जब पार्टी की जरूरत थी, सबने फेर लिया मुंह भाजपा महिला मोर्चा जिलाध्यक्ष सपना भारती का छलका दर्द! राजनीति की दुनिया बाहर से जितनी चमकदार दिखती है, अंदर की हकीकत कभी-कभी उतनी ही कड़वी और दर्दनाक होती है। जब तक आप संगठन और पार्टी के काम आ रहे हैं, मंचों पर जयकारे लगते हैं, लेकिन जब खुद पर विपदा आती है—तो अपने कहे जाने वाले ही कैसे मुंह फेर लेते हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण सामने आया है। दरभंगा से भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष सपना भारती का एक बेहद भावुक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। गंभीर रूप से बीमार होने के बाद जब उन्हें पार्टी के बरे नेताओं और जनप्रतिनिधियों से कोई सहारा नहीं मिला, तो उनका दर्द कैमरे के सामने छलक पड़ा। बच्चों को घर पर अकेला छोर कर इलाज के लिए अकेले दिल्ली पहुंचीं और नम आंखों से उन्होंने जो कुछ कहा, उसने सियासत के संवेदनहीन चेहरे को बेनकाब कर दिया है। देखिए यह रिपोर्ट..." आंखों में आंसू, गले में रुंधा हुआ स्वर और चेहरे पर अपनों की बेरुखी का गहरा दर्द... ये हैं दरभंगा भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष सपना भारती। जो सालों से संगठन और पार्टी की मजबूती के लिए दिन-रात काम कर रही थीं। लेकिन जब गंभीर बीमारी ने उन्हें घेरा, तो जिन नेताओं के साथ वो कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहती थीं, उनमें से किसी ने उनकी सुध तक नहीं ली। सोशल मीडिया पर लाइव आकर सपना भारती ने रोते हुए अपना दर्द साझा किया। उन्होंने बताया कि वो अपने छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर अकेले इलाज के लिए दिल्ली के अस्पताल पहुंची हैं। पार्टी के कई बरे नेताओं और माननीयों को उन्होंने सुरक्षा और मदद के लिए फोन किया, लेकिन किसी के पास उनका हालचाल जानने तक का वक्त नहीं था सपना भारती ने उन अफवाहों पर भी विराम लगाया कि पार्टी में काम करने से उन्हें कोई निजी लाभ या पैसा मिला। उन्होंने साफ किया कि उन्होंने हमेशा निष्ठा से काम किया, कभी किसी से एक पैसा नहीं लिया। उन्होंने भरे गले से कहा कि एक समर्पित कार्यकर्ता को सिर्फ मान-सम्मान और बुरे वक्त में थोड़े से सहारे की जरूरत होती है। सपना भारती का यह दर्द सिर्फ एक नेत्री का नहीं, बल्कि उन तमाम जमीनी कार्यकर्ताओं का है जो पार्टियों के लिए अपना खून-पसीना बहाते हैं, लेकिन वक्त परने पर उन्हें तन्हा छोड़ दिया जाता है। सपना भारती का यह सीधा सवाल उन तमाम बड़े नेताओं से है कि क्या कार्यकर्ताओं की कद्र सिर्फ चुनाव और रैलियों तक ही सीमित है?"
जब पार्टी की जरूरत थी, सबने फेर लिया मुंह भाजपा महिला मोर्चा जिलाध्यक्ष सपना भारती का छलका दर्द! राजनीति की दुनिया बाहर से जितनी चमकदार दिखती है, अंदर की हकीकत कभी-कभी उतनी ही कड़वी और दर्दनाक होती है। जब तक आप संगठन और पार्टी के काम आ रहे हैं, मंचों पर जयकारे लगते हैं, लेकिन जब खुद पर विपदा आती है—तो अपने कहे जाने वाले ही कैसे मुंह फेर लेते हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण सामने आया है। दरभंगा से भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष सपना भारती का एक बेहद भावुक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। गंभीर रूप से बीमार होने के बाद जब उन्हें पार्टी के बरे नेताओं और जनप्रतिनिधियों से कोई सहारा नहीं मिला, तो उनका दर्द कैमरे के सामने छलक पड़ा। बच्चों को घर पर अकेला छोर कर इलाज के लिए अकेले दिल्ली पहुंचीं और नम आंखों से उन्होंने जो कुछ कहा, उसने सियासत के संवेदनहीन चेहरे को बेनकाब कर दिया है। देखिए यह रिपोर्ट..." आंखों में आंसू, गले में रुंधा हुआ स्वर और चेहरे पर अपनों की बेरुखी का गहरा दर्द... ये हैं दरभंगा भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष सपना भारती। जो सालों से संगठन और पार्टी की मजबूती के लिए दिन-रात काम कर रही थीं। लेकिन जब गंभीर बीमारी ने उन्हें घेरा, तो जिन नेताओं के साथ वो कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहती थीं, उनमें से किसी ने उनकी सुध तक नहीं ली। सोशल मीडिया पर लाइव आकर सपना भारती ने रोते हुए अपना दर्द साझा किया। उन्होंने बताया कि वो अपने छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर अकेले इलाज के लिए दिल्ली के अस्पताल पहुंची हैं। पार्टी के कई बरे नेताओं और माननीयों को उन्होंने सुरक्षा और मदद के लिए फोन किया, लेकिन किसी के पास उनका हालचाल जानने तक का वक्त नहीं था सपना भारती ने उन अफवाहों पर भी विराम लगाया कि पार्टी में काम करने से उन्हें कोई निजी लाभ या पैसा मिला। उन्होंने साफ किया कि उन्होंने हमेशा निष्ठा से काम किया, कभी किसी से एक पैसा नहीं लिया। उन्होंने भरे गले से कहा कि एक समर्पित कार्यकर्ता को सिर्फ मान-सम्मान और बुरे वक्त में थोड़े से सहारे की जरूरत होती है। सपना भारती का यह दर्द सिर्फ एक नेत्री का नहीं, बल्कि उन तमाम जमीनी कार्यकर्ताओं का है जो पार्टियों के लिए अपना खून-पसीना बहाते हैं, लेकिन वक्त परने पर उन्हें तन्हा छोड़ दिया जाता है। सपना भारती का यह सीधा सवाल उन तमाम बड़े नेताओं से है कि क्या कार्यकर्ताओं की कद्र सिर्फ चुनाव और रैलियों तक ही सीमित है?"
- जब पार्टी की जरूरत थी, सबने फेर लिया मुंह भाजपा महिला मोर्चा जिलाध्यक्ष सपना भारती का छलका दर्द! राजनीति की दुनिया बाहर से जितनी चमकदार दिखती है, अंदर की हकीकत कभी-कभी उतनी ही कड़वी और दर्दनाक होती है। जब तक आप संगठन और पार्टी के काम आ रहे हैं, मंचों पर जयकारे लगते हैं, लेकिन जब खुद पर विपदा आती है—तो अपने कहे जाने वाले ही कैसे मुंह फेर लेते हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण सामने आया है। दरभंगा से भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष सपना भारती का एक बेहद भावुक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। गंभीर रूप से बीमार होने के बाद जब उन्हें पार्टी के बरे नेताओं और जनप्रतिनिधियों से कोई सहारा नहीं मिला, तो उनका दर्द कैमरे के सामने छलक पड़ा। बच्चों को घर पर अकेला छोर कर इलाज के लिए अकेले दिल्ली पहुंचीं और नम आंखों से उन्होंने जो कुछ कहा, उसने सियासत के संवेदनहीन चेहरे को बेनकाब कर दिया है। देखिए यह रिपोर्ट..." आंखों में आंसू, गले में रुंधा हुआ स्वर और चेहरे पर अपनों की बेरुखी का गहरा दर्द... ये हैं दरभंगा भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष सपना भारती। जो सालों से संगठन और पार्टी की मजबूती के लिए दिन-रात काम कर रही थीं। लेकिन जब गंभीर बीमारी ने उन्हें घेरा, तो जिन नेताओं के साथ वो कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहती थीं, उनमें से किसी ने उनकी सुध तक नहीं ली। सोशल मीडिया पर लाइव आकर सपना भारती ने रोते हुए अपना दर्द साझा किया। उन्होंने बताया कि वो अपने छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर अकेले इलाज के लिए दिल्ली के अस्पताल पहुंची हैं। पार्टी के कई बरे नेताओं और माननीयों को उन्होंने सुरक्षा और मदद के लिए फोन किया, लेकिन किसी के पास उनका हालचाल जानने तक का वक्त नहीं था सपना भारती ने उन अफवाहों पर भी विराम लगाया कि पार्टी में काम करने से उन्हें कोई निजी लाभ या पैसा मिला। उन्होंने साफ किया कि उन्होंने हमेशा निष्ठा से काम किया, कभी किसी से एक पैसा नहीं लिया। उन्होंने भरे गले से कहा कि एक समर्पित कार्यकर्ता को सिर्फ मान-सम्मान और बुरे वक्त में थोड़े से सहारे की जरूरत होती है। सपना भारती का यह दर्द सिर्फ एक नेत्री का नहीं, बल्कि उन तमाम जमीनी कार्यकर्ताओं का है जो पार्टियों के लिए अपना खून-पसीना बहाते हैं, लेकिन वक्त परने पर उन्हें तन्हा छोड़ दिया जाता है। सपना भारती का यह सीधा सवाल उन तमाम बड़े नेताओं से है कि क्या कार्यकर्ताओं की कद्र सिर्फ चुनाव और रैलियों तक ही सीमित है?"1
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