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भाजयुमो जिलाध्यक्ष बनने के बाद पहली बार कांसाबेल पहुंचे विजय आदित्य सिंह जूदेव का कार्यकर्ताओं ने जोरदार स्वागत किया। नगर में लंबी बाइक रैली निकाली गई। ढोल-ताशों, कर्मा नृत्य और “जय जूदेव” के नारों से पूरा कांसाबेल गूंज उठा। दुर्गा मंदिर में दर्शन के बाद भाजपा कार्यालय में उनका विधिवत स्वागत किया गया। सभा को संबोधित करते हुए श्री जूदेव ने कहा – “आप लोगों के लिए आधी रात भी जरूरत पड़े तो मैं उपस्थित रहूंगा।” कार्यक्रम में भाजपा, युवा मोर्चा, महिला मोर्चा सहित अनेक पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की गरिमामयी उपस्थिति रही। 👉 ऐसी ही राजनीतिक और स्थानीय खबरों के लिए जुड़े रहें Jashpur Times – सच सब तक #VijayAdityaSinghJudev #BJYM #Kansabel #Jashpur #JashpurTimes

2 hrs ago
user_Ibnul khan
Ibnul khan
Media house कांसबेल, जशपुर, छत्तीसगढ़•
2 hrs ago

भाजयुमो जिलाध्यक्ष बनने के बाद पहली बार कांसाबेल पहुंचे विजय आदित्य सिंह जूदेव का कार्यकर्ताओं ने जोरदार स्वागत किया। नगर में लंबी बाइक रैली निकाली गई। ढोल-ताशों, कर्मा नृत्य और “जय जूदेव” के नारों से पूरा कांसाबेल गूंज उठा। दुर्गा मंदिर में दर्शन के बाद भाजपा कार्यालय में उनका विधिवत स्वागत किया गया। सभा को संबोधित करते हुए श्री जूदेव ने कहा – “आप लोगों के लिए आधी रात भी जरूरत पड़े तो मैं उपस्थित रहूंगा।” कार्यक्रम में भाजपा, युवा मोर्चा, महिला मोर्चा सहित अनेक पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की गरिमामयी उपस्थिति रही। 👉 ऐसी ही राजनीतिक और स्थानीय खबरों के लिए जुड़े रहें Jashpur Times – सच सब तक #VijayAdityaSinghJudev #BJYM #Kansabel #Jashpur #JashpurTimes

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  • नगर में लंबी बाइक रैली निकाली गई। ढोल-ताशों, कर्मा नृत्य और “जय जूदेव” के नारों से पूरा कांसाबेल गूंज उठा। दुर्गा मंदिर में दर्शन के बाद भाजपा कार्यालय में उनका विधिवत स्वागत किया गया। सभा को संबोधित करते हुए श्री जूदेव ने कहा – “आप लोगों के लिए आधी रात भी जरूरत पड़े तो मैं उपस्थित रहूंगा।” कार्यक्रम में भाजपा, युवा मोर्चा, महिला मोर्चा सहित अनेक पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की गरिमामयी उपस्थिति रही। 👉 ऐसी ही राजनीतिक और स्थानीय खबरों के लिए जुड़े रहें Jashpur Times – सच सब तक #VijayAdityaSinghJudev #BJYM #Kansabel #Jashpur #JashpurTimes
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    नगर में लंबी बाइक रैली निकाली गई। ढोल-ताशों, कर्मा नृत्य और “जय जूदेव” के नारों से पूरा कांसाबेल गूंज उठा।
दुर्गा मंदिर में दर्शन के बाद भाजपा कार्यालय में उनका विधिवत स्वागत किया गया। सभा को संबोधित करते हुए श्री जूदेव ने कहा –
“आप लोगों के लिए आधी रात भी जरूरत पड़े तो मैं उपस्थित रहूंगा।”
कार्यक्रम में भाजपा, युवा मोर्चा, महिला मोर्चा सहित अनेक पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की गरिमामयी उपस्थिति रही।
👉 ऐसी ही राजनीतिक और स्थानीय खबरों के लिए जुड़े रहें Jashpur Times – सच सब तक
#VijayAdityaSinghJudev
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    user_Ibnul khan
    Ibnul khan
    Media house कांसबेल, जशपुर, छत्तीसगढ़•
    2 hrs ago
  • भारतमाला रोड़ पण्डरीपानी को बक्सा नहीं जा रहा है
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    भारतमाला रोड़ पण्डरीपानी को बक्सा नहीं जा रहा है
    user_Dj sund Devnarayan Pandripani
    Dj sund Devnarayan Pandripani
    Farmer Kunkuri, Jashpur•
    13 hrs ago
  • Post by हमर जशपुर
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    Post by हमर जशपुर
    user_हमर जशपुर
    हमर जशपुर
    जशपुर, जशपुर, छत्तीसगढ़•
    14 hrs ago
  • Post by SAMBHU RAVI
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    Post by SAMBHU RAVI
    user_SAMBHU RAVI
    SAMBHU RAVI
    पत्रकार Jashpur, Chhattisgarh•
    17 hrs ago
  • डीआईजी एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉ. लाल उमेद सिंह के निर्देश पर जिलेभर में सघन कार्रवाई 23 से अधिक प्रकरण दर्ज, तथा 100 लीटर से अधिक देसी, अंग्रेजी एवं कच्ची महुआ शराब जब्त।
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    डीआईजी एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉ. लाल उमेद सिंह के निर्देश पर जिलेभर में सघन कार्रवाई 23 से अधिक प्रकरण दर्ज, तथा 100 लीटर से अधिक देसी, अंग्रेजी एवं कच्ची महुआ शराब जब्त।
    user_क्राइम कण्ट्रोल न्यूज़ सी.सी.एफ
    क्राइम कण्ट्रोल न्यूज़ सी.सी.एफ
    Media company सन्ना, जशपुर, छत्तीसगढ़•
    25 min ago
  • सूचना का अधिकार बनाम प्रशासनिक मानसिकता: मेन्द्राकला मंडी प्रकरण से उठते सवाल लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का मूल तत्व है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 इसी उद्देश्य से अस्तित्व में आया था — ताकि नागरिक सरकार से प्रश्न पूछ सके और शासन जवाबदेह बने। परंतु जब स्वयं सार्वजनिक संस्थान सूचना देने से बचते दिखाई दें, तो यह केवल एक कार्यालय का मुद्दा नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था की सोच पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले, अंबिकापुर स्थित कृषि उपज मंडी समिति मेन्द्रा कला से जुड़ा हालिया प्रकरण इसी बहस को पुनः जीवित करता है। मुद्दा केवल 7230 रुपये का नहीं आरटीआई आवेदन के माध्यम से पिछले दो वर्षों के टेंडर, भुगतान, एमबी बुक, सब्सिडी एवं अन्य प्रशासनिक दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई। जवाब में कार्यालय ने 3615 पृष्ठों की प्रतिलिपि बताकर 7230 रुपये शुल्क जमा करने का निर्देश दिया। कानूनन प्रति पृष्ठ निर्धारित शुल्क लिया जा सकता है — यह व्यवस्था का हिस्सा है। परंतु प्रश्न यह है कि जब सूचना डिजिटल रूप में उपलब्ध कराई जा सकती है, तब केवल छायाप्रति के रूप में देने पर जोर क्यों? क्या यह तकनीकी सुविधा का अभाव है, या प्रक्रिया को जटिल बनाने की प्रवृत्ति? सूचना का अधिकार केवल कागजों का लेन-देन नहीं, बल्कि पारदर्शिता का माध्यम है। यदि सूचना देने की प्रक्रिया ही इतनी महंगी और बोझिल बना दी जाए कि आम नागरिक पीछे हट जाए, तो कानून का उद्देश्य कैसे पूरा होगा? धारा 4(1)(b) की आत्मा आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1)(b) सार्वजनिक प्राधिकरणों को कई जानकारियां स्वतः सार्वजनिक करने का निर्देश देती है। टेंडर, भुगतान, कार्यादेश और बैठकों के निर्णय — ये सभी ऐसी सूचनाएं हैं जिन्हें नियमित रूप से वेबसाइट या सूचना पट्ट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यदि दो वर्षों की जानकारी 3615 पृष्ठों में फैली है, तो यह भी विचारणीय है कि क्या इनका नियमित डिजिटलीकरण और सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ? यदि नहीं, तो क्यों? प्रशासनिक प्रशिक्षण और संवेदनशीलता मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें अधिकारी द्वारा आरटीआई की धाराओं की जानकारी न होने संबंधी कथन सुनाई देता है। यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और जवाबदेही की कमी का संकेत है। जन सूचना अधिकारी का दायित्व मात्र आवेदन स्वीकार करना नहीं, बल्कि अधिनियम की भावना को समझते हुए नागरिक को सहयोग देना है। “जैसा अधिकारी कहेगा वैसा होगा” जैसी मानसिकता पारदर्शी शासन के सिद्धांत से मेल नहीं खाती। बड़ा प्रश्न: क्या व्यवस्था पारदर्शिता से सहज है? यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध आरोप का विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रश्न का संकेत है — क्या हमारी संस्थाएं पारदर्शिता को सहजता से स्वीकार कर पा रही हैं? यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हुई हैं, तो सूचना उपलब्ध कराने में संकोच क्यों? यदि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी है, तो दस्तावेज साझा करने में हिचक क्यों? लोकतंत्र में विश्वास दस्तावेजों से बनता है, बयानों से नहीं। आगे क्या? ऐसे मामलों में आवश्यक है कि: विभागीय स्तर पर पारदर्शिता की समीक्षा हो डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली को अनिवार्य बनाया जाए जन सूचना अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण हो स्वप्रकाशन (Proactive Disclosure) को सख्ती से लागू किया जाए सूचना का अधिकार कोई एहसान नहीं, बल्कि नागरिक का विधिक अधिकार है। शासन की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह सवालों से कितना सहज है। मेन्द्राकला मंडी प्रकरण एक अवसर भी है — व्यवस्था आत्ममंथन करे और पारदर्शिता को कागजों से निकालकर व्यवहार में उतारे। #ChhattisgarhNews #RaipurNews #CGViral #BilaspurNews #Chhattisgarh @PMOIndia @ChhattisgarhCMO @mandiboardcg @narendramodi @DoPTGoI @CIC_India @DCsofIndia @SurgujaDist @AmbikapurPro @rti_online @prsIndia @NCPrincipals #RightToInformation #RTI #RTIAct2005 #Transparency #Accountability #OpenGovernment #DigitalIndia #Section4_1_b #PublicAccountability #AdministrativeReform #Governance #CitizenRights #Loktantra #Democracy #Chhattisgarh #Sarguja #Ambikapur #Mandi #PublicFunds #TenderProcess #CorruptionFreeIndia #SystemReform #JanAdhikar #InformationIsPower #RTIMovement #cg
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    सूचना का अधिकार बनाम प्रशासनिक मानसिकता: मेन्द्राकला मंडी प्रकरण से उठते सवाल
लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का मूल तत्व है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 इसी उद्देश्य से अस्तित्व में आया था — ताकि नागरिक सरकार से प्रश्न पूछ सके और शासन जवाबदेह बने। परंतु जब स्वयं सार्वजनिक संस्थान सूचना देने से बचते दिखाई दें, तो यह केवल एक कार्यालय का मुद्दा नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था की सोच पर प्रश्नचिह्न बन जाता है।
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले, अंबिकापुर स्थित
कृषि उपज मंडी समिति मेन्द्रा कला
से जुड़ा हालिया प्रकरण इसी बहस को पुनः जीवित करता है।
मुद्दा केवल 7230 रुपये का नहीं
आरटीआई आवेदन के माध्यम से पिछले दो वर्षों के टेंडर, भुगतान, एमबी बुक, सब्सिडी एवं अन्य प्रशासनिक दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई। जवाब में कार्यालय ने 3615 पृष्ठों की प्रतिलिपि बताकर 7230 रुपये शुल्क जमा करने का निर्देश दिया।
कानूनन प्रति पृष्ठ निर्धारित शुल्क लिया जा सकता है — यह व्यवस्था का हिस्सा है। परंतु प्रश्न यह है कि जब सूचना डिजिटल रूप में उपलब्ध कराई जा सकती है, तब केवल छायाप्रति के रूप में देने पर जोर क्यों? क्या यह तकनीकी सुविधा का अभाव है, या प्रक्रिया को जटिल बनाने की प्रवृत्ति?
सूचना का अधिकार केवल कागजों का लेन-देन नहीं, बल्कि पारदर्शिता का माध्यम है। यदि सूचना देने की प्रक्रिया ही इतनी महंगी और बोझिल बना दी जाए कि आम नागरिक पीछे हट जाए, तो कानून का उद्देश्य कैसे पूरा होगा?
धारा 4(1)(b) की आत्मा
आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1)(b) सार्वजनिक प्राधिकरणों को कई जानकारियां स्वतः सार्वजनिक करने का निर्देश देती है। टेंडर, भुगतान, कार्यादेश और बैठकों के निर्णय — ये सभी ऐसी सूचनाएं हैं जिन्हें नियमित रूप से वेबसाइट या सूचना पट्ट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
यदि दो वर्षों की जानकारी 3615 पृष्ठों में फैली है, तो यह भी विचारणीय है कि क्या इनका नियमित डिजिटलीकरण और सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ? यदि नहीं, तो क्यों?
प्रशासनिक प्रशिक्षण और संवेदनशीलता
मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें अधिकारी द्वारा आरटीआई की धाराओं की जानकारी न होने संबंधी कथन सुनाई देता है। यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और जवाबदेही की कमी का संकेत है।
जन सूचना अधिकारी का दायित्व मात्र आवेदन स्वीकार करना नहीं, बल्कि अधिनियम की भावना को समझते हुए नागरिक को सहयोग देना है। “जैसा अधिकारी कहेगा वैसा होगा” जैसी मानसिकता पारदर्शी शासन के सिद्धांत से मेल नहीं खाती।
बड़ा प्रश्न: क्या व्यवस्था पारदर्शिता से सहज है?
यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध आरोप का विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रश्न का संकेत है —
क्या हमारी संस्थाएं पारदर्शिता को सहजता से स्वीकार कर पा रही हैं?
यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हुई हैं, तो सूचना उपलब्ध कराने में संकोच क्यों?
यदि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी है, तो दस्तावेज साझा करने में हिचक क्यों?
लोकतंत्र में विश्वास दस्तावेजों से बनता है, बयानों से नहीं।
आगे क्या?
ऐसे मामलों में आवश्यक है कि:
विभागीय स्तर पर पारदर्शिता की समीक्षा हो
डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली को अनिवार्य बनाया जाए
जन सूचना अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण हो
स्वप्रकाशन (Proactive Disclosure) को सख्ती से लागू किया जाए
सूचना का अधिकार कोई एहसान नहीं, बल्कि नागरिक का विधिक अधिकार है। शासन की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह सवालों से कितना सहज है।
मेन्द्राकला मंडी प्रकरण एक अवसर भी है —
व्यवस्था आत्ममंथन करे और पारदर्शिता को कागजों से निकालकर व्यवहार में उतारे।
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    user_SUMIT KUMAR
    SUMIT KUMAR
    Newspaper publisher सरगुजा, सरगुजा, छत्तीसगढ़•
    4 hrs ago
  • केरजू समिति में 127 किसानों के फर्जी हस्ताक्षर कर 1.92 करोड़ का घोटाला: तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी, शाखा प्रबंधक और कैशियर सहित 8 पर FIR … अम्बिकापुर | आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित केरजू में फर्जी ऋण आहरण का एक बड़ा सनसनीखेज मामला उजागर हुआ है। जांच में 127 किसानों के नाम पर फर्जी हस्ताक्षर कर 1,92,82,006 रुपये (एक करोड़ बयानवे लाख बयासी हजार छह रुपये) का अवैध आहरण पाया गया है। इस वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होने के बाद कलेक्टर अजीत वसंत ने तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारियों, शाखा प्रबंधक, सहायक लेखापाल और कंप्यूटर ऑपरेटर सहित कुल 8 संबंधितों के विरुद्ध एफआईआर (FIR) दर्ज करने के कड़े निर्देश दिए हैं। 127 किसानों के हक पर डाका: फर्जी हस्ताक्षर से निकाला पैसा अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) सीतापुर की अध्यक्षता में गठित संयुक्त जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि सहकारी समिति के भीतर एक सुनियोजित तरीके से किसानों के नाम पर कर्ज निकाला गया। रिकॉर्ड के अनुसार, कुल 127 किसानों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए और उनके खाते से करोड़ों रुपये की राशि निकाल ली गई। जांच प्रतिवेदन के आधार पर प्रशासन ने निम्नलिखित कर्मचारियों और अधिकारियों को सीधे तौर पर दोषी पाया है: मदन सिंह (तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी) जोगी राम (तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी) सैनाथ केरकेट्टा (वरिष्ठ सहकारी निरीक्षक एवं प्राधिकृत अधिकारी) भूपेन्द्र सिंह परिहार (तत्कालीन शाखा प्रबंधक) शिवशंकर सोनी (सहायक लेखापाल) ललिता सिन्हा (कैशियर) सुमित कुमार (सामान्य सहायक) दीपक कुमार चक्रधारी (कम्प्यूटर ऑपरेटर)
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    केरजू समिति में 127 किसानों के फर्जी हस्ताक्षर कर 1.92 करोड़ का घोटाला: तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी, शाखा प्रबंधक और कैशियर सहित 8 पर FIR …
अम्बिकापुर | आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित केरजू में फर्जी ऋण आहरण का एक बड़ा सनसनीखेज मामला उजागर हुआ है। जांच में 127 किसानों के नाम पर फर्जी हस्ताक्षर कर 1,92,82,006 रुपये (एक करोड़ बयानवे लाख बयासी हजार छह रुपये) का अवैध आहरण पाया गया है। इस वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होने के बाद कलेक्टर अजीत वसंत ने तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारियों, शाखा प्रबंधक, सहायक लेखापाल और कंप्यूटर ऑपरेटर सहित कुल 8 संबंधितों के विरुद्ध एफआईआर (FIR) दर्ज करने के कड़े निर्देश दिए हैं।
127 किसानों के हक पर डाका: फर्जी हस्ताक्षर से निकाला पैसा
अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) सीतापुर की अध्यक्षता में गठित संयुक्त जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि सहकारी समिति के भीतर एक सुनियोजित तरीके से किसानों के नाम पर कर्ज निकाला गया। रिकॉर्ड के अनुसार, कुल 127 किसानों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए और उनके खाते से करोड़ों रुपये की राशि निकाल ली गई। जांच प्रतिवेदन के आधार पर प्रशासन ने निम्नलिखित कर्मचारियों और अधिकारियों को सीधे तौर पर दोषी पाया है:
मदन सिंह (तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी)
जोगी राम (तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी)
सैनाथ केरकेट्टा (वरिष्ठ सहकारी निरीक्षक एवं प्राधिकृत अधिकारी)
भूपेन्द्र सिंह परिहार (तत्कालीन शाखा प्रबंधक)
शिवशंकर सोनी (सहायक लेखापाल)
ललिता सिन्हा (कैशियर)
सुमित कुमार (सामान्य सहायक)
दीपक कुमार चक्रधारी (कम्प्यूटर ऑपरेटर)
    user_Jarif Khan
    Jarif Khan
    अंबिकापुर, सरगुजा, छत्तीसगढ़•
    1 hr ago
  • किसानों को मिला होली का तोहफ़ा किसानों के खाते में अंतर की राशि एकमुश्त आहरित- वरिष्ठ भाजपा नेता सुनील गुप्ता
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    किसानों को मिला होली का तोहफ़ा किसानों के खाते में अंतर की राशि एकमुश्त आहरित- वरिष्ठ भाजपा नेता सुनील गुप्ता
    user_Ibnul khan
    Ibnul khan
    Media house कांसबेल, जशपुर, छत्तीसगढ़•
    21 hrs ago
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