किशाऊ का फैसला केवल बांध नहीं, हिमाचल के हक की जीत*किसी पहाड़ी राज्य की सबसे बड़ी विडंबना नूरपुर, भूषण शर्मा *किशाऊ का फैसला केवल बांध नहीं, हिमाचल के हक की जीत* किसी पहाड़ी राज्य की सबसे बड़ी विडंबना शायद इससे बड़ी नहीं हो सकती कि उसकी नदियों का पानी मैदानों की प्यास बुझाए, उसकी पहाड़ियों पर परियोजनाएं बनें, उसकी जमीन डूबे और पर्यावरणीय कीमत भी वही चुकाए, लेकिन जब उसके हिस्से और अधिकार की बात आए तो उसे वर्षों तक इंतजार करना पड़े। किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना पर हुआ ताजा समझौता इसलिए महज एक बांध परियोजना से जुड़ा फैसला नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि हिमाचल अब अपने प्राकृतिक संसाधनों को लेकर केवल भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि आर्थिक और संवैधानिक अधिकार के आधार पर अपनी बात मजबूती से रखने की स्थिति में है। किशाऊ परियोजना की कहानी आज से शुरू नहीं हुई। टौंस नदी पर हिमाचल और उत्तराखंड की सीमा के निकट प्रस्तावित इस परियोजना को लेकर वर्षों से चर्चा चलती रही है। हिमाचल और उत्तराखंड के बीच 2015 में समझौता हुआ और बाद में किशाऊ कॉरपोरेशन का गठन भी किया गया। परियोजना को राष्ट्रीय महत्व की परियोजना के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिशें हुईं, लेकिन लागत के बंटवारे, पानी के उपयोग, बिजली और राज्यों के हिस्से जैसे सवालों ने इसकी राह रोक दी। कागजों पर परियोजना आगे बढ़ती रही, लेकिन जमीन पर वर्षों तक कोई निर्णायक प्रगति नहीं हो सकी। समस्या केवल यह नहीं थी कि परियोजना लंबित थी। असली सवाल यह था कि किस कीमत पर परियोजना आगे बढ़ेगी और उस कीमत का भार कौन उठाएगा? हिमाचल का तर्क स्वाभाविक था कि यदि परियोजना का प्रमुख उद्देश्य देश के दूसरे राज्यों की सिंचाई और पेयजल जरूरतें पूरी करना है, तो हिमाचल पर उसके विद्युत घटक की भारी वित्तीय लागत डालना कितना न्यायसंगत है। यही वह सवाल था जिसने पुराने समझौते की व्यावहारिकता पर पुनर्विचार की जरूरत पैदा की। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने इसी बिंदु को मजबूती से उठाया। यहां राजनीतिक श्रेय से अधिक महत्वपूर्ण उस संघर्ष का परिणाम है। राज्य सरकार ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि हिमाचल अपने हितों की कीमत पर किसी भी परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। जून 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में भी हिमाचल ने अपना पक्ष मजबूती से रखा। इसके बाद जिस वित्तीय व्यवस्था पर सहमति बनी, उसमें हिमाचल के हिस्से के बिजली घटक की लगभग दो हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत का भार अन्य लाभार्थी राज्यों द्वारा उठाए जाने का रास्ता बना। यही वह बदलाव है जिसने वर्षों से अटकी परियोजना में हिमाचल के लिए तस्वीर बदल दी। इस निर्णय का आर्थिक महत्व भी कम नहीं है। समझौते के अनुसार परियोजना के जल घटक की अधिकांश लागत केंद्र सरकार वहन करेगी और राज्यों पर सीमित साझा भार रहेगा। इसके बदले हिमाचल को परियोजना से बिजली का महत्वपूर्ण हिस्सा मिलने की संभावना है। मुख्यमंत्री के अनुसार इससे प्रदेश को प्रतिवर्ष लगभग 1000 मिलियन यूनिट बिजली मिलेगी, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 1000 करोड़ रुपये सालाना होगी। एक ऐसे राज्य के लिए, जिस पर पहले ही वित्तीय दबाव है, बिना भारी पूंजीगत बोझ उठाए दीर्घकालिक राजस्व और ऊर्जा लाभ हासिल करना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन किशाऊ की लड़ाई को केवल आज के समझौते तक सीमित करके देखना हिमाचल की व्यापक समस्या को छोटा करना होगा। बीबीएमबी से जुड़े अधिकारों का सवाल हो, शानन परियोजना का मामला हो या प्रदेश की नदियों से पैदा होने वाली बिजली में न्यायसंगत हिस्सेदारी—हिमाचल को लंबे समय से यह अनुभव रहा है कि प्राकृतिक संसाधनों का लाभ राष्ट्रीय हित में बांटने की बात तो होती है, लेकिन संसाधन उपलब्ध कराने वाले राज्य के हितों पर उतनी गंभीरता नहीं दिखाई जाती। किशाऊ का अनुभव इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने यह रास्ता दिखाया है कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, तथ्यात्मक पक्ष और लगातार बातचीत से पुराने समीकरण बदले जा सकते हैं। फिर भी इस उपलब्धि पर केवल उत्सव मनाकर रुक जाना उचित नहीं होगा। समझौता किसी परियोजना की अंतिम मंजिल नहीं, बल्कि शुरुआत है। अब केंद्र और संबंधित राज्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि परियोजना की स्वीकृतियां, वित्तीय प्रबंध, पर्यावरणीय प्रक्रियाएं, पुनर्वास और निर्माण कार्य अनावश्यक देरी का शिकार न हों। हिमाचल सरकार की भी जिम्मेदारी होगी कि आज जिस आर्थिक हित को सुरक्षित किया गया है, उसकी भविष्य में लगातार निगरानी करे। किसी भी बड़े समझौते की वास्तविक सफलता उसके कागज पर नहीं, बल्कि उसके जमीन पर लागू होने में होती है। किशाऊ पर आया यह फैसला इसलिए ऐतिहासिक माना जा सकता है कि इसमें हिमाचल ने विकास का विरोध किए बिना अपने हिस्से का सवाल उठाया है। प्रदेश को परियोजनाएं चाहिए, निवेश चाहिए और राष्ट्रीय विकास में उसकी भागीदारी भी चाहिए, लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि पहाड़ केवल संसाधन दें और लाभ कहीं और चला जाए। आज मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू और पूरी प्रदेश सरकार को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी जानी चाहिए, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी यह है कि किशाऊ के बाद हिमाचल अपने जल, बिजली और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े हर लंबित अधिकार के मामले में इसी दृढ़ता से आगे बढ़े। किशाऊ का समझौता यदि एक नए अध्याय की शुरुआत है, तो अगला अध्याय यह होना चाहिए कि हिमाचल अपने संसाधनों का संरक्षक भी बने और उनके न्यायसंगत लाभ का हिस्सेदार भी!
किशाऊ का फैसला केवल बांध नहीं, हिमाचल के हक की जीत*किसी पहाड़ी राज्य की सबसे बड़ी विडंबना नूरपुर, भूषण शर्मा *किशाऊ का फैसला केवल बांध नहीं, हिमाचल के हक की जीत* किसी पहाड़ी राज्य की सबसे बड़ी विडंबना शायद इससे बड़ी नहीं हो सकती कि उसकी नदियों का पानी मैदानों की प्यास बुझाए, उसकी पहाड़ियों पर परियोजनाएं बनें, उसकी जमीन डूबे और पर्यावरणीय कीमत भी वही चुकाए, लेकिन जब उसके हिस्से और अधिकार की बात आए तो उसे वर्षों तक इंतजार करना पड़े। किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना पर हुआ ताजा समझौता इसलिए महज एक बांध परियोजना से जुड़ा फैसला नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि हिमाचल अब अपने प्राकृतिक संसाधनों को लेकर केवल भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि आर्थिक और संवैधानिक अधिकार के आधार पर अपनी बात मजबूती से रखने की स्थिति में है। किशाऊ परियोजना की कहानी आज से शुरू नहीं हुई। टौंस नदी पर हिमाचल और उत्तराखंड की सीमा के निकट प्रस्तावित इस परियोजना को लेकर वर्षों से चर्चा चलती रही है। हिमाचल और उत्तराखंड के बीच 2015 में समझौता हुआ और बाद में किशाऊ कॉरपोरेशन का गठन भी किया गया। परियोजना को राष्ट्रीय महत्व की परियोजना के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिशें हुईं, लेकिन लागत के बंटवारे, पानी के उपयोग, बिजली और राज्यों के हिस्से जैसे सवालों ने इसकी राह रोक दी। कागजों पर परियोजना आगे बढ़ती रही, लेकिन जमीन पर वर्षों तक कोई निर्णायक प्रगति नहीं हो सकी। समस्या केवल यह नहीं थी कि परियोजना लंबित थी। असली सवाल यह था कि किस कीमत पर परियोजना आगे बढ़ेगी और उस कीमत का भार कौन उठाएगा? हिमाचल का तर्क स्वाभाविक था कि यदि परियोजना का प्रमुख उद्देश्य देश के दूसरे राज्यों की सिंचाई और पेयजल जरूरतें पूरी करना है, तो हिमाचल पर उसके विद्युत घटक की भारी वित्तीय लागत डालना कितना न्यायसंगत है। यही वह सवाल था जिसने पुराने समझौते की व्यावहारिकता पर पुनर्विचार की जरूरत पैदा की। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने इसी बिंदु को मजबूती से उठाया। यहां राजनीतिक श्रेय से अधिक महत्वपूर्ण उस संघर्ष का परिणाम है। राज्य सरकार ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि हिमाचल अपने हितों की कीमत पर किसी भी परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। जून 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में भी हिमाचल ने अपना पक्ष मजबूती से रखा। इसके बाद जिस वित्तीय व्यवस्था पर सहमति बनी, उसमें हिमाचल के हिस्से के बिजली घटक की लगभग दो हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत का भार अन्य लाभार्थी राज्यों द्वारा उठाए जाने का रास्ता बना। यही वह बदलाव है जिसने वर्षों से अटकी परियोजना में हिमाचल के लिए तस्वीर बदल दी। इस निर्णय का आर्थिक महत्व भी कम नहीं है। समझौते के अनुसार परियोजना के जल घटक की अधिकांश लागत केंद्र सरकार वहन करेगी और राज्यों पर सीमित साझा भार रहेगा। इसके बदले हिमाचल को परियोजना से बिजली का महत्वपूर्ण हिस्सा मिलने की संभावना है। मुख्यमंत्री के अनुसार इससे प्रदेश को प्रतिवर्ष लगभग 1000 मिलियन यूनिट बिजली मिलेगी, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 1000 करोड़ रुपये सालाना होगी। एक ऐसे राज्य के लिए, जिस पर पहले ही वित्तीय दबाव है, बिना भारी पूंजीगत बोझ उठाए दीर्घकालिक राजस्व और ऊर्जा लाभ हासिल करना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन किशाऊ की लड़ाई को केवल आज के समझौते तक सीमित करके देखना हिमाचल की व्यापक समस्या को छोटा करना होगा। बीबीएमबी से जुड़े अधिकारों का सवाल हो, शानन परियोजना का मामला हो या प्रदेश की नदियों से पैदा होने वाली बिजली में न्यायसंगत हिस्सेदारी—हिमाचल को लंबे समय से यह अनुभव रहा है कि प्राकृतिक संसाधनों का लाभ राष्ट्रीय हित में बांटने की बात तो होती है, लेकिन संसाधन उपलब्ध कराने वाले राज्य के हितों पर उतनी गंभीरता नहीं दिखाई जाती। किशाऊ का अनुभव इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने यह रास्ता दिखाया है कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, तथ्यात्मक पक्ष और लगातार बातचीत से पुराने समीकरण बदले जा सकते हैं। फिर भी इस उपलब्धि पर केवल उत्सव मनाकर रुक जाना उचित नहीं होगा। समझौता किसी परियोजना की अंतिम मंजिल नहीं, बल्कि शुरुआत है। अब केंद्र और संबंधित राज्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि परियोजना की स्वीकृतियां, वित्तीय प्रबंध, पर्यावरणीय प्रक्रियाएं, पुनर्वास और निर्माण कार्य अनावश्यक देरी का शिकार न हों। हिमाचल सरकार की भी जिम्मेदारी होगी कि आज जिस आर्थिक हित को सुरक्षित किया गया है, उसकी भविष्य में लगातार निगरानी करे। किसी भी बड़े समझौते की वास्तविक सफलता उसके कागज पर नहीं, बल्कि उसके जमीन पर लागू होने में होती है। किशाऊ पर आया यह फैसला इसलिए ऐतिहासिक माना जा सकता है कि इसमें हिमाचल ने विकास का विरोध किए बिना अपने हिस्से का सवाल उठाया है। प्रदेश को परियोजनाएं चाहिए, निवेश चाहिए और राष्ट्रीय विकास में उसकी भागीदारी भी चाहिए, लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि पहाड़ केवल संसाधन दें और लाभ कहीं और चला जाए। आज मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू और पूरी प्रदेश सरकार को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी जानी चाहिए, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी यह है कि किशाऊ के बाद हिमाचल अपने जल, बिजली और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े हर लंबित अधिकार के मामले में इसी दृढ़ता से आगे बढ़े। किशाऊ का समझौता यदि एक नए अध्याय की शुरुआत है, तो अगला अध्याय यह होना चाहिए कि हिमाचल अपने संसाधनों का संरक्षक भी बने और उनके न्यायसंगत लाभ का हिस्सेदार भी!
- खैरियां स्कूल के खिलाड़ियों ने कबड्डी में जीती रनरअप ट्रॉफी, स्वागत में उमड़ा उत्साह; SMC कमेटी की दूरी बनी चर्चा का विषय राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय खैरियां के छात्रों ने अंडर-19 कबड्डी प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन करते हुए रनरअप ट्रॉफी अपने नाम की। प्रतियोगिता से लौटे खिलाड़ियों का स्कूल पहुंचने पर जोरदार स्वागत किया गया और उनकी उपलब्धि पर स्कूल में खुशी का माहौल रहा। हालांकि, खिलाड़ियों के स्वागत और सम्मान के दौरान SMC कमेटी की खिलाड़ियों से दूरी चर्चा का विषय बनी। आखिर ऐसा क्या कारण रहा कि SMC कमेटी इस सम्मान समारोह से दूर रही? पूरी खबर और खिलाड़ियों के स्वागत की तस्वीरें वीडियो में देखें। RK Himachal News #Khairiyan #Kabaddi #Under19 #RunnerUp #SchoolNews #HimachalNews #RKHimachalNews #KabaddiNews1
- नूरपुर सिविल हॉस्पिटल को मिले 5 नए विशेषज्ञ डॉक्टरविधायक रणबीर सिंह निक्का ने स्वास्थ्य मंत्री जी का जताया आभार नूरपुर सिविल हॉस्पिटल को मिले 5 नए विशेषज्ञ डॉक्टर विधायक रणबीर सिंह निक्का ने स्वास्थ्य मंत्री जी का जताया आभार नूरपुर, भूषण शर्मा नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर स्थानीय विधायक श्री रणबीर सिंह निक्का जी द्वारा विधानसभा स्तर के दौरान कई बार नूरपुर सिविल हॉस्पिटल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी का मुद्दा सदन में उठाया । अब स्वास्थ्य मंत्री जी ने इस मांग को गंभीरता से लेते हुए नूरपुर सिविल हॉस्पिटल में 5 नए विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति की है। विधायक रणबीर सिंह निक्का जी ने नूरपुर सिविल हॉस्पिटल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति के लिए स्वास्थय मंत्री जी का हार्दिक आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि इन नियुक्तियों से नूरपुर क्षेत्र के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं अपने नजदीकी अस्पताल में ही उपलब्ध हो सकेंगी और उन्हें विशेषज्ञ उपचार के लिए अन्य स्थानों पर जाने की आवश्यकता कम होगी। नूरपुर सिविल हॉस्पिटल में नियुक्त किए गए विशेषज्ञ डॉक्टरों में— 👶 2 बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. श्वेता भाटिया जी डॉ. पायल ठाकुर जी 👩⚕️ 2 स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. आरुषि जी डॉ. अर्चना जी 🧠 1 मनोचिकित्सक विशेषज्ञ डॉ. सिमंत मल्होत्रा जी विधायक निक्का जी ने कहा कि नूरपुर की जनता को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवाना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति से विशेष रूप से बच्चों, महिलाओं और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के उपचार में क्षेत्रवासियों को बड़ी सुविधा मिलेगी। उन्होंने कहा कि नूरपुर क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं को और मजबूत करने के लिए भविष्य में भी आवश्यक प्रयास लगातार जारी रहेंगे। जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध करवाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है।1
- श्रीबृजराज स्वामी मंदिर नरपुर से प्रातःकाल प्रभु श्रीकृष्ण जी के श्रंगार एवं आरती के दर्शन संजीव कुमार (कांगडा जिला)1
- मुख्यमंत्री के आगमन की तैयारी में जुटा प्रशासन ll ATV न्यूज़ चैनल1
- घर छतराडी ओ तेरा राखा डेरा हो प्यारूया ..............1
- सुजानपुर में घर में घुसा रेट स्नेक, स्नेक सेवर ने किया सुरक्षित रेस्क्यू सुजानपुर सुजानपुर क्षेत्र में एक परिवार उस समय दहशत में आ गया, जब उनके घर में अचानक रेट स्नेक दिखाई दिया। सांप को देखकर परिवार के सदस्यों में हड़कंप मच गया और उन्होंने तुरंत मदद के लिए स्नेक सेवर से संपर्क किया। सूचना मिलते ही स्नेक सेवर माथुर धीमान मौके पर पहुंचे और सावधानीपूर्वक रेट स्नेक का रेस्क्यू किया। उन्होंने बिना किसी नुकसान के सांप को सुरक्षित बाहर निकाला, जिससे परिवार ने राहत की सांस ली। माथुर धीमान ने लोगों से अपील की कि घर या आसपास सांप दिखाई देने पर घबराएं नहीं और उसे पकड़ने या मारने का प्रयास न करें। तुरंत प्रशिक्षित स्नेक सेवर या वन विभाग को सूचना दें। उन्होंने कहा कि सांप भी पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनका सुरक्षित रेस्क्यू कर प्राकृतिक आवास में छोड़ना जरूरी है।1
- कल होगा ऊना वॉकाथॉन का आयोजन, मुख्यमंत्री भरेंगे नशे के खिलाफ हुंकार, आईजी विमल गुप्ता ने की बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की अपील हिमाचल प्रदेश में नशे के खिलाफ चलाए जा रहे जनजागरूकता अभियान को नई मजबूती देने के लिए बुधवार को ऊना में 'ऊना वॉकाथॉन' का आयोजन किया जाएगा। 'एंटी-चिट्टा और पर्यावरण जागरूकता' की थीम पर होने वाले इस आयोजन में मुख्यमंत्री सहित बड़ी संख्या में आम नागरिक, विद्यार्थी, युवा और विभिन्न वर्गों के लोग हिस्सा लेंगे। कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में बढ़ते नशे के खतरे के प्रति लोगों को जागरूक करना और युवाओं को नशे से दूर रहने का संदेश देना है। आयोजन को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में हैं और लोगों में भी खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। पुलिस विभाग ने जिले वासियों से अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर इस अभियान को सफल बनाने की अपील की है। मंगलवार को आईजी विमल गुप्ता के नेतृत्व में तैयारी को अंतिम रूप दिया गया।1
- 50 स्कूलों के 500 खिलाड़ी पहुंचे जसूर! खिलाड़ियों की सुविधा पर DPE का बड़ा बयान जसूर में अंडर-19 खेलकूद प्रतियोगिता को लेकर खिलाड़ियों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। प्रतियोगिता में 50 स्कूलों के करीब 500 खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं। इस दौरान DPE मैडम ने खिलाड़ियों का स्वागत करते हुए कहा कि प्रतियोगिता के दौरान बच्चों की हर सुविधा का विशेष ध्यान रखा जाएगा। खेल मैदान में खिलाड़ियों का जोश और उत्साह देखते ही बन रहा है। 🏆🔥 नमस्कार, आप देख रहे हैं RK Himachal News और मैं हूं रमन राणा। #RKHimachalNews #Jassur #Under19Sports #SportsCompetition #Kangra #Nurpur #HimachalPradesh #500Players #SchoolSports #YouTubeShorts1