जिले की पहचान ‘गौरा पत्थर’ की मूर्ति कला दम तोड़ती नजर आई, कारीगर पलायन को मजबूर #महोबा बुंदेलखंड की शान और महोबा की पहचान मानी जाने वाली ‘गौरा पत्थर’ की मूर्ति कला अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। चंदेलकालीन परंपरा को संजोने वाले शिल्पकारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। पीढ़ियों से चली आ रही यह कला धीरे-धीरे दम तोड़ती नजर आ रही है। महोबा के गौरहारी पहाड़ों से निकलने वाला ‘गौरा पत्थर’ बेहद मुलायम, सफेद-गुलाबी आभा लिए होता था। इस पर की गई बारीक नक्काशी सदियों तक खराब नहीं होती। चंदेलकालीन मंदिरों से लेकर आधुनिक घरों तक में गौरा पत्थर से बनी गणेश-लक्ष्मी, बुद्ध, और बुंदेली लोक-देवताओं की मूर्तियों की मांग रहती थी। खास बात ये कि बिना जोड़ के एक ही पत्थर से पूरी मूर्ति तराशी जाती थी। कारीगरों का दर्द:- जिले के थाना चरखारी अंतर्गत गौरहारी में 40 से ज्यादा परिवार इस काम से जुड़े थे, अब सिर्फ 7-8 परिवार बचे हैं। 45 वर्षीय शिल्पकार भोला बताते हैं – “पहले एक फुट की मूर्ति 15 दिन में बनाकर 3000-4000 रुपये मिल जाते थे। अब POP और फाइबर की सस्ती मूर्तियों ने बाजार मार लिया। गौरा पत्थर महंगा पड़ता है, ग्राहक मोलभाव करके 800-1000 में मांगते हैं। बिजली, औजार, पत्थर का खर्च निकालकर मजदूरी भी नहीं बचती।” नई पीढ़ी इस काम से विमुख हो रही है। कारीगरों के बच्चे अब दिल्ली, सूरत में मजदूरी करने जा रहे हैं। 22 साल के दीपक कहते हैं – “महीने में 4-5 हजार कमाने से अच्छा है फैक्ट्री में 12 हजार मिल जाएं। हुनर से पेट नहीं भरता।” कच्चे माल की कमी - वन विभाग की रोक और लीज न मिलने से गौरा पत्थर का खनन लगभग बंद है। कारीगरों को मध्यप्रदेश से 3 गुना दाम पर पत्थर खरीदना पड़ता है। बाजार न मिलना- सरकारी प्रदर्शनी, मेला, ODOP योजना में गौरा पत्थर को वो जगह नहीं मिली जो बनारस की लकड़ी या सहारनपुर के वुडवर्क को मिली। प्रशिक्षण का अभाव- शिल्प कला सिखाने के लिए कोई संस्थान नहीं। पुराने उस्तादों के साथ ही हुनर खत्म हो रहा है। आधुनिकता की मार- लोग रेडीमेड, हल्की और सस्ती POP की मूर्तियां पसंद करते हैं। गौरा पत्थर भारी और महंगा लगता है। जिला उद्योग केंद्र के उपायुक्त ने बताया ODOP में गौरा पत्थर शामिल है। हम शिल्पकारों को टूलकिट और 15 हजार तक की सहायता दे रहे हैं। जल्द ही लखनऊ और दिल्ली के क्राफ्ट मेलों में स्टॉल दिलवाएंगे। स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर गौरा पत्थर को GI टैग मिल जाए, ई-कॉमर्स से जोड़ा जाए और पर्यटन स्थलों पर बिक्री केंद्र बनें तो कला बच सकती है। ये सिर्फ मूर्ति नहीं, बुंदेलखंड की 1000 साल पुरानी विरासत है। फिलहाल हालात ये हैं कि जिन हाथों ने पत्थर को भगवान का रूप दिया, वही हाथ आज खाली हैं। अगर समय रहते ठोस कदम न उठे तो महोबा की ये अनूठी पहचान सिर्फ किताबों में रह जाएगी। Nitendra Jha
जिले की पहचान ‘गौरा पत्थर’ की मूर्ति कला दम तोड़ती नजर आई, कारीगर पलायन को मजबूर #महोबा बुंदेलखंड की शान और महोबा की पहचान मानी जाने वाली ‘गौरा पत्थर’ की मूर्ति कला अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। चंदेलकालीन परंपरा को संजोने वाले शिल्पकारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। पीढ़ियों से चली आ रही यह कला धीरे-धीरे दम तोड़ती नजर आ रही है। महोबा के गौरहारी पहाड़ों से निकलने वाला ‘गौरा पत्थर’ बेहद मुलायम, सफेद-गुलाबी आभा लिए होता था। इस पर की गई बारीक नक्काशी सदियों तक खराब नहीं होती। चंदेलकालीन मंदिरों से लेकर आधुनिक घरों तक में गौरा पत्थर से बनी गणेश-लक्ष्मी, बुद्ध, और बुंदेली लोक-देवताओं की मूर्तियों की मांग रहती थी। खास
बात ये कि बिना जोड़ के एक ही पत्थर से पूरी मूर्ति तराशी जाती थी। कारीगरों का दर्द:- जिले के थाना चरखारी अंतर्गत गौरहारी में 40 से ज्यादा परिवार इस काम से जुड़े थे, अब सिर्फ 7-8 परिवार बचे हैं। 45 वर्षीय शिल्पकार भोला बताते हैं – “पहले एक फुट की मूर्ति 15 दिन में बनाकर 3000-4000 रुपये मिल जाते थे। अब POP और फाइबर की सस्ती मूर्तियों ने बाजार मार लिया। गौरा पत्थर महंगा पड़ता है, ग्राहक मोलभाव करके 800-1000 में मांगते हैं। बिजली, औजार, पत्थर का खर्च निकालकर मजदूरी भी नहीं बचती।” नई पीढ़ी इस काम से विमुख हो रही है। कारीगरों के बच्चे अब दिल्ली, सूरत में मजदूरी करने जा रहे हैं। 22 साल के दीपक कहते हैं –
“महीने में 4-5 हजार कमाने से अच्छा है फैक्ट्री में 12 हजार मिल जाएं। हुनर से पेट नहीं भरता।” कच्चे माल की कमी - वन विभाग की रोक और लीज न मिलने से गौरा पत्थर का खनन लगभग बंद है। कारीगरों को मध्यप्रदेश से 3 गुना दाम पर पत्थर खरीदना पड़ता है। बाजार न मिलना- सरकारी प्रदर्शनी, मेला, ODOP योजना में गौरा पत्थर को वो जगह नहीं मिली जो बनारस की लकड़ी या सहारनपुर के वुडवर्क को मिली। प्रशिक्षण का अभाव- शिल्प कला सिखाने के लिए कोई संस्थान नहीं। पुराने उस्तादों के साथ ही हुनर खत्म हो रहा है। आधुनिकता की मार- लोग रेडीमेड, हल्की और सस्ती POP की मूर्तियां पसंद करते हैं। गौरा पत्थर भारी और महंगा लगता
है। जिला उद्योग केंद्र के उपायुक्त ने बताया ODOP में गौरा पत्थर शामिल है। हम शिल्पकारों को टूलकिट और 15 हजार तक की सहायता दे रहे हैं। जल्द ही लखनऊ और दिल्ली के क्राफ्ट मेलों में स्टॉल दिलवाएंगे। स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर गौरा पत्थर को GI टैग मिल जाए, ई-कॉमर्स से जोड़ा जाए और पर्यटन स्थलों पर बिक्री केंद्र बनें तो कला बच सकती है। ये सिर्फ मूर्ति नहीं, बुंदेलखंड की 1000 साल पुरानी विरासत है। फिलहाल हालात ये हैं कि जिन हाथों ने पत्थर को भगवान का रूप दिया, वही हाथ आज खाली हैं। अगर समय रहते ठोस कदम न उठे तो महोबा की ये अनूठी पहचान सिर्फ किताबों में रह जाएगी। Nitendra Jha
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- Post by राजीव कुमार1
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- राठ में एक दहेज से भरी पिकअप में आग लग गई, जिससे करीब 3 लाख रुपये का सामान जलकर खाक हो गया। अलकछवा-खजली की रहने वाली वर्षा ठाकुर की शादी शारदा पैलेस में संपन्न हुई थी, और दहेज का सामान पिकअप में भरकर ले जाया जा रहा था, तभी अचानक आग भड़क उठी। आग लगने से अलमारी, सोफा, टीवी, फ्रिज, कूलर, आटा-दाल समेत सारा सामान जलकर राख हो गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पास में जल रही चिंगारी से आग पिकअप तक पहुंची, जिससे यह बड़ा हादसा हो गया। गनीमत रही कि इस हादसे में कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन परिवार को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। जानकारी के मुताबिक 👇👇👇👇 गाड़ी मालिक सुनील कुमार S/O श्याम बाबू हरसुंडी रिर्पोट निर्दोष राजपूत1
- राठ। थाना राठ क्षेत्र अन्तर्गत ट्रैक्टर व मोटरसाइकिल की टक्कर में मोटरसाइकिल सवार 58 वर्षीय हरिश्चंद्र मिश्रा, मान बहादुर मिश्रा निवासी ग्राम खेड़ा शिलाजीत थाना जरिया गंभीर रूप से घायल हो गए। जिन्हें सीएचसी राठ ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने दोनों को मृत घोषित किया। दोनों शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम हेतु मोर्चरी हाउस में रखवाया गया है। सीओ राजीव प्रताप सिंह ने बताया कि ट्रैक्टर व चालक को हिरासत में लेकर अग्रिम वैधानिक कार्यवाही की जा रही है।1
- मौदहा (हमीरपुर), 20 अप्रैल 2026। क्षेत्र में लगाए जा रहे स्मार्ट बिजली मीटरों को लेकर बढ़ते विरोध के बीच समाजवादी पार्टी से जुड़े पदाधिकारियों एवं स्थानीय लोगों ने उपजिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर समस्याओं के समाधान की मांग उठाई। यह ज्ञापन सांसद प्रतिनिधि शादाब हुसैन (बिट्टू) के लेटर पैड पर दिया गया। ज्ञापन में बताया गया कि स्मार्ट मीटर लगाए जाने के बाद उपभोक्ताओं के बिजली बिलों में अनियमितताएं सामने आ रही हैं। आम नागरिकों का आरोप है कि मीटरों की रीडिंग में गड़बड़ी, अधिक बिलिंग और तकनीकी खामियों के कारण उन्हें आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ज्ञापन के माध्यम से प्रशासन से मांग की गई कि क्षेत्र में लगे सभी स्मार्ट मीटरों की निष्पक्ष और तकनीकी जांच कराई जाए, गलत बिजली बिलों को संशोधित किया जाए तथा जांच पूरी होने तक स्मार्ट मीटर के आधार पर की जा रही बिलिंग पर रोक लगाई जाए। साथ ही उपभोक्ताओं की समस्याओं के समाधान के लिए विशेष शिविर आयोजित करने की भी मांग की गई। इस दौरान अभिलाष श्रीवास,आशीष लखेरा,घनश्याम साहू, अरशद मामा, डॉ. मुबीन खान, तबरेज खान, सरफरोश, सगीर मलिक सहित कई लोग मौजूद रहे और सभी ने एकजुट होकर आम जनता की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। ज्ञापन में यह भी चेतावनी दी गई कि यदि जल्द ही समस्या का समाधान नहीं किया गया तो आगे व्यापक आंदोलन किया जाएगा।3
- Post by इंडिया न्यूज यूपी एक्सप्रेस1