वाराणसी प्रमाणिक दस्तावेजों एवं प्राथमिक ऐतिहासिक साक्ष्य के विस्तृत अध्ययन के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ,नई दिल्ली ने स्वीकार किया है कि वाराणसी में सारनाथ स्थल बाबू जगत सिंह के द्वारा कराए गए उत्खनन से सर्वप्रथम प्रकाश में आया है। 10.02.2026 को सारनाथ परिसर में नए संशोधित शिलापट्ट को लगाया गया है। उल्लेखनीय है कि बाबू जगत सिंह ने 18वीं सदी के उत्तरार्ध में सारनाथ क्षेत्र में उत्खनन संबंधी कार्य को आरंभ कराया था । लंबे समय तक इतिहास के पन्नों में यह तथ्य दबा रहा । विगत वर्षों में जगत सिंह रॉयल फैमिली प्रोजेक्ट शोध समिति के अथक परिश्रम और प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर अब इसे आधिकारिक मान्यता मिल गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारतीय इतिहास लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। 26.12.2024 को सारनाथ परिसर में धर्मराजिका शिलापट्ट को भी संशोधित कर नया शिलापट्ट लगाया गया है। बाबू जगत सिंह शोध समिति के संरक्षक प्रदीप नारायण सिंह के अनुसार यह कार्य भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से संपन्न हुआ है। बाबू जगत सिंह रॉयल फैमिली शोध समिति ने उन प्रमाणित दस्तावेजों को ,भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली के समक्ष रखा है, जिसके आधार पर औपनिवेशिक शासन के समय से चली आ रही गलत मान्यता अब समाप्त हुई है। शिलापट्ट परिवर्तन कार्य में काशी के विद्वानों, विश्वविद्यालयों , महाविद्यालयों,जवाहरलाल नेहरू एवं कोलकाता विश्वविद्यालय, लखनऊ तथा पटना विश्वविद्यालय आदि के वर्तमान एवं अवकाश प्राप्त प्रवक्ताओं का हमें योगदान मिला है। वाराणसी गाइड एसोसिएशन एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली का भी हमें समर्थन मिला साथ ही काशी के धर्म गुरुओं,इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया, डिजिटल तथा आकाशवाणी का भी हमें समर्थन मिला है। उक्त योगदान और समर्थन के लिए हम आप सभी को हृदय से नमन करते हैं। इस निर्णय से वाराणसी सहित पूरे देश में प्रसन्नता की लहर है। बाबू जगत सिंह की छठवीं पीढ़ी के वंशज प्रदीप नारायण सिंह ने कहा -"यह हमारे पूर्वजों के आशीर्वाद आप सभी के सहयोग व समर्थन का ही परिणाम है कि आज उनके ऐतिहासिक योगदान को देश ने स्वीकारा है ।यह केवल हमारे परिवार व समिति के लिए ही नहीं अपितु वाराणसी के साथ ही देश की ऐतिहासिक विरासत के लिए भी गर्व का विषय है । श्री सिंह ने कहा हमारा शोध निरंतर जारी है, आगे शीघ्र ही कुछ नए तथ्य प्रकाश में आएंगे, देश को उससे अवगत कराया जाएगा। पत्रकार वार्ता के दौरान शोध समिति के सदस्य, अधिवक्ता त्रिपुरारी शंकर , प्रोफेसर राणा पीबी सिंह ,अरविंद कुमार सिंह एडवोकेट ,अशोक आनंद, डॉ (मेजर )अरविंद कुमार सिंह, राजेंद्र कुमार दुबे वरिष्ठ पत्रकार, मनीष खत्री अवनीधर, एहसन अहमद, विकास एवं शमीम उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि सत्य और प्रमाणों पर आधारित, शोध अंततः अपना स्थान बना ही लेता है। इतिहासकारों का मत है कि इस निर्णय से न केवल सारनाथ के इतिहास को नया आयाम मिला है , अपितु स्थानीय नायकों के योगदान को भी राष्ट्रीय परिपेक्ष में पुन स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। सचमुच यह शोध भारतीय इतिहास के पन्नों में सच्चाई की नींव डालने जैसा है। प्रदीप नारायण सिंह ने आह्वान किया कि उपरोक्त अनुक्रम में नालंदा, भरूच, अमरावती इत्यादि स्थलों पर इतिहासकारों, शोधकर्ताओं को प्राथमिक ऐतिहासिक साक्ष्य के आधार पर नवीन शोध की आवश्यकता है।
वाराणसी प्रमाणिक दस्तावेजों एवं प्राथमिक ऐतिहासिक साक्ष्य के विस्तृत अध्ययन के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ,नई दिल्ली ने स्वीकार किया है कि वाराणसी में सारनाथ स्थल बाबू जगत सिंह के द्वारा कराए गए उत्खनन से सर्वप्रथम प्रकाश में आया है। 10.02.2026 को सारनाथ परिसर में नए संशोधित शिलापट्ट को लगाया गया है। उल्लेखनीय है कि बाबू जगत सिंह ने 18वीं सदी के उत्तरार्ध में सारनाथ क्षेत्र में उत्खनन संबंधी कार्य को आरंभ कराया था । लंबे समय तक इतिहास के पन्नों में यह तथ्य दबा रहा । विगत वर्षों में जगत सिंह रॉयल फैमिली प्रोजेक्ट शोध समिति के अथक परिश्रम और प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर अब इसे आधिकारिक मान्यता मिल गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारतीय इतिहास लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। 26.12.2024 को सारनाथ परिसर में धर्मराजिका शिलापट्ट को भी संशोधित कर नया शिलापट्ट लगाया गया है। बाबू जगत सिंह शोध समिति के संरक्षक प्रदीप नारायण सिंह के अनुसार यह कार्य भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से संपन्न हुआ है। बाबू जगत सिंह रॉयल फैमिली शोध समिति ने उन प्रमाणित दस्तावेजों को ,भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली के समक्ष रखा है, जिसके आधार पर औपनिवेशिक शासन के समय से चली आ रही गलत मान्यता अब समाप्त हुई है। शिलापट्ट परिवर्तन कार्य में काशी के विद्वानों, विश्वविद्यालयों , महाविद्यालयों,जवाहरलाल नेहरू एवं कोलकाता विश्वविद्यालय, लखनऊ तथा पटना विश्वविद्यालय आदि के वर्तमान एवं अवकाश प्राप्त प्रवक्ताओं का हमें योगदान मिला है। वाराणसी गाइड एसोसिएशन एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली का भी हमें समर्थन मिला साथ ही काशी के धर्म गुरुओं,इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया, डिजिटल तथा आकाशवाणी का भी हमें समर्थन मिला है। उक्त योगदान और समर्थन के लिए हम आप सभी को हृदय से नमन करते हैं। इस निर्णय से वाराणसी सहित पूरे देश में प्रसन्नता की लहर है। बाबू जगत सिंह की छठवीं पीढ़ी के वंशज प्रदीप नारायण सिंह ने कहा -"यह हमारे पूर्वजों के आशीर्वाद आप सभी के सहयोग व समर्थन का ही परिणाम है कि आज उनके ऐतिहासिक योगदान को देश ने स्वीकारा है ।यह केवल हमारे परिवार व समिति के लिए ही नहीं अपितु वाराणसी के साथ ही देश की ऐतिहासिक विरासत के लिए भी गर्व का विषय है । श्री सिंह ने कहा हमारा शोध निरंतर जारी है, आगे शीघ्र ही कुछ नए तथ्य प्रकाश में आएंगे, देश को उससे अवगत कराया जाएगा। पत्रकार वार्ता के दौरान शोध समिति के सदस्य, अधिवक्ता त्रिपुरारी शंकर , प्रोफेसर राणा पीबी सिंह ,अरविंद कुमार सिंह एडवोकेट ,अशोक आनंद, डॉ (मेजर )अरविंद कुमार सिंह, राजेंद्र कुमार दुबे वरिष्ठ पत्रकार, मनीष खत्री अवनीधर, एहसन अहमद, विकास एवं शमीम उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि सत्य और प्रमाणों पर आधारित, शोध अंततः अपना स्थान बना ही लेता है। इतिहासकारों का मत है कि इस निर्णय से न केवल सारनाथ के इतिहास को नया आयाम मिला है , अपितु स्थानीय नायकों के योगदान को भी राष्ट्रीय परिपेक्ष में पुन स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। सचमुच यह शोध भारतीय इतिहास के पन्नों में सच्चाई की नींव डालने जैसा है। प्रदीप नारायण सिंह ने आह्वान किया कि उपरोक्त अनुक्रम में नालंदा, भरूच, अमरावती इत्यादि स्थलों पर इतिहासकारों, शोधकर्ताओं को प्राथमिक ऐतिहासिक साक्ष्य के आधार पर नवीन शोध की आवश्यकता है।
- चंदौसी कोल्ड ट्रेडर्स एसोसिएशन के द्वारा मंडी की पुनर्स्थापना पिछले 50 वर्ष पहले हुई थी उन समस्त पदाधिकारी को सम्मानित किया गया। और इस स्थापना दिवस को धूमधाम से मनाया गया। कोयला व्यापारियों का कहना है कि 50 वर्ष पूरे हो जाने के बाद भी चंदासी कोयला मंडी की मूलभूत जो जरूरत है उस पर सरकार ध्यान नहीं दे रही। व्यापारियों का कहना है कि चंदा सी कोयला मंडी में मजदूरों के लिए कोई स्वास्थ्य केंद्र नहीं है ना तो साफ सफाई है और ना ही जल का कोई प्रबंध है। बार-बार सरकार से अपील की जाती है परंतु सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही।1
- संवाददाता आशीष पुरोहित जोधपुर/राजस्थान पारंपरिक गैर गायन के साथ घांची समाज का होली स्नेह मिलन सम्पन्न जोधपुर। श्री घांची नवयुवक मण्डल सेवा समिति, जोधपुर के तत्वावधान में महादेव वाटिका, बासनी गुफा में आयोजित होली स्नेह मिलन एवं संगोष्ठी कार्यक्रम उत्साह और उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में समाज के वरिष्ठजन, महिलाएं, युवक-युवतियां तथा बड़ी संख्या में समाज बंधुओं ने भाग लिया। नवयुवक मण्डल सचिव धनराज बोराणा ने बताया कि कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में आपसी सौहार्द, एकता और भाईचारे को मजबूत करना तथा युवाओं को अपनी समृद्ध लोक संस्कृति से जोड़ना है। कार्यक्रम में समाज के विभिन्न मोहल्लों की चंग टीमों द्वारा पारंपरिक गैर गायन, फाग गीत एवं होली के लोकगीतों की शानदार प्रस्तुतियां दी गई, जिन पर उपस्थित समाज बंधु झूम उठे। कार्यक्रम संयोजक एडवोकेट महेंद्र भाटी ने बताया कि मुख्य अतिथि के रूप में न्यायाधीश रेखा बोराणा ने उपस्थित होकर महिला दिवस के अवसर पर समाज की महिलाओं को प्रोत्साहित किया। कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा में प्रस्तुति देकर कार्यक्रम को रंगारंग बना दिया। इस अवसर पर समाज के विशेष सहयोगी महेंद्र परिहार, भामाशाहों एवं विभिन्न गैर दलों का दुपट्टा पहनाकर तथा स्मृति चिन्ह देकर सम्मान किया गया। नवयुवक मण्डल अध्यक्ष पंकज भाटी के नेतृत्व में संरक्षक गौरीशंकर बोराणा, सुरेंद्र बोराणा, अशोक परिहार, अशोक भाटी, सन्नी परिहार, राज भाटी, मंगल परिहार, राजेश भाटी, राकेश परिहार, करण सोलंकी, निखिल सोलंकी, पवन धाणादिया, लखपत सोलंकी, विनोद भाटी, अर्जुन भाटी, रमेश बोराणा, प्रवीण भाटी, प्रेम भाटी, जसवंत पंवार, देवेश परिहार, नवीन बोराणा, मोहित निकूब, पीयूष बोराणा, अंकुश धाणादिया, तरुण भाटी, मघराज भाटी, कृष्णा सोलंकी, जगदीश भाटी, अर्जुन परिहार, रमेश भाटी, करण परिहार, राकेश भाटी, विजय राज भाटी, दिव्यांशु, गौतम सहित अनेक सदस्यों ने कार्यक्रम की व्यवस्था में सहयोग किया।1
- आगरा दीवानी कोर्ट में तारीख पर पहुंचे एक हिंदूवादी नेता के साथ मारपीट का मामला सामने आया है। पीड़ित सौरभ शर्मा का आरोप है कि गोकशों से मिली हुई एक महिला वकील ने टकराने के बहाने उनके साथ मारपीट की। उनका कहना है कि यह पूरी घटना सुनियोजित साजिश के तहत कराई गई। सौरभ शर्मा के अनुसार उन्होंने वर्ष 2025 में गौकशी के कई मामलों में मुकदमे दर्ज कराए थे और दो गौवंश का मीट भी बरामद कराया था। उनका आरोप है कि जिन लोगों पर उन्होंने कार्रवाई कराई थी, वही लोग लंबे समय से गौकशी में लिप्त हैं और कुछ थाने के हिस्ट्रीशीटर भी हैं। फिलहाल मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।1
- Post by Pawan Gupta1
- Post by Dharmendra Kumar2
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- आगरा में एक दिव्यांग व्यक्ति ने अपने परिवार के साथ तहसील परिसर में धरना दे दिया। पीड़ित एसडीएम की गाड़ी के सामने बैठ गया और आरोप लगाया कि दबंगों ने उसके घर के हिस्से पर कब्जा कर लिया है। पीड़ित का कहना है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद उसे न्याय नहीं मिला। उसने एसडीएम पर भी बदसलूकी का आरोप लगाया। मामले को लेकर तहसील परिसर में काफी देर तक हंगामा और भीड़ लगी रही। बताया जा रहा है कि पीड़ित सिकंदरा क्षेत्र के बांईपुर का निवासी है और अपने परिवार के साथ न्याय की मांग कर रहा है। प्रशासन द्वारा मामले की जांच की बात कही जा रही1
- के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ,नई दिल्ली ने स्वीकार किया है कि वाराणसी में सारनाथ स्थल बाबू जगत सिंह के द्वारा कराए गए उत्खनन से सर्वप्रथम प्रकाश में आया है। 10.02.2026 को सारनाथ परिसर में नए संशोधित शिलापट्ट को लगाया गया है। उल्लेखनीय है कि बाबू जगत सिंह ने 18वीं सदी के उत्तरार्ध में सारनाथ क्षेत्र में उत्खनन संबंधी कार्य को आरंभ कराया था । लंबे समय तक इतिहास के पन्नों में यह तथ्य दबा रहा । विगत वर्षों में जगत सिंह रॉयल फैमिली प्रोजेक्ट शोध समिति के अथक परिश्रम और प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर अब इसे आधिकारिक मान्यता मिल गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारतीय इतिहास लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। 26.12.2024 को सारनाथ परिसर में धर्मराजिका शिलापट्ट को भी संशोधित कर नया शिलापट्ट लगाया गया है। बाबू जगत सिंह शोध समिति के संरक्षक प्रदीप नारायण सिंह के अनुसार यह कार्य भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से संपन्न हुआ है। बाबू जगत सिंह रॉयल फैमिली शोध समिति ने उन प्रमाणित दस्तावेजों को ,भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली के समक्ष रखा है, जिसके आधार पर औपनिवेशिक शासन के समय से चली आ रही गलत मान्यता अब समाप्त हुई है। शिलापट्ट परिवर्तन कार्य में काशी के विद्वानों, विश्वविद्यालयों , महाविद्यालयों,जवाहरलाल नेहरू एवं कोलकाता विश्वविद्यालय, लखनऊ तथा पटना विश्वविद्यालय आदि के वर्तमान एवं अवकाश प्राप्त प्रवक्ताओं का हमें योगदान मिला है। वाराणसी गाइड एसोसिएशन एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली का भी हमें समर्थन मिला साथ ही काशी के धर्म गुरुओं,इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया, डिजिटल तथा आकाशवाणी का भी हमें समर्थन मिला है। उक्त योगदान और समर्थन के लिए हम आप सभी को हृदय से नमन करते हैं। इस निर्णय से वाराणसी सहित पूरे देश में प्रसन्नता की लहर है। बाबू जगत सिंह की छठवीं पीढ़ी के वंशज प्रदीप नारायण सिंह ने कहा -"यह हमारे पूर्वजों के आशीर्वाद आप सभी के सहयोग व समर्थन का ही परिणाम है कि आज उनके ऐतिहासिक योगदान को देश ने स्वीकारा है ।यह केवल हमारे परिवार व समिति के लिए ही नहीं अपितु वाराणसी के साथ ही देश की ऐतिहासिक विरासत के लिए भी गर्व का विषय है । श्री सिंह ने कहा हमारा शोध निरंतर जारी है, आगे शीघ्र ही कुछ नए तथ्य प्रकाश में आएंगे, देश को उससे अवगत कराया जाएगा। पत्रकार वार्ता के दौरान शोध समिति के सदस्य, अधिवक्ता त्रिपुरारी शंकर , प्रोफेसर राणा पीबी सिंह ,अरविंद कुमार सिंह एडवोकेट ,अशोक आनंद, डॉ (मेजर )अरविंद कुमार सिंह, राजेंद्र कुमार दुबे वरिष्ठ पत्रकार, मनीष खत्री अवनीधर, एहसन अहमद, विकास एवं शमीम उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि सत्य और प्रमाणों पर आधारित, शोध अंततः अपना स्थान बना ही लेता है। इतिहासकारों का मत है कि इस निर्णय से न केवल सारनाथ के इतिहास को नया आयाम मिला है , अपितु स्थानीय नायकों के योगदान को भी राष्ट्रीय परिपेक्ष में पुन स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। सचमुच यह शोध भारतीय इतिहास के पन्नों में सच्चाई की नींव डालने जैसा है। प्रदीप नारायण सिंह ने आह्वान किया कि उपरोक्त अनुक्रम में नालंदा, भरूच, अमरावती इत्यादि स्थलों पर इतिहासकारों, शोधकर्ताओं को प्राथमिक ऐतिहासिक साक्ष्य के आधार पर नवीन शोध की आवश्यकता है।1