक इसे राहुल भैया का अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को दिया गया एक कड़ा 'अल्टीमेटम' मान रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह हार का डर है, या संगठन को जगाने के लिए आखिरी शंखनाद?
​मजे की बात यह है कि अजय सिंह अब राजनीति में 'विपक्ष' और 'सत्ता' के बीच की लकीरों को धुंधला करते नजर आ रहे हैं। उनका यह कहना कि "ऐसी लाइन न खींचो कि विपक्ष और सत्ता अलग-अलग दिखे", कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है। कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और उमा भारती से लेकर शिवराज सिंह चौहान तक से उनके 'बेहतर संबंधों' का सार्वजनिक बखान क्या केवल शिष्टाचार है, या फिर ये 'मधुर संबंध' किसी नई राजनीतिक केमिस्ट्री की ओर इशारा कर रहे हैं? जब बात गुटबाजी की आई, तो उन्होंने इसे छिपाने के बजाय बड़ी बेबाकी से स्वीकार किया। यह स्वीकारोक्ति कांग्रेस की अंदरूनी कलह को उजागर तो करती ही है, साथ ही यह भी बताती है कि अजय सिंह अब किसी भी 'दबाव' से मुक्त होकर अपनी अलग राह की टोह ले रहे हैं।
​उनकी बातों में अपनी 'उपेक्षा' की टीस भी साफ़ झलकती है। उनका यह कहना कि "जब राय मांगी जाती है तभी देता हूँ", उनकी खामोश नाराजगी को बयां करता है। लेकिन असली सस्पेंस तब शुरू होता है जब वे वर्तमान सरकार के काम की तारीफ करते हुए कहते हैं कि "सरकार जमीनी स्तर पर अच्छा काम कर रही है।" हालांकि उन्होंने 'गांधी जी की फोटो' (भ्रष्टाचार का सांकेतिक तंज) का जिक्र कर संतुलन बनाने की कोशिश की, लेकिन तारीफ के सुर कहीं ज्यादा ऊंचे सुनाई दिए। विंध्य की जनता और राजनीतिक पंडित अब एक ही सवाल पूछ रहे हैं—क्या चुरहट के 'टाइगर' का मन वाकई बदल रहा है? 2028 की हार का डर महज एक 'एग्जिट प्लान' की भूमिका है या कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का कोई कड़वा नुस्खा? अजय सिंह राहुल के ये बदले हुए तेवर किसी बड़े उलटफेर का संकेत हैं या सिर्फ एक अनुभवी नेता का अपनी जमीन सुरक्षित करने का तरीका, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, विंध्य की राजनीति का यह ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका सस्पेंस बरकरार है।
    user_पत्रकार रुद्र प्रताप सिंह
    पत्रकार रुद्र प्रताप सिंह
    Photographer गोपदबनास, सीधी, मध्य प्रदेश•
    21 hrs ago
  • Post by Bablu Namdev
    1
    Post by Bablu Namdev
    user_Bablu Namdev
    Bablu Namdev
    Photographer मऊगंज, रीवा, मध्य प्रदेश•
    20 hrs ago
  • Post by Deepesh Pandey Dist Chief Director ACFI Rewa
    1
    Post by Deepesh Pandey Dist Chief Director ACFI Rewa
    user_Deepesh Pandey Dist Chief Director ACFI Rewa
    Deepesh Pandey Dist Chief Director ACFI Rewa
    NGO Worker हुजूर नगर, रीवा, मध्य प्रदेश•
    2 hrs ago
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