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देश की सीमा पर खड़े अग्निवीर को सिर्फ 4 साल की नौकरी, और कुर्सी पर बैठे नेता को हर जीत पर नई पेंशन। फैसला आप करें? चार साल का अग्निवीर, जीवनभर का पेंशनवीर नेता? सीमा पर जवान अस्थायी, सत्ता में नेता स्थायी। यही है आज की व्यवस्था। #गैरसैंण #उत्तराखंड #अग्निवीर_योजना_बंद #विधायकों_की_पेंशन_बंद #viralphotochallenge
पवन नेगी
देश की सीमा पर खड़े अग्निवीर को सिर्फ 4 साल की नौकरी, और कुर्सी पर बैठे नेता को हर जीत पर नई पेंशन। फैसला आप करें? चार साल का अग्निवीर, जीवनभर का पेंशनवीर नेता? सीमा पर जवान अस्थायी, सत्ता में नेता स्थायी। यही है आज की व्यवस्था। #गैरसैंण #उत्तराखंड #अग्निवीर_योजना_बंद #विधायकों_की_पेंशन_बंद #viralphotochallenge
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- हाथरस के मुरसान कस्बे में एक सड़क हादसे में 6 साल की बच्ची दामिनी की मौत हो गई। इस दुर्घटना में बच्ची के माता-पिता भी घायल हुए हैं। यह परिवार कौशांबी से अपने गांव लौट रहा था। जानकारी के अनुसार, कोतवाली मुरसान क्षेत्र के गांव हरिया की गढ़ी निवासी विपिन वैक्सीन सप्लाई का काम करते हैं। वह अपनी पत्नी पूजा और बच्चों के साथ अपनी ससुराल कौशांबी गए थे। 7 मार्च को परिवार हाथरस जंक्शन रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरा। वहां से वे ऑटो में बैठकर अपने गांव हरिया की गढ़ी लौट रहे थे। मुरसान कस्बे में एक अज्ञात वाहन ने उनके ऑटो को टक्कर मार दी। इलाज के दौरान दामिनी की मौत इस हादसे में विपिन की 6 साल की बेटी दामिनी, विपिन और उनकी पत्नी पूजा घायल हो गए। दामिनी की हालत गंभीर थी, जिसे पहले हाथरस जिला अस्पताल ले जाया गया। बाद में उसे आगरा रेफर कर दिया गया। आगरा में दामिनी को पहले एक निजी अस्पताल और फिर मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। आज सुबह इलाज के दौरान दामिनी की मौत हो गई। उसके शव को पोस्टमार्टम के लिए हाथरस लाया गया है। दामिनी कक्षा एक की छात्रा थी।1
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- अल्मोड़ा। सोमेश्वर क्षेत्र के रनमन के पास कोसी नदी में नहाने के दौरान एक युवक गहरे पानी में डूब गया। स्थानीय लोगों ने युवक को नदी से बाहर निकालकर निजी वाहन से अस्पताल पहुंचाया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद क्षेत्र में शोक का माहौल है। मृतक की पहचान गोकुल नेगी (20) पुत्र हेम सिंह, निवासी ग्राम उटिया थाना धौलछीना के रूप में हुई है। बताया गया है कि वह बीएसएनएल में फाइबर लाइन बिछाने का काम करता था। मंगलवार को वह अपने तीन अन्य साथियों के साथ रनमन के पास कोसी नदी में नहाने गया था। बताया जा रहा है कि गोकुल नदी में नहाते समय गहरे पानी की ओर चला गया, जबकि उसके अन्य तीन साथी तैरना नहीं जानते थे और नदी किनारे ही नहा रहे थे। इसी दौरान गोकुल अचानक गहरे पानी में डूबने लगा। साथियों ने शोर मचाकर आसपास के लोगों को घटना की जानकारी दी। सूचना मिलने पर ग्रामीण मौके पर पहुंचे और काफी प्रयासों के बाद युवक को नदी के गहरे पानी से बाहर निकाला। इसके बाद उसे निजी वाहन से नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस भी मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर आवश्यक कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि यदि साथियों को तैरना आता तो संभवतः युवक को बचाया जा सकता था, लेकिन जब तक ग्रामीण मौके पर पहुंचे तब तक काफी देर हो चुकी थी।1
- विडियो देखें-उत्तराखंड (विधानसभा) विधानसभा सत्र में उत्तराखंड नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने बयां की सच्चाई। जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादाएँ टूटती हैं, जब संसदीय परंपराएँ तार-तार होने लगती हैं, तब स्वाभाविक रूप से सब्र का बाँध भी टूट जाता है। आज जो स्थिति सदन में बनी है, उसका कारण भी यही है कि माननीय सदस्यों द्वारा नियमों के तहत दी गई सूचनाओं को स्वीकार नहीं किया जा रहा है। यह पंचम विधानसभा का दसवाँ सत्र है और यदि इस बार के सत्र को भी जोड़ लिया जाए तो पिछले चार वर्षों में यह सदन कुल मिलाकर केवल 36 दिन ही चलेगा। यह स्थिति अपने आप में चिंताजनक है। विधानसभा लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण मंच है। यही वह स्थान है जहाँ जनता के प्रतिनिधि अपने क्षेत्र की समस्याओं और जनता की पीड़ा को सरकार के सामने रखते हैं। लेकिन यदि सदन इतने सीमित दिनों तक ही चलेगा तो प्रदेश से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर चर्चा कैसे हो पाएगी? राज्य की जनता की विपक्ष से बहुत अपेक्षाएँ होती हैं। जनता चाहती है कि उनके मुद्दे इस सदन में मजबूती के साथ उठाए जाएँ। हम विपक्ष के सदस्य सीमित समय में भी पूरी जिम्मेदारी के साथ उन सभी विषयों को उठाने का प्रयास करते हैं जो हमारे संज्ञान में आते हैं और जो प्रदेश की जनता के हित से जुड़े होते हैं। लेकिन बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि राज्य की पंचम विधानसभा में संसदीय परंपराओं को बुरी तरह तोड़ा गया है और कार्य संचालन नियमावली की भी अपेक्षित परवाह नहीं की गई है। हमारी यह मांग थी कि यह सत्र कम से कम 21 दिन का होना चाहिए, ताकि महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा हो सके और सरकार जनता के प्रति अपनी जवाबदेही निभा सके। लेकिन सरकार न केवल इस मांग को स्वीकार नहीं कर रही है, बल्कि उल्टा ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सदन की कार्यवाही को भी नियमानुसार संचालित नहीं किया जा रहा है। विधानसभा की अपनी परंपराएँ और मर्यादाएँ होती हैं। इन परंपराओं के अंतर्गत नेता प्रतिपक्ष के कुछ परंपरागत विशेषाधिकार भी होते हैं। सदन की यह परंपरा रही है कि जब नेता प्रतिपक्ष अपनी बात रखते हैं तो उन्हें पूरा अवसर दिया जाता है। यहाँ तक कि विधानसभा अध्यक्ष भी सामान्यतः उन्हें बीच में नहीं टोकते, क्योंकि यह पद केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे विपक्ष की आवाज का प्रतिनिधित्व करता है। दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष भी सदन की मर्यादा और अपनी सीमाओं का पूरा ध्यान रखते हैं। लेकिन अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि माननीय विधानसभा अध्यक्ष जी के मुख से एक बार भी “माननीय नेता प्रतिपक्ष” शब्द नहीं निकला। यह स्थिति केवल शब्दों का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह सदन की परंपराओं और लोकतांत्रिक मर्यादाओं से जुड़ा हुआ विषय है। आज तक किसी भी विधानसभा अध्यक्ष ने अध्यक्ष के आसन पर बैठकर इस प्रकार का व्यवहार नहीं किया है। अध्यक्ष का पद अत्यंत गरिमामय और निष्पक्ष माना जाता है, और उसी भावना के साथ इस पद से अपेक्षा की जाती है कि वह पूरे सदन को समान रूप से सम्मान दे। हम सभी इस सदन की गरिमा और संसदीय शालीनता को बनाए रखने में विश्वास रखते हैं। लेकिन यदि संसदीय परंपराएँ लगातार टूटेंगी, यदि नियमों की अनदेखी होगी और यदि विपक्ष की आवाज को दबाने का प्रयास किया जाएगा, तो फिर हमें भी इन परंपराओं की रक्षा के लिए मजबूर होकर अपनी आवाज और अधिक मजबूती से उठानी पड़ेगी। क्योंकि जब संसदीय परंपराएँ टूटती हैं, तो उन्हें बचाने और उनकी रक्षा करने की जिम्मेदारी भी हम सभी जनप्रतिनिधियों की ही होती है।1
- जंगलों की अंधाधुंध कटाई, अनियंत्रित पर्यटन, सड़क व भवन निर्माण और वाहनों के बढ़ते दबाव से बिगड़ रही पहाड़ों की सुंदर तस्वीर पहाड़ों में प्राकृतिक आपदाओं से ज्यादा मानवीय गतिविधियों से उपज रही आपदाओं का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। पर्यावरण के दृष्टिगत विकास के मानक तय नहीं और जंगलों की अंधाधुंध कटाई, अनियंत्रित पर्यटन, सड़क व भवन निर्माण और वाहनों के बढ़ते दबाव ने पहाड़ों की सुंदर तस्वीर बिगड़ रही है। जिसका भयानक खामियाजा बादल फटने, ग्लेशियर पिघलने, बाढ़ और सूखे के रूप भुगतना पढ़ रहा है। पहाड़ों की तबाही के सिलसिला का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, बल्कि तभी से शुरू हुआ, जब विकास की गति में तेजी आई । पहाड़ों को काटना प्रकृति के साथ सबसे बड़ी भूल कही जा सकती है, जो पेड़ों को काटे बिना संभव नहीं। साथ ही भूस्खलन को बढ़ावा देती है और यह किसीसे छिपा नहीं की भूस्खलन की त्रासदियां हर वर्ष जानलेवा साबित होती है तो वृक्षों की कमी से कार्बन जैसी घातक गैसों में वृद्धि स्वाभाविक है, जो वायु प्रदूषण को न्यौता देना है और प्रदूषण रोकने के प्रयास अभी तक नाकाफी साबित हुए हैं। फलस्वरूप पीएम 2.5 जैसी जहरीली गैसों में निरंतर वृद्धि हो रही है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे विकास के चलते अंधाधुंध होटल और रिजॉर्ट की संख्या के कोई मानक नहीं हैं, जबकि इतना तो तय होना चाहिए कि किसीभी क्षेत्र के क्षेत्रफल के हिसाब से विकास हो। साथ ही वाहनों की आवाजाही की संख्या भी क्षेत्र की क्षमता के अनुसार निर्धारित होनी चाहिए। मगर इस दिशा में कोई कदम अभी तक नहीं उठाए गए हैं। जिस कारण कई तरह की दुश्वारियों से दोचार होना पड़ता है। बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, हाईवे और सुरंग खोदा जाना प्रकृति के साथ अन्याय है। बांधों का निर्माण क्षेत्रीय मौसम पर बड़ा असर डालता है, जो उस क्षेत्र के साथ नजदीकी क्षेत्रों की बारिश में अनिश्चितता पैदा करता है और कृषि, आर्थिकी और सामाजिक स्तर प्रभावित होता है। मानवीय गतिविधियों के चलते पर्वतीय क्षेत्रों में एक बड़ा दुष्प्रभाव हिमालय भुगत रहा है। हालाकि इसकी इसके पीछे प्रमुख जिम्मेदार वैश्विक ताप में वृद्धि है, लेकिन पर्वतीय क्षेत्र में मानवीय गतिविधि भी कम जिम्मेदार नहीं है। पहाड़ों में नदियों किनारे निर्माण, अत्यधिक वाहनों की आवाजाही, प्लास्टिक कचरा और बेहिसाब माइनिंग पर्यावरण पर अटैक जैसा है। हिमालय से जुड़े राज्य लेह लद्दाख, हिमाचल और उत्तराखंड में अभी तक किया गया विकास आपदाओं को जन्मदाता रहा है। लिहाजा प्रदूषण बढ़ रहा है तो नुकसान अनेक उठाने पड़ रहे हैं। जिस ओर गंभीरता से ध्यान देने की सख्त जरूरत है। समय रहते इस दिशा में सार्थक प्रयास नहीं किए गए तो भविष्य में आपदाओं से निबटने के निबटने के लिए तैयार रहना होगा। पर्यावरण विशेषज्ञों की रिपोर्ट मानवीय कृत्य को जिम्मेदार मानती हैं आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज के वरिष्ठ पर्यावरण व वायुमंडलीय वैज्ञानिक डॉ नरेंद्र सिंह कहते हैं कि अनियोजित माननीय विकास को लेकर कई रिपोर्ट आ चुकी हैं, जो प्रकृति के साथ खिलवाड़ का विरोध करती हैं। विकास का आधार वैज्ञानिक होना चाहिए और पर्यावरण के अनुरूप होना चाहिए। भारतीय मौसम विभाग, वाडिया इंस्टीट्यूट हिमालयन जियोलॉजी और पर्यावरण मंत्रालय समेत कई अन्य रिपोर्ट आ चुकी हैं। एरीज भी हिमालय क्षेत्र की वायुमंडलीय स्थिति पर कई शोध कर चुका है, जो बताता है कि विकास पर्यावरण संरक्षण के आधार पर होना चाहिए। खनन से अधिक निकलती है मीथेन ऑस्ट्रेलियाई पर्यावरण वैज्ञानिकों का शोध बताता है कि खनन से मीथेन गैस अधिक निकलती है, जो ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में अधिक जिम्मेदार मानी जाती है। कार्बन डाईऑक्साइड की तुलना में मीथेन 40 प्रतिशत अधिक वैश्विक ताप बढ़ाती है। इधर पहाड़ों में निरंतर खनन जारी है तो जिम्मेदार कोई और नहीं इंसान है।1
- Uday preet chopra lock Manpur. Harsh Yana Colony key road. Samvidhan karai or Sarkar Tak pose Bhai ye news.Chalsal iss road ka samvidhan nikal oil , bahut , dikkaten hoti storo per chal chalne ke baad1
- Post by Chandra Devi1
- हाथरस। थाना सिकंद्राराऊ क्षेत्र के गांव मऊ चिरायल में 28 वर्षीय विवाहिता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। जानकारी के अनुसार मृतका 28 वर्षीय लक्ष्मी पुत्री श्योराज सिंह निवासी गन्थरी शाहयपुर थाना सिकंद्राराऊ की शादी करीब 6 वर्ष पूर्व क्रितपाल सिंह चौहान के बेटे रवि चौहान निवासी मऊ चिरायल के साथ धूमधाम से हुई थी। मृतका के मायके पक्ष का आरोप है कि शादी के कुछ समय बाद से ही ससुराल पक्ष के लोग उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित करने लगे थे। परिजनों के अनुसार उन्होंने रवि चौहान को एक मोटरसाइकिल भी दिलाई थी, लेकिन इसके बाद भी ससुराल पक्ष की ओर से अतिरिक्त दहेज की मांग की जाती रही। मायके वालों का आरोप है कि ससुराल पक्ष के लोगों ने लक्ष्मी की हत्या कर उसके शव को फंदे पर लटका दिया और घटना के बाद से सभी आरोपी मौके से फरार हो गए। सूचना मिलने पर मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले की जांच शुरू कर दी है। विवाहिता की मौत से परिजनों में शोक की लहर है और उनका रो-रोकर बुरा हाल है।1