Shuru
Apke Nagar Ki App…
जांजगीर की अमिता श्रीवास ने विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह कर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने 8848 मीटर ऊंची इस चोटी पर सफलतापूर्वक तिरंगा फहराया, जिससे देश का गौरव बढ़ा। हालांकि, एवरेस्ट फतह करने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई, जिसके कारण उन्हें काठमांडू के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस संबंध में मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया का भी उल्लेख किया गया है।
Bhupendra lahare
जांजगीर की अमिता श्रीवास ने विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह कर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने 8848 मीटर ऊंची इस चोटी पर सफलतापूर्वक तिरंगा फहराया, जिससे देश का गौरव बढ़ा। हालांकि, एवरेस्ट फतह करने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई, जिसके कारण उन्हें काठमांडू के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस संबंध में मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया का भी उल्लेख किया गया है।
More news from छत्तीसगढ़ and nearby areas
- जांजगीर की अमिता श्रीवास ने विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह कर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने 8848 मीटर ऊंची इस चोटी पर सफलतापूर्वक तिरंगा फहराया, जिससे देश का गौरव बढ़ा। हालांकि, एवरेस्ट फतह करने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई, जिसके कारण उन्हें काठमांडू के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस संबंध में मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया का भी उल्लेख किया गया है।1
- कोरबा जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर लेमरू में पहाड़ी कोरवा समुदाय के लोग पहाड़ पर बसे हुए हैं।1
- छत्तीसगढ़ कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर टीएस सिंहदेव और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के बीच चल रही सियासी खींचतान और ‘युवा बनाम बाबा’ बहस के बीच, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे टीएस सिंहदेव के किसी भी बयान पर प्रतिक्रिया नहीं देते हैं। रायपुर में मीडिया से चर्चा के दौरान भूपेश बघेल ने बताया कि दीपक बैज पिछले साढ़े तीन वर्षों से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति का निर्णय केवल पार्टी हाईकमान द्वारा ही लिया जाता है। बघेल ने साफ शब्दों में कहा, "किसे नेता प्रतिपक्ष बनाना है और किसे प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी देनी है, यह पार्टी हाईकमान तय करता है। मैं इसमें अपनी बुद्धि नहीं लगाता।" उनके इस बयान को कांग्रेस के भीतर चल रही ‘युवा बनाम बाबा’ बहस और प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर उठ रहे सवालों के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में इसे संगठनात्मक मुद्दों पर हाईकमान के फैसले को सर्वोपरि मानने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।1
- सारंगढ़ जिले के सुदूर अंचल ग्राम पंचायत अमलीपाली के आश्रित ग्राम छिछपानी में भीषण जल संकट गहरा गया है, जहाँ गर्मी का पारा चढ़ने के साथ ही पानी की भारी किल्लत के कारण ग्रामीणों के बीच हाहाकार मचा हुआ है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, पिछले तीन महीनों से गाँव में पेयजल की स्थिति बद से बदतर हो चुकी है और लोग दैनिक उपयोग तथा पीने के साफ पानी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी 'जल जीवन मिशन' योजना, जिसका उद्देश्य हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना है और जो छिछपानी गाँव के लिए कारगर भी साबित हुई थी, वह अब विभाग की अनियमितताओं के कारण पूरी तरह विफल नजर आ रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग तीन माह पहले बोर पंप खराब होने के बाद उसे मरम्मत के लिए ले गया था, लेकिन अब तक उसकी मरम्मत नहीं हो पाई है। विभागीय लापरवाही और अधिकारियों की उदासीनता का आलम यह है कि महीनों से शिकायत के बाद भी जमीनी स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं, और ग्रामीणों को केवल आश्वासन ही मिल रहा है। इस स्थिति से ग्रामीण काफी आक्रोशित हैं, और उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते इस गंभीर समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो उनका आक्रोश उग्र आंदोलन का रूप ले सकता है। छिछपानी के त्रस्त ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और संबंधित विभाग के उच्च अधिकारियों से तत्काल राहत की मांग की है, ताकि योजना की कमियों को दूर कर इस भीषण गर्मी में लोगों को राहत मिल सके, क्योंकि उनका गाँव पिछले तीन महीने से प्यासा है और बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है।1
- देश में लगातार बढ़ती महंगाई अब हर मध्यम वर्गीय परिवार, किसान और मज़दूर की जिंदगी का सबसे कड़वा सच बन चुकी है। कुछ वर्षों पहले सिनेमाघरों में जिस लोकगीत 'सखी सईयां तो खूब ही कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है' पर तालियाँ बजती थीं, वह आज व्यवस्था पर एक करारा व्यंग्य बनकर रह गया है, क्योंकि बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। अब गांव की चौपालों से लेकर शहर की तंग गलियों तक, राजनीति से ज्यादा 'राशन के दाम' चर्चा का मुख्य विषय बन गए हैं। बाजारों में हरी सब्जियां और दालें खरीदना आम आदमी के लिए किसी लग्जरी से कम नहीं है। खाद्य तेलों, मसालों और रोजमर्रा के राशन की कीमतों में आए उछाल ने रसोई का पूरा गणित बिगाड़ दिया है, जिससे जिस थाली में कभी चार चीजें सजा करती थीं, वह अब केवल पेट भरने का साधन मात्र रह गई है। गृहिणियाँ महीने के अंत तक खर्च चलाने के लिए अपनी छोटी-मोटी जरूरतों में भी कटौती करने को मजबूर हैं। आज का यथार्थ इससे भी ज्यादा भयावह है क्योंकि एक तरफ जहाँ रोजगार और आमदनी के साधन सीमित हुए हैं, वहीं वेतन वृद्धि या तो रुकी हुई है या महंगाई दर के मुकाबले बेहद मामूली है। शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन के खर्च आसमान छू रहे हैं, जिसके कारण महीने की पहली तारीख को मिलने वाली कमाई हफ्ते भर के भीतर ही बिलों और उधारों को चुकाने में खत्म हो जाती है, और बचत का कॉलम लोगों की डायरी से लगभग मिट चुका है। शहरों में लोग किसी तरह अतिरिक्त काम करके गुज़ारा कर रहे हैं, लेकिन ग्रामीण अंचलों और कस्बों में स्थिति ज्यादा गंभीर है, जहाँ किसानी की लागत (खाद, बीज, डीजल) महंगी हो गई है और उपज का सही मोल आज भी एक बड़ा संघर्ष है। दिहाड़ी मज़दूरों के लिए तो दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी किसी जंग से कम नहीं है। यह केवल एक आर्थिक आँकड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर एक गंभीर सवाल है जहाँ विकास के दावों के बीच आम नागरिक अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है। जनता आज केवल राहत की उम्मीद में है कि कोई ऐसी व्यवस्था बने जो इस 'महंगाई डायन' के प्रकोप से उन्हें आज़ाद कर सके, क्योंकि जब तक नीतियाँ 'जमीनी हकीकत' और 'आम आदमी की क्रय शक्ति' को ध्यान में रखकर नहीं बनेंगी, तब तक 'महंगाई डायन' इसी तरह लोगों की मेहनत की कमाई को निगलती रहेगी।1
- कोरबा पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए 104 चालान काटे हैं। इस अभियान के दौरान पुलिस ने 19 शराबी चालकों को पकड़ा, जिनसे कुल ₹53,400 का जुर्माना वसूला गया।2
- सारंगढ़ जिले के खर्री छोटे गाँव में 'धरती आबा अभियान' के तहत पूरा प्रशासनिक अमला एक साथ एकत्र हुआ। इस पहल के माध्यम से, ग्रामीणों को एक ही छत के नीचे विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे तौर पर प्रदान किया गया, जिससे उन्हें काफी सुविधा मिली।1
- केराकछार में आयोजित समाधान शिविर के दौरान रोजगार सहायक के खिलाफ कई शिकायतें सामने आईं। ग्रामीणों द्वारा दर्ज कराई गई इन शिकायतों पर जब रोजगार सहायक से जवाब मांगा गया, तो वे सवालों से बचते नजर आए और कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी।1