एक अधिकारी की सनक, एक हस्ताक्षर, और एक परिवार की आजीविका मिट्टी में मिल जाती है। उस पानीपुरी वाले ने शायद वर्षों में अपने हाथों की मेहनत से कुछ पैसे जोड़े होंगे। उसी रेहड़ी से उसने अपने बच्चों को पढ़ाया होगा, बूढ़े माता-पिता की दवाइयाँ खरीदी होंगी, और अपने घर का चूल्हा जलाया होगा। उसकी रेहड़ी सिर्फ लकड़ी और लोहे का ढांचा नहीं थी—वह उसकी जिंदगी थी। लेकिन सत्ता की नजर में वह सिर्फ “अवैध अतिक्रमण” था। न कोई चेतावनी, न कोई पुनर्वास, न कोई वैकल्पिक व्यवस्था—सीधा बुल्डोज़र। यह विकास नहीं, यह संवेदनहीनता है। सरकारें अक्सर गरीबों के कल्याण की बात करती हैं, रोजगार देने के वादे करती हैं। लेकिन जब गरीब खुद अपने हाथों से रोजगार पैदा करता है, तो उसे कुचल दिया जाता है। क्या यही सुशासन है? क्या यही न्याय है? एक सभ्य समाज की पहचान यह होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। अगर विकास के नाम पर गरीबों की रोज़ी छिनी जाए, तो वह विकास नहीं, बल्कि विनाश है। आज पानीपुरी वाले की रेहड़ी गिरी है, कल किसी सब्ज़ीवाले की ठेली गिरेगी, परसों किसी मोची की दुकान। और हर बार सत्ता कहेगी—“कानून अपना काम कर रहा है।” लेकिन सच यह है कि कानून तब तक अधूरा है, जब तक उसमें करुणा और इंसानियत न हो। सवाल सिर्फ एक पानीपुरी वाले का नहीं है। सवाल यह है—आखिर कब तक गरीबों का हक, उनकी मेहनत और उनका आत्मसम्मान बुल्डोज़र के नीचे कुचला जाता रहेगा?
एक अधिकारी की सनक, एक हस्ताक्षर, और एक परिवार की आजीविका मिट्टी में मिल जाती है। उस पानीपुरी वाले ने शायद वर्षों में अपने हाथों की मेहनत से कुछ पैसे जोड़े होंगे। उसी रेहड़ी से उसने अपने बच्चों को पढ़ाया होगा, बूढ़े माता-पिता की दवाइयाँ खरीदी होंगी, और अपने घर का चूल्हा जलाया होगा। उसकी रेहड़ी सिर्फ लकड़ी और लोहे का ढांचा नहीं थी—वह उसकी जिंदगी थी। लेकिन सत्ता की नजर में वह सिर्फ “अवैध अतिक्रमण” था। न कोई चेतावनी, न कोई पुनर्वास, न कोई वैकल्पिक व्यवस्था—सीधा बुल्डोज़र। यह विकास नहीं, यह संवेदनहीनता है। सरकारें अक्सर गरीबों के कल्याण की बात करती हैं, रोजगार देने के वादे करती हैं। लेकिन जब गरीब खुद अपने हाथों से रोजगार पैदा करता है, तो उसे कुचल दिया जाता है। क्या यही सुशासन है? क्या यही न्याय है? एक सभ्य समाज की पहचान यह होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। अगर विकास के नाम पर गरीबों की रोज़ी छिनी जाए, तो वह विकास नहीं, बल्कि विनाश है। आज पानीपुरी वाले की रेहड़ी गिरी है, कल किसी सब्ज़ीवाले की ठेली गिरेगी, परसों किसी मोची की दुकान। और हर बार सत्ता कहेगी—“कानून अपना काम कर रहा है।” लेकिन सच यह है कि कानून तब तक अधूरा है, जब तक उसमें करुणा और इंसानियत न हो। सवाल सिर्फ एक पानीपुरी वाले का नहीं है। सवाल यह है—आखिर कब तक गरीबों का हक, उनकी मेहनत और उनका आत्मसम्मान बुल्डोज़र के नीचे कुचला जाता रहेगा?
- Post by SNN न्यूज़4
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- Post by Ankit Sharma4
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