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मजालता पुल को लेकर बड़ी जानकारी मजालता में निर्माणाधीन पुल (Bridge) को लेकर सिविल इंजीनियर मोहम्मद शरीफ मलिक ने स्पष्ट किया है कि इस पुल पर वाहनों की आवाजाही शुरू होने में अभी लगभग 1 से 2 साल का समय लग सकता है। निर्माण कार्य जारी है और विभाग की ओर से गुणवत्ता व सुरक्षा मानकों का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। स्थानीय लोगों को अभी थोड़ा और इंतजार करना होगा, लेकिन पुल के पूरा होने के बाद क्षेत्र में आवागमन की बड़ी सुविधा मिलेगी। विकास की रफ्तार जारी है, इंतजार खत्म होगा मजबूत बुनियादी ढांचे के साथ। क्या आपको लगता है कि कार्य में तेजी लानी चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर दें। Explore News – JkDogra Surat _Till The End News
VERINDER SINGH
मजालता पुल को लेकर बड़ी जानकारी मजालता में निर्माणाधीन पुल (Bridge) को लेकर सिविल इंजीनियर मोहम्मद शरीफ मलिक ने स्पष्ट किया है कि इस पुल पर वाहनों की आवाजाही शुरू होने में अभी लगभग 1 से 2 साल का समय लग सकता है। निर्माण कार्य जारी है और विभाग की ओर से गुणवत्ता व सुरक्षा मानकों का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। स्थानीय लोगों को अभी थोड़ा और इंतजार करना होगा, लेकिन पुल के पूरा होने के बाद क्षेत्र में आवागमन की बड़ी सुविधा मिलेगी। विकास की रफ्तार जारी है, इंतजार खत्म होगा मजबूत बुनियादी ढांचे के साथ। क्या आपको लगता है कि कार्य में तेजी लानी चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर दें। Explore News – JkDogra Surat _Till The End News
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- जब परंपरा ही सुरक्षा बन जाए और विश्वास ही शक्ति: पांगी घाटी के समाल पर्व की दिव्य गाथा पांगी घाटी (चंबा): दुर्गम हिमालयी अंचल पांगी घाटी में आस्था केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन का अभिन्न सुरक्षा कवच है। यहां सुरक्षा किसी बाहरी साधन से नहीं, बल्कि परंपराओं और विश्वासों के माध्यम से सुनिश्चित की जाती है। यही कारण है कि पांगी में मनाया जाने वाला समाल पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और आध्यात्मिक संरक्षण का अद्वितीय उदाहरण है। पांच दिनों तक चलने वाला यह पर्व इस वर्ष भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सम्पन्न हुआ। इसकी शुरुआत शौर गांव से होती है और अंतिम आयोजन साच क्षेत्र में संपन्न होता है। विशेष बात यह है कि यह पर्व किलाड़ क्षेत्र में नहीं मनाया जाता, जो इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक सीमा को दर्शाता है। दैवीय कन्या की लोककथा: समाल पर्व की आधारशिला समाल पर्व का मूल एक प्राचीन लोकगाथा से जुड़ा है, जो पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से संजोई गई है। मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व साच क्षेत्र में एक परिवार में एक दैवीय कन्या का जन्म हुआ। पांगी की कठोर सर्दियों और भारी बर्फबारी के बीच वृद्ध माता-पिता के कारण घर का समस्त कार्य उसी कन्या के जिम्मे था। वह अत्यंत कर्तव्यनिष्ठ थी, पर उसकी एक शर्त थी—वह “जूठा पानी” (खाने के बर्तनों से निकला गंदा पानी) नहीं उठाएगी। एक दिन परिस्थितियोंवश उसे यह कार्य भी करना पड़ा। लोककथा कहती है कि जब वह जूठा पानी बाहर फेंकने गई, तो फिर कभी घर नहीं लौटी। परिवारजन खोजते हुए जंगल की ओर पहुंचे तो देखा कि वह एक बड़े पत्थर के नीचे बैठी है। उसने स्पष्ट शब्दों में घर लौटने से इंकार कर दिया और कहा कि अब उसका निवास वही स्थान है। परिवारजन कुछ समय तक उसे भोजन पहुंचाते रहे। एक दिन बर्फबारी और वृद्धावस्था के कारण वे स्वयं नहीं जा सके और एक युवक को भेजा। किंवदंती के अनुसार उस युवक ने दुष्कर्म का प्रयास किया। तब उस दैवीय कन्या ने पक्षी का रूप धारण किया और वहां से उड़कर कुल्लू के भेखली नामक स्थान पर जा बसी। आज भी वहां उसका भव्य मंदिर विद्यमान है। लोक-मान्यता है कि समाल पर्व के दौरान एक दिन वह दैवीय शक्ति अपने मूल गांव लौटती है, और उसके अगले दिन साच क्षेत्र में समाल पर्व का मुख्य आयोजन होता है। अनुष्ठानिक ज्यामिति: जब घर बनते हैं जीवित सुरक्षा कवच समाल पर्व के दौरान पांगी के जनजातीय घर आध्यात्मिक किले में परिवर्तित हो जाते हैं। घरों के मुख्य द्वार, खिड़कियों, सीढ़ियों और प्रवेश मार्गों पर विशेष पवित्र चिह्न बनाए जाते हैं। इन चिह्नों के निर्माण में उपयोग होता है: चोक – सफेद पत्थर का चूर्ण कांटेदार जंगली गुलाब की टहनियां – नकारात्मक शक्तियों से रक्षा का प्रतीक शाशो – पवित्र सफेद पत्थरों का समूह, जिससे प्राचीनकाल में अग्नि प्रज्वलित की जाती थी कैली – मिट्टी या चूने का लेप इन प्रतीकों को फर्श से छत तक जाने वाले मार्गों और प्रत्येक दहलीज पर अंकित किया जाता है। यह मात्र सजावट नहीं, बल्कि एक अनुष्ठानिक प्रक्रिया है। हर आकृति का एक आध्यात्मिक अर्थ है, भले ही उसका आकार गांव-गांव में भिन्न हो। स्थानीय विश्वास के अनुसार ये चिह्न: राक्षसी और नकारात्मक ऊर्जाओं को घर में प्रवेश से रोकते हैं घर और परिवेश की पवित्रता बनाए रखते हैं प्रकृति-देवताओं और पूर्वजों का आशीर्वाद आमंत्रित करते हैं यह परंपरा “अनुष्ठानिक ज्यामिति” का जीवंत उदाहरण है—एक ऐसी मौन भाषा, जो पुस्तकों में नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृति में सुरक्षित है। सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक एकता समाल पर्व केवल आध्यात्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक भी है। पांच दिनों तक गांवों में विशेष आयोजन होते हैं, पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से लोक परंपराओं को जीवित रखा जाता है। यह पर्व जनजातीय समाज को उनकी जड़ों से जोड़ता है। आधुनिकता और वैश्वीकरण के दौर में जहां कई परंपराएं लुप्त होती जा रही हैं, वहीं पांगी घाटी ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को न केवल सुरक्षित रखा है, बल्कि उसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया है। आस्था जो दीवारों पर उकेरी जाती है पांगी की यह परंपरा यह संदेश देती है कि सांस्कृतिक विरासत केवल संग्रहालयों या शोधग्रंथों में नहीं बसती। यहां आस्था दीवारों पर उकेरी जाती है, दहलीजों पर अंकित की जाती है और जीवन के हर आयाम में जिया जाती है। पत्थर, कांटे, राख और मिट्टी—ये साधारण तत्व मिलकर असाधारण आध्यात्मिक संरचना का निर्माण करते हैं। यह एक ऐसा विश्वास है, जो सुरक्षा का आश्वासन देता है और सामुदायिक आत्मविश्वास को सुदृढ़ करता है। निष्कर्ष समाल पर्व पांगी घाटी की जनजातीय विरासत, पूर्वजों की ज्ञान-परंपरा और पर्वतीय विश्वास की अमिट छाप है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जब परंपरा जीवित रहती है, तो समाज सुरक्षित और सशक्त बना रहता है। पांगी में परंपरा केवल अतीत नहीं—वह वर्तमान की शक्ति और भविष्य की सुरक्षा है।1
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- Asalamualaikum I request those people who leave these horses unattended to please take care of them and keep them properly secured so that no one gets harmed.1
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- क्या ये सब हमारी आंतरिक सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं। हिंदू कब जागेगा। ओर अपनी आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।1
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- आज साच खास में संपूर्णता अभियान 2.0 का शानदार आयोजन! डॉ. अमन ठाकुर ने टीबी के इलाज और रोकथाम पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि समय पर जांच और सही दवा से टीबी को पूरी तरह हराया जा सकता है। आइए, स्वस्थ हिमाचल के लिए एकजुट हों! 💪🫁1
- सुजानपुर सुजानपुर होली मेला ग्राउंड को एक व्यक्ति को बेचने के फरमान पर होली मेला बचाओ संघर्ष समिति आक्रोश में है और प्रशासन का यह फैसला बदल जाए इसको लेकर एक मांग पत्र उपमंडल एवं मेला अधिकारी को दिया गया है होली मेला बचाओ संघर्ष समिति सुजानपुर के प्रधान अरुण जैन ने मेले के भीतर दुकानदारी लगाने वालों के साथ मिलकर एक मांग पत्र मिला एवं उपमंडल अधिकारी विकास शुक्ला को दिया है उन्होंने बताया कि सुजानपुर प्रशासन द्वारा इस बार होली मेला ग्राउंड को एक ही व्यक्ति को बेचने का फरमान जारी किया गया है जो गलत हैं हम सभी सुजानपुर के नागरिक प्रशासन द्वारा होली मेला ग्राउंड को किसी एक व्यक्ति ही के नाम पर आवंटन का हम सुजानपुर वासी पुरजोर विरोध करते हैं उन्होंने बताया कि प्रशाशन के इस निर्णय से छोटे दुकानदारों का उत्पीडन होगा तथा जो गरीब लोग पूरा साल भर इस मेले का इंतज़ार करते हैं ताकि इस मेले से अपनी रोजी रोटी का प्रबंध कर सकें। सभी लोग हतास व निराश हैं, महाराजा संसार चंद द्वारा शुरू किया गया यह मेला एक ऐतिहासिक मेला है तथा इस मेले को शुरू करने का एक तात्पर्य यह था कि लोग अपने उत्पादों को बेच सकें ताकि उनकी रोजी रोटी साल भर चलती रहे मगर इस तुगलकी फरमान से सबकी आशाएं निराशाओं में बदल रही हैं। प्रशाशन से पुरजोर अनुरोध है कि जैसे बिगत वर्षों में प्लाट आवंटन का जो नियम था उसे जारी रहने दें। अगर हमारी मांग नहीं मानी गई तो प्रशाशन के खिलाफ सुजानपुर होली मेला बचाओ संघर्ष समिति धरना प्रदर्शन करेगी जिसकी पूरी जुम्मेवरी प्रशाशन की होगी1