जब जेल भी वीआईपी बन जाए: कानून, नेता और आम आदमी के बीच टूटती समानता भारतीय संविधान ने देश के हर नागरिक को समानता, न्याय और गरिमा के साथ जीने का अधिकार दिया है। कानून की नजर में अमीर–गरीब, ताकतवर–कमजोर, नेता–नागरिक सभी बराबर हैं। लेकिन जब हम हकीकत की जमीन पर उतरकर देखते हैं, तो यह समानता कई बार सिर्फ कागजों तक सीमित नजर आती है। खासकर छत्तीसगढ़ में इन दिनों जो “जेल की राजनीति” देखने को मिल रही है, उसने इस सवाल को और गहरा कर दिया है कि क्या वाकई कानून सबके लिए एक समान है? कुछ प्रकरणों में एक दृश्य समान रूप से सामने आया। जेल के बाहर समर्थकों की भीड़, नेताओं के स्वागत में नारे, और फिर एक साथ कई लोगों का जेल के भीतर जाकर मुलाकात करना। यह दृश्य आम जनता के मन में कई सवाल खड़े करता है। क्या जेल के नियम नेताओं के लिए अलग हैं? क्या कानून की सख्ती सिर्फ आम आदमी तक ही सीमित है? जेल प्रशासन के नियम साफ कहते हैं कि मुलाकात की एक तय प्रक्रिया होती है। आम आदमी जब किसी मामले में जेल जाता है, तो उसके परिजन घंटों इंतजार करते हैं। कई बार उन्हें केवल मुख्य द्वार तक ही सीमित रखा जाता है। बंदी को बाहर लाकर कुछ मिनट की बातचीत कराई जाती है, वह भी कड़ी निगरानी में। मां की आंखों में आंसू होते हैं, पत्नी हाथ जोड़कर विनती करती है, बच्चे अपने पिता को दूर से देखकर लौट जाते हैं। वहां न कोई नारा होता है, न कोई सिफारिश, न कोई “विशेष व्यवस्था”। लेकिन जब कोई प्रभावशाली नेता जेल जाता है, तो वही नियम अचानक लचीले हो जाते हैं। जेल के दरवाजे खुलते हैं, समर्थकों का आना-जाना बढ़ जाता है, और मुलाकात एक सामान्य प्रक्रिया नहीं बल्कि शक्ति-प्रदर्शन का रूप ले लेती है। यही वह क्षण है, जब आम नागरिक का भरोसा व्यवस्था से डगमगाने लगता है। उसे लगता है कि न्याय का तराजू अब बराबरी पर नहीं टिका, बल्कि वजन और रसूख के अनुसार झुकता है। यह सवाल सिर्फ जेल प्रशासन या पुलिस व्यवस्था का नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है, जब कानून सबके लिए एक जैसा हो। अगर जेल के भीतर भी वीआईपी संस्कृति पनपने लगे, तो आम आदमी के मन में यह भावना गहरी होती जाती है कि उसके लिए न्याय पाना हमेशा कठिन रहेगा। दर्द की बात यह है कि आम व्यक्ति जब कानून के शिकंजे में आता है, तो उसके पास न भीड़ होती है, न आवाज़। वह सिस्टम के सामने अकेला खड़ा होता है। वहीं नेता जेल जाकर भी अकेला नहीं होता—उसके साथ उसकी राजनीतिक ताकत, समर्थकों की संख्या और सत्ता की परछाईं रहती है। यह लेख किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ है, जो कानून को दो हिस्सों में बांट देती है—एक खास लोगों के लिए, दूसरा आम जनता के लिए। अगर हमें सच में संविधान की भावना को जीवित रखना है, तो जेल हो या सड़क, अदालत हो या प्रशासन—हर जगह एक ही नियम, एक ही व्यवहार और एक ही न्याय दिखना चाहिए। वरना लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज यही होगी कि आम आदमी यह मान ले कि कानून उसका नहीं, सिर्फ ताकतवरों का हथियार है। यही विश्वास का टूटना, किसी भी व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
जब जेल भी वीआईपी बन जाए: कानून, नेता और आम आदमी के बीच टूटती समानता भारतीय संविधान ने देश के हर नागरिक को समानता, न्याय और गरिमा के साथ जीने का अधिकार दिया है। कानून की नजर में अमीर–गरीब, ताकतवर–कमजोर, नेता–नागरिक सभी बराबर हैं। लेकिन जब हम हकीकत की जमीन पर उतरकर देखते हैं, तो यह समानता कई बार सिर्फ कागजों तक सीमित नजर आती है। खासकर छत्तीसगढ़ में इन दिनों जो “जेल की राजनीति” देखने को मिल रही है, उसने इस सवाल को और गहरा कर दिया है कि क्या वाकई कानून सबके लिए एक समान है? कुछ प्रकरणों में एक दृश्य समान रूप से सामने आया। जेल के बाहर समर्थकों की भीड़, नेताओं के स्वागत में नारे, और फिर एक साथ कई लोगों का जेल के भीतर जाकर मुलाकात करना। यह दृश्य आम जनता के मन में कई सवाल खड़े करता है। क्या जेल के नियम नेताओं के लिए अलग हैं? क्या कानून की सख्ती सिर्फ आम आदमी तक ही सीमित है? जेल प्रशासन के नियम साफ कहते हैं कि मुलाकात की एक तय प्रक्रिया होती है। आम आदमी जब किसी मामले में जेल जाता है, तो उसके परिजन घंटों इंतजार करते हैं। कई बार उन्हें केवल मुख्य द्वार तक ही सीमित रखा जाता है। बंदी को बाहर लाकर कुछ मिनट की बातचीत कराई जाती है, वह भी कड़ी निगरानी में। मां की आंखों में आंसू होते हैं, पत्नी हाथ जोड़कर विनती करती है, बच्चे अपने पिता को दूर से देखकर लौट जाते हैं। वहां न कोई नारा होता है, न कोई सिफारिश, न कोई “विशेष व्यवस्था”। लेकिन जब कोई प्रभावशाली नेता जेल जाता है, तो वही नियम अचानक लचीले हो जाते हैं। जेल के दरवाजे खुलते हैं, समर्थकों का आना-जाना बढ़ जाता है, और मुलाकात एक सामान्य प्रक्रिया नहीं बल्कि शक्ति-प्रदर्शन का रूप ले लेती है। यही वह क्षण है, जब आम नागरिक का भरोसा व्यवस्था से डगमगाने लगता है। उसे लगता है कि न्याय का तराजू अब बराबरी पर नहीं टिका, बल्कि वजन और रसूख के अनुसार झुकता है। यह सवाल सिर्फ जेल प्रशासन या पुलिस व्यवस्था का नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है, जब कानून सबके लिए एक जैसा हो। अगर जेल के भीतर भी वीआईपी संस्कृति पनपने लगे, तो आम आदमी के मन में यह भावना गहरी होती जाती है कि उसके लिए न्याय पाना हमेशा कठिन रहेगा। दर्द की बात यह है कि आम व्यक्ति जब कानून के शिकंजे में आता है, तो उसके पास न भीड़ होती है, न आवाज़। वह सिस्टम के सामने अकेला खड़ा होता है। वहीं नेता जेल जाकर भी अकेला नहीं होता—उसके साथ उसकी राजनीतिक ताकत, समर्थकों की संख्या और सत्ता की परछाईं रहती है। यह लेख किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ है, जो कानून को दो हिस्सों में बांट देती है—एक खास लोगों के लिए, दूसरा आम जनता के लिए। अगर हमें सच में संविधान की भावना को जीवित रखना है, तो जेल हो या सड़क, अदालत हो या प्रशासन—हर जगह एक ही नियम, एक ही व्यवहार और एक ही न्याय दिखना चाहिए। वरना लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज यही होगी कि आम आदमी यह मान ले कि कानून उसका नहीं, सिर्फ ताकतवरों का हथियार है। यही विश्वास का टूटना, किसी भी व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
- Post by Gautam karsh1
- जिले की चार विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत अनमैपड मतदाताओं को नोटिस जारी किया गया है। इनकी 2003 की सूची मे मैपिंग नहीं हुई है । इन मतदाताओं के माता-पिता या दादा-दादी का नाम ही नहीं था। प्रारंभिक प्रकाशन में बचे मतदाताओं के हिसाब से जिले में विभिन्न वोटर्स को नोटिस जारी किया गया है। अब इन मतदाताओं को मान्य 11 में से कोई भी एक दस्तावेज देना होगा। तहसीलों में एआरओ सुनवाई भी कर रहे हैं। दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करने पर नाम मतदाता सूची से कटने का डर है। एसआईआर की प्रारंभिक मतदाता सूची का प्रकाशन 23 दिसंबर को हो चुका है।1
- *बांकीमोंगरा क्षेत्र में युवती से दुष्कर्म – मुख्य आरोपी तरुण व एक सहयोगी हिरासत में अन्य की तलाश जारी।* बांकीमोंगरा :– प्रार्थी पीड़िता लड़की ने जिला पुलिस अधीक्षक के कार्यालय जाकर शिकायत दर्ज कराया कि बीते दिनांक 08/01/26 देर रात तरुण श्रीवास नामक युवक ने मुझे गजरा स्थित SECL के क्वार्टर में लेकर गया और जबरन संबंध बनाया फिर कुछ देर बाद युवक के कुछ दोस्त भी वहां पहुंचे और सभी ने शराब का सेवन किया फिर उस युवक के साथियों ने भी युवती के साथ जबरन दुष्कर्म किया। युवती के मना करने और नाराजगी दिखाने पर युवकों ने पीड़िता के मोबाइल छीनी और पटक के तोड़ दिया और टूटे हुए मोबाइल को वही दरवाजे के बाहर आंगन में फेक दिया और मारपीट करने लगे। पीड़िता किसी तरह वहां से देर रात सुबह में बीते दिनांक 9 जनवरी को साईं मोहल्ला तरुण श्रीवास के घर गई और तरुण के बारे में पूछा । तरुण के घरवालों ने बताया कि वो कहा है पता नहीं जिसके बाद पीड़िता अपने घर जहां वह किराए के मकान में रहती है वहां पहुंची और अपनी मकान मालकिन को सारी घटना की जानकारी दी जिसके बाद सुबह सुबह लगभग 6 और 7 बजे के बीच थाना बाँकी मोगरा पहुंच अपने साथ हुए घटना के बारे में शिकायत दर्ज कराना चाही पर उस वक्त पीड़िता को 11 बजे आना कह भेज दिया गया जिसके बाद पीड़िता ने अपनी शिकायत लेकर जिला पुलिस अधीक्षक के पास पहुंची और बताया कि तरुण श्रीवास और उसके अन्य 4 साथियों ने मेरे साथ दुष्कर्म किया और मारपीट किया है जिसके बाद घटना को गंभीरता से लेते हुए पीड़िता लड़की को उपचार के लिए चिकित्सकीय परीक्षण के लिए मेडिकल कालेज अस्पताल कोरबा में भेजा गया। यह मामला बांकीमोंगरा थाना क्षेत्र का होने के कारण आनन फानन में वहीं सिविल लाइन थाना रामपुर में इस मामले का प्रकरण जीरो में दर्ज कर संबंधित थाना बांकीमोंगरा में भेजा गया और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने तुरंत जांच के आदेश देते हुए आरोपियों की गिरफ्तारी के निर्देश दिए । जिसके बाद बाँकी मोंगरा पुलिस विभाग हरकत में आ गई और मामले को संज्ञान में लेते हुए जांच प्रारंभ की गई युवकों की पतासाजी शुरू कर दी गई जिसमें से दो युवक को हिरासत में ले लिया गया । वरिष्ठ अधिकारी सीएसपी दर्री के निगरानी में पीड़िता के शिकायत पर थाना बाकी मोगरा पुलिस के साथ मिलकर विवेचना कर अपराध दर्ज करते हुए वर्तमान में दोनों आरोपियों को माननीय न्यायालय को भेज दिया जहां से दोनों को जेल दाखिल करा दिया गया है । आरोपी – 1. तरुण श्रीवास उम्र 19 वर्ष पिता बेदी श्रीवास 2. भुवन साहू उम्र 27 वर्ष पिता रामप्रसाद साहू4
- Post by Santosh Sao1
- चीन ने बिना पटरी चलने वाली ट्रेन तकनीक ART (Autonomous Rail Rapid Transit) विकसित की है। यह ट्रेन सामान्य सड़कों पर चलती है और सेंसर, कैमरा व GPS की मदद से सड़क पर बनी वर्चुअल लाइनों को फॉलो करती है। पारंपरिक ट्राम के मुकाबले यह सस्ती, तेज़ और आसान है। ART बस की लचीलापन और मेट्रो जैसी क्षमता को एक साथ जोड़ती है। #FutureTech #ChinaInnovation #SmartTransport #NextGenTransit #ViralNews #TechExplained #PublicTransport1
- छत्तीसगढ़ राज्य केसरवानी वैश्य सभा अखिल भारतीय केसरवानी वैश्य महासभा के संबंध अधिवेशन दिनांक 11,01.2026 आयोजक केसरवानी वेश्यसभा भटगांव जिला सारंगढ़ मैं संपन्न1
- मेरठ की रहने वाली सुनीता जाटव और उनकी बेटी मां की हत्या और उनकी बेटी का अपहरण कर अपराधी छिपे हैं और नगीना के सांसद चंद्रशेखर आजाद उसे पीड़िता के घर अपना दुख व्यक्त करने जा रहे थे उन पीड़िता की आवाज सुनकर उनको न्याय दिलाने की प्रयास करने में थे लेकिन वही सरकार पुलिस प्रशासन न्याय की मांग करने वाले लोगों को उनके वाहनों को रोका जा रहा था वही चंद्रशेखर आजाद को पैदल पुलिस वाले पीछा करते उन्हें रोका जा रहा था जिस पुलिस प्रशासन को अपराधियों को पकड़ना चाहिए वह नया मांगने वालों को रोक रहे हैं और अपराधियों को संरक्षण दे रहे क्या यह सही है पुलिस पर पुलिस प्रशासन अपना कार्यपाली भारती करती तो यह घटना ना होता लेकिन उन्हें तो अपने हक अधिकार मांगने वाले और नया मांगने वालों को ही सताया करते हैं यह बात आज इस वीडियो के माध्यम से दिख रहा है1
- Post by Santosh Sao1