100 बच्चों को कॉपी-किताबें मिलने का काम बेशक प्रशंसनीय है, लेकिन 'तीसरी आंख' का काम केवल सराहना करना नहीं, बल्कि सवाल उठाना भी है। यदि एक पार्षद को अपने वार्ड के बच्चों को पाठ्यसामग्री बाँटनी पड़ रही है, तो यह केवल उनकी दरियादिली का मामला नहीं है। यह आज़ादी के 79 साल बाद भी बच्चों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी न कर पाने वाली व्यवस्था पर सीधा सवाल है। यह प्रश्न किसी गरीब या संसाधनविहीन इलाके का नहीं, बल्कि बैलाडीला जैसे अत्यंत संपन्न क्षेत्र का है। बैलाडीला की पहाड़ियों से हर साल अरबों रुपये का लौह अयस्क निकलता है और इसे छत्तीसगढ़ की सबसे धनी नगरपालिकाओं में गिना जाता है। इस क्षेत्र में खनिज संपदा से मिलने वाली रॉयल्टी और जिला खनिज न्यास (DMF) की राशि करोड़ों में नहीं, बल्कि सैकड़ों करोड़ों में होती है। इसके बावजूद, अगर बच्चों की कॉपी-किताब की व्यवस्था किसी जनप्रतिनिधि की व्यक्तिगत पहल पर निर्भर है, तो यह स्थिति गंभीर सवाल पैदा करती है। अनिल जी ने जो किया वह निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन इससे कहीं बड़ा सवाल यह है कि खनिज संपदा से भरे इस इलाके में बच्चों की शिक्षा की बुनियादी ज़रूरतें व्यवस्था की जिम्मेदारी क्यों नहीं बन पाईं? यह अकाट्य सत्य है कि दान हमेशा एक नेक काम है, पर जहाँ पहाड़ अरबों रुपये उगलते हों, वहाँ बच्चों की कॉपी-किताब अगर 'उपहार' बन जाए, तो कमी संसाधनों की नहीं, बल्कि नीयत और प्राथमिकताओं की होती है।
100 बच्चों को कॉपी-किताबें मिलने का काम बेशक प्रशंसनीय है, लेकिन 'तीसरी आंख' का काम केवल सराहना करना नहीं, बल्कि सवाल उठाना भी है। यदि एक पार्षद को अपने वार्ड के बच्चों को पाठ्यसामग्री बाँटनी पड़ रही है, तो यह केवल उनकी दरियादिली का मामला नहीं है। यह आज़ादी के 79 साल बाद भी बच्चों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी न कर पाने वाली व्यवस्था पर सीधा सवाल है। यह प्रश्न किसी गरीब या संसाधनविहीन इलाके का नहीं, बल्कि बैलाडीला जैसे अत्यंत संपन्न क्षेत्र का है। बैलाडीला की पहाड़ियों से हर साल अरबों रुपये का लौह अयस्क निकलता है और इसे छत्तीसगढ़ की सबसे धनी नगरपालिकाओं में गिना जाता है। इस क्षेत्र में खनिज संपदा से मिलने वाली रॉयल्टी और जिला खनिज न्यास (DMF) की राशि करोड़ों में नहीं, बल्कि सैकड़ों करोड़ों में होती है। इसके बावजूद, अगर बच्चों की कॉपी-किताब की व्यवस्था किसी जनप्रतिनिधि की व्यक्तिगत पहल पर निर्भर है, तो यह स्थिति गंभीर सवाल पैदा करती है। अनिल जी ने जो किया वह निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन इससे कहीं बड़ा सवाल यह है कि खनिज संपदा से भरे इस इलाके में बच्चों की शिक्षा की बुनियादी ज़रूरतें व्यवस्था की जिम्मेदारी क्यों नहीं बन पाईं? यह अकाट्य सत्य है कि दान हमेशा एक नेक काम है, पर जहाँ पहाड़ अरबों रुपये उगलते हों, वहाँ बच्चों की कॉपी-किताब अगर 'उपहार' बन जाए, तो कमी संसाधनों की नहीं, बल्कि नीयत और प्राथमिकताओं की होती है।
- हंगरी में एक चौंकाने वाली राजनीतिक घटना सामने आई है, जहाँ 16 साल से स्थापित अटूट सत्ता मात्र एक वोट के अंतर से ध्वस्त हो गई। इस परिणाम को केवल एक चुनावी नतीजा नहीं बताया गया है, बल्कि इसे उन सभी सत्ताधीशों के लिए एक निर्णायक सबक माना जा रहा है जो जनता की शक्ति को कम आंकने की भूल करते हैं। इस घटना के माध्यम से एक महत्वपूर्ण संदेश दिया जा रहा है कि इतिहास गवाह है कि कोई भी देश अपने दुश्मनों से कम, बल्कि अपनी जनता की चुप्पी और उदासीनता से ज़्यादा हारता है। दर्शकों से आग्रह किया गया है कि वे इस विषय पर बने वीडियो को देखें, जिसका अंत उन्हें गहन चिंतन पर मजबूर करने का दावा किया गया है।1
- जगदलपुर में कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए एक बड़ी मुहिम चलाई गई, जिसके अंतर्गत एक मुफ्त जांच शिविर का आयोजन किया गया। बालको मेडिकल सेंटर रायपुर की टीम ने अपनी आधुनिक कैंसर वैन के माध्यम से इस निःशुल्क जांच शिविर का संचालन किया। शिविर में मैमोग्राफी, पैप स्मीयर के साथ-साथ ओरल, ब्रेस्ट और गर्भाशय कैंसर जैसी विभिन्न प्रकार की जांचें की गईं। इस पहल के तहत अब तक 50 से अधिक लोगों की जांच की जा चुकी है, जिसमें कई संदिग्ध मरीज भी सामने आए हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि बस्तर क्षेत्र में कैंसर के प्रति जागरूकता की कमी एक बड़ी चुनौती है, जिसके कारण मरीज अक्सर बीमारी की उन्नत अवस्था में इलाज के लिए पहुंचते हैं। इस अभियान में 40 साल से अधिक उम्र की महिलाओं की स्तन और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की स्क्रीनिंग पर विशेष जोर दिया गया। स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन के सहयोग से गांवों में सर्वे कर लोगों को यह महत्वपूर्ण संदेश दिया जा रहा है कि समय पर जांच कराने से कैंसर जैसी बीमारी को हराया जा सकता है।1
- एक व्यक्ति ने अपनी सशक्त और निडर भावना व्यक्त करते हुए कहा कि उसे किसी के पिता से कोई डर नहीं लगता। हालांकि, उसने तुरंत स्पष्ट किया कि उसके अपने पिता के मामले में स्थिति कुछ और है, जो एक विशेष और अद्वितीय संबंध की ओर इशारा करता है।1
- छत्तीसगढ़ में विकास और 24 घंटे बिजली के दावों के बीच, मुलमुला के वार्ड क्रमांक 12 (पटेल पारा) से बिजली विभाग की बड़ी लापरवाही उजागर करती एक तस्वीर सामने आई है। इस इलाके में पिछले दो दिनों से बिजली की आपूर्ति पूरी तरह ठप है, जिसके कारण स्थानीय निवासियों को भीषण उमस और गर्मी के बीच अंधेरे में रातें बितानी पड़ रही हैं। यह समस्या केवल बिजली गुल होने और अंधेरे तक सीमित नहीं है, बल्कि बिजली न होने के कारण पटेल पारा में पानी का भी एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है।1
- कभी एक नक्सल संगठन का हिस्सा रहे सुकालु की जीवनगाथा संघर्ष, भय और बदलाव का एक अनूठा उदाहरण है। घने जंगलों में नक्सली संगठन के साथ कई वर्ष बिताने के बाद, सुकालु ने एक साहसिक निर्णय लेते हुए समाज की मुख्यधारा में लौटने का रास्ता चुना। उनकी कहानी कई प्रश्न खड़े करती है कि आखिर किन परिस्थितियों में वे संगठन में शामिल हुए और वहां से बाहर निकलने में उन्हें किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सुकालु स्वयं बताते हैं कि कम उम्र में ही बिगड़ती परिस्थितियों और संगठन के प्रभाव के कारण उनका नक्सलियों से संपर्क हुआ। धीरे-धीरे वे इस संगठन का एक अभिन्न अंग बन गए और कई सालों तक जंगलों में रहकर जीवन यापन किया। इस पूरी अवधि के दौरान, उन्होंने लगातार भय, असुरक्षा और हिंसा के माहौल को बहुत करीब से देखा और अनुभव किया। समय के साथ, सुकालु को यह गहरा एहसास हुआ कि बंदूक और हिंसा का मार्ग केवल विनाश की ओर ही ले जाता है। एक बेहतर भविष्य और सामान्य, शांतिपूर्ण जीवन की तीव्र चाह ने उन्हें संगठन छोड़ने के लिए प्रेरित किया। हालांकि, नक्सल संगठन से बाहर निकलना बिल्कुल भी आसान नहीं था; उन्हें हर कदम पर गंभीर खतरों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद, उन्होंने साहस का परिचय देते हुए आखिरकार आत्मसमर्पण किया और समाज की मुख्यधारा में वापस आने का फैसला लिया। आज, सुकालु समाज की मुख्यधारा में लौटकर एक सम्मानजनक और सामान्य जीवन जी रहे हैं। उनकी यह प्रेरणादायक कहानी उन सभी व्यक्तियों के लिए एक उम्मीद की किरण है, जो हिंसा और संघर्ष का रास्ता छोड़कर विकास तथा शांति की राह पर चलना चाहते हैं, यह साबित करते हुए कि परिवर्तन संभव है।1
- बलरामपुर जिले में कलेक्टर श्रीमती चंदन संजय त्रिपाठी के निर्देशन में शासकीय भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने का अभियान लगातार चलाया जा रहा है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य शासकीय भूमि का संरक्षण करना और उसे सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित रखना है। इसी दिशा में विकासखंड रामचंद्रपुर में शासकीय भूमि पर बने 23 मकानों को हटाकर कुल 7 एकड़ 75 डिसमिल शासकीय भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया है। प्रशासन द्वारा इस अतिक्रमण मुक्ति के लिए सुनियोजित तैयारी की गई थी। अनुविभागीय अधिकारी राजस्व श्री आनंद राम नेताम के नेतृत्व में राजस्व, पुलिस और संबंधित विभागों की एक संयुक्त टीम ने संबंधित भूमि का अभिलेखीय परीक्षण किया, सीमांकन कराया तथा अतिक्रमण की स्थिति का विस्तृत सर्वेक्षण किया। इसके बाद, नियमानुसार संबंधित व्यक्तियों को नोटिस जारी कर भूमि खाली करने के निर्देश दिए गए और उन्हें स्वेच्छा से अतिक्रमण हटाने का अवसर भी प्रदान किया गया। कलेक्टर श्रीमती चंदन संजय त्रिपाठी के मार्गदर्शन में यह सुनिश्चित किया गया कि यह कार्रवाई पूरी तरह कानून सम्मत और पारदर्शी तरीके से हो, साथ ही अधिकारियों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और आम नागरिकों की सुविधाओं व संवेदनशीलता का भी ध्यान रखने के निर्देश दिए गए थे। कलेक्टर के निर्देशों के अनुरूप, अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) श्री आनंद राम नेताम के नेतृत्व में संयुक्त टीम ने सभी आवश्यक तैयारियां पूरी करने के बाद निर्धारित तिथि को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू की। प्रशासनिक अमले की उपस्थिति में 23 मकानों से अतिक्रमण हटाया गया और लगभग 7 एकड़ 75 डिसमिल भूमि को मुक्त कराया गया। यह पूरी कार्रवाई शांतिपूर्ण और व्यवस्थित रूप से संपन्न हुई, और कहीं भी कोई अप्रिय स्थिति निर्मित नहीं हुई। अतिक्रमण हटने के बाद मुक्त कराई गई भूमि को पुनः शासकीय अभिलेखों के अनुरूप सुरक्षित कर लिया गया है, जिसका उपयोग भविष्य में जनहित और विकास कार्यों के लिए किया जा सकेगा, जिससे क्षेत्र के नागरिकों को लाभ मिलेगा। कलेक्टर श्रीमती चंदन संजय त्रिपाठी ने स्पष्ट किया है कि शासकीय भूमि पर अवैध कब्जों को किसी भी स्थिति में प्रोत्साहित नहीं किया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को जिले में शासकीय भूमि की नियमित निगरानी करने और अतिक्रमण के मामलों में नियमानुसार त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जनहित से जुड़ी भूमि को सुरक्षित रखना प्रशासन की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है और इस दिशा में आगे भी प्रभावी कार्रवाई जारी रहेगी। प्रशासन सार्वजनिक संपत्तियों के संरक्षण के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।1
- बलरामपुर-रामानुजगंज पुलिस पशु तस्करी और अवैध पशु परिवहन के खिलाफ लगातार प्रभावी कार्रवाई कर रही है, इसी क्रम में थाना राजपुर पुलिस ने पशु तस्करी के एक प्रकरण में फरार चल रहे एक और आरोपी सलमान उर्फ सहजाद आलम को गिरफ्तार करने में सफलता पाई है। यह मामला 11 जून 2026 का है, जब मुखबिर की सूचना पर पुलिस टीम ने ग्राम गोपालपुर के पास घेराबंदी कर उत्तर प्रदेश की ओर जा रहे संदिग्ध पिकअप वाहन क्रमांक UP-65 QT-1375 की जांच की थी। उस दौरान वाहन में मवेशियों को अमानवीय और क्रूरतापूर्ण तरीके से ठूंस-ठूंसकर भरा हुआ पाया गया था। पुलिस ने पिकअप चालक अशोक गिरी, निवासी थाना चकिया, जिला चंदौली (उ.प्र.) को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया था, जबकि उसके अन्य सहयोगी साथी फरार हो गए थे। विवेचना के दौरान यह तथ्य सामने आया कि आरोपी मवेशियों को वध हेतु उत्तर प्रदेश ले जाने की तैयारी में थे। विवेचना के दौरान फरार आरोपी सलमान उर्फ सहजाद आलम, पिता मुमताज आलम, उम्र 28 वर्ष, निवासी ग्राम विष्णुपुरा महादेवपुर चौकी डीन्दो, थाना त्रिकुंडा, जिला बलरामपुर रामानुजगंज की लगातार तलाश की जा रही थी। तकनीकी साक्ष्य और मुखबिर सूचना के आधार पर आरोपी सलमान को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड के लिए न्यायालय में प्रस्तुत किया गया, जहाँ से उसे न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया है। इस प्रकरण में आरोपियों के खिलाफ थाना राजपुर में अपराध क्रमांक 147/2026 के तहत पशु परिरक्षण अधिनियम 2024 की धारा 4, 6 और 10, पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम 1960 की धारा 11(डी) तथा धारा 3(5) बीएनएस के अंतर्गत मामला पंजीबद्ध किया गया है। अब तक इस मामले में कुल 02 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। साथ ही, पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से घटना में प्रयुक्त 01 नग पिकअप वाहन, 01 नग ब्रेजा कार और कुल 12 नग भैंसों को जब्त किया है, जिन्हें सुरक्षित संरक्षण में रखा गया है। शेष फरार आरोपियों की तलाश और गिरफ्तारी के लिए पुलिस लगातार प्रयास कर रही है। बलरामपुर पुलिस आमजन से अपील करती है कि पशु तस्करी, अवैध पशु परिवहन या पशुओं के प्रति क्रूरता संबंधी किसी भी सूचना को तत्काल निकटतम पुलिस थाना या पुलिस कंट्रोल रूम को दें, ताकि ऐसे अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।2
- कभी नक्सल संगठन की मेडिकल टीम का हिस्सा रहीं फगनी की जिंदगी आज पूरी तरह बदल चुकी है। केवल पाँचवीं कक्षा तक पढ़ी फगनी के पास कोई औपचारिक मेडिकल डिग्री नहीं थी, फिर भी उन्हें संगठन में इलाज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई थी। जंगलों में रहने के दौरान फगनी मलेरिया से पीड़ित लोगों का उपचार करती थीं और घायल नक्सलियों को प्राथमिक चिकित्सा प्रदान करती थीं। उन्होंने सीमित संसाधनों और बेहद कठिन परिस्थितियों के बावजूद वर्षों तक यह जिम्मेदारी निभाई। समय के साथ, उन्होंने हिंसा और बंदूक के रास्ते को त्यागकर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया। आत्मसमर्पण के बाद फगनी के जीवन में एक बड़ा बदलाव आया है; अब वह नारायणपुर के पंडुम कैफे में काम करते हुए एक सम्मानजनक जीवन जी रही हैं। उनकी यह कहानी केवल एक व्यक्ति के परिवर्तन की गाथा नहीं है, बल्कि यह बदलते बस्तर, आत्मनिर्भरता और एक नई शुरुआत का भी प्रतीक है। आज फगनी अपने अनुभवों के साथ समाज में एक सकारात्मक भूमिका निभा रही हैं और कई अन्य लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।1