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मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा आज कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया
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मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा आज कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया
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- *बस यही फ़र्क है मोहन सरकार और शिवराज सरकार में…?* व्यंग्य–राजेन्द्र सिंह जादौन मोहन जी, ज़रा शिवराज की तरह “रोड़छाप” नेता बन जाइए।।वीवीआईपी कल्चर की चमचमाती कार से उतरकर कभी धूल में खड़े होकर देखिए।वहाँ सवाल मिलेंगे, जवाब नहीं। सीधी ज़िले में सैकड़ों करोड़ की योजनाओं का शिलान्यास हो रहा था। मंच पर विकास मुस्कुरा रहा था, पोस्टर पर भविष्य चमक रहा था और माइक पर उपलब्धियाँ बोल रही थीं। ठीक उसी समय नीचे भीड़ में एक आवाज़ रो रही थी।“मैं बैगा आदिवासी हूं, मुझे डॉक्टर बनना है… पर पापा के पास इतने पैसे नहीं हैं…”।यह कोई नाटक नहीं था, कोई विपक्षी साज़िश नहीं थी। यह एक आदिवासी बच्ची की कच्ची, सच्ची और असहाय फरियाद थी। नाम।अनामिका बैगा। वह रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, सुरक्षाकर्मियों से कहती रही।“बस एक बार मिल लेने दीजिए…”लेकिन वीवीआईपी कल्चर के कड़े पहरे में इंसान नहीं, सिर्फ़ पास और प्रोटोकॉल की एंट्री होती है। मुख्यमंत्री तक पहुँचना, जैसे भगवान से मिलने का आवेदन हो। अनामिका कहती है।“मैं विधायक के पास गई, सांसद के पास गई, कलेक्टर के पास गई… सब जगह से हार चुकी हूं।”।यानी लोकतंत्र की पूरी सीढ़ी चढ़ चुकी है, लेकिन दरवाज़ा कहीं नहीं खुला। अब सवाल सीधा है, और कड़वा भी।लाड़ली बहना योजना पर हर महीने लगभग ₹18 हज़ार करोड़ खर्च करने वाली मध्यप्रदेश सरकार, क्या एक बैगा आदिवासी बच्ची को डॉक्टर बनाने का सपना नहीं संभाल सकती? यह योजना पर सवाल नहीं है। यह प्राथमिकता पर सवाल है। शिवराज सरकार की एक पहचान थी।वे कभी खेत में उतर जाते थे, कभी बहन के घर चाय पी लेते थे, कभी किसी बच्ची का सिर थपथपा देते थे। राजनीति थी, कैमरा था, लेकिन “मुलाक़ात” तो होती थी। मोहन सरकार में फ़र्क यही दिख रहा है।यहाँ मंच ऊँचा है, और जनता बहुत नीचे। आज विकास की फाइलें भारी हैं, लेकिन संवेदनशीलता हल्की हो गई है। आज योजनाओं के नाम बड़े हैं, पर सपनों के कद छोटे पड़ रहे हैं। मोहन जी, मुख्यमंत्री होना सिर्फ़ शिलान्यास करने का नाम नहीं है। मुख्यमंत्री होना उस बच्ची की आँखों में झांकने का नाम है, जो कहती है “एक बार मिल लीजिए।”अगर सरकार एक अनामिका को डॉक्टर नहीं बना सकती, तो फिर यह बताइए।इतने करोड़ों का विकास आख़िर किसके लिए है? और हाँ, रोड़छाप होना गाली नहीं है। रोड़छाप वही होता है जो सड़क पर खड़े आदमी की बात सुन ले। शायद यही वो फ़र्क है,।जिसे जनता आज महसूस कर रही है1
- भोपाल एंकर : राजधानी भोपाल में NSUI के कार्यकर्ताओं के द्वारा आज हबीबगंज थाने में भोपाल CMHO मनीष शर्मा के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई गई है NSUI के कार्यकर्ताओं का कहना है कि राजधानी भोपाल में लगातार फाड़ दी अस्पताल संचालित हो रहे हैं जिसके कारण मरीज़ों की जान को ख़तरा लगातार बना हुआ है ऐसे में जब nsui के कार्यकर्ता उनसे मिलने का प्रयास करते हैं तो कार्यकर्ताओं को समय नहीं दिया जाता साथ ही nsui कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा है कि यदि इसी तरह से राजधानी में फ़र्ज़ी अस्पताल संचालित होते रहे तो आगामी समय में रचाई के द्वारा 1 उग्र आंदोलन किया जाएगा बाइट: रवि परमार प्रदेश उपाध्यक्ष, कांग्रेसNSUI1
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