सिसई / सिमडेगा : "मिट्टी का देशी फ्रीज ठंडा" ; लेकिन जलडेगा के कुम्हारों की हालत गर्म -- बाज़ार में पहचान की जंग जारी भीषण गर्मी में जब लोग राहत के लिए महंगे फ्रीज और कूलर की ओर भाग रहे हैं। वहीं गांव-गांव के कुम्हार अपने पारंपरिक “देशी फ्रिज” यानी मिट्टी के घड़ों के साथ बाजार में ग्राहकों का इंतजार कर रहे हैं। कभी हर घर की जरूरत रही ये घड़े आज उपेक्षा के शिकार हो गए हैं। सुबह से शाम तक चाक पर घूमती मिट्टी, हाथों की मेहनत और धूप में तपकर तैयार होते ये बर्तन केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि पीढ़ियों की विरासत है। लेकिन विडंबना यह है कि जितनी मेहनत इन घड़ों को बनाने में लगती है, उतनी पहचान और कीमत इन्हें बाजार में नहीं मिल पाती। स्थानीय कुम्हार बताते हैं कि पहले गर्मी आते ही घड़ों की मांग इतनी बढ़ जाती थी कि उत्पादन पूरा करना मुश्किल हो जाता था। लेकिन अब प्लास्टिक और फ्रिज के बढ़ते चलन ने उनकी रोजी-रोटी पर सीधा असर डाला है। “हमारा घड़ा पानी को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखता है, बिजली की जरूरत नहीं पड़ती, फिर भी लोग इसे नजरअंदाज कर रहे हैं,” एक कुम्हार ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा। *मार्केटिंग की कमी बना सबसे बड़ा कारण* कुम्हारों का कहना है कि उनके उत्पादों की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं है, लेकिन प्रचार-प्रसार और आधुनिक मार्केटिंग के अभाव में वे बड़े बाजार तक नहीं पहुंच पा रहे। जहां एक ओर कंपनियां अपने उत्पादों का विज्ञापन कर ग्राहकों तक पहुंच बना रही हैं, वहीं कुम्हार आज भी पारंपरिक तरीके से ही बिक्री करने को मजबूर हैं। *पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद* मिट्टी के बर्तन न केवल स्वास्थ्य के लिए बेहतर माने जाते हैं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी होते हैं। प्लास्टिक और बिजली से चलने वाले उपकरणों की तुलना में ये पूरी तरह प्राकृतिक हैं। ऐसे में विशेषज्ञ भी लोगों से मिट्टी के बर्तनों के उपयोग को बढ़ावा देने की अपील कर रहे हैं। *जरूरत है सहयोग और जागरूकता की* यदि समय रहते कुम्हारों को उचित बाजार, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन नहीं मिला, तो यह परंपरागत कला धीरे-धीरे खत्म हो सकती है। सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि इन कारीगरों को समर्थन दें, ताकि मिट्टी की यह ठंडक और संस्कृति दोनों बची रहे। *सिमडेगा समाचार*
सिसई / सिमडेगा : "मिट्टी का देशी फ्रीज ठंडा" ; लेकिन जलडेगा के कुम्हारों की हालत गर्म -- बाज़ार में पहचान की जंग जारी भीषण गर्मी में जब लोग राहत के लिए महंगे फ्रीज और कूलर की ओर भाग रहे हैं। वहीं गांव-गांव के कुम्हार अपने पारंपरिक “देशी फ्रिज” यानी मिट्टी के घड़ों के साथ बाजार में ग्राहकों का इंतजार कर रहे हैं। कभी हर घर की जरूरत रही ये घड़े आज उपेक्षा के शिकार हो गए हैं। सुबह से शाम तक चाक पर घूमती मिट्टी, हाथों की मेहनत और धूप में तपकर तैयार होते ये बर्तन केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि पीढ़ियों की विरासत है। लेकिन विडंबना यह है कि जितनी मेहनत इन घड़ों को बनाने में लगती है, उतनी पहचान और कीमत इन्हें बाजार में नहीं मिल पाती। स्थानीय कुम्हार बताते हैं कि पहले गर्मी आते ही घड़ों की मांग इतनी बढ़ जाती थी कि उत्पादन पूरा करना मुश्किल हो जाता था। लेकिन अब प्लास्टिक और फ्रिज के बढ़ते चलन ने उनकी रोजी-रोटी पर सीधा असर डाला है। “हमारा घड़ा पानी को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखता है, बिजली की जरूरत नहीं पड़ती, फिर भी लोग इसे नजरअंदाज कर रहे हैं,” एक कुम्हार ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा। *मार्केटिंग की कमी बना सबसे बड़ा कारण* कुम्हारों का कहना है कि उनके उत्पादों की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं है, लेकिन प्रचार-प्रसार और आधुनिक मार्केटिंग के अभाव में वे बड़े बाजार तक नहीं पहुंच पा रहे। जहां एक ओर कंपनियां अपने उत्पादों का विज्ञापन कर ग्राहकों तक पहुंच बना रही हैं, वहीं कुम्हार आज भी पारंपरिक तरीके से ही बिक्री करने को मजबूर हैं। *पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद* मिट्टी के बर्तन न केवल स्वास्थ्य के लिए बेहतर माने जाते हैं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी होते हैं। प्लास्टिक और बिजली से चलने वाले उपकरणों की तुलना में ये पूरी तरह प्राकृतिक हैं। ऐसे में विशेषज्ञ भी लोगों से मिट्टी के बर्तनों के उपयोग को बढ़ावा देने की अपील कर रहे हैं। *जरूरत है सहयोग और जागरूकता की* यदि समय रहते कुम्हारों को उचित बाजार, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन नहीं मिला, तो यह परंपरागत कला धीरे-धीरे खत्म हो सकती है। सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि इन कारीगरों को समर्थन दें, ताकि मिट्टी की यह ठंडक और संस्कृति दोनों बची रहे। *सिमडेगा समाचार*
- बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर जयंती समारोह के मौके पर समारोह की शुरुआत दीप प्रज्वलित कर किया गया दीप प्रज्वलन रिम्स के निदेशक डॉ राजकुर सर के द्वारा किया गया। दीप प्रज्वलन के बाद गणमान्य लोगों को बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर की तस्वीर देकर , और पगड़ी पहना कर किया गया।, आयोजन बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर के 135 जयंती पर किया गया।1
- Laila Majnu1
- गुमला शहर से सटे लक्ष्मण नगर काली मंदिर के पास पिछले तीन दिनों से सांप का एक जोड़ा लोगों के बीच चर्चा और कौतूहल का विषय बना हुआ है। बताया जा रहा है कि दोपहर बाद खेतों में यह जोड़ा अक्सर दिखाई देता है, जिसे देखने के लिए आसपास के लोगों की भीड़ जुटने लगी है। स्थानीय लोगों के अनुसार एक सांप नाग है, जबकि दूसरा “धमना सांप” है। दोनों खेलते हुए दिखाई दे रहे हैं। लगातार तीन दिनों से इस जोड़े के एक ही इलाके में दिखने से लोगों में जिज्ञासा बढ़ गई है और प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग मौके पर पहुंचकर मोबाइल व कैमरे से तस्वीरें ले रहे हैं। कुछ लोगों के बीच यह भी चर्चा है कि सांपों के इस जोड़े के ऊपर कपड़ा रखने से मनोकामना पूरी होती है, हालांकि डर के कारण कोई भी उनके नजदीक जाने की हिम्मत नहीं कर रहा है।2
- पुआल ढेर तथा जंगल में आग लगने से पुआल जलकर राख,पालतू जानवर का चारा नष्ट जंगली जीव जंतुओं के बीच हुआ विकट समस्या1
- Post by AAM JANATA1
- मांडर मुख्य डाकघर के समीप शनिवार देर रात एक बड़ा हादसा हो गया। यहाँ ऊपर से गुजर रहा 11,000 वोल्ट का हाई वोल्टेज तार अचानक टूटकर गिर गया, जिससे भीषण आग लग गई2
- जिले के बसिया प्रखंड स्थित कोनबीर NHPC ग्राउंड में क्रिकेट का अभ्यास करने वाले बच्चे इन दिनों अपनी खेल प्रतिभा निखारने के बजाय नशेड़ियों के आतंक से जूझ रहे हैं। खेल का मैदान जो कभी बच्चों की मेहनत और ऊर्जा का केंद्र हुआ करता था, अब शाम ढलते ही शराबियों और नशेड़ियों का अड्डा बन चुका है। नशेड़ियों द्वारा मैदान में फोड़ी गई शराब और बीयर की बोतलों के कांच के टुकड़े बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। *₹20 हजार की मैट जलाई, ग्राउंड को बनाया कचरा घर* अकादमी के कोच राजू राम ने प्रशासन के समक्ष अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि नशेड़ियों की करतूतें अब बर्दाश्त से बाहर हो गई हैं। दो दिन पूर्व ही अराजक तत्वों ने एकेडमी की ₹20,000 मूल्य की मैट जलाकर राख कर दी। इसके अलावा, रोजाना ग्राउंड में बीयर और दारू की बोतलें फोड़ी जा रही हैं। स्थिति यह है कि पिछले दो दिनों से एकेडमी के नन्हे खिलाड़ी खुद ग्राउंड से कांच के टुकड़े चुनकर उसे साफ कर रहे हैं, ताकि खेलते समय उनके साथियों को चोट न लगे। *खिलाड़ी बच्चों में भय का माहौल, विशेषकर बालिकाओं की सुरक्षा पर सवाल* अकादमी में प्रशिक्षण ले रहे बच्चों, विशेषकर बालिकाओं का कहना है कि शाम के वक्त यहां अभ्यास करने में उन्हें डर लगता है। नशेड़ियों के जमावड़े के कारण खेल का माहौल दूषित हो गया है। बच्चों का कहना है कि वे पूरे उत्साह के साथ प्रैक्टिस करने आते हैं, लेकिन हर वक्त मन में यही डर रहता है कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाए। *प्रशासन से 'अभय' माहौल की मांग* कोच राजू राम और एकेडमी के सभी खिलाड़ियों ने प्रशासन से कड़ी कार्रवाई की गुहार लगाई है। उन्होंने मांग की है कि ग्राउंड में असामाजिक तत्वों के प्रवेश पर पूर्णतः रोक लगाई जाए और नियमित गश्त सुनिश्चित की जाए। कोच ने कहा, "हम बच्चों को एक भय-मुक्त वातावरण देना चाहते हैं, ताकि वे बिना किसी चिंता के अपना खेल खेल सकें और प्रखंड सहित जिले का का नाम रोशन कर सकें।" अब देखना यह होगा कि प्रशासन कब तक इन नशेड़ियों पर नकेल कसता है और कब खेल के मैदान को पुनः बच्चों के लिए सुरक्षित बनाता है।2
- ye Buddha jabardasti.......1