महोबा जिले में गौरहरि-पनवाड़ी सड़क पर एक पुल का निर्माण कार्य चल रहा है, लेकिन यह परियोजना उम्मीदों से कम और गंभीर सवालों से अधिक घिरी हुई है। लाखों-करोड़ों की लागत से बन रही इस संरचना की नींव में ही कथित भ्रष्टाचार की दरारें दिखने लगी हैं, जिससे इसकी गुणवत्ता और सुरक्षा पर गहरा संदेह पैदा हो गया है। निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठने पर संबंधित अधिकारियों ने जवाबदेही से पल्ला झाड़ लिया; जेई विनोद यादव ने मामला जेई अजय कुमार की ओर मोड़ दिया, जबकि अजय कुमार पुल की योजना, ठेकेदार और बजट संबंधी जानकारी देने में पूरी तरह विफल रहे। स्थिति तब और भी हैरान करने वाली हो गई जब अधिशासी अभियंता अनिल कुमार ने सीधे तौर पर कहा कि उन्हें इस पुल के निर्माण की कोई जानकारी ही नहीं है। यह बयान इस तथ्य के बावजूद आया कि उनके हस्ताक्षर के बिना परियोजना में एक ईंट भी नहीं लग सकती, जिससे यह सवाल खड़ा होता है कि फिर साइट पर काम कौन करवा रहा है और इसकी निगरानी किसकी है। मौके पर भी हालात चिंताजनक हैं: सिंगल रोड को बीच से चार फीट गहरा खोद दिया गया है, लेकिन वहां न तो कोई चेतावनी बोर्ड है, न बैरिकेड, और न ही रात में रोशनी की व्यवस्था। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जेसीबी से सड़क किनारे की काली मिट्टी खोदकर सीधे पुल की नींव में डाली जा रही है, जबकि इंजीनियरों के अनुसार ऐसी मिट्टी पर नींव टिक नहीं सकती और पुल पहली बाढ़ में ही ढह सकता है। सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर अनियमितताओं के आरोप हैं। नियमानुसार पुल में नर्मदा की साफ बजरी और तय ग्रेड का सीमेंट लगना चाहिए, लेकिन यहां नदी की मिट्टी मिली बजरी और कम सीमेंट के इस्तेमाल की बात सामने आई है। न तो क्यूब टेस्ट की कोई रिपोर्ट है और न ही लैब जांच का कोई रजिस्टर। निर्माण स्थल पर परियोजना का बोर्ड तक नहीं लगा है, जिससे यह पता चल सके कि यह काम किस मद से हो रहा है और ठेकेदार कौन है। यह कोई पहला मामला नहीं है; पनवाड़ी ब्लॉक के नेकपुरा-नगारा घाट पर बनी 30 लाख रुपये की सड़क एक महीने में ही उखड़ गई थी, जिसे ग्रामीणों ने खुद आगे आकर रुकवाया था। अब यह डर सता रहा है कि गौरहरि-पनवाड़ी का यह पुल भी उसी फेहरिस्त में न जुड़ जाए। पुल बनाना एक तकनीकी काम है, जिसमें मिट्टी की जांच से लेकर कंक्रीट की ग्रेड, सरिये की गुणवत्ता और नींव की गहराई तक हर कदम पर निर्धारित मानकों का पालन करना अनिवार्य होता है। जेई से लेकर एक्सईएन तक को हर दिन साइट रजिस्टर में एंट्री करनी होती है, लेकिन इस परियोजना में न तो मानक दिख रहे हैं और न ही कोई निगरानी। महोबा की जनता अब सीधा जवाब मांग रही है कि जब सब कुछ नियम से हो रहा है, तो अधिकारी जानकारी क्यों छिपा रहे हैं और जब एक्सईएन को ही पता नहीं, तो भुगतान किसके हस्ताक्षर से रिलीज हो रहा है। क्या यह केवल लापरवाही है या फिर पूरे सिस्टम की मिलीभगत से जनता के पैसे पर डाका डाला जा रहा है? जनता की मांग है कि काम तुरंत रोककर किसी थर्ड पार्टी से तकनीकी ऑडिट कराया जाए, साथ ही डीपीआर, टेंडर, एमबी और भुगतान का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए और दोषी ठेकेदार व अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, क्योंकि पुल केवल सीमेंट-सरिया का ढांचा नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का प्रतीक होता है।
महोबा जिले में गौरहरि-पनवाड़ी सड़क पर एक पुल का निर्माण कार्य चल रहा है, लेकिन यह परियोजना उम्मीदों से कम और गंभीर सवालों से अधिक घिरी हुई है। लाखों-करोड़ों की लागत से बन रही इस संरचना की नींव में ही कथित भ्रष्टाचार की दरारें दिखने लगी हैं, जिससे इसकी गुणवत्ता और सुरक्षा पर गहरा संदेह पैदा हो गया है। निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठने पर संबंधित अधिकारियों ने जवाबदेही से पल्ला झाड़ लिया; जेई विनोद यादव ने मामला जेई अजय कुमार की ओर मोड़ दिया, जबकि अजय कुमार पुल की योजना, ठेकेदार और बजट संबंधी जानकारी देने में पूरी तरह विफल रहे। स्थिति तब और भी हैरान करने वाली हो गई जब अधिशासी अभियंता अनिल कुमार ने सीधे तौर पर कहा कि उन्हें इस पुल के निर्माण की कोई जानकारी ही नहीं है। यह बयान इस तथ्य के बावजूद आया कि उनके हस्ताक्षर के बिना परियोजना में एक ईंट भी नहीं लग सकती, जिससे यह सवाल खड़ा होता है कि फिर साइट पर काम कौन करवा रहा है और इसकी निगरानी किसकी है। मौके पर भी हालात चिंताजनक हैं: सिंगल रोड को बीच से चार फीट गहरा खोद दिया गया है, लेकिन वहां न तो कोई चेतावनी बोर्ड है, न बैरिकेड, और न ही रात में रोशनी की व्यवस्था। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जेसीबी से सड़क किनारे की काली मिट्टी खोदकर सीधे पुल की नींव में डाली जा रही है, जबकि इंजीनियरों के अनुसार ऐसी मिट्टी पर नींव टिक नहीं सकती और पुल पहली बाढ़ में ही ढह सकता है। सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर अनियमितताओं के आरोप हैं। नियमानुसार पुल में नर्मदा की साफ बजरी और तय ग्रेड का सीमेंट लगना चाहिए, लेकिन यहां नदी की मिट्टी मिली बजरी और कम सीमेंट के इस्तेमाल की बात सामने आई है। न तो क्यूब टेस्ट की कोई रिपोर्ट है और न ही लैब जांच का कोई रजिस्टर। निर्माण स्थल पर परियोजना का बोर्ड तक नहीं लगा है, जिससे यह पता चल सके कि यह काम किस मद से हो रहा है और ठेकेदार कौन है। यह कोई पहला मामला नहीं है; पनवाड़ी ब्लॉक के नेकपुरा-नगारा घाट पर बनी 30 लाख रुपये की सड़क एक महीने में ही उखड़ गई थी, जिसे ग्रामीणों ने खुद आगे आकर रुकवाया था। अब यह डर सता रहा है कि गौरहरि-पनवाड़ी का यह पुल भी उसी फेहरिस्त में न जुड़ जाए। पुल बनाना एक तकनीकी काम है, जिसमें मिट्टी की जांच से लेकर कंक्रीट की ग्रेड, सरिये की गुणवत्ता और नींव की गहराई तक हर कदम पर निर्धारित मानकों का पालन करना अनिवार्य होता है। जेई से लेकर एक्सईएन तक को हर दिन साइट रजिस्टर में एंट्री करनी होती है, लेकिन इस परियोजना में न तो मानक दिख रहे हैं और न ही कोई निगरानी। महोबा की जनता अब सीधा जवाब मांग रही है कि जब सब कुछ नियम से हो रहा है, तो अधिकारी जानकारी क्यों छिपा रहे हैं और जब एक्सईएन को ही पता नहीं, तो भुगतान किसके हस्ताक्षर से रिलीज हो रहा है। क्या यह केवल लापरवाही है या फिर पूरे सिस्टम की मिलीभगत से जनता के पैसे पर डाका डाला जा रहा है? जनता की मांग है कि काम तुरंत रोककर किसी थर्ड पार्टी से तकनीकी ऑडिट कराया जाए, साथ ही डीपीआर, टेंडर, एमबी और भुगतान का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए और दोषी ठेकेदार व अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, क्योंकि पुल केवल सीमेंट-सरिया का ढांचा नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का प्रतीक होता है।
- उत्तर प्रदेश के महोबा में 'जीरो टॉलरेंस' नीति का खुला उल्लंघन देखा गया है। महोबा जिले के सोरा गांव में एक पुलिस चौकी के ठीक नाक के नीचे ही एक पहाड़ का 'चीरहरण' किया जा रहा है, जिससे इस नीति की खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं।1
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- महोबा जिले की कबरई नगर पंचायत में स्थित सरकारी जमीन पर एक व्यक्ति, जिसे माफिया रामप्रकाश पाठक बताया गया है, ने कब्जा कर लिया है। यह अतिक्रमण सरकारी नगर पंचायत की भूमि पर किया गया है।1
- विश्व साइकिल दिवस के अवसर पर, हमीरपुर की सड़कों पर रविवार सुबह एक भव्य साइकिल रैली का आयोजन किया गया, जिसमें 92 युवाओं ने 'संडेज ऑन साइकिल' थीम के तहत जोशपूर्ण भागीदारी कर फिटनेस और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इस आयोजन से हमीरपुर में स्वास्थ्य और जागरूकता का माहौल दिखा। हमीरपुर के DM के निर्देश पर आयोजित इस रैली को सुबह 6 बजे कलेक्ट्रेट परिसर से हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। इसमें कॉलेज के छात्र, एनसीसी कैडेट, खिलाड़ी और विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े युवाओं ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया। साइकिल सवार अपने हाथों में "साइकिल चलाओ, स्वस्थ रहो" और "हरित जीवनशैली अपनाओ" जैसे स्लोगन लिखी तख्तियां लिए हुए थे। यह लगभग 5 किलोमीटर लंबी जागरूकता रैली कलेक्ट्रेट से शुरू होकर मुख्य बाजार, रमेड़ी तिराहा, बस स्टैंड होते हुए वापस कलेक्ट्रेट परिसर में संपन्न हुई, जहाँ युवाओं का जोश देखने लायक था। मुख्य अतिथि ने इस अवसर पर कहा कि साइकिल न केवल फिटनेस का एक सरल माध्यम है, बल्कि यह पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने का भी एक सशक्त तरीका है। उन्होंने युवा पीढ़ी से फिट इंडिया और स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने के लिए साइकिल को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने का आह्वान किया। रैली में शामिल छात्रा प्रिया ने बताया कि वे हफ्ते में एक दिन साइकिल जरूर चलाएंगी, जिससे शरीर फिट रहेगा और पेट्रोल की बचत से पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा। वहीं, एनसीसी कैडेट राहुल ने कहा कि 'संडेज ऑन साइकिल' जैसी पहल हमीरपुर में फिटनेस संस्कृति को बढ़ावा देगी। कार्यक्रम के अंत में, सभी 92 प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। आयोजकों ने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के "स्वस्थ यूपी, सशक्त यूपी" के विजन को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से भविष्य में भी ऐसी रैलियों का लगातार आयोजन किया जाएगा।1
- हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के पालमपुर (भवारना) क्षेत्र में पुलिस ने एक व्यक्ति को अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ गंभीर अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया है। यह सनसनीखेज मामला तब सामने आया जब स्वास्थ्य संबंधी कारणों से अधिकारियों को इसकी जानकारी मिली और यह खुलासा हुआ कि हैवान पिता ने अपनी ही नाबालिग बेटी को हवस का शिकार बनाया, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई। इस गंभीर घटना के सामने आते ही पालमपुर पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए आरोपी को अपनी हिरासत में ले लिया है। पुलिस प्रशासन द्वारा मामले की गहनता से जांच की जा रही है, और आरोपी के खिलाफ पॉक्सो (POCSO) अधिनियम तथा भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है, क्योंकि पॉक्सो कानून विशेष रूप से नाबालिगों के संरक्षण के लिए बनाया गया है। स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने बताया है कि पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए कानून के तहत कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है। साथ ही, कानूनी नियमों और पीड़ित की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, इस संवेदनशील मामले से जुड़ी पहचान और अन्य जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है।1
- उत्तर प्रदेश में 29 मई को पुल की कोठियां ढहने से हुई छह मजदूरों की मौत के बाद, समाजवादी पार्टी (सपा) ने पीड़ित परिवारों से मुलाकात की है। अखिलेश यादव के निर्देश पर, राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल निगम वाराणसी और जिलाध्यक्ष इदरीश खान ने इन प्रभावित परिजनों से भेंट की। उन्होंने परसैनी मोराकंदर पुल हादसे के दुर्घटनास्थल का भी निरीक्षण किया। मुलाकात के दौरान, सपा नेताओं ने पीड़ित परिवारों तक राष्ट्रीय अध्यक्ष का संदेश पहुंचाया और उन्हें न्याय दिलाने का भरोसा दिलाया। सपा मजदूर सभा की टीम भी परसैनी मोराकंदर में पीड़ित परिवारों से मिली और उन्हें सहायता दिलाने का आश्वासन दिया। इसके अतिरिक्त, पार्टी ने जिलाधिकारी को एक ज्ञापन सौंपा है, जिसमें मृतकों के परिजनों के लिए आर्थिक सहायता और उचित मुआवजे की मांग की गई है।1
- विश्वकर्मा योजना के तहत किट वितरण प्रक्रिया में अवैध वसूली का गंभीर आरोप सामने आया है। इस मामले को लेकर एक पीड़ित महिला ने संबंधित अधिकारियों से तत्काल गहन जांच की मांग उठाई है।1
- महोबा जिले में गौरहरि-पनवाड़ी सड़क पर एक पुल का निर्माण कार्य चल रहा है, लेकिन यह परियोजना उम्मीदों से कम और गंभीर सवालों से अधिक घिरी हुई है। लाखों-करोड़ों की लागत से बन रही इस संरचना की नींव में ही कथित भ्रष्टाचार की दरारें दिखने लगी हैं, जिससे इसकी गुणवत्ता और सुरक्षा पर गहरा संदेह पैदा हो गया है। निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठने पर संबंधित अधिकारियों ने जवाबदेही से पल्ला झाड़ लिया; जेई विनोद यादव ने मामला जेई अजय कुमार की ओर मोड़ दिया, जबकि अजय कुमार पुल की योजना, ठेकेदार और बजट संबंधी जानकारी देने में पूरी तरह विफल रहे। स्थिति तब और भी हैरान करने वाली हो गई जब अधिशासी अभियंता अनिल कुमार ने सीधे तौर पर कहा कि उन्हें इस पुल के निर्माण की कोई जानकारी ही नहीं है। यह बयान इस तथ्य के बावजूद आया कि उनके हस्ताक्षर के बिना परियोजना में एक ईंट भी नहीं लग सकती, जिससे यह सवाल खड़ा होता है कि फिर साइट पर काम कौन करवा रहा है और इसकी निगरानी किसकी है। मौके पर भी हालात चिंताजनक हैं: सिंगल रोड को बीच से चार फीट गहरा खोद दिया गया है, लेकिन वहां न तो कोई चेतावनी बोर्ड है, न बैरिकेड, और न ही रात में रोशनी की व्यवस्था। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जेसीबी से सड़क किनारे की काली मिट्टी खोदकर सीधे पुल की नींव में डाली जा रही है, जबकि इंजीनियरों के अनुसार ऐसी मिट्टी पर नींव टिक नहीं सकती और पुल पहली बाढ़ में ही ढह सकता है। सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर अनियमितताओं के आरोप हैं। नियमानुसार पुल में नर्मदा की साफ बजरी और तय ग्रेड का सीमेंट लगना चाहिए, लेकिन यहां नदी की मिट्टी मिली बजरी और कम सीमेंट के इस्तेमाल की बात सामने आई है। न तो क्यूब टेस्ट की कोई रिपोर्ट है और न ही लैब जांच का कोई रजिस्टर। निर्माण स्थल पर परियोजना का बोर्ड तक नहीं लगा है, जिससे यह पता चल सके कि यह काम किस मद से हो रहा है और ठेकेदार कौन है। यह कोई पहला मामला नहीं है; पनवाड़ी ब्लॉक के नेकपुरा-नगारा घाट पर बनी 30 लाख रुपये की सड़क एक महीने में ही उखड़ गई थी, जिसे ग्रामीणों ने खुद आगे आकर रुकवाया था। अब यह डर सता रहा है कि गौरहरि-पनवाड़ी का यह पुल भी उसी फेहरिस्त में न जुड़ जाए। पुल बनाना एक तकनीकी काम है, जिसमें मिट्टी की जांच से लेकर कंक्रीट की ग्रेड, सरिये की गुणवत्ता और नींव की गहराई तक हर कदम पर निर्धारित मानकों का पालन करना अनिवार्य होता है। जेई से लेकर एक्सईएन तक को हर दिन साइट रजिस्टर में एंट्री करनी होती है, लेकिन इस परियोजना में न तो मानक दिख रहे हैं और न ही कोई निगरानी। महोबा की जनता अब सीधा जवाब मांग रही है कि जब सब कुछ नियम से हो रहा है, तो अधिकारी जानकारी क्यों छिपा रहे हैं और जब एक्सईएन को ही पता नहीं, तो भुगतान किसके हस्ताक्षर से रिलीज हो रहा है। क्या यह केवल लापरवाही है या फिर पूरे सिस्टम की मिलीभगत से जनता के पैसे पर डाका डाला जा रहा है? जनता की मांग है कि काम तुरंत रोककर किसी थर्ड पार्टी से तकनीकी ऑडिट कराया जाए, साथ ही डीपीआर, टेंडर, एमबी और भुगतान का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए और दोषी ठेकेदार व अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, क्योंकि पुल केवल सीमेंट-सरिया का ढांचा नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का प्रतीक होता है।1