कलम की चीख: जब एक बुजुर्ग पत्रकार को अपराधी बना दिया गया… कलम की चीख: जब एक बुजुर्ग पत्रकार को अपराधी बना दिया गया… गरियाबंद। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की हालत आज किस दौर से गुजर रही है, इसका दर्दनाक उदाहरण छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में देखने को मिला। वर्षों तक समाज की आवाज़ बनने वाला एक बुजुर्ग पत्रकार आज खुद व्यवस्था के सवालों के बीच खड़ा दिखाई दे रहा है। जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी कलम के जरिए गरीबों, पीड़ितों और आम जनता की समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुँचाया, आज उसी को अपराधी की तरह पेश किए जाने की कोशिश ने पूरे पत्रकार जगत को भीतर तक झकझोर दिया है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि उस हर पत्रकार की पीड़ा है जो सच लिखने का साहस करता है। सवाल यह उठता है कि क्या अब सच बोलना और सच दिखाना भी गुनाह बन चुका है? जिस उम्र में इंसान सम्मान और शांति की उम्मीद करता है, उस उम्र में एक बुजुर्ग पत्रकार को मानसिक प्रताड़ना, अपमान और कार्रवाई का सामना करना पड़े — यह दृश्य केवल पत्रकार समाज ही नहीं, बल्कि हर संवेदनशील नागरिक को विचलित कर रहा है। आखिर वह कौन-सी गुंडागर्दी है, जो एक कमजोर, बुजुर्ग पत्रकार की आंखों में दिखाई दे रही है? क्या व्यवस्था अब इतनी असहज हो चुकी है कि सवाल पूछने वाली कलम भी उसे दुश्मन नजर आने लगी है? विडंबना देखिए… एक तरफ वे लोग जिन पर समाज में भय और हिंसा फैलाने के आरोप लगते रहे हैं, उनके लिए सुरक्षा के बड़े-बड़े इंतजाम किए जाते हैं। करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। लेकिन दूसरी तरफ, जनता की आवाज़ उठाने वाला पत्रकार खुद असुरक्षित महसूस कर रहा है। पत्रकार कभी समाज का दुश्मन नहीं होता। पत्रकार वह आईना होता है जो सत्ता को उसकी सच्चाई दिखाता है। लेकिन जब सत्ता और व्यवस्था उसी आईने को तोड़ने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र खतरे में है। आज गरियाबंद की यह घटना पूरे प्रदेश के पत्रकारों के मन में एक डर पैदा कर रही है। डर इस बात का कि कहीं कल सच लिखने की कीमत उन्हें भी न चुकानी पड़े। यदि एक बुजुर्ग पत्रकार सुरक्षित नहीं है, तो फिर आम नागरिक किस भरोसे न्याय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की उम्मीद करेगा? प्रदेश के मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai, गृहमंत्री और प्रशासनिक अधिकारियों से पत्रकार समाज की यही मांग है कि इस मामले को केवल कानूनी कार्रवाई के नजरिए से नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों की दृष्टि से देखा जाए। क्योंकि अगर कलम डर गई… तो जनता की आवाज़ भी खामोश हो जाएगी। आज जरूरत है पत्रकारों को संरक्षण देने की, उन्हें सम्मान देने की, ताकि वे बिना भय के सच लिख सकें। लोकतंत्र की असली ताकत बंदूक नहीं, बल्कि स्वतंत्र कलम होती है। “अगर सच लिखना अपराध बन गया, तो आने वाला समय लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक दौर साबित होगा।”
कलम की चीख: जब एक बुजुर्ग पत्रकार को अपराधी बना दिया गया… कलम की चीख: जब एक बुजुर्ग पत्रकार को अपराधी बना दिया गया… गरियाबंद। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की हालत आज किस दौर से गुजर रही है, इसका दर्दनाक उदाहरण छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में देखने को मिला। वर्षों तक समाज की आवाज़ बनने वाला एक बुजुर्ग पत्रकार आज खुद व्यवस्था के सवालों के बीच खड़ा दिखाई दे रहा है। जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी कलम के जरिए गरीबों, पीड़ितों और आम जनता की समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुँचाया, आज उसी को अपराधी की तरह पेश किए जाने की कोशिश ने पूरे पत्रकार जगत को भीतर तक झकझोर दिया है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि उस हर पत्रकार की पीड़ा है जो सच लिखने का साहस करता है। सवाल यह उठता है कि क्या अब सच बोलना और सच दिखाना भी गुनाह बन चुका है? जिस उम्र में इंसान सम्मान और शांति की उम्मीद करता है, उस उम्र में एक बुजुर्ग पत्रकार को मानसिक प्रताड़ना, अपमान और कार्रवाई का सामना करना पड़े — यह दृश्य केवल पत्रकार समाज ही नहीं, बल्कि हर संवेदनशील नागरिक को विचलित कर रहा है। आखिर वह कौन-सी गुंडागर्दी है, जो एक कमजोर, बुजुर्ग पत्रकार की आंखों में दिखाई दे रही है? क्या व्यवस्था अब इतनी असहज हो चुकी है कि सवाल पूछने वाली कलम भी उसे दुश्मन नजर आने लगी है? विडंबना देखिए… एक तरफ वे लोग जिन पर समाज में भय और हिंसा फैलाने के आरोप लगते रहे हैं, उनके लिए सुरक्षा के बड़े-बड़े इंतजाम किए जाते हैं। करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। लेकिन दूसरी तरफ, जनता की आवाज़ उठाने वाला पत्रकार खुद असुरक्षित महसूस कर रहा है। पत्रकार कभी समाज का दुश्मन नहीं होता। पत्रकार वह आईना होता है जो सत्ता को उसकी सच्चाई दिखाता है। लेकिन जब सत्ता और व्यवस्था उसी आईने को तोड़ने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र खतरे में है। आज गरियाबंद की यह घटना पूरे प्रदेश के पत्रकारों के मन में एक डर पैदा कर रही है। डर इस बात का कि कहीं कल सच लिखने की कीमत उन्हें भी न चुकानी पड़े। यदि एक बुजुर्ग पत्रकार सुरक्षित नहीं है, तो फिर आम नागरिक किस भरोसे न्याय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की उम्मीद करेगा? प्रदेश के मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai, गृहमंत्री और प्रशासनिक अधिकारियों से पत्रकार समाज की यही मांग है कि इस मामले को केवल कानूनी कार्रवाई के नजरिए से नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों की दृष्टि से देखा जाए। क्योंकि अगर कलम डर गई… तो जनता की आवाज़ भी खामोश हो जाएगी। आज जरूरत है पत्रकारों को संरक्षण देने की, उन्हें सम्मान देने की, ताकि वे बिना भय के सच लिख सकें। लोकतंत्र की असली ताकत बंदूक नहीं, बल्कि स्वतंत्र कलम होती है। “अगर सच लिखना अपराध बन गया, तो आने वाला समय लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक दौर साबित होगा।”
- कलम की चीख: जब एक बुजुर्ग पत्रकार को अपराधी बना दिया गया… कलम की चीख: जब एक बुजुर्ग पत्रकार को अपराधी बना दिया गया… गरियाबंद। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की हालत आज किस दौर से गुजर रही है, इसका दर्दनाक उदाहरण छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में देखने को मिला। वर्षों तक समाज की आवाज़ बनने वाला एक बुजुर्ग पत्रकार आज खुद व्यवस्था के सवालों के बीच खड़ा दिखाई दे रहा है। जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी कलम के जरिए गरीबों, पीड़ितों और आम जनता की समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुँचाया, आज उसी को अपराधी की तरह पेश किए जाने की कोशिश ने पूरे पत्रकार जगत को भीतर तक झकझोर दिया है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि उस हर पत्रकार की पीड़ा है जो सच लिखने का साहस करता है। सवाल यह उठता है कि क्या अब सच बोलना और सच दिखाना भी गुनाह बन चुका है? जिस उम्र में इंसान सम्मान और शांति की उम्मीद करता है, उस उम्र में एक बुजुर्ग पत्रकार को मानसिक प्रताड़ना, अपमान और कार्रवाई का सामना करना पड़े — यह दृश्य केवल पत्रकार समाज ही नहीं, बल्कि हर संवेदनशील नागरिक को विचलित कर रहा है। आखिर वह कौन-सी गुंडागर्दी है, जो एक कमजोर, बुजुर्ग पत्रकार की आंखों में दिखाई दे रही है? क्या व्यवस्था अब इतनी असहज हो चुकी है कि सवाल पूछने वाली कलम भी उसे दुश्मन नजर आने लगी है? विडंबना देखिए… एक तरफ वे लोग जिन पर समाज में भय और हिंसा फैलाने के आरोप लगते रहे हैं, उनके लिए सुरक्षा के बड़े-बड़े इंतजाम किए जाते हैं। करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। लेकिन दूसरी तरफ, जनता की आवाज़ उठाने वाला पत्रकार खुद असुरक्षित महसूस कर रहा है। पत्रकार कभी समाज का दुश्मन नहीं होता। पत्रकार वह आईना होता है जो सत्ता को उसकी सच्चाई दिखाता है। लेकिन जब सत्ता और व्यवस्था उसी आईने को तोड़ने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र खतरे में है। आज गरियाबंद की यह घटना पूरे प्रदेश के पत्रकारों के मन में एक डर पैदा कर रही है। डर इस बात का कि कहीं कल सच लिखने की कीमत उन्हें भी न चुकानी पड़े। यदि एक बुजुर्ग पत्रकार सुरक्षित नहीं है, तो फिर आम नागरिक किस भरोसे न्याय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की उम्मीद करेगा? प्रदेश के मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai, गृहमंत्री और प्रशासनिक अधिकारियों से पत्रकार समाज की यही मांग है कि इस मामले को केवल कानूनी कार्रवाई के नजरिए से नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों की दृष्टि से देखा जाए। क्योंकि अगर कलम डर गई… तो जनता की आवाज़ भी खामोश हो जाएगी। आज जरूरत है पत्रकारों को संरक्षण देने की, उन्हें सम्मान देने की, ताकि वे बिना भय के सच लिख सकें। लोकतंत्र की असली ताकत बंदूक नहीं, बल्कि स्वतंत्र कलम होती है। “अगर सच लिखना अपराध बन गया, तो आने वाला समय लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक दौर साबित होगा।”1
- माल वाहन गाड़ियों भी सवारी ले जाते हुए बलौदा बाजार मुख्यालय से गुजर कर जा रही है गाड़ियां यातायात के नियमों का उड़ा रहे हैं धज्जियां अब देखते हैं क्या ऐसे लोगों पर भी होगी कार्रवाई1
- छत्तीसगढ़ में 12वीं हिंदी परीक्षा पेपर लीक मामले के मुख्य आरोपी वेणु जंघेल को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस गिरफ्तारी से इस बड़े घोटाले के पीछे की पूरी कड़ी खुलने की उम्मीद जगी है, जिससे लाखों छात्रों के भविष्य पर असर पड़ा था।1
- छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार-भाटापारा स्थित लवन में निषाद समाज परिषद ने भव्य शपथ एवं सम्मान समारोह आयोजित किया। इसमें सामाजिक एकता, शिक्षा और युवा शक्ति को मजबूत करने का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम में 80 प्रतिभावान 10वीं व 12वीं के छात्रों को सम्मानित कर शिक्षा के महत्व पर विशेष जोर दिया गया।2
- रायपुर में अभिभावकों को बच्चों के लिए कुरकुरी से सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। संदेश में कहा गया है कि बच्चों को बचत के लिए लालच न दें, बल्कि सही सीख दें।1
- मदर्स डे पर ग्राम परसदा में नसेड़ी बेटे ने मां और बहन के साथ की मारपीट जिसकी थाना मदर्स डे पर ग्राम परसदा में नसेड़ी बेटे ने मां और बहन के साथ की मारपीट जिसकी थाना चकरभाठा में दर्ज कराई गई शिकायत रविवार की रात 9:30 पर प्रार्थी की बेटी से मिली जानकारी के अनुसार प्रार्थी महिला आवास पारा परसदा थाना चकरभाठा जिला बिलासपुर में रहती है मदर्स डे के दिन उसका शराबी बेटा जिसका नाम भूपेंद्र साहू है जो माँ के साथ ही परसदा आवास पारा में रहता है दुर्गा ऑयल मिल सिरगिट्टी में हमाली का काम करता है और गांजा और शराब नशे का आदी है उसके द्वारा किसी बात को लेकर अपनी मां को बेल्ट लात घुसे एवं लोटे से फेंक कर मरने से महिला घायल पड़ी थी जिसने अपने बेटी वर्षा द्वेदी जो सरकंडा नूतन चौक की रहने वाली है उसे फोन कर घर बुलाई तो आरोपी बेटे ने मां के साथ बहन की भी पिटाई कर दी जिसकी वजह से दोनों घायल होकर न्याय की गुहार लगाने थाना चकरभाठा पहुंचे जिन्होंने आरोपी भूपेंद्र साहू के खिलाफ उचित कार्रवाई करने की मांग की है एवं प्रार्थी महिला की बेटी वर्षा द्विवेदी ने बताया की उनका भाई नशेड़ी किस्म का है जिसके दो बच्चे हैं लेकिन उसके नशा की वजह से उसकी पत्नी छोड़कर चली गई है जो जय दुर्गा आइल मिल सिरगिट्टी में हमाली का काम करता है उसने मदर्स डे जिस दिन मां की पूजा की जाती है उस दिन अपनी मां पर हाथ उठाया है चुड़े से भी वार किया है और चाकू दिखा कर जान से मारने की धमकी भी दिया है उचित कार्यवाही होनी चाहिए आप भी सुने वर्षा द्विवेदी ने क्या कहा1
- बिलासपुर के बिल्हा में स्थित मानस केटरिंग, अपनी लाजवाब सेवाओं के लिए क्षेत्र में लोकप्रिय है। यह स्थानीय आयोजनों और उत्सवों में स्वादिष्ट भोजन का भरोसेमंद विकल्प बन गया है।1
- कलम की चीख: जब एक बुजुर्ग पत्रकार को अपराधी बना दिया गया… कलम की चीख: जब एक बुजुर्ग पत्रकार को अपराधी बना दिया गया… संवाददाता धीरेंद्र कुमार जायसवाल/9131419735 गरियाबंद। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की हालत आज किस दौर से गुजर रही है, इसका दर्दनाक उदाहरण छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में देखने को मिला। वर्षों तक समाज की आवाज़ बनने वाला एक बुजुर्ग पत्रकार आज खुद व्यवस्था के सवालों के बीच खड़ा दिखाई दे रहा है। जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी कलम के जरिए गरीबों, पीड़ितों और आम जनता की समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुँचाया, आज उसी को अपराधी की तरह पेश किए जाने की कोशिश ने पूरे पत्रकार जगत को भीतर तक झकझोर दिया है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि उस हर पत्रकार की पीड़ा है जो सच लिखने का साहस करता है। सवाल यह उठता है कि क्या अब सच बोलना और सच दिखाना भी गुनाह बन चुका है? जिस उम्र में इंसान सम्मान और शांति की उम्मीद करता है, उस उम्र में एक बुजुर्ग पत्रकार को मानसिक प्रताड़ना, अपमान और कार्रवाई का सामना करना पड़े — यह दृश्य केवल पत्रकार समाज ही नहीं, बल्कि हर संवेदनशील नागरिक को विचलित कर रहा है। आखिर वह कौन-सी गुंडागर्दी है, जो एक कमजोर, बुजुर्ग पत्रकार की आंखों में दिखाई दे रही है? क्या व्यवस्था अब इतनी असहज हो चुकी है कि सवाल पूछने वाली कलम भी उसे दुश्मन नजर आने लगी है? विडंबना देखिए… एक तरफ वे लोग जिन पर समाज में भय और हिंसा फैलाने के आरोप लगते रहे हैं, उनके लिए सुरक्षा के बड़े-बड़े इंतजाम किए जाते हैं। करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। लेकिन दूसरी तरफ, जनता की आवाज़ उठाने वाला पत्रकार खुद असुरक्षित महसूस कर रहा है। पत्रकार कभी समाज का दुश्मन नहीं होता। पत्रकार वह आईना होता है जो सत्ता को उसकी सच्चाई दिखाता है। लेकिन जब सत्ता और व्यवस्था उसी आईने को तोड़ने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र खतरे में है। आज गरियाबंद की यह घटना पूरे प्रदेश के पत्रकारों के मन में एक डर पैदा कर रही है। डर इस बात का कि कहीं कल सच लिखने की कीमत उन्हें भी न चुकानी पड़े। यदि एक बुजुर्ग पत्रकार सुरक्षित नहीं है, तो फिर आम नागरिक किस भरोसे न्याय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की उम्मीद करेगा? प्रदेश के मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai, गृहमंत्री और प्रशासनिक अधिकारियों से पत्रकार समाज की यही मांग है कि इस मामले को केवल कानूनी कार्रवाई के नजरिए से नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों की दृष्टि से देखा जाए। क्योंकि अगर कलम डर गई… तो जनता की आवाज़ भी खामोश हो जाएगी। आज जरूरत है पत्रकारों को संरक्षण देने की, उन्हें सम्मान देने की, ताकि वे बिना भय के सच लिख सकें। लोकतंत्र की असली ताकत बंदूक नहीं, बल्कि स्वतंत्र कलम होती है। “अगर सच लिखना अपराध बन गया, तो आने वाला समय लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक दौर साबित होगा।”1