रात का आकाश एक बार फिर खगोलीय आकर्षण से रोशन होने जा रहा है। क्योंकि 28 अगस्त 2026 की पूर्णिमा, पर दिखाई देगा “स्टर्जन मून खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोलविज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए 28 अगस्त 2026 का स्टर्जन मून होगा ख़ास, क्योंकि इसी दिन चंद्र ग्रहण भी घटित होने वाला है लेकिन भारत में यह पूर्णिमा सुबह के समय चरम पर होगी, इसीलिए चन्द्रमा का चरम एवं चंद्र ग्रहण का दृश्य भारत से नहीं देखा जा सकेगा। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगर हम वैश्विक परिदृश्य की बात करें तो पाते हैं कि अगस्त की यह पूर्णिमा खगोल प्रेमियों के लिए और भी खास है,क्योंकि इस दौरान चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में चमकने के साथ-साथ पृथ्वी की छाया में भी प्रवेश करेगा। इस दौरान चंद्रमा का लगभग 96 प्रतिशत भाग पृथ्वी की छाया से ढक जाएगा। इसी वजह से कई देशों से चंद्रमा तांबे-सा लाल या गहरा नारंगी दिखाई दे सकता है लेकिन यह भारत से दिखाई नहीं देगा। *भारत में कब और कितने बजे होगा पूर्णिमा का चरम समय ।?* वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला, (तारामण्डल) गोरखपुर के खगोलविद् अमर पाल सिंह के अनुसार, यह पूर्णिमा 28 अगस्त 2026 को भारतीय समयानुसार सुबह करीब 9:48 बजे अपने चरम पर होगी। इसका अर्थ है कि जब पूर्ण चंद्रमा अपने सर्वोच्च रूप में होगा, तब भारत में दिन हो चुका होगा। इसलिए भारतीय आकाश में ग्रहण का दृश्य प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा जा सकेगा। फिर भी, सूर्यास्त के बाद चमकता हुआ पूर्ण चंद्रमा लोगों को विशेष दृश्य का अनुभव कराएगा। *क्या होता है “स्टर्जन मून”।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि “स्टर्जन मून” नाम उत्तरी अमेरिका की जनजातीय परंपराओं से जुड़ा है, क्योंकि अगस्त के महीने में ग्रेट लेक्स और लेक चैम्पलेन जैसे क्षेत्रों में स्टर्जन मछलियाँ बड़ी संख्या में पाई जाती थीं, इसलिए इस पूर्णिमा को यह नाम दिया गया। अलग-अलग संस्कृतियों में इसके अन्य नाम भी प्रचलित रहे हैं, जैसे कि सेल्ट्स इसे विवाद का चंद्रमा और लिंक्स का चंद्रमा कहते थे, जबकि एंग्लो-सैक्सन परंपरा में इसे अनाज का चंद्रमा कहा गया। अगर हम बात करें इसके कुछ अन्य नामों कि तो पाते हैं कि इसके कई अन्य नाम भी मौजूद हैं उनमें से कुछ इस प्रकार हैं जैसे कि इसको कॉर्न मून, ग्रेन मून, फ्रूट मून, लाइटनिंग मून और बारले मून जैसे आदि नामों से भी जाना जाता रहा है। *पूर्णिमा क्या होती है?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूर्णिमा उस क्षण को कहते हैं जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के विपरीत दिशाओं में होते हैं,और चंद्रमा का दिखाई देने वाला भाग पूरी तरह से प्रकाशित होता है या कुछ यूं कहें कि पूर्णिमा वह समय होता है जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के विपरीत दिशाओं में एक लगभग सीध में होते हैं, जिसे खगोलविज्ञान की भाषा में' सिज़ीगी' कहते हैं । उस समय,चंद्रमा का प्रकाशित आधा भाग पृथ्वी की ओर होता है जबकि दूसरा भाग अंधकार में होता है। और अमावस्या के समय इसका ठीक विपरीत होता है,अगस्त 2026 का स्टर्जन मून (पूर्णिमा) भारत में 28 अगस्त 2026 को सुबह 09 बजकर 48 मिनट पर अपने चरम (पूर्ण आकार) पर होगा पूर्णिमा की अवस्था की बात करें तो पाते हैं कि जब चंद्रमा पूर्णिमा की अवस्था में होता है, तब वह चंद्र कला चक्र का आधा दृश्य भाग पूरा कर चुका होता है क्योंकि पृथ्वी से देखने पर, यह सूर्य के ठीक विपरीत दिशा में स्थित होता है, खगोल विज्ञान में इस विन्यास को विपरीत स्थिति के रूप में जाना जाता है,इस स्थिति में, पृथ्वी से दिखाई देने वाला चंद्रमा का पूरा भाग सूर्य द्वारा पूर्णतः प्रकाशित होता है, जिससे वह एक चमकदार, गोलाकार डिस्क के रूप में दिखाई देता है। पूर्णिमा का चंद्रमा, सूर्यास्त के समय उगता है और आधी रात के आसपास आकाश में अपनी उच्चतम ऊंचाई पर पहुंचता है और सूर्योदय के समय अस्त हो जाता है। *किस दिशा में दिखाई देगा स्टर्जन पूर्णिमा का चांद और कितना होगा इसका दृश्य मैग्नीट्यूड।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 28 अगस्त 2026 को स्टर्जन पूर्णिमा का चांद शाम के समय पूर्वी आकाशीय क्षितिज पर लगभग 6 बजकर 35 मिनट के बाद दिखाई देना शुरू कर देगा और पूरी रात अपनी चमक बिखेरते हुए भोर में पश्चिमी क्षितिज की ओर चला जायेगा। *सटीक पूर्णिमा कब होती है?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूर्णिमा वह समय होता है जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के विपरीत दिशाओं में एक सीध में होते हैं, और चंद्रमा का लगभग 100% भाग सूर्य द्वारा प्रकाशित होता है ,चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर निरंतर गतिमान रहता है, इसलिए तकनीकी रूप से कहें तो पूर्णिमा केवल एक क्षण के लिए ही दिखाई देती है । इसका अर्थ यह है कि पृथ्वी के कुछ हिस्सों में पूर्णिमा का सटीक समय दिन के दौरान होता है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्रमा, हमारा प्राकृतिक उपग्रह है फिर भी,जब चंद्रमा की डिस्क का 98% से अधिक भाग प्रकाशित होता है तो चंद्रमा एक दिन पहले या बाद में पूर्ण दिखाई दे सकता है। इससे पूर्णिमा और बढ़ते हुए चंद्रमा के अंतिम चरण या घटते हुए चंद्रमा की शुरुआत के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है । *कैसे पड़ा अगस्त के चंद्रमा का नाम,स्टर्जन मून ।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगस्त की पूर्णिमा को स्टर्जन मून के नाम से जाना जाता है, जिसका नाम एक विशाल मीठे पानी की मछली के नाम पर रखा गया है जो अगस्त में बड़ी संख्या में पाई जाती है। चूंकि उत्तरी गोलार्ध में अगस्त कटाई का मौसम होता है, इसलिए अगस्त की पूर्णिमा को ग्रेन मून, फ्रूट मून और बारले मून भी कहा जाता है। *क्या होती है पूर्णिमा की खगोलीय स्थिति।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूर्णिमा की खगोलीय स्थिति को समझना भी जरूरी है,जैसे कि जब चंद्रमा, पूर्णिमा अवस्था में होता है, तब वह अपनी कक्षा का लगभग आधा चक्र पूरा कर चुका होता है और पृथ्वी से देखने पर सूर्य के ठीक विपरीत दिशा में स्थित दिखाई देता है। इस स्थिति में चंद्रमा का पूरा प्रकाशित भाग नजर आता है, इसलिए वह गोल और अत्यंत चमकदार दिखता है। सामान्यतः पूर्णिमा सूर्यास्त के समय उदय होती है, और आधी रात के आसपास आकाश में सबसे ऊंचाई पर पहुंचती है और सूर्योदय के समय अस्त हो जाती है। *क्या संबंध होता है ग्रहण और पूर्णिमा में।?* खगोलविद अमर पाल सिंह का यह भी कहना है कि ग्रहण और पूर्णिमा का मेल कोई असाधारण संयोग नहीं है, बल्कि चंद्रमा की कक्षा और उसके नोड्स से जुड़ी एक नियमित खगोलीय प्रक्रिया है। जब पूर्णिमा के समय चंद्रमा अपनी कक्षा के ऐसे बिंदु पर होता है, जहां वह पृथ्वी की कक्षा यानी क्रांतिवृत्त को काटता है, तभी चंद्र ग्रहण की स्थिति बनती है। यही कारण है कि कभी-कभी पूर्णिमा के साथ चंद्र ग्रहण और अमावस्या के साथ सूर्य ग्रहण देखने को मिलता है। *हर पूर्णिमा को क्यों नहीं होता चंद्र ग्रहण।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि हर पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण न होने का मुख्य कारण चंद्रमा की कक्षा का पृथ्वी की कक्षा के तल (orbital plane) से लगभग 5° से 5.1° झुका होना है,और मुख्य कारण कक्षा का झुकाव है,चंद्रमा, पृथ्वी के चारों ओर बिल्कुल सीधी या समतल प्लेट की तरह नहीं घूमता, बल्कि इसका मार्ग 5 डिग्री झुका हुआ होता है,साथ ही इस झुकाव के कारण ज्यादातर पूर्णिमा के दिन चंद्रमा, पृथ्वी की छाया के या तो ऊपर से या नीचे से निकल जाता है और छाया सीधे चंद्रमा पर नहीं पड़ती, लेकिन यह भी जानना आवश्यक है कि चंद्र ग्रहण तभी होता है जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा अंतरिक्ष में बिल्कुल एक सीध में आएं और चंद्रमा पृथ्वी की छाया से होकर गुजरे, जो कि केवल तभी संभव है जब पूर्णिमा की तिथि कक्षा के मिलन बिंदुओं (nodes) के पास हो। या कुछ यूं कहें कि लगभग प्रत्येक 29.5 दिनों में पूर्णिमा तो आती है और पूर्णिमा के समय पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच होती है। लेकिन इसका मतलब यह ज़रूरी नहीं है कि तीनों खगोलीय पिंड एकदम सीधी लाइन या (180 डिग्री ) में होंगे जिसे खगोलविज्ञान की भाषा में सिजिगी एवं हिंदी में इसको 'युति-वियुति' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है कि तीनों खगोलीय पिंडों का एक सीधी रेखा में होना। या कुछ यूं कहें कि जब अंतरिक्ष में सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में आ जाते हैं, तो उस स्थिति को सिजिगी कहा जाता है और इस सीधी रेखा में होने वाले संरेखण के कारण समुद्र में सबसे ऊंचे ज्वार (Spring Tides) भी आते हैं, लेकिन अधिकतर पूर्णिमाओं के समय चंद्रमा, पृथ्वी की छाया के ऊपर या नीचे से निकल जाता है, इसलिए पृथ्वी की जो छाया बनती है वह सीधे चांद पर नहीं पड़ती और चंद्र ग्रहण नहीं होता,यही मुख्य कारण है कि प्रत्येक महीने को होने वाली पूर्णिमा होने के बावजूद भी चंद्र ग्रहण दिखाई नहीं देता है *क्यों महत्वपूर्ण है चंद्रमा का 5 डिग्री का झुकाब।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगर चन्द्रमा की कक्षा पृथ्वी की कक्षा के समतल से बिल्कुल भी झुकी हुई नहीं होती,या कुछ यूं कहें कि चंद्रमा और पृथ्वी एक ही समतल में होते, तब होता यह कि लगभग हर पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण और लगभग हर अमावस्या पर सूर्य ग्रहण होने की स्थिति बन सकती थी या कुछ यूं भी समझ सकते हैं कि उस स्थिति में हमें हर महीने कम से कम दो ग्रहण देखने को मिलते, हर पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण होता,और लगभग दो सप्ताह बाद अमावस्या को सूर्य ग्रहण होता, इस प्रकार कुल मिलाकर प्रति वर्ष कम से कम 24 ग्रहण होते। आप सोच सकते हैं तब क्या होता।लेकिन इस 5 डिग्री के झुकाव के कारण ही ऐसी स्थिति हर बार नहीं बनती है। *कोई ग्रहण अकेला क्यों नहीं आता है।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण हमेशा जोड़े में आते हैं, एक ग्रहण दूसरे के बाद लगभग दो सप्ताह (पखवाड़े भर) की अवधि में होता है। अगर हम बात करें बीते 12 अगस्त की अमावस्या पर स्पेन में एक पूर्ण सूर्य ग्रहण देखा गया था,और अब लगभग दो सप्ताह बाद पूर्णिमा के साथ चंद्र ग्रहण का दृश्य भी सामने आ रहा है। खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार, यह दर्शाता है कि ग्रहण अक्सर जोड़ों में आते हैं। *क्या 28 अगस्त 2026 को होने वाला चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई देगा या नहीं।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि भारत के लिए यह खगोलीय घटना प्रत्यक्ष रूप से देखने योग्य नहीं होगी, लेकिन आप दुनियां के कई ऑनलाइन माध्यम एवं लाईव प्लेटफॉर्म्स पर इसका सीधा डिजिटल प्रसारण तो देख ही सकते हैं। लेकिन विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए यह जानना ही दिलचस्प है कि पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य की यह सटीक ज्यामितीय व्यवस्था कितनी सुंदरता से आकाशीय घटनाएँ रचती हैं। लेकिन 28 अगस्त 2026 को भले ही चंद्र ग्रहण भारत से न दिखे, क्योंकि उस दौरान भारत में दिन का समय होगा लेकिन रात्रि में पूर्ण चंद्रमा (फुल मून) या स्टर्जन मून की पूर्णिमा के चंद्रमा की उज्ज्वल आभा पूरे आसमान को एक विशेष चमक जरूर देगी। *28 अगस्त 2026 को होने वाला चंद्र ग्रहण भारतीय समयानुसार कितने बजे घटित होगा।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 28 अगस्त 2026 को होने वाला चंद्र ग्रहण भारतीय समयानुसार (IST) सुबह 6:54 बजे शुरू होगा और दोपहर 12:32 बजे समाप्त होगा, लेकिन यह भारत में दिखाई नहीं देगा। चंद्र ग्रहण का समय (भारतीय समयानुसार) उपच्छाया चरण (Penumbral Phase) की शुरुआत,सुबह 6:54 बजे होगी और आंशिक ग्रहण (Partial Phase) की शुरुआत,सुबह 8:04 बजे और ग्रहण का चरम (Maximum Peak) समय सुबह 9:43 बजे एवं आंशिक चरण की समाप्ति 11:22 बजे एवं पूर्ण समाप्ति (उपच्छाया समाप्त) दोपहर 12:32 PM बजे होगी। लेकिन यह चंद्र ग्रहण भारत में नजर नहीं आएगा क्योंकि इस दौरान भारत में दिन का समय होगा और चंद्रमा क्षितिज (Horizon) से नीचे रहेगा। साथ ही 28 अगस्त 2026 को भारत में पूर्णिमा का चंद्रमा (Full Moon) सुबह 9 बजकर 48 मिनट पर अपने चरम (पूर्ण अवस्था) पर होगा,इसीलिए इसका चरम भी दिखाई नहीं देगा लेकिन रात्रि में आप पूर्ण चांद का दीदार तो कर ही सकते हैं। *क्या भारत में दिखाई देगा यह चंद्र ग्रहण।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 28 अगस्त 2026 को होने वाला चंद्रग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा क्योंकि उस समय दिन का समय होगा। साथ ही ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका और प्रशांत महासागर के किनारे वाले क्षेत्रों से भी दिन के उजाले के कारण यह दिखाई नहीं देगा। *28 अगस्त 2026 का चंद्र ग्रहण कहां-कहां दिखेगा।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह ग्रहण दक्षिणी-पश्चिमी एशिया, अफ्रीका, यूरोप के ज्यादातर हिस्सों में, उत्तर-दक्षिणी अमेरिका, हिंद महासागर,प्रशांत महासागर में नजर आएगा। भारत में उस समय दिन का होगा,इसलिए यह ग्रहण नहीं दिखेगा। *चंद्र ग्रहण क्या होता है?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है जो तब घटित होती है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के ठीक बीच से गुजरती है, जिससे चंद्रमा की सतह पर पृथ्वी की छाया पड़ती है। यह स्थिति केवल पूर्णिमा के दौरान ही संभव है। *चंद्र ग्रहण के प्रकार क्या होते हैं।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस चन्द्र ग्रहण मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं, लेकिन यह स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में किस प्रकार स्थित हैं। 1-पूर्ण चंद्र ग्रहण: चंद्रमा पूरी तरह से पृथ्वी की छाया के सबसे अंधेरे हिस्से में चला जाता है, जिससे "ब्लड मून" नामक एक घटना घटती है, जिसमें पृथ्वी के वायुमंडल से सूर्य के प्रकाश के अपवर्तन के कारण चंद्रमा लाल-नारंगी रंग का दिखाई देता है। 2-आंशिक चंद्र ग्रहण: चंद्रमा का केवल एक हिस्सा पृथ्वी की छाया के सबसे गहरे हिस्से में प्रवेश करता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो हमारे ग्रह के उपग्रह का एक टुकड़ा काट लिया गया हो। 3-उपछाया चंद्र ग्रहण: खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि उपछाया चंद्र ग्रहण क्या होता है उन्होंने बताया कि चंद्रमा, पृथ्वी की हल्की बाहरी छाया से होकर गुजरता है, और ग्रहण इतना सूक्ष्म होता है कि इसे अक्सर नंगी आंखों से देखना बहुत मुश्किल होता है।। इसे ही उपछाया चंद्र ग्रहण कहा जाता है। *चन्द्रमा की कितनी और क्या अवस्थाएं होती हैं और क्या होता है तीसरा प्राथमिक चंद्र चरण का रहस्य।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूर्णिमा चंद्रमा की चार प्रमुख अवस्थाओं में से तीसरी अवस्था है,जो पूर्ण चन्द्रमा को सबसे ज्यादा खूबसूरत बनाती है,जो समय के विशिष्ट क्षणों में घटित होती हैं। अन्य तीन अवस्थाएँ हैं अमावस्या , प्रथम चतुर्थांश और तृतीय चतुर्थांश । इसके अतिरिक्त, चंद्रमा की चार मध्यवर्ती अवस्थाएँ भी होती हैं जो मुख्य अवस्थाओं के बीच के समय को कवर करती हैं। ये हैं: बढ़ता हुआ अर्धचंद्र , बढ़ता हुआ गिबस चंद्रमा , घटता हुआ गिबस चंद्रमा और घटता हुआ अर्धचंद्र,और यह भी जानना आवश्यक है कि चंद्रमा को अपनी इन सभी आठ अवस्थाओं को पूरा करने में लगभग 29.5 दिन लगते हैं। यही होती हैं चंद्रमा की चंद्र कलाएँ। जो पृथ्वी से दिखाई देती हैं। *क्या होता है चंद्र लिब्रेशन/ हिलता हुआ चंद्रमा। ?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से देखने पर चंद्रमा एक दीर्घवृत्ताकार पथ पर वामावर्त दिशा में पृथ्वी की परिक्रमा करता है , और चंद्रमा का एक ही भाग हमेशा पृथ्वी की ओर रहता है। पूर्णिमा के दौरान, चंद्रमा का यह निकटवर्ती भाग पूरी तरह से प्रकाशित होता है, जिससे हम चंद्रमा की सतह का आधा भाग देख पाते हैं । लेकिन क्या आप जानते हैं कि समय के साथ, हम वास्तव में चंद्रमा की सतह का 59% हिस्सा ही देख सकते हैं ,भले ही किसी भी समय केवल 50% ही दिखाई देता हो? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चंद्रमा उत्तर से दक्षिण की ओर थोड़ा हिलता है और पूर्व से पश्चिम की ओर थोड़ा डगमगाता है, जिसे खगोलविद चंद्र लिब्रेशन कहते हैं । *कुछ अतिरिक्त खगोलीय जानकारियों का खजाना।* *सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के संबंध में क्या होती है अम्ब्रा और पेनुम्ब्रा ।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अम्ब्रा ( छाया शंकु) पृथ्वी द्वारा प्रक्षेपित छाया क्षेत्र का वह भाग है जहाँ सूर्य, पृथ्वी की डिस्क द्वारा पूर्णतः ग्रहणित हो जाता है। पृथ्वी के अम्ब्रा से होकर गुजरने वाली वस्तुएँ सूर्य को पृथ्वी द्वारा पूर्णतः ग्रहणित होते हुए दिखेंगी। अगर हम बात करें पेनुम्ब्रा की तो पाते हैं कि उपछाया (पेनुम्ब्रा ),पृथ्वी द्वारा प्रक्षेपित छाया शंकु के भीतर का वह भाग जहाँ सूर्य की डिस्क पृथ्वी की डिस्क द्वारा पूरी तरह से ढकी नहीं होती है। पृथ्वी की उपछाया से गुजरने वाली वस्तुएँ सूर्य को पृथ्वी द्वारा आंशिक रूप से ग्रहणित होते हुए दिखेंगी। आंशिक चंद्र ग्रहण के लिए, पृथ्वी की छाया द्वारा ढके चंद्रमा के व्यास का अंश, जिसे 0 से 1 के बीच की संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है। पूर्ण चंद्र ग्रहण के लिए, इसे 1 से अधिक संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है, जिसकी गणना पृथ्वी की छाया के किनारे और चंद्रमा के उस हिस्से के बीच की दूरी, जो छाया में सबसे गहराई तक होता है, और चंद्रमा के व्यास के अनुपात के रूप में की जाती है। ये मान सबसे बड़े ग्रहण के समय परिकलित किए जाते हैं। उपछाया परिमाण । चंद्रमा के व्यास का वह अंश जो पृथ्वी की उपछाया से ढका होता है। आंशिक उपछाया ग्रहणों में यह संख्या 1 से कम होती है। जब चंद्रमा पूरी तरह से उपछाया में प्रवेश करता है, तो उपछाया परिमाण 1 से अधिक होता है, जिसकी गणना पूर्ण छाया परिमाण के समान ही की जाती है , जो यह दर्शाता है कि चंद्रमा पृथ्वी की उपछाया में कितनी गहराई तक प्रवेश कर रहा है। *क्या होती है टर्मिनेटर लाईन?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि टर्मिनेटर एक विशेष खगोलीय काल्पनिक रेखा होती है या कुछ यूं कहें कि पृथ्वी की सतह पर खींची गई वह रेखा जो किसी खगोलीय पिंड या घटना के दृश्य क्षेत्र को उसके दृश्य क्षेत्र से अलग करती है। दिन और रात को विभाजित करने वाली रेखा टर्मिनेटर का एक सामान्य उदाहरण है। चंद्र ग्रहण के मामले में, टर्मिनेटर रेखाओं का उपयोग उन क्षेत्रों को दर्शाने के लिए किया जाता है जहां विभिन्न संपर्क रेखाएँ दिखाई देती हैं।
रात का आकाश एक बार फिर खगोलीय आकर्षण से रोशन होने जा रहा है। क्योंकि 28 अगस्त 2026 की पूर्णिमा, पर दिखाई देगा “स्टर्जन मून खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोलविज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए 28 अगस्त 2026 का स्टर्जन मून होगा ख़ास, क्योंकि इसी दिन चंद्र ग्रहण भी घटित होने वाला है लेकिन भारत में यह पूर्णिमा सुबह के समय चरम पर होगी, इसीलिए चन्द्रमा का चरम एवं चंद्र ग्रहण का दृश्य भारत से नहीं देखा जा सकेगा। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगर हम वैश्विक परिदृश्य की बात करें तो पाते हैं कि अगस्त की यह पूर्णिमा खगोल प्रेमियों के लिए और भी खास है,क्योंकि इस दौरान चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में चमकने के साथ-साथ पृथ्वी की छाया में भी प्रवेश करेगा। इस दौरान चंद्रमा का लगभग 96 प्रतिशत भाग पृथ्वी की छाया से ढक जाएगा। इसी वजह से कई देशों से चंद्रमा तांबे-सा लाल या गहरा नारंगी दिखाई दे सकता है लेकिन यह भारत से दिखाई नहीं देगा। *भारत में कब और कितने बजे होगा पूर्णिमा का चरम समय ।?* वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला, (तारामण्डल) गोरखपुर के खगोलविद् अमर पाल सिंह के अनुसार, यह पूर्णिमा 28 अगस्त 2026 को भारतीय समयानुसार सुबह करीब 9:48 बजे अपने चरम पर होगी। इसका अर्थ है कि जब पूर्ण चंद्रमा अपने सर्वोच्च रूप में होगा, तब भारत में दिन हो चुका होगा। इसलिए भारतीय आकाश में ग्रहण का दृश्य प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा जा सकेगा। फिर भी, सूर्यास्त के बाद चमकता हुआ पूर्ण चंद्रमा लोगों को विशेष दृश्य का अनुभव कराएगा। *क्या होता है “स्टर्जन मून”।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि “स्टर्जन मून” नाम उत्तरी अमेरिका की जनजातीय परंपराओं से जुड़ा है, क्योंकि अगस्त के महीने में ग्रेट लेक्स और लेक चैम्पलेन जैसे क्षेत्रों में स्टर्जन मछलियाँ बड़ी संख्या में पाई जाती थीं, इसलिए इस पूर्णिमा को यह नाम दिया गया। अलग-अलग संस्कृतियों में इसके अन्य नाम भी प्रचलित रहे हैं, जैसे कि सेल्ट्स इसे विवाद का चंद्रमा और लिंक्स का चंद्रमा कहते थे, जबकि एंग्लो-सैक्सन परंपरा में इसे अनाज का चंद्रमा कहा गया। अगर हम बात करें इसके कुछ अन्य नामों कि तो पाते हैं कि इसके कई अन्य नाम भी मौजूद हैं उनमें से कुछ इस प्रकार हैं जैसे कि इसको कॉर्न मून, ग्रेन मून, फ्रूट मून, लाइटनिंग मून और बारले मून जैसे आदि नामों से भी जाना जाता रहा है। *पूर्णिमा क्या होती है?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूर्णिमा उस क्षण को कहते हैं जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के विपरीत दिशाओं में होते हैं,और चंद्रमा का दिखाई देने वाला भाग पूरी तरह से प्रकाशित होता है या कुछ यूं कहें कि पूर्णिमा वह समय होता है जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के विपरीत दिशाओं में एक लगभग सीध में होते हैं, जिसे खगोलविज्ञान की भाषा में' सिज़ीगी' कहते हैं । उस समय,चंद्रमा का प्रकाशित आधा भाग पृथ्वी की ओर होता है जबकि दूसरा भाग अंधकार में होता है। और अमावस्या के समय इसका ठीक विपरीत होता है,अगस्त 2026 का स्टर्जन मून (पूर्णिमा) भारत में 28 अगस्त 2026 को सुबह 09 बजकर 48 मिनट पर अपने चरम (पूर्ण आकार) पर होगा पूर्णिमा की अवस्था की बात करें तो पाते हैं कि जब चंद्रमा पूर्णिमा की अवस्था में होता है, तब वह चंद्र कला चक्र का आधा दृश्य भाग पूरा कर चुका होता है क्योंकि पृथ्वी से देखने पर, यह सूर्य के ठीक विपरीत दिशा में स्थित होता है, खगोल विज्ञान में इस विन्यास को विपरीत स्थिति के रूप में जाना जाता है,इस स्थिति में, पृथ्वी से दिखाई देने वाला चंद्रमा का पूरा भाग सूर्य द्वारा पूर्णतः प्रकाशित होता है, जिससे वह एक चमकदार, गोलाकार डिस्क के रूप में दिखाई देता है। पूर्णिमा का चंद्रमा, सूर्यास्त के समय उगता है और आधी रात के आसपास आकाश में अपनी उच्चतम ऊंचाई पर पहुंचता है और सूर्योदय के समय अस्त हो जाता है। *किस दिशा में दिखाई देगा स्टर्जन पूर्णिमा का चांद और कितना होगा इसका दृश्य मैग्नीट्यूड।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 28 अगस्त 2026 को स्टर्जन पूर्णिमा का चांद शाम के समय पूर्वी आकाशीय क्षितिज पर लगभग 6 बजकर 35 मिनट के बाद दिखाई देना शुरू कर देगा और पूरी रात अपनी चमक बिखेरते हुए भोर में पश्चिमी क्षितिज की ओर चला जायेगा। *सटीक पूर्णिमा कब होती है?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूर्णिमा वह समय होता है जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के विपरीत दिशाओं में एक सीध में होते हैं, और चंद्रमा का लगभग 100% भाग सूर्य द्वारा प्रकाशित होता है ,चंद्रमा पृथ्वी के चारों
ओर निरंतर गतिमान रहता है, इसलिए तकनीकी रूप से कहें तो पूर्णिमा केवल एक क्षण के लिए ही दिखाई देती है । इसका अर्थ यह है कि पृथ्वी के कुछ हिस्सों में पूर्णिमा का सटीक समय दिन के दौरान होता है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्रमा, हमारा प्राकृतिक उपग्रह है फिर भी,जब चंद्रमा की डिस्क का 98% से अधिक भाग प्रकाशित होता है तो चंद्रमा एक दिन पहले या बाद में पूर्ण दिखाई दे सकता है। इससे पूर्णिमा और बढ़ते हुए चंद्रमा के अंतिम चरण या घटते हुए चंद्रमा की शुरुआत के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है । *कैसे पड़ा अगस्त के चंद्रमा का नाम,स्टर्जन मून ।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगस्त की पूर्णिमा को स्टर्जन मून के नाम से जाना जाता है, जिसका नाम एक विशाल मीठे पानी की मछली के नाम पर रखा गया है जो अगस्त में बड़ी संख्या में पाई जाती है। चूंकि उत्तरी गोलार्ध में अगस्त कटाई का मौसम होता है, इसलिए अगस्त की पूर्णिमा को ग्रेन मून, फ्रूट मून और बारले मून भी कहा जाता है। *क्या होती है पूर्णिमा की खगोलीय स्थिति।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूर्णिमा की खगोलीय स्थिति को समझना भी जरूरी है,जैसे कि जब चंद्रमा, पूर्णिमा अवस्था में होता है, तब वह अपनी कक्षा का लगभग आधा चक्र पूरा कर चुका होता है और पृथ्वी से देखने पर सूर्य के ठीक विपरीत दिशा में स्थित दिखाई देता है। इस स्थिति में चंद्रमा का पूरा प्रकाशित भाग नजर आता है, इसलिए वह गोल और अत्यंत चमकदार दिखता है। सामान्यतः पूर्णिमा सूर्यास्त के समय उदय होती है, और आधी रात के आसपास आकाश में सबसे ऊंचाई पर पहुंचती है और सूर्योदय के समय अस्त हो जाती है। *क्या संबंध होता है ग्रहण और पूर्णिमा में।?* खगोलविद अमर पाल सिंह का यह भी कहना है कि ग्रहण और पूर्णिमा का मेल कोई असाधारण संयोग नहीं है, बल्कि चंद्रमा की कक्षा और उसके नोड्स से जुड़ी एक नियमित खगोलीय प्रक्रिया है। जब पूर्णिमा के समय चंद्रमा अपनी कक्षा के ऐसे बिंदु पर होता है, जहां वह पृथ्वी की कक्षा यानी क्रांतिवृत्त को काटता है, तभी चंद्र ग्रहण की स्थिति बनती है। यही कारण है कि कभी-कभी पूर्णिमा के साथ चंद्र ग्रहण और अमावस्या के साथ सूर्य ग्रहण देखने को मिलता है। *हर पूर्णिमा को क्यों नहीं होता चंद्र ग्रहण।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि हर पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण न होने का मुख्य कारण चंद्रमा की कक्षा का पृथ्वी की कक्षा के तल (orbital plane) से लगभग 5° से 5.1° झुका होना है,और मुख्य कारण कक्षा का झुकाव है,चंद्रमा, पृथ्वी के चारों ओर बिल्कुल सीधी या समतल प्लेट की तरह नहीं घूमता, बल्कि इसका मार्ग 5 डिग्री झुका हुआ होता है,साथ ही इस झुकाव के कारण ज्यादातर पूर्णिमा के दिन चंद्रमा, पृथ्वी की छाया के या तो ऊपर से या नीचे से निकल जाता है और छाया सीधे चंद्रमा पर नहीं पड़ती, लेकिन यह भी जानना आवश्यक है कि चंद्र ग्रहण तभी होता है जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा अंतरिक्ष में बिल्कुल एक सीध में आएं और चंद्रमा पृथ्वी की छाया से होकर गुजरे, जो कि केवल तभी संभव है जब पूर्णिमा की तिथि कक्षा के मिलन बिंदुओं (nodes) के पास हो। या कुछ यूं कहें कि लगभग प्रत्येक 29.5 दिनों में पूर्णिमा तो आती है और पूर्णिमा के समय पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच होती है। लेकिन इसका मतलब यह ज़रूरी नहीं है कि तीनों खगोलीय पिंड एकदम सीधी लाइन या (180 डिग्री ) में होंगे जिसे खगोलविज्ञान की भाषा में सिजिगी एवं हिंदी में इसको 'युति-वियुति' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है कि तीनों खगोलीय पिंडों का एक सीधी रेखा में होना। या कुछ यूं कहें कि जब अंतरिक्ष में सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में आ जाते हैं, तो उस स्थिति को सिजिगी कहा जाता है और इस सीधी रेखा में होने वाले संरेखण के कारण समुद्र में सबसे ऊंचे ज्वार (Spring Tides) भी आते हैं, लेकिन अधिकतर पूर्णिमाओं के समय चंद्रमा, पृथ्वी की छाया के ऊपर या नीचे से निकल जाता है, इसलिए पृथ्वी की जो छाया बनती है वह सीधे चांद पर नहीं पड़ती और चंद्र ग्रहण नहीं होता,यही मुख्य कारण है कि प्रत्येक महीने को होने वाली पूर्णिमा होने के बावजूद भी चंद्र ग्रहण दिखाई नहीं देता है *क्यों महत्वपूर्ण है चंद्रमा का 5 डिग्री का झुकाब।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगर चन्द्रमा की कक्षा पृथ्वी की कक्षा के समतल से बिल्कुल भी झुकी हुई नहीं होती,या कुछ यूं
कहें कि चंद्रमा और पृथ्वी एक ही समतल में होते, तब होता यह कि लगभग हर पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण और लगभग हर अमावस्या पर सूर्य ग्रहण होने की स्थिति बन सकती थी या कुछ यूं भी समझ सकते हैं कि उस स्थिति में हमें हर महीने कम से कम दो ग्रहण देखने को मिलते, हर पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण होता,और लगभग दो सप्ताह बाद अमावस्या को सूर्य ग्रहण होता, इस प्रकार कुल मिलाकर प्रति वर्ष कम से कम 24 ग्रहण होते। आप सोच सकते हैं तब क्या होता।लेकिन इस 5 डिग्री के झुकाव के कारण ही ऐसी स्थिति हर बार नहीं बनती है। *कोई ग्रहण अकेला क्यों नहीं आता है।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण हमेशा जोड़े में आते हैं, एक ग्रहण दूसरे के बाद लगभग दो सप्ताह (पखवाड़े भर) की अवधि में होता है। अगर हम बात करें बीते 12 अगस्त की अमावस्या पर स्पेन में एक पूर्ण सूर्य ग्रहण देखा गया था,और अब लगभग दो सप्ताह बाद पूर्णिमा के साथ चंद्र ग्रहण का दृश्य भी सामने आ रहा है। खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार, यह दर्शाता है कि ग्रहण अक्सर जोड़ों में आते हैं। *क्या 28 अगस्त 2026 को होने वाला चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई देगा या नहीं।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि भारत के लिए यह खगोलीय घटना प्रत्यक्ष रूप से देखने योग्य नहीं होगी, लेकिन आप दुनियां के कई ऑनलाइन माध्यम एवं लाईव प्लेटफॉर्म्स पर इसका सीधा डिजिटल प्रसारण तो देख ही सकते हैं। लेकिन विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए यह जानना ही दिलचस्प है कि पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य की यह सटीक ज्यामितीय व्यवस्था कितनी सुंदरता से आकाशीय घटनाएँ रचती हैं। लेकिन 28 अगस्त 2026 को भले ही चंद्र ग्रहण भारत से न दिखे, क्योंकि उस दौरान भारत में दिन का समय होगा लेकिन रात्रि में पूर्ण चंद्रमा (फुल मून) या स्टर्जन मून की पूर्णिमा के चंद्रमा की उज्ज्वल आभा पूरे आसमान को एक विशेष चमक जरूर देगी। *28 अगस्त 2026 को होने वाला चंद्र ग्रहण भारतीय समयानुसार कितने बजे घटित होगा।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 28 अगस्त 2026 को होने वाला चंद्र ग्रहण भारतीय समयानुसार (IST) सुबह 6:54 बजे शुरू होगा और दोपहर 12:32 बजे समाप्त होगा, लेकिन यह भारत में दिखाई नहीं देगा। चंद्र ग्रहण का समय (भारतीय समयानुसार) उपच्छाया चरण (Penumbral Phase) की शुरुआत,सुबह 6:54 बजे होगी और आंशिक ग्रहण (Partial Phase) की शुरुआत,सुबह 8:04 बजे और ग्रहण का चरम (Maximum Peak) समय सुबह 9:43 बजे एवं आंशिक चरण की समाप्ति 11:22 बजे एवं पूर्ण समाप्ति (उपच्छाया समाप्त) दोपहर 12:32 PM बजे होगी। लेकिन यह चंद्र ग्रहण भारत में नजर नहीं आएगा क्योंकि इस दौरान भारत में दिन का समय होगा और चंद्रमा क्षितिज (Horizon) से नीचे रहेगा। साथ ही 28 अगस्त 2026 को भारत में पूर्णिमा का चंद्रमा (Full Moon) सुबह 9 बजकर 48 मिनट पर अपने चरम (पूर्ण अवस्था) पर होगा,इसीलिए इसका चरम भी दिखाई नहीं देगा लेकिन रात्रि में आप पूर्ण चांद का दीदार तो कर ही सकते हैं। *क्या भारत में दिखाई देगा यह चंद्र ग्रहण।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 28 अगस्त 2026 को होने वाला चंद्रग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा क्योंकि उस समय दिन का समय होगा। साथ ही ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका और प्रशांत महासागर के किनारे वाले क्षेत्रों से भी दिन के उजाले के कारण यह दिखाई नहीं देगा। *28 अगस्त 2026 का चंद्र ग्रहण कहां-कहां दिखेगा।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह ग्रहण दक्षिणी-पश्चिमी एशिया, अफ्रीका, यूरोप के ज्यादातर हिस्सों में, उत्तर-दक्षिणी अमेरिका, हिंद महासागर,प्रशांत महासागर में नजर आएगा। भारत में उस समय दिन का होगा,इसलिए यह ग्रहण नहीं दिखेगा। *चंद्र ग्रहण क्या होता है?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है जो तब घटित होती है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के ठीक बीच से गुजरती है, जिससे चंद्रमा की सतह पर पृथ्वी की छाया पड़ती है। यह स्थिति केवल पूर्णिमा के दौरान ही संभव है। *चंद्र ग्रहण के प्रकार क्या होते हैं।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस चन्द्र ग्रहण मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं, लेकिन यह स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में किस प्रकार स्थित हैं। 1-पूर्ण चंद्र ग्रहण: चंद्रमा पूरी तरह से पृथ्वी की छाया के सबसे अंधेरे हिस्से में चला जाता है, जिससे "ब्लड मून" नामक एक घटना घटती है, जिसमें पृथ्वी के वायुमंडल से सूर्य के प्रकाश के अपवर्तन के कारण चंद्रमा लाल-नारंगी रंग का दिखाई देता है। 2-आंशिक चंद्र ग्रहण: चंद्रमा का केवल
एक हिस्सा पृथ्वी की छाया के सबसे गहरे हिस्से में प्रवेश करता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो हमारे ग्रह के उपग्रह का एक टुकड़ा काट लिया गया हो। 3-उपछाया चंद्र ग्रहण: खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि उपछाया चंद्र ग्रहण क्या होता है उन्होंने बताया कि चंद्रमा, पृथ्वी की हल्की बाहरी छाया से होकर गुजरता है, और ग्रहण इतना सूक्ष्म होता है कि इसे अक्सर नंगी आंखों से देखना बहुत मुश्किल होता है।। इसे ही उपछाया चंद्र ग्रहण कहा जाता है। *चन्द्रमा की कितनी और क्या अवस्थाएं होती हैं और क्या होता है तीसरा प्राथमिक चंद्र चरण का रहस्य।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूर्णिमा चंद्रमा की चार प्रमुख अवस्थाओं में से तीसरी अवस्था है,जो पूर्ण चन्द्रमा को सबसे ज्यादा खूबसूरत बनाती है,जो समय के विशिष्ट क्षणों में घटित होती हैं। अन्य तीन अवस्थाएँ हैं अमावस्या , प्रथम चतुर्थांश और तृतीय चतुर्थांश । इसके अतिरिक्त, चंद्रमा की चार मध्यवर्ती अवस्थाएँ भी होती हैं जो मुख्य अवस्थाओं के बीच के समय को कवर करती हैं। ये हैं: बढ़ता हुआ अर्धचंद्र , बढ़ता हुआ गिबस चंद्रमा , घटता हुआ गिबस चंद्रमा और घटता हुआ अर्धचंद्र,और यह भी जानना आवश्यक है कि चंद्रमा को अपनी इन सभी आठ अवस्थाओं को पूरा करने में लगभग 29.5 दिन लगते हैं। यही होती हैं चंद्रमा की चंद्र कलाएँ। जो पृथ्वी से दिखाई देती हैं। *क्या होता है चंद्र लिब्रेशन/ हिलता हुआ चंद्रमा। ?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से देखने पर चंद्रमा एक दीर्घवृत्ताकार पथ पर वामावर्त दिशा में पृथ्वी की परिक्रमा करता है , और चंद्रमा का एक ही भाग हमेशा पृथ्वी की ओर रहता है। पूर्णिमा के दौरान, चंद्रमा का यह निकटवर्ती भाग पूरी तरह से प्रकाशित होता है, जिससे हम चंद्रमा की सतह का आधा भाग देख पाते हैं । लेकिन क्या आप जानते हैं कि समय के साथ, हम वास्तव में चंद्रमा की सतह का 59% हिस्सा ही देख सकते हैं ,भले ही किसी भी समय केवल 50% ही दिखाई देता हो? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चंद्रमा उत्तर से दक्षिण की ओर थोड़ा हिलता है और पूर्व से पश्चिम की ओर थोड़ा डगमगाता है, जिसे खगोलविद चंद्र लिब्रेशन कहते हैं । *कुछ अतिरिक्त खगोलीय जानकारियों का खजाना।* *सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के संबंध में क्या होती है अम्ब्रा और पेनुम्ब्रा ।?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अम्ब्रा ( छाया शंकु) पृथ्वी द्वारा प्रक्षेपित छाया क्षेत्र का वह भाग है जहाँ सूर्य, पृथ्वी की डिस्क द्वारा पूर्णतः ग्रहणित हो जाता है। पृथ्वी के अम्ब्रा से होकर गुजरने वाली वस्तुएँ सूर्य को पृथ्वी द्वारा पूर्णतः ग्रहणित होते हुए दिखेंगी। अगर हम बात करें पेनुम्ब्रा की तो पाते हैं कि उपछाया (पेनुम्ब्रा ),पृथ्वी द्वारा प्रक्षेपित छाया शंकु के भीतर का वह भाग जहाँ सूर्य की डिस्क पृथ्वी की डिस्क द्वारा पूरी तरह से ढकी नहीं होती है। पृथ्वी की उपछाया से गुजरने वाली वस्तुएँ सूर्य को पृथ्वी द्वारा आंशिक रूप से ग्रहणित होते हुए दिखेंगी। आंशिक चंद्र ग्रहण के लिए, पृथ्वी की छाया द्वारा ढके चंद्रमा के व्यास का अंश, जिसे 0 से 1 के बीच की संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है। पूर्ण चंद्र ग्रहण के लिए, इसे 1 से अधिक संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है, जिसकी गणना पृथ्वी की छाया के किनारे और चंद्रमा के उस हिस्से के बीच की दूरी, जो छाया में सबसे गहराई तक होता है, और चंद्रमा के व्यास के अनुपात के रूप में की जाती है। ये मान सबसे बड़े ग्रहण के समय परिकलित किए जाते हैं। उपछाया परिमाण । चंद्रमा के व्यास का वह अंश जो पृथ्वी की उपछाया से ढका होता है। आंशिक उपछाया ग्रहणों में यह संख्या 1 से कम होती है। जब चंद्रमा पूरी तरह से उपछाया में प्रवेश करता है, तो उपछाया परिमाण 1 से अधिक होता है, जिसकी गणना पूर्ण छाया परिमाण के समान ही की जाती है , जो यह दर्शाता है कि चंद्रमा पृथ्वी की उपछाया में कितनी गहराई तक प्रवेश कर रहा है। *क्या होती है टर्मिनेटर लाईन?* खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि टर्मिनेटर एक विशेष खगोलीय काल्पनिक रेखा होती है या कुछ यूं कहें कि पृथ्वी की सतह पर खींची गई वह रेखा जो किसी खगोलीय पिंड या घटना के दृश्य क्षेत्र को उसके दृश्य क्षेत्र से अलग करती है। दिन और रात को विभाजित करने वाली रेखा टर्मिनेटर का एक सामान्य उदाहरण है। चंद्र ग्रहण के मामले में, टर्मिनेटर रेखाओं का उपयोग उन क्षेत्रों को दर्शाने के लिए किया जाता है जहां विभिन्न संपर्क रेखाएँ दिखाई देती हैं।
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- धूमधाम से मनाया गया जश्ने ईद-मिलादुन्नबी, जगह-जगह निकले शानदार और शांतिपूर्ण जुलूस हंगामा टाइम्स न्यूज़, कुशीनगर कुशीनगर जनपद में जश्ने ईद-मिलादुन्नबी का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास, धार्मिक उत्साह और आपसी भाईचारे के साथ मनाया गया। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में शानदार एवं शांतिपूर्ण जुलूस निकाले गए, जिसमें मुस्लिम धर्मगुरुओं, समाजसेवियों, बुजुर्गों, युवाओं, महिलाओं और बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जुलूस के दौरान पूरे जिले में अमन, भाईचारे और आपसी सौहार्द का संदेश देखने को मिला। जश्ने ईद-मिलादुन्नबी के अवसर पर जिले के विभिन्न क्षेत्रों में सुबह से ही धार्मिक उत्साह का माहौल रहा। जगह-जगह निकले जुलूसों में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। हाथों में धार्मिक झंडे और दिलों में पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के प्रति अकीदत लिए लोग पूरे जोश और उत्साह के साथ जुलूस में शामिल नजर आए। इस दौरान मुस्लिम धर्मगुरुओं ने पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब की शिक्षाओं और इस्लाम के शांति, प्रेम एवं भाईचारे के संदेश को अपनाने का आह्वान किया। जुलूस के माध्यम से समाज में शांति, आपसी प्रेम, एकता और सौहार्द का संदेश दिया गया। खास बात यह रही कि जुलूस में बुजुर्गों के साथ युवाओं, महिलाओं और बच्चों की भी बड़ी भागीदारी रही। जुलूस के मार्गों पर जगह-जगह सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों द्वारा श्रद्धालुओं के लिए ठंडे पानी, मीठे चावल सहित खाने-पीने की अन्य व्यवस्थाएं की गई थीं। लोगों ने जुलूस में शामिल लोगों का स्वागत करते हुए सेवा और सहयोग की भावना का परिचय दिया। इससे जुलूस में शामिल लोगों को किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। वहीं, जुलूसों को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए पुलिस प्रशासन भी पूरी तरह सतर्क रहा। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में पुलिस अधिकारी और जवान चप्पे-चप्पे पर तैनात रहे। जुलूस के मार्गों की लगातार निगरानी की गई तथा सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद नजर आया। प्रशासन और पुलिस की सक्रियता तथा आयोजकों और स्थानीय लोगों के सहयोग से जिले में जश्ने ईद-मिलादुन्नबी का पर्व शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। इस अवसर पर निकाले गए जुलूसों ने एक बार फिर कुशीनगर की गंगा-जमुनी तहजीब, अमन, भाईचारे और आपसी एकता का संदेश दिया।4
- जटहा बाजार थाना अध्यक्ष अभिनव मिश्रा के निगरानी में जुलूस ए मोहम्मदी संपन्न बड़े ही शानो शौकत से निकाला गया जुलूस ए मोहम्मदी नारे तकबीर अल्लाह हू अकबर लब्बैक या लब्बैक या लब्बैक की सदाएं बुलंद कुशीनगर जटहा बाजार थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत पकहां लुकपुर से पहुंचे हर साल की तरह इस साल भी जुलूस ए मोहम्मदी निकल गया जिसमें हजारों की संख्या में लोग ट्रैक्टर मोटरसाइकिल चार पहिया वाहनों में झंडा लगाकर जुलूस ए मोहम्मदी निकल गया जिसमें गांव में जुलूस में शामिल लोगों को फल हलवा का इंतजाम किया गया जिसमें सैकड़ो की संख्या में लोग मौजूद रहे। पकहा लुकपुर जटहा बाजार एकवनही कटाई भरपुरवा पुरनहां मिश्रा में भी जुलूस से मोहम्मदी बड़ी शानो शौकत के साथ निकाला गया जिसमें बूढ़े बच्चे बुजुर्ग नौजवान सभी लोग कंधों से कंधा मिलाकर नारे तकबीर अल्लाह हू अकबर लब्बैक या लब्बैक या लब्बैक की सदाएं बुलंद करके जुलूस ए मोहम्मदी निकाला गया। नुरी जामा मस्जिद से इमाम हाफिज एस एस कादरी की मौजूदगी में जुलूस ए मोहम्मदी निकाला गया। जिसमें मनऊवर अली मुंशी रहे।कलाम आजाद डॉक्टर गोस्लिम अंसारी हाफिज इश्तियाक इलियास इजहार अब्दुल कलाम आजाद गयासुद्दीन डॉक्टर नईमुद्दीन अंसारी शमसुद्दीन अंसारी मोहम्मदी अंसारी रियाजुद्दीन सैफुल्लाह अंसारी नसरुद्दीन अंसारी जटहा बाजार थाना अध्यक्ष अभिनव मिश्रा उप निरीक्षक चंद्रजीत यादव शौरभ यादव विजय विकेक भारगोव सोनम सिंघ अनसीखा रामचंदर यादव हेड कांस्टेबल गोरखनाथ शेरबहादुर सिंह श्रवण कुमार अनुराग कुमार बृजेश यादव सहित सभी बीट के पुलिस कर्मी सहित काफी संख्या में महिला व पुरुष मौजूद जटहा बाजार थाना अध्यक्ष अभिनव मिश्रा के निगरानी में जुलूस ए मोहम्मदी संपन्न बड़े ही शानो शौकत से निकाला गया जुलूस ए मोहम्मदी नारे तकबीर अल्लाह हू अकबर लब्बैक या लब्बैक या लब्बैक की सदाएं बुलंद कुशीनगर जटहा बाजार थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत पकहां लुकपुर से पहुंचे हर साल की तरह इस साल भी जुलूस ए मोहम्मदी निकल गया जिसमें हजारों की संख्या में लोग ट्रैक्टर मोटरसाइकिल चार पहिया वाहनों में झंडा लगाकर जुलूस ए मोहम्मदी निकल गया जिसमें गांव में जुलूस में शामिल लोगों को फल हलवा का इंतजाम किया गया जिसमें सैकड़ो की संख्या में लोग मौजूद रहे। पकहा लुकपुर जटहा बाजार एकवनही कटाई भरपुरवा पुरनहां मिश्रा में भी जुलूस से मोहम्मदी बड़ी शानो शौकत के साथ निकाला गया जिसमें बूढ़े बच्चे बुजुर्ग नौजवान सभी लोग कंधों से कंधा मिलाकर नारे तकबीर अल्लाह हू अकबर लब्बैक या लब्बैक या लब्बैक की सदाएं बुलंद करके जुलूस ए मोहम्मदी निकाला गया। नुरी जामा मस्जिद से इमाम हाफिज एस एस कादरी की मौजूदगी में जुलूस ए मोहम्मदी निकाला गया। जिसमें मनऊवर अली मुंशी रहे।कलाम आजाद डॉक्टर गोस्लिम अंसारी हाफिज इश्तियाक इलियास इजहार अब्दुल कलाम आजाद गयासुद्दीन डॉक्टर नईमुद्दीन अंसारी शमसुद्दीन अंसारी मोहम्मदी अंसारी रियाजुद्दीन सैफुल्लाह अंसारी नसरुद्दीन अंसारी जटहा बाजार थाना अध्यक्ष अभिनव मिश्रा उप निरीक्षक चंद्रजीत यादव शौरभ यादव विजय विकेक भारगोव सोनम सिंघ अनसीखा रामचंदर यादव हेड कांस्टेबल गोरखनाथ शेरबहादुर सिंह श्रवण कुमार अनुराग कुमार बृजेश यादव सहित सभी बीट के पुलिस कर्मी सहित काफी संख्या में महिला व पुरुष मौजूद1
- नेपाल में भीषण बाढ़ आने से कुशीनगर जिला प्रशासन मुस्तैद, निरीक्षण हेतु पहुंचे। नेपाल के रसुवा जिले में ग्लेशियर जनित झील फटने की सूचना के बाद कुशीनगर में बड़ी गंडक नदी (नारायणी) के जलस्तर को लेकर प्रशासन सतर्क हो गया है। वाल्मीकि बैराज से करीब 2.50 से 3 लाख क्यूसेक पानी आने की संभावना को देखते हुए संभावित बाढ़ के मद्देनजर तैयारियां तेज कर दी गई हैं। डीएम महेंद्र सिंह तंवर और एसपी ने शिवपुर क्षेत्र का स्थलीय निरीक्षण कर नदी किनारे बसे संवेदनशील गांवों में ग्रामीणों से हालात की जानकारी ली। ग्रामीणों को नदी और निचले इलाकों से दूर रहने तथा पशुओं को भी सुरक्षित स्थानों पर रखने की अपील की गई है। संभावित बाढ़ से निपटने के लिए एसडीआरएफ टीम को तैनात किया गया है। राहत-बचाव उपकरणों के साथ प्रशासनिक अमला अलर्ट मोड पर है। संवेदनशील क्षेत्रों में अधिकारियों और कर्मचारियों को लगातार निगरानी के निर्देश दिए गए हैं। प्रशासन ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और केवल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करने की अपील की है। किसी भी आपात स्थिति में प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की पूरी तैयारी की जा रही है।1