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अम्बेडकरनगर पालसी के नाम पर लाखो की ठगी दो दर्जन से ज्यादा लोग परेशान
Anant kushwaha
अम्बेडकरनगर पालसी के नाम पर लाखो की ठगी दो दर्जन से ज्यादा लोग परेशान
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- बसखारी में ठंडा पानी, गरम घोटाला! वाटर कूलर के नाम पर ‘कूलर कम, कमीशन ज़्यादा’ का आरोप अंबेडकरनगर विकास खंड बसखारी में भले ही अभी गर्मी पूरी तरह शुरू न हुई हो, लेकिन वाटर कूलर स्थापना को लेकर चर्चाओं का पारा लगातार चढ़ता जा रहा है। ब्लॉक प्रमुख नरेंद्र मोहन उर्फ संजय सिंह की निधि से लगाए गए वाटर कूलरों की लागत को लेकर क्षेत्र में गंभीर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वाटर कूलर जनता को ठंडा पानी देने से ज़्यादा सरकारी धन को “गरम” करने का जरिया बन गए हैं। अजमेरी बादशाहपुर, तिलकारपुर का नागदरपुर, रामपुर बेनीपुर, सिंहपुर, सुलेमपुर परसावां, बेलापरसा, नौरहनी रामपुर, नारायणपुर और एकडल्ला सहित कई गांवों में इन वाटर कूलरों की स्थापना की गई है। खास बात यह है कि अधिकतर कूलर सरकारी विद्यालयों और मंदिर परिसरों में लगाए गए हैं, जिससे इन स्थानों को लेकर भी चर्चा तेज़ है। खर्च का हिसाब देख चकराई जनता क्षेत्रवासियों के अनुसार जब इन वाटर कूलरों के खर्च का विवरण सामने आया, तो लोग हैरान रह गए। स्थानीय स्तर पर कराए गए आकलन के मुताबिक एक वाटर कूलर पर होने वाला वास्तविक खर्च इस प्रकार बताया जा रहा है— 4 इंच बोरिंग (पाइप सहित): लगभग ₹20,000 समरसेबल पंप, टंकी, प्लंबर व फिटिंग: ₹25,000 आरओ सिस्टम: ₹40 से 45 हजार जाल, फाउंडेशन एवं अन्य खर्च: ₹18,000 इस तरह एक वाटर कूलर की कुल लागत लगभग ₹1 लाख के आसपास बैठती है। सरकारी काग़ज़ों में साढ़े तीन लाख का भुगतान स्थानीय लोगों का कहना है कि जबकि जमीनी हकीकत में खर्च करीब एक लाख रुपये का है, वहीं सरकारी अभिलेखों में एक-एक वाटर कूलर की लागत ₹3,68,000 दर्शाई गई है। यह कार्य फर्म मे० सगीर अहमद (एम#47), ठेकेदार संख्या 432168 के माध्यम से कराया गया बताया जा रहा है। कथित घोटाले का आंकड़ा क्षेत्रवासियों के अनुसार यदि सभी वाटर कूलरों की वास्तविक लागत जोड़ी जाए तो यह करीब ₹13,56,000 बैठती है, जबकि भुगतान के आधार पर अनुमानित खर्च इससे कई गुना अधिक दर्शाया गया है। लोगों का दावा है कि इस अंतर के आधार पर कथित घोटाले की राशि लगभग ₹30,57,600 तक पहुंचती है। लोगों के बीच चर्चा है कि कई स्थानों पर वाटर कूलरों की फिटिंग और गुणवत्ता भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि “पाइप से पानी कम और कमीशन ज़्यादा बह रहा है।” निष्पक्ष जांच पर उठे सवाल अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ब्लॉक प्रमुख निधि से कराए गए इस कार्य की निष्पक्ष जांच होगी या नहीं। ‘भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश’ के सरकारी दावों के बीच आमजन पूछ रहा है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है, तो लागत में इतना बड़ा अंतर क्यों है। फिलहाल यह मामला जनपद के जिम्मेदार अधिकारियों के लिए चुनौती बनता जा रहा है। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि पूरे प्रकरण की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाएगी, ताकि विकास के नाम पर हुए कथित खेल की सच्चाई उजागर हो सके। अब देखना यह है कि यह ठंडा–गरम खेल जांच की धूप सह पाता है या फिर फाइलों में ठंडा कर दिया जाता है।1
- अयोध्या/ तारुन /रिपोर्टर दुर्गा सिंह खबर शिक्षा क्षेत्र तारुन अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय खजुरीपुर की है। जिसमें तैनात 56 वर्षीय शिक्षामित्र अजीत कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि वह खजूरी पर प्राथमिक विद्यालय में शिक्षामित्र के पद पर तैनात हैं। विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापिका श्रीमती कंचन वर्मा एक हफ्ते से छुट्टी पर हैं। विद्यालय में और अध्यापक ना होने के कारण बच्चों का शिक्षण कार्य सिर्फ उन हैं के भरोसे चलता है। इसी के साथ ही ग्राम पंचायत मतदाता सूची और विधानसभा पुनरीक्षण कार्य डबल बी एल ओ काम उन्हें अकेले ही करना पड़ रहा है। और स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है जिससे उन्हें कठिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जिसे शिक्षा मित्र अजीत कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि मेरी समस्या का निदान नहीं हुआ तो मैं मजबूरन आत्महत्या करने के लिए मजबूर होंगे। जानकारी लेने पर एसडीएम बीकापुर श्रेया ने बताया कि एक अध्यापक उनके सहायक के रूप में अटैच कर दिया जा रहा है। नियम अनुसार बी एल ओ के पद से बताया जा सकता है। परंतु तत्काल नहीं।1
- Pramod Kumar Goswami. 06/02/20261
- Post by Vindhyavasini Yadav1
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- जनपद मुख्यालय में कचरा संग्रहण व्यवस्था पर उठे सवाल, घनी आबादी के बीच जमा कूड़ा बना स्वास्थ्य के लिए ख़तरा अंबेडकरनगर। जनपद मुख्यालय के मुख्य कस्बे में कचरा संग्रहण की मौजूदा व्यवस्था स्थानीय नागरिकों के लिए गंभीर परेशानी का कारण बनती जा रही है। नगर पालिका द्वारा घर-घर से एकत्रित किए गए कचरे को मुख्य बाजारों और घनी आबादी वाले इलाकों में अस्थायी रूप से एकत्र कर दिया जा रहा है, जिससे सुबह से लेकर कचरा उठने तक पूरे क्षेत्र में तीव्र दुर्गंध फैल जाती है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि दुर्गंध के कारण घरों से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है, वहीं बाजार से गुजरने वाले राहगीरों और दुकानदारों को भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका असर सबसे अधिक देखा जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार खुले में पड़े गीले कचरे से मक्खी-मच्छरों का प्रकोप तेजी से बढ़ता है, जिससे डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड जैसी संक्रामक बीमारियों का खतरा बना रहता है। इसके अलावा सड़ते कचरे से निकलने वाली दुर्गंध और बैक्टीरिया सांस संबंधी रोगों को भी जन्म दे सकते हैं। नगर पालिका प्रशासन की ओर से बताया गया है कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत नियमित सफाई अभियान चलाया जा रहा है और नागरिकों से कचरे को अलग-अलग करके देने की अपील की जा रही है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि कई बार कचरा उठाने वाली गाड़ियां समय से नहीं पहुंचतीं और जब पहुंचती भी हैं तो कचरे को ढककर नहीं ले जाया जाता, जिससे समस्या यथावत बनी रहती है। नगर पालिका के अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि जल्द ही कचरा संग्रहण के लिए मुख्य आबादी वाले क्षेत्रों से बाहर उपयुक्त ट्रांसफर प्वाइंट विकसित किए जाएंगे, ताकि लोगों को इस परेशानी से राहत मिल सके। वहीं स्थानीय निवासी और व्यापारी वर्ग इस मामले में त्वरित और ठोस सुधार की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक कचरा प्रबंधन की व्यवस्था वैज्ञानिक और व्यवस्थित नहीं होगी, तब तक स्वच्छता अभियान का वास्तविक लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच पाएगा।2
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