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जब परंपरा ही सुरक्षा बन जाए और विश्वास ही शक्ति: पांगी घाटी के समाल पर्व की दिव्य गाथा जब परंपरा ही सुरक्षा बन जाए और विश्वास ही शक्ति: पांगी घाटी के समाल पर्व की दिव्य गाथा पांगी घाटी (चंबा): दुर्गम हिमालयी अंचल पांगी घाटी में आस्था केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन का अभिन्न सुरक्षा कवच है। यहां सुरक्षा किसी बाहरी साधन से नहीं, बल्कि परंपराओं और विश्वासों के माध्यम से सुनिश्चित की जाती है। यही कारण है कि पांगी में मनाया जाने वाला समाल पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और आध्यात्मिक संरक्षण का अद्वितीय उदाहरण है। पांच दिनों तक चलने वाला यह पर्व इस वर्ष भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सम्पन्न हुआ। इसकी शुरुआत शौर गांव से होती है और अंतिम आयोजन साच क्षेत्र में संपन्न होता है। विशेष बात यह है कि यह पर्व किलाड़ क्षेत्र में नहीं मनाया जाता, जो इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक सीमा को दर्शाता है। दैवीय कन्या की लोककथा: समाल पर्व की आधारशिला समाल पर्व का मूल एक प्राचीन लोकगाथा से जुड़ा है, जो पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से संजोई गई है। मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व साच क्षेत्र में एक परिवार में एक दैवीय कन्या का जन्म हुआ। पांगी की कठोर सर्दियों और भारी बर्फबारी के बीच वृद्ध माता-पिता के कारण घर का समस्त कार्य उसी कन्या के जिम्मे था। वह अत्यंत कर्तव्यनिष्ठ थी, पर उसकी एक शर्त थी—वह “जूठा पानी” (खाने के बर्तनों से निकला गंदा पानी) नहीं उठाएगी। एक दिन परिस्थितियोंवश उसे यह कार्य भी करना पड़ा। लोककथा कहती है कि जब वह जूठा पानी बाहर फेंकने गई, तो फिर कभी घर नहीं लौटी। परिवारजन खोजते हुए जंगल की ओर पहुंचे तो देखा कि वह एक बड़े पत्थर के नीचे बैठी है। उसने स्पष्ट शब्दों में घर लौटने से इंकार कर दिया और कहा कि अब उसका निवास वही स्थान है। परिवारजन कुछ समय तक उसे भोजन पहुंचाते रहे। एक दिन बर्फबारी और वृद्धावस्था के कारण वे स्वयं नहीं जा सके और एक युवक को भेजा। किंवदंती के अनुसार उस युवक ने दुष्कर्म का प्रयास किया। तब उस दैवीय कन्या ने पक्षी का रूप धारण किया और वहां से उड़कर कुल्लू के भेखली नामक स्थान पर जा बसी। आज भी वहां उसका भव्य मंदिर विद्यमान है। लोक-मान्यता है कि समाल पर्व के दौरान एक दिन वह दैवीय शक्ति अपने मूल गांव लौटती है, और उसके अगले दिन साच क्षेत्र में समाल पर्व का मुख्य आयोजन होता है। अनुष्ठानिक ज्यामिति: जब घर बनते हैं जीवित सुरक्षा कवच समाल पर्व के दौरान पांगी के जनजातीय घर आध्यात्मिक किले में परिवर्तित हो जाते हैं। घरों के मुख्य द्वार, खिड़कियों, सीढ़ियों और प्रवेश मार्गों पर विशेष पवित्र चिह्न बनाए जाते हैं। इन चिह्नों के निर्माण में उपयोग होता है: चोक – सफेद पत्थर का चूर्ण कांटेदार जंगली गुलाब की टहनियां – नकारात्मक शक्तियों से रक्षा का प्रतीक शाशो – पवित्र सफेद पत्थरों का समूह, जिससे प्राचीनकाल में अग्नि प्रज्वलित की जाती थी कैली – मिट्टी या चूने का लेप इन प्रतीकों को फर्श से छत तक जाने वाले मार्गों और प्रत्येक दहलीज पर अंकित किया जाता है। यह मात्र सजावट नहीं, बल्कि एक अनुष्ठानिक प्रक्रिया है। हर आकृति का एक आध्यात्मिक अर्थ है, भले ही उसका आकार गांव-गांव में भिन्न हो। स्थानीय विश्वास के अनुसार ये चिह्न: राक्षसी और नकारात्मक ऊर्जाओं को घर में प्रवेश से रोकते हैं घर और परिवेश की पवित्रता बनाए रखते हैं प्रकृति-देवताओं और पूर्वजों का आशीर्वाद आमंत्रित करते हैं यह परंपरा “अनुष्ठानिक ज्यामिति” का जीवंत उदाहरण है—एक ऐसी मौन भाषा, जो पुस्तकों में नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृति में सुरक्षित है। सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक एकता समाल पर्व केवल आध्यात्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक भी है। पांच दिनों तक गांवों में विशेष आयोजन होते हैं, पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से लोक परंपराओं को जीवित रखा जाता है। यह पर्व जनजातीय समाज को उनकी जड़ों से जोड़ता है। आधुनिकता और वैश्वीकरण के दौर में जहां कई परंपराएं लुप्त होती जा रही हैं, वहीं पांगी घाटी ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को न केवल सुरक्षित रखा है, बल्कि उसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया है। आस्था जो दीवारों पर उकेरी जाती है पांगी की यह परंपरा यह संदेश देती है कि सांस्कृतिक विरासत केवल संग्रहालयों या शोधग्रंथों में नहीं बसती। यहां आस्था दीवारों पर उकेरी जाती है, दहलीजों पर अंकित की जाती है और जीवन के हर आयाम में जिया जाती है। पत्थर, कांटे, राख और मिट्टी—ये साधारण तत्व मिलकर असाधारण आध्यात्मिक संरचना का निर्माण करते हैं। यह एक ऐसा विश्वास है, जो सुरक्षा का आश्वासन देता है और सामुदायिक आत्मविश्वास को सुदृढ़ करता है। निष्कर्ष समाल पर्व पांगी घाटी की जनजातीय विरासत, पूर्वजों की ज्ञान-परंपरा और पर्वतीय विश्वास की अमिट छाप है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जब परंपरा जीवित रहती है, तो समाज सुरक्षित और सशक्त बना रहता है। पांगी में परंपरा केवल अतीत नहीं—वह वर्तमान की शक्ति और भविष्य की सुरक्षा है।

1 hr ago
user_PANGI NEWS 24
PANGI NEWS 24
Social Media Manager Pangi, Chamba•
1 hr ago

जब परंपरा ही सुरक्षा बन जाए और विश्वास ही शक्ति: पांगी घाटी के समाल पर्व की दिव्य गाथा जब परंपरा ही सुरक्षा बन जाए और विश्वास ही शक्ति: पांगी घाटी के समाल पर्व की दिव्य गाथा पांगी घाटी (चंबा): दुर्गम हिमालयी अंचल पांगी घाटी में आस्था केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन का अभिन्न सुरक्षा कवच है। यहां सुरक्षा किसी बाहरी साधन से नहीं, बल्कि परंपराओं और विश्वासों के माध्यम से सुनिश्चित की जाती है। यही कारण है कि पांगी में मनाया जाने वाला समाल पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और आध्यात्मिक संरक्षण का अद्वितीय उदाहरण है। पांच दिनों तक चलने वाला यह पर्व इस वर्ष भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सम्पन्न हुआ। इसकी शुरुआत शौर गांव से होती है और अंतिम आयोजन साच क्षेत्र में संपन्न होता है। विशेष बात यह है कि यह पर्व किलाड़ क्षेत्र में नहीं मनाया जाता, जो इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक सीमा को दर्शाता है। दैवीय कन्या की लोककथा: समाल पर्व की आधारशिला समाल पर्व का मूल एक प्राचीन लोकगाथा से जुड़ा है, जो पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से संजोई गई है। मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व साच क्षेत्र में एक परिवार में एक दैवीय कन्या का जन्म हुआ। पांगी की कठोर सर्दियों और भारी बर्फबारी के बीच वृद्ध माता-पिता के कारण घर का समस्त कार्य उसी कन्या के जिम्मे था। वह अत्यंत कर्तव्यनिष्ठ थी, पर उसकी एक शर्त थी—वह “जूठा पानी” (खाने के बर्तनों से निकला गंदा पानी) नहीं उठाएगी। एक दिन परिस्थितियोंवश उसे यह कार्य भी करना पड़ा। लोककथा कहती है कि जब वह जूठा पानी बाहर फेंकने गई, तो फिर कभी घर नहीं लौटी। परिवारजन खोजते हुए जंगल की ओर पहुंचे तो देखा कि वह एक बड़े पत्थर के नीचे बैठी है। उसने स्पष्ट शब्दों में घर लौटने से इंकार कर दिया और कहा कि अब उसका निवास वही स्थान है। परिवारजन कुछ समय तक उसे भोजन पहुंचाते रहे। एक दिन बर्फबारी और वृद्धावस्था के कारण वे स्वयं नहीं जा सके और एक युवक को भेजा। किंवदंती के अनुसार उस युवक ने दुष्कर्म का प्रयास किया। तब उस दैवीय कन्या ने पक्षी का रूप धारण किया और वहां से उड़कर कुल्लू के भेखली नामक स्थान पर जा बसी। आज भी वहां उसका भव्य मंदिर विद्यमान है। लोक-मान्यता है कि समाल पर्व के दौरान एक दिन वह दैवीय शक्ति अपने मूल गांव लौटती है, और उसके अगले दिन साच क्षेत्र में समाल पर्व का मुख्य आयोजन होता है। अनुष्ठानिक ज्यामिति: जब घर बनते हैं जीवित सुरक्षा कवच समाल पर्व के दौरान पांगी के जनजातीय घर आध्यात्मिक किले में परिवर्तित हो जाते हैं। घरों के मुख्य द्वार, खिड़कियों, सीढ़ियों और प्रवेश मार्गों पर विशेष पवित्र चिह्न बनाए जाते हैं। इन चिह्नों के निर्माण में उपयोग होता है: चोक – सफेद पत्थर का चूर्ण कांटेदार जंगली गुलाब की टहनियां – नकारात्मक शक्तियों से रक्षा का प्रतीक शाशो – पवित्र सफेद पत्थरों का समूह, जिससे प्राचीनकाल में अग्नि प्रज्वलित की जाती थी कैली – मिट्टी या चूने का लेप इन प्रतीकों को फर्श से छत तक जाने वाले मार्गों और प्रत्येक दहलीज पर अंकित किया जाता है। यह मात्र सजावट नहीं, बल्कि एक अनुष्ठानिक प्रक्रिया है। हर आकृति का एक आध्यात्मिक अर्थ है, भले ही उसका आकार गांव-गांव में भिन्न हो। स्थानीय विश्वास के अनुसार ये चिह्न: राक्षसी और नकारात्मक ऊर्जाओं को घर में प्रवेश से रोकते हैं घर और परिवेश की पवित्रता बनाए रखते हैं प्रकृति-देवताओं और पूर्वजों का आशीर्वाद आमंत्रित करते हैं यह परंपरा “अनुष्ठानिक ज्यामिति” का जीवंत उदाहरण है—एक ऐसी मौन भाषा, जो पुस्तकों में नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृति में सुरक्षित है। सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक एकता समाल पर्व केवल आध्यात्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक भी है। पांच दिनों तक गांवों में विशेष आयोजन होते हैं, पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से लोक परंपराओं को जीवित रखा जाता है। यह पर्व जनजातीय समाज को उनकी जड़ों से जोड़ता है। आधुनिकता और वैश्वीकरण के दौर में जहां कई परंपराएं लुप्त होती जा रही हैं, वहीं पांगी घाटी ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को न केवल सुरक्षित रखा है, बल्कि उसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया है। आस्था जो दीवारों पर उकेरी जाती है पांगी की यह परंपरा यह संदेश देती है कि सांस्कृतिक विरासत केवल संग्रहालयों या शोधग्रंथों में नहीं बसती। यहां आस्था दीवारों पर उकेरी जाती है, दहलीजों पर अंकित की जाती है और जीवन के हर आयाम में जिया जाती है। पत्थर, कांटे, राख और मिट्टी—ये साधारण तत्व मिलकर असाधारण आध्यात्मिक संरचना का निर्माण करते हैं। यह एक ऐसा विश्वास है, जो सुरक्षा का आश्वासन देता है और सामुदायिक आत्मविश्वास को सुदृढ़ करता है। निष्कर्ष समाल पर्व पांगी घाटी की जनजातीय विरासत, पूर्वजों की ज्ञान-परंपरा और पर्वतीय विश्वास की अमिट छाप है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जब परंपरा जीवित रहती है, तो समाज सुरक्षित और सशक्त बना रहता है। पांगी में परंपरा केवल अतीत नहीं—वह वर्तमान की शक्ति और भविष्य की सुरक्षा है।

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    जब परंपरा ही सुरक्षा बन जाए और विश्वास ही शक्ति: पांगी घाटी के समाल पर्व की दिव्य गाथा
पांगी घाटी (चंबा): दुर्गम हिमालयी अंचल पांगी घाटी में आस्था केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन का अभिन्न सुरक्षा कवच है। यहां सुरक्षा किसी बाहरी साधन से नहीं, बल्कि परंपराओं और विश्वासों के माध्यम से सुनिश्चित की जाती है। यही कारण है कि पांगी में मनाया जाने वाला समाल पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और आध्यात्मिक संरक्षण का अद्वितीय उदाहरण है।
पांच दिनों तक चलने वाला यह पर्व इस वर्ष भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सम्पन्न हुआ। इसकी शुरुआत शौर गांव से होती है और अंतिम आयोजन साच क्षेत्र में संपन्न होता है। विशेष बात यह है कि यह पर्व किलाड़ क्षेत्र में नहीं मनाया जाता, जो इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक सीमा को दर्शाता है।
दैवीय कन्या की लोककथा: समाल पर्व की आधारशिला
समाल पर्व का मूल एक प्राचीन लोकगाथा से जुड़ा है, जो पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से संजोई गई है। मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व साच क्षेत्र में एक परिवार में एक दैवीय कन्या का जन्म हुआ। पांगी की कठोर सर्दियों और भारी बर्फबारी के बीच वृद्ध माता-पिता के कारण घर का समस्त कार्य उसी कन्या के जिम्मे था।
वह अत्यंत कर्तव्यनिष्ठ थी, पर उसकी एक शर्त थी—वह “जूठा पानी” (खाने के बर्तनों से निकला गंदा पानी) नहीं उठाएगी। एक दिन परिस्थितियोंवश उसे यह कार्य भी करना पड़ा। लोककथा कहती है कि जब वह जूठा पानी बाहर फेंकने गई, तो फिर कभी घर नहीं लौटी।
परिवारजन खोजते हुए जंगल की ओर पहुंचे तो देखा कि वह एक बड़े पत्थर के नीचे बैठी है। उसने स्पष्ट शब्दों में घर लौटने से इंकार कर दिया और कहा कि अब उसका निवास वही स्थान है। परिवारजन कुछ समय तक उसे भोजन पहुंचाते रहे।
एक दिन बर्फबारी और वृद्धावस्था के कारण वे स्वयं नहीं जा सके और एक युवक को भेजा। किंवदंती के अनुसार उस युवक ने दुष्कर्म का प्रयास किया। तब उस दैवीय कन्या ने पक्षी का रूप धारण किया और वहां से उड़कर कुल्लू के भेखली नामक स्थान पर जा बसी। आज भी वहां उसका भव्य मंदिर विद्यमान है।
लोक-मान्यता है कि समाल पर्व के दौरान एक दिन वह दैवीय शक्ति अपने मूल गांव लौटती है, और उसके अगले दिन साच क्षेत्र में समाल पर्व का मुख्य आयोजन होता है।
अनुष्ठानिक ज्यामिति: जब घर बनते हैं जीवित सुरक्षा कवच
समाल पर्व के दौरान पांगी के जनजातीय घर आध्यात्मिक किले में परिवर्तित हो जाते हैं। घरों के मुख्य द्वार, खिड़कियों, सीढ़ियों और प्रवेश मार्गों पर विशेष पवित्र चिह्न बनाए जाते हैं।
इन चिह्नों के निर्माण में उपयोग होता है:
चोक – सफेद पत्थर का चूर्ण
कांटेदार जंगली गुलाब की टहनियां – नकारात्मक शक्तियों से रक्षा का प्रतीक
शाशो – पवित्र सफेद पत्थरों का समूह, जिससे प्राचीनकाल में अग्नि प्रज्वलित की जाती थी
कैली – मिट्टी या चूने का लेप
इन प्रतीकों को फर्श से छत तक जाने वाले मार्गों और प्रत्येक दहलीज पर अंकित किया जाता है। यह मात्र सजावट नहीं, बल्कि एक अनुष्ठानिक प्रक्रिया है। हर आकृति का एक आध्यात्मिक अर्थ है, भले ही उसका आकार गांव-गांव में भिन्न हो।
स्थानीय विश्वास के अनुसार ये चिह्न:
राक्षसी और नकारात्मक ऊर्जाओं को घर में प्रवेश से रोकते हैं
घर और परिवेश की पवित्रता बनाए रखते हैं
प्रकृति-देवताओं और पूर्वजों का आशीर्वाद आमंत्रित करते हैं
यह परंपरा “अनुष्ठानिक ज्यामिति” का जीवंत उदाहरण है—एक ऐसी मौन भाषा, जो पुस्तकों में नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृति में सुरक्षित है।
सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक एकता
समाल पर्व केवल आध्यात्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक भी है। पांच दिनों तक गांवों में विशेष आयोजन होते हैं, पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से लोक परंपराओं को जीवित रखा जाता है।
यह पर्व जनजातीय समाज को उनकी जड़ों से जोड़ता है। आधुनिकता और वैश्वीकरण के दौर में जहां कई परंपराएं लुप्त होती जा रही हैं, वहीं पांगी घाटी ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को न केवल सुरक्षित रखा है, बल्कि उसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया है।
आस्था जो दीवारों पर उकेरी जाती है
पांगी की यह परंपरा यह संदेश देती है कि सांस्कृतिक विरासत केवल संग्रहालयों या शोधग्रंथों में नहीं बसती। यहां आस्था दीवारों पर उकेरी जाती है, दहलीजों पर अंकित की जाती है और जीवन के हर आयाम में जिया जाती है।
पत्थर, कांटे, राख और मिट्टी—ये साधारण तत्व मिलकर असाधारण आध्यात्मिक संरचना का निर्माण करते हैं। यह एक ऐसा विश्वास है, जो सुरक्षा का आश्वासन देता है और सामुदायिक आत्मविश्वास को सुदृढ़ करता है।
निष्कर्ष
समाल पर्व पांगी घाटी की जनजातीय विरासत, पूर्वजों की ज्ञान-परंपरा और पर्वतीय विश्वास की अमिट छाप है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जब परंपरा जीवित रहती है, तो समाज सुरक्षित और सशक्त बना रहता है।
पांगी में परंपरा केवल अतीत नहीं—वह वर्तमान की शक्ति और भविष्य की सुरक्षा है।
    user_PANGI NEWS 24
    PANGI NEWS 24
    Social Media Manager Pangi, Chamba•
    1 hr ago
  • महत्वपूर्ण सूचना… पांगी स्की एसोसिएशन, सुराल (हिमाचल प्रदेश विंटर गेम्स एसोसिएशन, मनाली से संबद्ध) पांगी घाटी में शीतकालीन खेलों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पांगी स्की एसोसिएशन, सुराल एक 14 दिवसीय बेसिक स्की प्रशिक्षण कोर्स का आयोजन करने जा रही है। इस स्की कोर्स में इच्छुक प्रतिभागी 25 फरवरी 2026 से भाग ले सकते हैं। अब सुनिए — नियम एवं शर्तें — प्रतिभागी की आयु 13 वर्ष से कम तथा 30 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। प्रतिभागी का शारीरिक रूप से स्वस्थ होना अनिवार्य है। प्रतिभागी के पास स्वास्थ्य प्रमाण पत्र होना आवश्यक है। यदि प्रतिभागी ठहरने की व्यवस्था स्वयं करता है, तो प्रशिक्षण शुल्क ₹2000/- होगा। यदि ठहरने की व्यवस्था एसोसिएशन द्वारा की जाती है, तो कुल शुल्क ₹8000/- (आठ हजार रुपये) अदा करना होगा। सुराल क्षेत्र के युवाओं के लिए कोई भी शुल्क नहीं लगेगा। आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि — 20 फरवरी है। आवेदन प्राप्त करने एवं अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें — मनोज गारमेंट्स (चिकू) निकट ग्रामीण बैंक, किलाड़, पांगी मोबाइल नंबर — 76499 66000 या संपर्क करें — 89880 21021 94184 62519 70184 69639 94187 42338 यह पांगी घाटी के युवाओं के लिए शीतकालीन खेलों में प्रशिक्षण प्राप्त करने का एक बेहतरीन अवसर है।
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    महत्वपूर्ण सूचना…
पांगी स्की एसोसिएशन, सुराल
(हिमाचल प्रदेश विंटर गेम्स एसोसिएशन, मनाली से संबद्ध)
पांगी घाटी में शीतकालीन खेलों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से
पांगी स्की एसोसिएशन, सुराल
एक 14 दिवसीय बेसिक स्की प्रशिक्षण कोर्स का आयोजन करने जा रही है।
इस स्की कोर्स में इच्छुक प्रतिभागी
25 फरवरी 2026 से भाग ले सकते हैं।
अब सुनिए — नियम एवं शर्तें —
प्रतिभागी की आयु 13 वर्ष से कम तथा 30 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।
प्रतिभागी का शारीरिक रूप से स्वस्थ होना अनिवार्य है।
प्रतिभागी के पास स्वास्थ्य प्रमाण पत्र होना आवश्यक है।
यदि प्रतिभागी ठहरने की व्यवस्था स्वयं करता है, तो प्रशिक्षण शुल्क ₹2000/- होगा।
यदि ठहरने की व्यवस्था एसोसिएशन द्वारा की जाती है, तो कुल शुल्क ₹8000/- (आठ हजार रुपये) अदा करना होगा।
सुराल क्षेत्र के युवाओं के लिए कोई भी शुल्क नहीं लगेगा।
आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि — 20 फरवरी है।
आवेदन प्राप्त करने एवं अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें —
मनोज गारमेंट्स (चिकू)
निकट ग्रामीण बैंक, किलाड़, पांगी
मोबाइल नंबर —
76499 66000
या संपर्क करें —
89880 21021
94184 62519
70184 69639
94187 42338
यह पांगी घाटी के युवाओं के लिए
शीतकालीन खेलों में प्रशिक्षण प्राप्त करने का
एक बेहतरीन अवसर है।
    user_THE VOICE OF PANGWAL
    THE VOICE OF PANGWAL
    Local News Reporter पांगी, चंबा, हिमाचल प्रदेश•
    22 hrs ago
  • चंबा “बजट पर बरसे सुधीर शर्मा: धर्मशाला विधायक ने चंबा में सरकार को घेरा, बोले- जनता को सिर्फ घोषणाओं का झांसा”। जिला मुख्यालय चंबा में धर्मशाला से विधायक सुधीर शर्मा ने बजट को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इस दौरान उन्होंने प्रदेश सरकार पर जमकर निशाना साधते हुए बजट को जनहित से दूर बताया। सुधीर शर्मा ने कहा कि सरकार ने बजट में आम जनता को राहत देने के बजाय केवल कागजी घोषणाएं की हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास कार्यों के लिए ठोस प्रावधान नहीं किए गए और कई अहम मुद्दों को नजरअंदाज किया गया है। विधायक ने कहा कि प्रदेश की जनता महंगाई, बेरोजगारी और मूलभूत सुविधाओं की कमी से परेशान है, लेकिन सरकार बजट के जरिए लोगों को गुमराह करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने सरकार से मांग की कि बजट में किए गए वादों को जल्द जमीन पर उतारा जाए, ताकि प्रदेश के लोगों को वास्तविक लाभ मिल सके। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने आगामी समय में सरकार के खिलाफ जनहित की लड़ाई को और तेज करने की बात भी कही। प्रेस कॉन्फ्रेंस सुधीर शर्मा विधायक धर्मशाला।
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    चंबा “बजट पर बरसे सुधीर शर्मा: धर्मशाला विधायक ने चंबा में सरकार को घेरा, बोले- जनता को सिर्फ घोषणाओं का झांसा”।
जिला मुख्यालय चंबा में धर्मशाला से विधायक सुधीर शर्मा ने बजट को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इस दौरान उन्होंने प्रदेश सरकार पर जमकर निशाना साधते हुए बजट को जनहित से दूर बताया।
सुधीर शर्मा ने कहा कि सरकार ने बजट में आम जनता को राहत देने के बजाय केवल कागजी घोषणाएं की हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास कार्यों के लिए ठोस प्रावधान नहीं किए गए और कई अहम मुद्दों को नजरअंदाज किया गया है।
विधायक ने कहा कि प्रदेश की जनता महंगाई, बेरोजगारी और मूलभूत सुविधाओं की कमी से परेशान है, लेकिन सरकार बजट के जरिए लोगों को गुमराह करने का प्रयास कर रही है।
उन्होंने सरकार से मांग की कि बजट में किए गए वादों को जल्द जमीन पर उतारा जाए, ताकि प्रदेश के लोगों को वास्तविक लाभ मिल सके।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने आगामी समय में सरकार के खिलाफ जनहित की लड़ाई को और तेज करने की बात भी कही।
प्रेस कॉन्फ्रेंस सुधीर शर्मा विधायक धर्मशाला।
    user_Mohd Ashiq
    Mohd Ashiq
    Journalist Chamba, Himachal Pradesh•
    10 hrs ago
  • नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपने झूठे वादों से केवल युवाओं को ठगने का काम किया है।
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    नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपने झूठे वादों से केवल युवाओं को ठगने का काम किया है।
    user_THE MR7
    THE MR7
    डोडा, डोडा, जम्मू और कश्मीर•
    9 hrs ago
  • Post by Ram chand
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    Post by Ram chand
    user_Ram chand
    Ram chand
    Nurse मनाली, कुल्लू, हिमाचल प्रदेश•
    4 hrs ago
  • Dessa road ki kya hallat ha social activists Arshad na kya kaha
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    Dessa road ki kya hallat ha social activists Arshad na kya kaha
    user_Kewal Singh
    Kewal Singh
    भगवाह, डोडा, जम्मू और कश्मीर•
    18 hrs ago
  • जोगिंदर नगर की भूतपूर्व सैनिक लीग ने मनाया अपना 52वां स्थापना दिवस।
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    जोगिंदर नगर की भूतपूर्व सैनिक लीग ने मनाया अपना 52वां स्थापना दिवस।
    user_Ankit Kumar
    Ankit Kumar
    Local News Reporter जोगिंदरनगर, मंडी, हिमाचल प्रदेश•
    2 hrs ago
  • आज साच खास में संपूर्णता अभियान 2.0 का शानदार आयोजन! डॉ. अमन ठाकुर ने टीबी के इलाज और रोकथाम पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि समय पर जांच और सही दवा से टीबी को पूरी तरह हराया जा सकता है। आइए, स्वस्थ हिमाचल के लिए एकजुट हों! 💪🫁
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    आज साच खास में संपूर्णता अभियान 2.0 का शानदार आयोजन!
डॉ. अमन ठाकुर ने टीबी के इलाज और रोकथाम पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि समय पर जांच और सही दवा से टीबी को पूरी तरह हराया जा सकता है। आइए, स्वस्थ हिमाचल के लिए एकजुट हों! 💪🫁
    user_PANGI NEWS 24
    PANGI NEWS 24
    Social Media Manager Pangi, Chamba•
    3 hrs ago
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