बड़ोद नगर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन कथा पंडाल में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। कथावाचक संत अभिराम दास महाराज ने इस अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया, जिसे सुनकर भक्त भावविभोर हो उठे। महाराजश्री ने इस विवाह को प्रेम, समर्पण और धर्म की विजय का प्रतीक बताया, जिसके बाद पूरा पंडाल भक्तिरस में डूब गया और श्रद्धालुओं ने भगवान के जयकारों और नृत्य के साथ उत्सव का भरपूर आनंद लिया। कथा के दौरान, महाराजश्री ने माता शकुंतला बाई, संत भक्त मीरा बाई और गोमाता के महत्व पर भी प्रकाश डाला, यह कहते हुए कि गोसेवा भारतीय संस्कृति की पहचान है और इससे जीवन में सुख, समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। उन्होंने सत्संग की कमी के कारण परिवारों में बढ़ती दूरियों का भी जिक्र किया और बातचीत तथा सबको साथ लेकर चलने वाले मुखिया के महत्व पर जोर दिया। इसके अतिरिक्त, पुरुषोत्तम मास में किए गए जप, तप, दान और भक्ति के विशेष फल की बात कही। संत अभिराम दास महाराज ने श्रद्धालुओं की भक्ति और श्रद्धा की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने बड़ोद को वृंदावन जैसा आध्यात्मिक वातावरण प्रदान कर दिया है। कथा का समापन राष्ट्र भक्ति के गीत के साथ हुआ, जिसने उपस्थित भक्तों में जोश भर दिया। बाहर से आए भक्तों ने महाराजश्री का स्वागत-सत्कार किया। कथा के अंतिम दिन, यानी 13 जून को, एक भव्य भंडारे का आयोजन किया जाएगा।
बड़ोद नगर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन कथा पंडाल में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। कथावाचक संत अभिराम दास महाराज ने इस अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया, जिसे सुनकर भक्त भावविभोर हो उठे। महाराजश्री ने इस विवाह को प्रेम, समर्पण और धर्म की विजय का प्रतीक बताया, जिसके
बाद पूरा पंडाल भक्तिरस में डूब गया और श्रद्धालुओं ने भगवान के जयकारों और नृत्य के साथ उत्सव का भरपूर आनंद लिया। कथा के दौरान, महाराजश्री ने माता शकुंतला बाई, संत भक्त मीरा बाई और गोमाता के महत्व पर भी प्रकाश डाला, यह कहते हुए कि गोसेवा भारतीय संस्कृति की पहचान है और इससे जीवन में सुख, समृद्धि तथा आध्यात्मिक
उन्नति प्राप्त होती है। उन्होंने सत्संग की कमी के कारण परिवारों में बढ़ती दूरियों का भी जिक्र किया और बातचीत तथा सबको साथ लेकर चलने वाले मुखिया के महत्व पर जोर दिया। इसके अतिरिक्त, पुरुषोत्तम मास में किए गए जप, तप, दान और भक्ति के विशेष फल की बात कही। संत अभिराम दास महाराज ने श्रद्धालुओं की भक्ति और श्रद्धा
की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने बड़ोद को वृंदावन जैसा आध्यात्मिक वातावरण प्रदान कर दिया है। कथा का समापन राष्ट्र भक्ति के गीत के साथ हुआ, जिसने उपस्थित भक्तों में जोश भर दिया। बाहर से आए भक्तों ने महाराजश्री का स्वागत-सत्कार किया। कथा के अंतिम दिन, यानी 13 जून को, एक भव्य भंडारे का आयोजन किया जाएगा।
- बड़ोद नगर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन कथा पंडाल में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। कथावाचक संत अभिराम दास महाराज ने इस अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया, जिसे सुनकर भक्त भावविभोर हो उठे। महाराजश्री ने इस विवाह को प्रेम, समर्पण और धर्म की विजय का प्रतीक बताया, जिसके बाद पूरा पंडाल भक्तिरस में डूब गया और श्रद्धालुओं ने भगवान के जयकारों और नृत्य के साथ उत्सव का भरपूर आनंद लिया। कथा के दौरान, महाराजश्री ने माता शकुंतला बाई, संत भक्त मीरा बाई और गोमाता के महत्व पर भी प्रकाश डाला, यह कहते हुए कि गोसेवा भारतीय संस्कृति की पहचान है और इससे जीवन में सुख, समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। उन्होंने सत्संग की कमी के कारण परिवारों में बढ़ती दूरियों का भी जिक्र किया और बातचीत तथा सबको साथ लेकर चलने वाले मुखिया के महत्व पर जोर दिया। इसके अतिरिक्त, पुरुषोत्तम मास में किए गए जप, तप, दान और भक्ति के विशेष फल की बात कही। संत अभिराम दास महाराज ने श्रद्धालुओं की भक्ति और श्रद्धा की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने बड़ोद को वृंदावन जैसा आध्यात्मिक वातावरण प्रदान कर दिया है। कथा का समापन राष्ट्र भक्ति के गीत के साथ हुआ, जिसने उपस्थित भक्तों में जोश भर दिया। बाहर से आए भक्तों ने महाराजश्री का स्वागत-सत्कार किया। कथा के अंतिम दिन, यानी 13 जून को, एक भव्य भंडारे का आयोजन किया जाएगा।4
- Post by Sarvan Savita4
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