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लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍 लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍

1 hr ago
user_Journalist Himanshu Garg
Journalist Himanshu Garg
Local News Reporter सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
1 hr ago

लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍 लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍

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  • Agarwal  Tringel News Lucknow  8574663222 हिन्दी दिवस  एवं गणपति जन्मोत्सव पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों का भव्य लोकार्पण लखनऊ, 14 सितंबर। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ।   उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने पुनः उपस्थित करता है, तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करने का कार्य करता है। पेशवा ने इस बात के लिए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उनके पूर्वजों और पेशवा परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान समाज के सामने पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने डॉ. उपाध्याय की दोनों कृतियों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी लेखनी इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को समाज के सामने लाने का कार्य कर रही है, जिन पर आज गंभीर और व्यापक संवाद की आवश्यकता है। मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के ऐतिहासिक कथा-लेखन की प्रक्रिया, उनकी रचनात्मक दृष्टि और लेखकीय साधना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों को क्रमबद्ध कर देने का नाम नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की खोज और पड़ताल, संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण, पात्रों की मानसिकता को समझना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का पुनर्निर्माण और इन समस्त तथ्यों को साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने की कठिन साधना होती है। उन्होंने कहा कि ‘संक्रान्ति का संहार’ के पीछे डॉ. उपाध्याय की दीर्घकालिक अध्ययनशीलता, शोध-दृष्टि और लेखकीय परिश्रम स्पष्ट दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इतिहास की तथ्यात्मक विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखते हुए कथा में ऐसा प्राण फूँका जाए कि पाठक केवल इतिहास पढ़े नहीं, बल्कि उसे घटित होते हुए अनुभव करे। डॉ. उपाध्याय इतिहास और साहित्य के बीच इसी जीवंत सेतु का निर्माण करते दिखाई देते हैं। ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने विशेष रूप से आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में इतिहास को विराट कथात्मकता, शोध और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की जिस समृद्ध परंपरा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऊँचाई प्रदान की, डॉ. विद्यासागर उपाध्याय उसी परंपरा को अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चतुरसेन की परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल ऐतिहासिक विषयों को चुन लेना नहीं है। इसके लिए इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य, समाज, सत्ता, संस्कृति, सभ्यता और संघर्ष के प्रश्नों को साहित्यिक गहराई के साथ पकड़ना आवश्यक है। डॉ. उपाध्याय की रचनाओं में यह प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।         बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का उपन्यास ‘संक्रांति का संहार’ केवल पानीपत के तृतीय युद्ध की ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के उन गुमनाम नायकों का प्रतीक बताया, जिनके त्याग, व्रत, कला, संस्कार और बलिदान से राष्ट्र और स्वराज्य की नींव निर्मित होती है। उन्होंने ‘तमस’ और ‘उसने कहा था’ के युगबोध से इसकी तुलना करते हुए कहा कि जहाँ ‘तमस’ तटस्थता और सांस्कृतिक विघटन की चेतावनी देता है तथा ‘उसने कहा था’ वचन और व्यक्तिगत त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं ‘संक्रांति का संहार’ सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए व्रत एवं बलिदान का संदेश देता है। डॉ. तिवारी के अनुसार पानीपत यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक युग की संक्रांति और नए युग के जन्म का प्रतीक है; इसलिए यह कृति साहित्यिक उपन्यास से आगे बढ़कर सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और राष्ट्रधर्म का पुनर्स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उन्होंने इसे प्रत्येक घर में पढ़े और मनन किए जाने योग्य बताते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस उच्चकोटि की साहित्यिक सृष्टि के लिए बधाई और साधुवाद दिया।  पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच का सेतु बताते हुए कहा कि आज ऐतिहासिक लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को न तो रूखा अकादमिक विवरण बनने देना है और न ही उसे कल्पना का ऐसा आख्यान बना देना है जिसमें इतिहास की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाए। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ऐतिहासिक साहित्य की वास्तविक कसौटी है और डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की लेखकीय दृष्टि इस चुनौती को साधने की दिशा में गंभीर एवं उल्लेखनीय प्रयास है। डॉ. उपाध्याय अतीत को वर्तमान से काटकर नहीं देखते। उनकी दृष्टि में अतीत केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा को समझने का आधार है। साहित्य उस अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे संवेदनशील माध्यम है। ‘संक्रान्ति का संहार’ और ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ दोनों कृतियाँ अलग-अलग विधागत धरातल पर इसी वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती हैं। डॉ. उपाध्याय की लेखन-पद्धति में इतिहास महज पृष्ठभूमि बनकर नहीं रहता, बल्कि कथा का सक्रिय और जीवंत तत्व बन जाता है। घटनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक मनःस्थिति, सामाजिक संरचना, मानवीय मनोविज्ञान, सत्ता-संघर्ष और सभ्यतागत द्वंद्व को समझने की उनकी कोशिश उनकी रचनात्मक दृष्टि को विशिष्ट बनाती है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास महज विवरण न रहकर साहित्य में रूपांतरित होता है। डॉ नरेन्द्र भूषण ने‌ हिन्दी दिवस को लक्षित करते हुए हिन्दी को बोलने व लेखन में प्राथमिकता के साथ अपनाने पर बल दिया कार्यक्रम में उमेश चन्द्र दुबे, सुशील कुमार वर्मा, कुमार तरल, राजेश सिंह 'श्रेयश', डॉ इंद्रजीत तिवारी निर्भीक, डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी, राजीव वत्सल, करुणानिधि तिवारी, डॉ विजय प्रताप आर्य, डॉ आर वी एन पाण्डेय, डॉ अनिल कुमार तिवारी,  विनोद शंकर शुक्ल, देवकीनन्दन शान्त, डॉ स्मिता मिश्रा, बलवन्त सिंह, केशरी प्रसाद शुक्ल, पंकज कृष्ण, सरोज आर्यावर्ती, मन मोहन बाराकोटी, सुरभि सिंह, पी एस सुनील अय्यर, कन्हैया लाल, सोनी शुक्ल, कुॅंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ योगेश, मंजू सक्सेना, विनय कुमार मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, जलदूत नन्द किशोर वर्मा, रविशंकर श्रीवास्तव, प्रमोद श्रीवास्तव, आनंद सिंह, राहुल पाण्डेय, शिव नाथ सिंह, वेद प्रकाश द्विवेदी, राम लखन वर्मा, वीरेंद्र प्रताप यादव, जितेंद्र शर्मा, हिमांशु सक्सेना, राजेश यादव, रामसुतार सिंह, रोनित पाण्डेय आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त द्वारा अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ विद्या सागर उपाध्याय की कृतियों को साहित्य की उपलब्धि बताते हुए  ऐतिहासिक तथ्यों को जनमानस के सम्मुख लाने पर बल दिया। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान किया कि आज साहित्य को लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के भावों के साथ सृजित किये‌ जाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन विदुषी डॉ. ममता पंकज ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध साहित्यकार  सीमा मधुरिमा ने समस्त अभ्यागतों के प्रति आभार व्यक्त किया। Sanjay Agarwal  Tringel News Lucknow  8574663222                  Sanjay Agarwal  Tringel News Lucknow  8574663222 हिन्दी दिवस  एवं गणपति जन्मोत्सव पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों का भव्य लोकार्पण लखनऊ, 14 सितंबर। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ। उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने पुनः उपस्थित करता है, तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करने का कार्य करता है। पेशवा ने इस बात के लिए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उनके पूर्वजों और पेशवा परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान समाज के सामने पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने डॉ. उपाध्याय की दोनों कृतियों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी लेखनी इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को समाज के सामने लाने का कार्य कर रही है, जिन पर आज गंभीर और व्यापक संवाद की आवश्यकता है। मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के ऐतिहासिक कथा-लेखन की प्रक्रिया, उनकी रचनात्मक दृष्टि और लेखकीय साधना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों को क्रमबद्ध कर देने का नाम नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की खोज और पड़ताल, संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण, पात्रों की मानसिकता को समझना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का पुनर्निर्माण और इन समस्त तथ्यों को साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने की कठिन साधना होती है। उन्होंने कहा कि ‘संक्रान्ति का संहार’ के पीछे डॉ. उपाध्याय की दीर्घकालिक अध्ययनशीलता, शोध-दृष्टि और लेखकीय परिश्रम स्पष्ट दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इतिहास की तथ्यात्मक विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखते हुए कथा में ऐसा प्राण फूँका जाए कि पाठक केवल इतिहास पढ़े नहीं, बल्कि उसे घटित होते हुए अनुभव करे। डॉ. उपाध्याय इतिहास और साहित्य के बीच इसी जीवंत सेतु का निर्माण करते दिखाई देते हैं। ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने विशेष रूप से आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में इतिहास को विराट कथात्मकता, शोध और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की जिस समृद्ध परंपरा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऊँचाई प्रदान की, डॉ. विद्यासागर उपाध्याय उसी परंपरा को अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चतुरसेन की परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल ऐतिहासिक विषयों को चुन लेना नहीं है। इसके लिए इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य, समाज, सत्ता, संस्कृति, सभ्यता और संघर्ष के प्रश्नों को साहित्यिक गहराई के साथ पकड़ना आवश्यक है। डॉ. उपाध्याय की रचनाओं में यह प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का उपन्यास ‘संक्रांति का संहार’ केवल पानीपत के तृतीय युद्ध की ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के उन गुमनाम नायकों का प्रतीक बताया, जिनके त्याग, व्रत, कला, संस्कार और बलिदान से राष्ट्र और स्वराज्य की नींव निर्मित होती है। उन्होंने ‘तमस’ और ‘उसने कहा था’ के युगबोध से इसकी तुलना करते हुए कहा कि जहाँ ‘तमस’ तटस्थता और सांस्कृतिक विघटन की चेतावनी देता है तथा ‘उसने कहा था’ वचन और व्यक्तिगत त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं ‘संक्रांति का संहार’ सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए व्रत एवं बलिदान का संदेश देता है। डॉ. तिवारी के अनुसार पानीपत यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक युग की संक्रांति और नए युग के जन्म का प्रतीक है; इसलिए यह कृति साहित्यिक उपन्यास से आगे बढ़कर सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और राष्ट्रधर्म का पुनर्स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उन्होंने इसे प्रत्येक घर में पढ़े और मनन किए जाने योग्य बताते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस उच्चकोटि की साहित्यिक सृष्टि के लिए बधाई और साधुवाद दिया। पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच का सेतु बताते हुए कहा कि आज ऐतिहासिक लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को न तो रूखा अकादमिक विवरण बनने देना है और न ही उसे कल्पना का ऐसा आख्यान बना देना है जिसमें इतिहास की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाए। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ऐतिहासिक साहित्य की वास्तविक कसौटी है और डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की लेखकीय दृष्टि इस चुनौती को साधने की दिशा में गंभीर एवं उल्लेखनीय प्रयास है। डॉ. उपाध्याय अतीत को वर्तमान से काटकर नहीं देखते। उनकी दृष्टि में अतीत केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा को समझने का आधार है। साहित्य उस अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे संवेदनशील माध्यम है। ‘संक्रान्ति का संहार’ और ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ दोनों कृतियाँ अलग-अलग विधागत धरातल पर इसी वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती हैं। डॉ. उपाध्याय की लेखन-पद्धति में इतिहास महज पृष्ठभूमि बनकर नहीं रहता, बल्कि कथा का सक्रिय और जीवंत तत्व बन जाता है। घटनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक मनःस्थिति, सामाजिक संरचना, मानवीय मनोविज्ञान, सत्ता-संघर्ष और सभ्यतागत द्वंद्व को समझने की उनकी कोशिश उनकी रचनात्मक दृष्टि को विशिष्ट बनाती है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास महज विवरण न रहकर साहित्य में रूपांतरित होता है। डॉ नरेन्द्र भूषण ने‌ हिन्दी दिवस को लक्षित करते हुए हिन्दी को बोलने व लेखन में प्राथमिकता के साथ अपनाने पर बल दिया कार्यक्रम में उमेश चन्द्र दुबे, सुशील कुमार वर्मा, कुमार तरल, राजेश सिंह 'श्रेयश', डॉ इंद्रजीत तिवारी निर्भीक, डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी, राजीव वत्सल, करुणानिधि तिवारी, डॉ विजय प्रताप आर्य, डॉ आर वी एन पाण्डेय, डॉ अनिल कुमार तिवारी,  विनोद शंकर शुक्ल, देवकीनन्दन शान्त, डॉ स्मिता मिश्रा, बलवन्त सिंह, केशरी प्रसाद शुक्ल, पंकज कृष्ण, सरोज आर्यावर्ती, मन मोहन बाराकोटी, सुरभि सिंह, पी एस सुनील अय्यर, कन्हैया लाल, सोनी शुक्ल, कुॅंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ योगेश, मंजू सक्सेना, विनय कुमार मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, जलदूत नन्द किशोर वर्मा, रविशंकर श्रीवास्तव, प्रमोद श्रीवास्तव, आनंद सिंह, राहुल पाण्डेय, शिव नाथ सिंह, वेद प्रकाश द्विवेदी, राम लखन वर्मा, वीरेंद्र प्रताप यादव, जितेंद्र शर्मा, हिमांशु सक्सेना, राजेश यादव, रामसुतार सिंह, रोनित पाण्डेय आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त द्वारा अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ विद्या सागर उपाध्याय की कृतियों को साहित्य की उपलब्धि बताते हुए  ऐतिहासिक तथ्यों को जनमानस के सम्मुख लाने पर बल दिया। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान किया कि आज साहित्य को लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के भावों के साथ सृजित किये‌ जाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन विदुषी डॉ. ममता पंकज ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध साहित्यकार  सीमा मधुरिमा ने समस्त अभ्यागतों के प्रति आभार व्यक्त किया। Sanjay Agarwal  Tringel News Lucknow  8574663222
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    Agarwal 

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हिन्दी दिवस  एवं गणपति जन्मोत्सव पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों का भव्य लोकार्पण

लखनऊ, 14 सितंबर। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ।

  उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने पुनः उपस्थित करता है, तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करने का कार्य करता है। पेशवा ने इस बात के लिए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उनके पूर्वजों और पेशवा परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान समाज के सामने पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने डॉ. उपाध्याय की दोनों कृतियों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी लेखनी इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को समाज के सामने लाने का कार्य कर रही है, जिन पर आज गंभीर और व्यापक संवाद की आवश्यकता है।

मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के ऐतिहासिक कथा-लेखन की प्रक्रिया, उनकी रचनात्मक दृष्टि और लेखकीय साधना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों को क्रमबद्ध कर देने का नाम नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की खोज और पड़ताल, संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण, पात्रों की मानसिकता को समझना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का पुनर्निर्माण और इन समस्त तथ्यों को साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने की कठिन साधना होती है। उन्होंने कहा कि ‘संक्रान्ति का संहार’ के पीछे डॉ. उपाध्याय की दीर्घकालिक अध्ययनशीलता, शोध-दृष्टि और लेखकीय परिश्रम स्पष्ट दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इतिहास की तथ्यात्मक विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखते हुए कथा में ऐसा प्राण फूँका जाए कि पाठक केवल इतिहास पढ़े नहीं, बल्कि उसे घटित होते हुए अनुभव करे। डॉ. उपाध्याय इतिहास और साहित्य के बीच इसी जीवंत सेतु का निर्माण करते दिखाई देते हैं।

ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने विशेष रूप से आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में इतिहास को विराट कथात्मकता, शोध और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की जिस समृद्ध परंपरा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऊँचाई प्रदान की, डॉ. विद्यासागर उपाध्याय उसी परंपरा को अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चतुरसेन की परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल ऐतिहासिक विषयों को चुन लेना नहीं है। इसके लिए इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य, समाज, सत्ता, संस्कृति, सभ्यता और संघर्ष के प्रश्नों को साहित्यिक गहराई के साथ पकड़ना आवश्यक है। डॉ. उपाध्याय की रचनाओं में यह प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।


        बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का उपन्यास ‘संक्रांति का संहार’ केवल पानीपत के तृतीय युद्ध की ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के उन गुमनाम नायकों का प्रतीक बताया, जिनके त्याग, व्रत, कला, संस्कार और बलिदान से राष्ट्र और स्वराज्य की नींव निर्मित होती है। उन्होंने ‘तमस’ और ‘उसने कहा था’ के युगबोध से इसकी तुलना करते हुए कहा कि जहाँ ‘तमस’ तटस्थता और सांस्कृतिक विघटन की चेतावनी देता है तथा ‘उसने कहा था’ वचन और व्यक्तिगत त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं ‘संक्रांति का संहार’ सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए व्रत एवं बलिदान का संदेश देता है। डॉ. तिवारी के अनुसार पानीपत यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक युग की संक्रांति और नए युग के जन्म का प्रतीक है; इसलिए यह कृति साहित्यिक उपन्यास से आगे बढ़कर सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और राष्ट्रधर्म का पुनर्स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उन्होंने इसे प्रत्येक घर में पढ़े और मनन किए जाने योग्य बताते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस उच्चकोटि की साहित्यिक सृष्टि के लिए बधाई और साधुवाद दिया।

 पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच का सेतु बताते हुए कहा कि आज ऐतिहासिक लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को न तो रूखा अकादमिक विवरण बनने देना है और न ही उसे कल्पना का ऐसा आख्यान बना देना है जिसमें इतिहास की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाए। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ऐतिहासिक साहित्य की वास्तविक कसौटी है और डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की लेखकीय दृष्टि इस चुनौती को साधने की दिशा में गंभीर एवं उल्लेखनीय प्रयास है। डॉ. उपाध्याय अतीत को वर्तमान से काटकर नहीं देखते। उनकी दृष्टि में अतीत केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा को समझने का आधार है। साहित्य उस अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे संवेदनशील माध्यम है। ‘संक्रान्ति का संहार’ और ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ दोनों कृतियाँ अलग-अलग विधागत धरातल पर इसी वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती हैं। डॉ. उपाध्याय की लेखन-पद्धति में इतिहास महज पृष्ठभूमि बनकर नहीं रहता, बल्कि कथा का सक्रिय और जीवंत तत्व बन जाता है। घटनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक मनःस्थिति, सामाजिक संरचना, मानवीय मनोविज्ञान, सत्ता-संघर्ष और सभ्यतागत द्वंद्व को समझने की उनकी कोशिश उनकी रचनात्मक दृष्टि को विशिष्ट बनाती है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास महज विवरण न रहकर साहित्य में रूपांतरित होता है। डॉ नरेन्द्र भूषण ने‌ हिन्दी दिवस को लक्षित करते हुए हिन्दी को बोलने व लेखन में प्राथमिकता के साथ अपनाने पर बल दिया

कार्यक्रम में उमेश चन्द्र दुबे, सुशील कुमार वर्मा, कुमार तरल, राजेश सिंह 'श्रेयश', डॉ इंद्रजीत तिवारी निर्भीक, डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी, राजीव वत्सल, करुणानिधि तिवारी, डॉ विजय प्रताप आर्य, डॉ आर वी एन पाण्डेय, डॉ अनिल कुमार तिवारी,  विनोद शंकर शुक्ल, देवकीनन्दन शान्त, डॉ स्मिता मिश्रा, बलवन्त सिंह, केशरी प्रसाद शुक्ल, पंकज कृष्ण, सरोज आर्यावर्ती, मन मोहन बाराकोटी, सुरभि सिंह, पी एस सुनील अय्यर, कन्हैया लाल, सोनी शुक्ल, कुॅंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ योगेश, मंजू सक्सेना, विनय कुमार मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, जलदूत नन्द किशोर वर्मा, रविशंकर श्रीवास्तव, प्रमोद श्रीवास्तव, आनंद सिंह, राहुल पाण्डेय, शिव नाथ सिंह, वेद प्रकाश द्विवेदी, राम लखन वर्मा, वीरेंद्र प्रताप यादव, जितेंद्र शर्मा, हिमांशु सक्सेना, राजेश यादव, रामसुतार सिंह, रोनित पाण्डेय आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त द्वारा अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ विद्या सागर उपाध्याय की कृतियों को साहित्य की उपलब्धि बताते हुए  ऐतिहासिक तथ्यों को जनमानस के सम्मुख लाने पर बल दिया। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान किया कि आज साहित्य को लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के भावों के साथ सृजित किये‌ जाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन विदुषी डॉ. ममता पंकज ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध साहित्यकार  सीमा मधुरिमा ने समस्त अभ्यागतों के प्रति आभार व्यक्त किया।

Sanjay Agarwal 

Tringel News Lucknow 

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हिन्दी दिवस  एवं गणपति जन्मोत्सव पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों का भव्य लोकार्पण
लखनऊ, 14 सितंबर। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ।
उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने पुनः उपस्थित करता है, तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करने का कार्य करता है। पेशवा ने इस बात के लिए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उनके पूर्वजों और पेशवा परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान समाज के सामने पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने डॉ. उपाध्याय की दोनों कृतियों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी लेखनी इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को समाज के सामने लाने का कार्य कर रही है, जिन पर आज गंभीर और व्यापक संवाद की आवश्यकता है।
मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के ऐतिहासिक कथा-लेखन की प्रक्रिया, उनकी रचनात्मक दृष्टि और लेखकीय साधना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों को क्रमबद्ध कर देने का नाम नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की खोज और पड़ताल, संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण, पात्रों की मानसिकता को समझना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का पुनर्निर्माण और इन समस्त तथ्यों को साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने की कठिन साधना होती है। उन्होंने कहा कि ‘संक्रान्ति का संहार’ के पीछे डॉ. उपाध्याय की दीर्घकालिक अध्ययनशीलता, शोध-दृष्टि और लेखकीय परिश्रम स्पष्ट दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इतिहास की तथ्यात्मक विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखते हुए कथा में ऐसा प्राण फूँका जाए कि पाठक केवल इतिहास पढ़े नहीं, बल्कि उसे घटित होते हुए अनुभव करे। डॉ. उपाध्याय इतिहास और साहित्य के बीच इसी जीवंत सेतु का निर्माण करते दिखाई देते हैं।
ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने विशेष रूप से आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में इतिहास को विराट कथात्मकता, शोध और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की जिस समृद्ध परंपरा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऊँचाई प्रदान की, डॉ. विद्यासागर उपाध्याय उसी परंपरा को अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चतुरसेन की परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल ऐतिहासिक विषयों को चुन लेना नहीं है। इसके लिए इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य, समाज, सत्ता, संस्कृति, सभ्यता और संघर्ष के प्रश्नों को साहित्यिक गहराई के साथ पकड़ना आवश्यक है। डॉ. उपाध्याय की रचनाओं में यह प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का उपन्यास ‘संक्रांति का संहार’ केवल पानीपत के तृतीय युद्ध की ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के उन गुमनाम नायकों का प्रतीक बताया, जिनके त्याग, व्रत, कला, संस्कार और बलिदान से राष्ट्र और स्वराज्य की नींव निर्मित होती है। उन्होंने ‘तमस’ और ‘उसने कहा था’ के युगबोध से इसकी तुलना करते हुए कहा कि जहाँ ‘तमस’ तटस्थता और सांस्कृतिक विघटन की चेतावनी देता है तथा ‘उसने कहा था’ वचन और व्यक्तिगत त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं ‘संक्रांति का संहार’ सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए व्रत एवं बलिदान का संदेश देता है। डॉ. तिवारी के अनुसार पानीपत यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक युग की संक्रांति और नए युग के जन्म का प्रतीक है; इसलिए यह कृति साहित्यिक उपन्यास से आगे बढ़कर सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और राष्ट्रधर्म का पुनर्स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उन्होंने इसे प्रत्येक घर में पढ़े और मनन किए जाने योग्य बताते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस उच्चकोटि की साहित्यिक सृष्टि के लिए बधाई और साधुवाद दिया।
पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच का सेतु बताते हुए कहा कि आज ऐतिहासिक लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को न तो रूखा अकादमिक विवरण बनने देना है और न ही उसे कल्पना का ऐसा आख्यान बना देना है जिसमें इतिहास की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाए। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ऐतिहासिक साहित्य की वास्तविक कसौटी है और डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की लेखकीय दृष्टि इस चुनौती को साधने की दिशा में गंभीर एवं उल्लेखनीय प्रयास है। डॉ. उपाध्याय अतीत को वर्तमान से काटकर नहीं देखते। उनकी दृष्टि में अतीत केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा को समझने का आधार है। साहित्य उस अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे संवेदनशील माध्यम है। ‘संक्रान्ति का संहार’ और ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ दोनों कृतियाँ अलग-अलग विधागत धरातल पर इसी वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती हैं। डॉ. उपाध्याय की लेखन-पद्धति में इतिहास महज पृष्ठभूमि बनकर नहीं रहता, बल्कि कथा का सक्रिय और जीवंत तत्व बन जाता है। घटनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक मनःस्थिति, सामाजिक संरचना, मानवीय मनोविज्ञान, सत्ता-संघर्ष और सभ्यतागत द्वंद्व को समझने की उनकी कोशिश उनकी रचनात्मक दृष्टि को विशिष्ट बनाती है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास महज विवरण न रहकर साहित्य में रूपांतरित होता है। डॉ नरेन्द्र भूषण ने‌ हिन्दी दिवस को लक्षित करते हुए हिन्दी को बोलने व लेखन में प्राथमिकता के साथ अपनाने पर बल दिया
कार्यक्रम में उमेश चन्द्र दुबे, सुशील कुमार वर्मा, कुमार तरल, राजेश सिंह 'श्रेयश', डॉ इंद्रजीत तिवारी निर्भीक, डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी, राजीव वत्सल, करुणानिधि तिवारी, डॉ विजय प्रताप आर्य, डॉ आर वी एन पाण्डेय, डॉ अनिल कुमार तिवारी,  विनोद शंकर शुक्ल, देवकीनन्दन शान्त, डॉ स्मिता मिश्रा, बलवन्त सिंह, केशरी प्रसाद शुक्ल, पंकज कृष्ण, सरोज आर्यावर्ती, मन मोहन बाराकोटी, सुरभि सिंह, पी एस सुनील अय्यर, कन्हैया लाल, सोनी शुक्ल, कुॅंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ योगेश, मंजू सक्सेना, विनय कुमार मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, जलदूत नन्द किशोर वर्मा, रविशंकर श्रीवास्तव, प्रमोद श्रीवास्तव, आनंद सिंह, राहुल पाण्डेय, शिव नाथ सिंह, वेद प्रकाश द्विवेदी, राम लखन वर्मा, वीरेंद्र प्रताप यादव, जितेंद्र शर्मा, हिमांशु सक्सेना, राजेश यादव, रामसुतार सिंह, रोनित पाण्डेय आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त द्वारा अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ विद्या सागर उपाध्याय की कृतियों को साहित्य की उपलब्धि बताते हुए  ऐतिहासिक तथ्यों को जनमानस के सम्मुख लाने पर बल दिया। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान किया कि आज साहित्य को लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के भावों के साथ सृजित किये‌ जाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन विदुषी डॉ. ममता पंकज ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध साहित्यकार  सीमा मधुरिमा ने समस्त अभ्यागतों के प्रति आभार व्यक्त किया।
Sanjay Agarwal 
Tringel News Lucknow 
8574663222
    user_Reporter Sanjay Agrawal
    Reporter Sanjay Agrawal
    Local News Reporter सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    42 min ago
  • लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍 लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍
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    लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍
लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍
    user_Journalist Himanshu Garg
    Journalist Himanshu Garg
    Local News Reporter सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    1 hr ago
  • मुंबई के जुहू स्थित प्रसिद्ध रेस्टोरेंट के बाहर स्पॉट हुई , शर्लिन चोपड़ा! मुंबई -शर्लिन चोपड़ा हाल ही में मुंबई के जुहू स्थित प्रसिद्ध रेस्टोरेंट 'चिन चिन चू' ,#ChinChinChu के बाहर स्पॉट हुई ,जहाँ उन्होंने एक बेहद ग्लैमरस और बोल्ड ग्रीन साटन ड्रेस पहनी हुई थी। इस दौरान बिंदास अंदाज में हमेशा की तरह दिए दमदार पोज। #BollywoodGossip #highlights2026 #followerseveryone #nishafakecase #RPT #RakeshPandey #character #Mumbai #highlightsfollowers #viralphotopost #BreakingNewsUpdate #SherlynChopra
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    मुंबई के जुहू स्थित प्रसिद्ध रेस्टोरेंट 
के बाहर स्पॉट हुई , शर्लिन चोपड़ा!
मुंबई -शर्लिन चोपड़ा हाल ही में मुंबई के जुहू स्थित प्रसिद्ध रेस्टोरेंट 'चिन चिन चू' ,#ChinChinChu के बाहर स्पॉट हुई ,जहाँ उन्होंने एक बेहद ग्लैमरस और बोल्ड ग्रीन साटन ड्रेस पहनी हुई थी। इस दौरान बिंदास अंदाज में हमेशा की तरह दिए दमदार पोज। 
#BollywoodGossip #highlights2026 #followerseveryone #nishafakecase #RPT #RakeshPandey #character  #Mumbai #highlightsfollowers #viralphotopost  #BreakingNewsUpdate #SherlynChopra
    user_AmanTv
    AmanTv
    Archive सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    1 hr ago
  • चलती बस के पीछे लटककर सफर करता दिखा युवक, वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल 🚨 BREAKING NEWS 🚨 लखनऊ की यातायात पुलिस को खुलेआम चुनौती! चलती बस के पीछे लटककर सफर करता दिखा युवक, वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल लखनऊ। राजधानी में यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए डीसीपी ट्रैफिक रवीना त्यागी लगातार अभियान चला रही हैं, वहीं दूसरी ओर यातायात नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाने का मामला सामने आया है। बिठौली ओवरब्रिज के पास चलती बस के पीछे लटककर एक व्यक्ति के सफर करने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में व्यक्ति बस के पिछले हिस्से को पकड़कर जान जोखिम में डालते हुए यात्रा करता दिखाई दे रहा है। ऐसे खतरनाक तरीके से सफर करना न सिर्फ यातायात नियमों की अनदेखी है, बल्कि किसी बड़े हादसे को भी न्योता दे सकता है। वीडियो सामने आने के बाद अब देखना होगा कि यातायात पुलिस इस मामले में क्या कार्रवाई करती है।
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    चलती बस के पीछे लटककर सफर करता दिखा युवक, वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल
🚨 BREAKING NEWS 🚨
लखनऊ की यातायात पुलिस को खुलेआम चुनौती!
चलती बस के पीछे लटककर सफर करता दिखा युवक, वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल
लखनऊ। राजधानी में यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए डीसीपी ट्रैफिक रवीना त्यागी लगातार अभियान चला रही हैं, वहीं दूसरी ओर यातायात नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाने का मामला सामने आया है।
बिठौली ओवरब्रिज के पास चलती बस के पीछे लटककर एक व्यक्ति के सफर करने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में व्यक्ति बस के पिछले हिस्से को पकड़कर जान जोखिम में डालते हुए यात्रा करता दिखाई दे रहा है।
ऐसे खतरनाक तरीके से सफर करना न सिर्फ यातायात नियमों की अनदेखी है, बल्कि किसी बड़े हादसे को भी न्योता दे सकता है। 
वीडियो सामने आने के बाद अब देखना होगा कि यातायात पुलिस इस मामले में क्या कार्रवाई करती है।
    user_Sameer Safder naqvi
    Sameer Safder naqvi
    Video Creator सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    2 hrs ago
  • सुशांत गोल्फ सिटी के अंसल सिटी में सैकड़ों की तादात में दबंगों ने बोला धावा। ब्रेकिंग सुशांत गोल्फ सिटी के अंसल सिटी में सैकड़ों की तादात में दबंगों ने बोला धावा। कर्मचारियों से की मारपीट और तोड़फोड़। दबंगों की करतूत सीसीटीवी में हुई कैद। अंसल के मालिक प्रणव अंसल ने थाने में दी तहरीर। आरोप कि तीन दिन पुरानी घटना में पुलिस ने अभी तक नहीं दर्ज किया मुकदमा।
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    सुशांत गोल्फ सिटी के अंसल सिटी में सैकड़ों की तादात में दबंगों ने बोला धावा।

ब्रेकिंग 
सुशांत गोल्फ सिटी के अंसल सिटी में सैकड़ों की तादात में दबंगों ने बोला धावा।
कर्मचारियों से की मारपीट और तोड़फोड़।
दबंगों की करतूत सीसीटीवी में हुई कैद।
अंसल के मालिक प्रणव अंसल ने थाने में दी तहरीर।
आरोप कि तीन दिन पुरानी घटना में पुलिस ने अभी तक नहीं दर्ज किया मुकदमा।
    user_उमेश लोधी पत्रकार
    उमेश लोधी पत्रकार
    Local News Reporter Sadar, Lucknow•
    7 hrs ago
  • लखनऊ के थाना तालकटोरा क्षेत्र स्थित बालाजी मंदिर के पास लंबा जाम लगने से राहगीरों और वाहन चालकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
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    लखनऊ के थाना तालकटोरा क्षेत्र स्थित बालाजी मंदिर के पास लंबा जाम लगने से राहगीरों और वाहन चालकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
    user_Journalist Himanshu Garg
    Journalist Himanshu Garg
    Local News Reporter सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    1 hr ago
  • *पत्नी को नैनी पुल पसंद था...इसलिए यहीं से कूदा:* प्रयागराज में युवक ने सुसाइड नोट में लिखा; देख लो मैं मर सकता हूं यह घटना उत्तर प्रदेश के प्रयागराज की है, जहां 14 सितम्बर 2026 को एक युवक ने नए यमुना (नैनी) पुल से नदी में छलांग लगा दी। राहत की बात यह रही कि नीचे मुस्तैद जल पुलिस के जवानों और स्थानीय गोताखोरों ने युवक को नदी से सुरक्षित बाहर निकाल लिया। दस्तावेजों की बरामदगी: घटना के बाद पुलिस को युवक के पास से पहचान पत्र और एक नोट प्राप्त हुआ, जिसकी जांच की जा रही है।त्वरित रेस्क्यू ऑपरेशन: जैसे ही युवक ने पुल से छलांग लगाई, वहां तैनात जल पुलिस और स्थानीय गोताखोरों ने तुरंत कार्रवाई की। मोटरबोट की मदद से युवक को समय रहते नदी से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। ब्रेकिंग न्यूज़ संवाददाता आशीष मिश्रा दैनिक समाचार पत्र लखनऊ
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    *पत्नी को नैनी पुल पसंद था...इसलिए यहीं से कूदा:* प्रयागराज में युवक ने सुसाइड नोट में लिखा; देख लो मैं मर सकता हूं  यह घटना उत्तर प्रदेश के प्रयागराज की है, जहां 14 सितम्बर 2026 को एक युवक ने नए यमुना (नैनी) पुल से नदी में छलांग लगा दी। राहत की बात यह रही कि नीचे मुस्तैद जल पुलिस के जवानों और स्थानीय गोताखोरों ने युवक को नदी से सुरक्षित बाहर निकाल लिया। दस्तावेजों की बरामदगी: घटना के बाद पुलिस को युवक के पास से पहचान पत्र और एक नोट प्राप्त हुआ, जिसकी जांच की जा रही है।त्वरित रेस्क्यू ऑपरेशन: जैसे ही युवक ने पुल से छलांग लगाई, वहां तैनात जल पुलिस और स्थानीय गोताखोरों ने तुरंत कार्रवाई की। मोटरबोट की मदद से युवक को समय रहते नदी से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
ब्रेकिंग न्यूज़ संवाददाता आशीष मिश्रा दैनिक समाचार पत्र लखनऊ
    user_आशीष मिश्रा
    आशीष मिश्रा
    Local News Reporter Sadar, Lucknow•
    2 hrs ago
  • लखनऊ बरिगवां एलडीए सेक्टर-बी में सोमवार सुबह झोपड़पट्टी के बाहर मौरंग पर मजदूर रामबाबू मौर्य (32) का शव मिलने से हड़कंप मच गया। रविवार देर रात जन्मदिन समारोह के बाद वारदात की आशंका। शराब पार्टी में कुछ लोगों के नशे में होने की जानकारी। डीसीपी, एसीपी, इंस्पेक्टर व फॉरेंसिक टीम मौके पर पहुंची। पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगालकर हत्यारों की पहचान में जुटी लखनऊ के कृष्णानगर में मजदूर की गला रेतकर हत्या
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    लखनऊ 
बरिगवां एलडीए सेक्टर-बी में सोमवार सुबह झोपड़पट्टी के बाहर मौरंग पर मजदूर रामबाबू मौर्य (32) का शव मिलने से हड़कंप मच गया। रविवार देर रात जन्मदिन समारोह के बाद वारदात की आशंका। शराब पार्टी में कुछ लोगों के नशे में होने की जानकारी। डीसीपी, एसीपी, इंस्पेक्टर व फॉरेंसिक टीम मौके पर पहुंची। पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगालकर हत्यारों की पहचान में जुटी
लखनऊ के कृष्णानगर में मजदूर की गला रेतकर हत्या
    user_Journalist Rais Lucknow
    Journalist Rais Lucknow
    लखनऊ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    6 hrs ago
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