बिना केमिकल आलू की खेती, 6 महीने तक पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में रहता है भंडारण किन्नौर के मुसरंग कंडे में आज भी अपनाई जा रही खेती और आलू सुरक्षित रखने की पुरानी तकनीक रामपुर बुशहर, 12 अक्टूबर मीनाक्षी हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर के मुसरंग कंडे में पारंपरिक खेती और फसलों के संरक्षण की अनूठी पद्धति देखने को मिलती है। यहां किसान बिना केमिकल का इस्तेमाल किए आलू की खेती करते हैं। इतना ही नहीं, खेतों में बनाए गए पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में आलू को करीब 6 महीने तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी की जाती है। आधुनिक तकनीक और रासायनिक खादों पर बढ़ती निर्भरता के बीच किन्नौर के इस क्षेत्र में खेती का पारंपरिक तरीका प्रकृति के साथ तालमेल का उदाहरण है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाई जाने वाली यह पद्धति किसानों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव को भी दर्शाती है। खेतों में ही तैयार करते हैं पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज मुसरंग कंडे में आलू को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए खेतों में पारंपरिक तरीके से भंडारण स्थल बनाए जाते हैं। इनका उपयोग आलू को कई महीनों तक सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। इस व्यवस्था के माध्यम से किसान फसल को तुरंत बेचने के बजाय जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं। पारंपरिक भंडारण तकनीक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान और मौसम की परिस्थितियां फसलों के संरक्षण को प्रभावित करती हैं। स्थानीय अनुभव के आधार पर विकसित ऐसी व्यवस्थाएं किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं। प्राकृतिक तरीके से खेती पर जोर यहां बिना केमिकल आलू की खेती करना विशेष आकर्षण है। प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक कृषि पद्धतियों के सहारे उगाई जाने वाली फसल पर्यावरण के अनुकूल खेती की संभावनाओं को सामने लाती है। पारंपरिक ज्ञान को सहेजने की जरूरत किन्नौर जैसे जनजातीय क्षेत्रों में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि स्थानीय जीवनशैली और परंपराओं का हिस्सा भी है। मुसरंग कंडे में आलू की खेती और सात महीने तक उसके पारंपरिक भंडारण की पद्धति इस बात को रेखांकित करती है कि स्थानीय अनुभव और पुरानी तकनीकें आज भी उपयोगी हो सकती हैं। जमीन के अंदर पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में 6 महीने तक सुरक्षित रखते हैं आलू जनजातीय जिला किन्नौर के मुसरंग कंडे में किसान पारंपरिक तरीके से आलू की खेती और उसके भंडारण की अनूठी पद्धति अपनाते हैं। यहां बिना केमिकल के आलू उगाने के साथ उसे जमीन के अंदर बनाए गए पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में करीब 6 महीने तक सुरक्षित रखा जाता है। इस पारंपरिक व्यवस्था में जमीन के भीतर बनी संरचना का उपयोग आलू के भंडारण के लिए किया जाता है। मिट्टी के प्राकृतिक तापमान का लाभ उठाकर आलू को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है। इससे किसानों को फसल को तुरंत बेचने की मजबूरी नहीं रहती और वे जरूरत के अनुसार उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि इन पारंपरिक तरीकों का वैज्ञानिक अध्ययन और दस्तावेजीकरण किया जाए, तो इन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के साथ टिकाऊ खेती को भी बढ़ावा मिल सकता है। बिना केमिकल आलू की खेती, 6 महीने तक पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में रहता है भंडारण किन्नौर के मुसरंग कंडे में आज भी अपनाई जा रही खेती और आलू सुरक्षित रखने की पुरानी तकनीक रामपुर बुशहर, 12 अक्टूबर मीनाक्षी हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर के मुसरंग कंडे में पारंपरिक खेती और फसलों के संरक्षण की अनूठी पद्धति देखने को मिलती है। यहां किसान बिना केमिकल का इस्तेमाल किए आलू की खेती करते हैं। इतना ही नहीं, खेतों में बनाए गए पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में आलू को करीब 6 महीने तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी की जाती है। आधुनिक तकनीक और रासायनिक खादों पर बढ़ती निर्भरता के बीच किन्नौर के इस क्षेत्र में खेती का पारंपरिक तरीका प्रकृति के साथ तालमेल का उदाहरण है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाई जाने वाली यह पद्धति किसानों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव को भी दर्शाती है। खेतों में ही तैयार करते हैं पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज मुसरंग कंडे में आलू को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए खेतों में पारंपरिक तरीके से भंडारण स्थल बनाए जाते हैं। इनका उपयोग आलू को कई महीनों तक सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। इस व्यवस्था के माध्यम से किसान फसल को तुरंत बेचने के बजाय जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं। पारंपरिक भंडारण तकनीक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान और मौसम की परिस्थितियां फसलों के संरक्षण को प्रभावित करती हैं। स्थानीय अनुभव के आधार पर विकसित ऐसी व्यवस्थाएं किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं। प्राकृतिक तरीके से खेती पर जोर यहां बिना केमिकल आलू की खेती करना विशेष आकर्षण है। प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक कृषि पद्धतियों के सहारे उगाई जाने वाली फसल पर्यावरण के अनुकूल खेती की संभावनाओं को सामने लाती है। पारंपरिक ज्ञान को सहेजने की जरूरत किन्नौर जैसे जनजातीय क्षेत्रों में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि स्थानीय जीवनशैली और परंपराओं का हिस्सा भी है। मुसरंग कंडे में आलू की खेती और सात महीने तक उसके पारंपरिक भंडारण की पद्धति इस बात को रेखांकित करती है कि स्थानीय अनुभव और पुरानी तकनीकें आज भी उपयोगी हो सकती हैं। जमीन के अंदर पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में 6 महीने तक सुरक्षित रखते हैं आलू जनजातीय जिला किन्नौर के मुसरंग कंडे में किसान पारंपरिक तरीके से आलू की खेती और उसके भंडारण की अनूठी पद्धति अपनाते हैं। यहां बिना केमिकल के आलू उगाने के साथ उसे जमीन के अंदर बनाए गए पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में करीब 6 महीने तक सुरक्षित रखा जाता है। इस पारंपरिक व्यवस्था में जमीन के भीतर बनी संरचना का उपयोग आलू के भंडारण के लिए किया जाता है। मिट्टी के प्राकृतिक तापमान का लाभ उठाकर आलू को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है। इससे किसानों को फसल को तुरंत बेचने की मजबूरी नहीं रहती और वे जरूरत के अनुसार उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि इन पारंपरिक तरीकों का वैज्ञानिक अध्ययन और दस्तावेजीकरण किया जाए, तो इन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के साथ टिकाऊ खेती को भी बढ़ावा मिल सकता है।
बिना केमिकल आलू की खेती, 6 महीने तक पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में रहता है भंडारण किन्नौर के मुसरंग कंडे में आज भी अपनाई जा रही खेती और आलू सुरक्षित रखने की पुरानी तकनीक रामपुर बुशहर, 12 अक्टूबर मीनाक्षी हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर के मुसरंग कंडे में पारंपरिक खेती और फसलों के संरक्षण की अनूठी पद्धति देखने को मिलती है। यहां किसान बिना केमिकल का इस्तेमाल किए आलू की खेती करते हैं। इतना ही नहीं, खेतों में बनाए गए पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में आलू को करीब 6 महीने तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी की जाती है। आधुनिक तकनीक और रासायनिक खादों पर बढ़ती निर्भरता के बीच किन्नौर के इस क्षेत्र में खेती का पारंपरिक तरीका प्रकृति के साथ तालमेल का उदाहरण है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाई जाने वाली यह पद्धति किसानों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव को भी दर्शाती है। खेतों में ही तैयार करते हैं पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज मुसरंग कंडे में आलू को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए खेतों में पारंपरिक तरीके से भंडारण स्थल बनाए जाते हैं। इनका उपयोग आलू को कई महीनों तक सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। इस व्यवस्था के माध्यम से किसान फसल को तुरंत बेचने के बजाय जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं। पारंपरिक भंडारण तकनीक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान और मौसम की परिस्थितियां फसलों के संरक्षण को प्रभावित करती हैं। स्थानीय अनुभव के आधार पर विकसित ऐसी व्यवस्थाएं किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं। प्राकृतिक तरीके से खेती पर जोर यहां बिना केमिकल आलू की खेती करना विशेष आकर्षण है। प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक कृषि पद्धतियों के सहारे उगाई जाने वाली फसल पर्यावरण के अनुकूल खेती की संभावनाओं को सामने लाती है। पारंपरिक ज्ञान को सहेजने की जरूरत किन्नौर जैसे जनजातीय क्षेत्रों में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि स्थानीय जीवनशैली और परंपराओं का हिस्सा भी है। मुसरंग कंडे में आलू की खेती और सात महीने तक उसके पारंपरिक भंडारण की पद्धति इस बात को रेखांकित करती है कि स्थानीय अनुभव और पुरानी तकनीकें आज भी उपयोगी हो सकती हैं। जमीन के अंदर पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में 6 महीने तक सुरक्षित रखते हैं आलू जनजातीय जिला किन्नौर के मुसरंग कंडे में किसान पारंपरिक तरीके से आलू की खेती और उसके भंडारण की अनूठी पद्धति अपनाते हैं। यहां बिना केमिकल के आलू उगाने के साथ उसे जमीन के अंदर बनाए गए पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में करीब 6 महीने तक सुरक्षित रखा जाता है। इस पारंपरिक व्यवस्था में जमीन के भीतर बनी संरचना का उपयोग आलू के भंडारण के लिए किया जाता है। मिट्टी के प्राकृतिक तापमान का लाभ उठाकर आलू को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है। इससे किसानों को फसल को तुरंत बेचने की मजबूरी नहीं रहती और वे जरूरत के अनुसार उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि इन पारंपरिक तरीकों का वैज्ञानिक अध्ययन और दस्तावेजीकरण किया जाए, तो इन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के साथ टिकाऊ खेती को भी बढ़ावा मिल सकता है। बिना केमिकल आलू की खेती, 6 महीने तक पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में रहता है भंडारण किन्नौर के मुसरंग कंडे में आज भी अपनाई जा रही खेती और आलू सुरक्षित रखने की पुरानी तकनीक रामपुर बुशहर, 12 अक्टूबर मीनाक्षी हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर के मुसरंग कंडे में पारंपरिक खेती और फसलों के संरक्षण की अनूठी पद्धति देखने को मिलती है। यहां किसान बिना केमिकल का इस्तेमाल किए आलू की खेती करते हैं। इतना ही नहीं, खेतों में बनाए गए पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में आलू को करीब 6 महीने तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी की जाती है। आधुनिक तकनीक और रासायनिक खादों पर बढ़ती निर्भरता के बीच किन्नौर के इस क्षेत्र में खेती का पारंपरिक तरीका प्रकृति के साथ तालमेल का उदाहरण है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाई जाने वाली यह पद्धति किसानों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव को भी दर्शाती है। खेतों में ही तैयार करते हैं पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज मुसरंग कंडे में आलू को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए खेतों में पारंपरिक तरीके से भंडारण स्थल बनाए जाते हैं। इनका उपयोग आलू को कई महीनों तक सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। इस व्यवस्था के माध्यम से किसान फसल को तुरंत बेचने के बजाय जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं। पारंपरिक भंडारण तकनीक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान और मौसम की परिस्थितियां फसलों के संरक्षण को प्रभावित करती हैं। स्थानीय अनुभव के आधार पर विकसित ऐसी व्यवस्थाएं किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं। प्राकृतिक तरीके से खेती पर जोर यहां बिना केमिकल आलू की खेती करना विशेष आकर्षण है। प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक कृषि पद्धतियों के सहारे उगाई जाने वाली फसल पर्यावरण के अनुकूल खेती की संभावनाओं को सामने लाती है। पारंपरिक ज्ञान को सहेजने की जरूरत किन्नौर जैसे जनजातीय क्षेत्रों में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि स्थानीय जीवनशैली और परंपराओं का हिस्सा भी है। मुसरंग कंडे में आलू की खेती और सात महीने तक उसके पारंपरिक भंडारण की पद्धति इस बात को रेखांकित करती है कि स्थानीय अनुभव और पुरानी तकनीकें आज भी उपयोगी हो सकती हैं। जमीन के अंदर पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में 6 महीने तक सुरक्षित रखते हैं आलू जनजातीय जिला किन्नौर के मुसरंग कंडे में किसान पारंपरिक तरीके से आलू की खेती और उसके भंडारण की अनूठी पद्धति अपनाते हैं। यहां बिना केमिकल के आलू उगाने के साथ उसे जमीन के अंदर बनाए गए पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में करीब 6 महीने तक सुरक्षित रखा जाता है। इस पारंपरिक व्यवस्था में जमीन के भीतर बनी संरचना का उपयोग आलू के भंडारण के लिए किया जाता है। मिट्टी के प्राकृतिक तापमान का लाभ उठाकर आलू को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है। इससे किसानों को फसल को तुरंत बेचने की मजबूरी नहीं रहती और वे जरूरत के अनुसार उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि इन पारंपरिक तरीकों का वैज्ञानिक अध्ययन और दस्तावेजीकरण किया जाए, तो इन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के साथ टिकाऊ खेती को भी बढ़ावा मिल सकता है।
- रामपुर बुशहर में अंतरराष्ट्रीय लवी मेले के सफल आयोजन को लेकर उपायुक्त शिमला अनुपम कश्यप की अध्यक्षता में की गई बैठक #kullutodaynews #himachalpradesh #himachalupdate #MediaPower #himachalkiawaaz #KTN #ATM #shimla #kullu #rampur1
- बिना केमिकल आलू की खेती, 6 महीने तक पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में रहता है भंडारण किन्नौर के मुसरंग कंडे में आज भी अपनाई जा रही खेती और आलू सुरक्षित रखने की पुरानी तकनीक रामपुर बुशहर, 12 अक्टूबर मीनाक्षी हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर के मुसरंग कंडे में पारंपरिक खेती और फसलों के संरक्षण की अनूठी पद्धति देखने को मिलती है। यहां किसान बिना केमिकल का इस्तेमाल किए आलू की खेती करते हैं। इतना ही नहीं, खेतों में बनाए गए पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में आलू को करीब 6 महीने तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी की जाती है। आधुनिक तकनीक और रासायनिक खादों पर बढ़ती निर्भरता के बीच किन्नौर के इस क्षेत्र में खेती का पारंपरिक तरीका प्रकृति के साथ तालमेल का उदाहरण है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाई जाने वाली यह पद्धति किसानों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव को भी दर्शाती है। खेतों में ही तैयार करते हैं पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज मुसरंग कंडे में आलू को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए खेतों में पारंपरिक तरीके से भंडारण स्थल बनाए जाते हैं। इनका उपयोग आलू को कई महीनों तक सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। इस व्यवस्था के माध्यम से किसान फसल को तुरंत बेचने के बजाय जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं। पारंपरिक भंडारण तकनीक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान और मौसम की परिस्थितियां फसलों के संरक्षण को प्रभावित करती हैं। स्थानीय अनुभव के आधार पर विकसित ऐसी व्यवस्थाएं किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं। प्राकृतिक तरीके से खेती पर जोर यहां बिना केमिकल आलू की खेती करना विशेष आकर्षण है। प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक कृषि पद्धतियों के सहारे उगाई जाने वाली फसल पर्यावरण के अनुकूल खेती की संभावनाओं को सामने लाती है। पारंपरिक ज्ञान को सहेजने की जरूरत किन्नौर जैसे जनजातीय क्षेत्रों में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि स्थानीय जीवनशैली और परंपराओं का हिस्सा भी है। मुसरंग कंडे में आलू की खेती और सात महीने तक उसके पारंपरिक भंडारण की पद्धति इस बात को रेखांकित करती है कि स्थानीय अनुभव और पुरानी तकनीकें आज भी उपयोगी हो सकती हैं। जमीन के अंदर पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में 6 महीने तक सुरक्षित रखते हैं आलू जनजातीय जिला किन्नौर के मुसरंग कंडे में किसान पारंपरिक तरीके से आलू की खेती और उसके भंडारण की अनूठी पद्धति अपनाते हैं। यहां बिना केमिकल के आलू उगाने के साथ उसे जमीन के अंदर बनाए गए पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में करीब 6 महीने तक सुरक्षित रखा जाता है। इस पारंपरिक व्यवस्था में जमीन के भीतर बनी संरचना का उपयोग आलू के भंडारण के लिए किया जाता है। मिट्टी के प्राकृतिक तापमान का लाभ उठाकर आलू को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है। इससे किसानों को फसल को तुरंत बेचने की मजबूरी नहीं रहती और वे जरूरत के अनुसार उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि इन पारंपरिक तरीकों का वैज्ञानिक अध्ययन और दस्तावेजीकरण किया जाए, तो इन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के साथ टिकाऊ खेती को भी बढ़ावा मिल सकता है। बिना केमिकल आलू की खेती, 6 महीने तक पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में रहता है भंडारण किन्नौर के मुसरंग कंडे में आज भी अपनाई जा रही खेती और आलू सुरक्षित रखने की पुरानी तकनीक रामपुर बुशहर, 12 अक्टूबर मीनाक्षी हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर के मुसरंग कंडे में पारंपरिक खेती और फसलों के संरक्षण की अनूठी पद्धति देखने को मिलती है। यहां किसान बिना केमिकल का इस्तेमाल किए आलू की खेती करते हैं। इतना ही नहीं, खेतों में बनाए गए पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में आलू को करीब 6 महीने तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी की जाती है। आधुनिक तकनीक और रासायनिक खादों पर बढ़ती निर्भरता के बीच किन्नौर के इस क्षेत्र में खेती का पारंपरिक तरीका प्रकृति के साथ तालमेल का उदाहरण है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाई जाने वाली यह पद्धति किसानों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव को भी दर्शाती है। खेतों में ही तैयार करते हैं पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज मुसरंग कंडे में आलू को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए खेतों में पारंपरिक तरीके से भंडारण स्थल बनाए जाते हैं। इनका उपयोग आलू को कई महीनों तक सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। इस व्यवस्था के माध्यम से किसान फसल को तुरंत बेचने के बजाय जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं। पारंपरिक भंडारण तकनीक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान और मौसम की परिस्थितियां फसलों के संरक्षण को प्रभावित करती हैं। स्थानीय अनुभव के आधार पर विकसित ऐसी व्यवस्थाएं किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं। प्राकृतिक तरीके से खेती पर जोर यहां बिना केमिकल आलू की खेती करना विशेष आकर्षण है। प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक कृषि पद्धतियों के सहारे उगाई जाने वाली फसल पर्यावरण के अनुकूल खेती की संभावनाओं को सामने लाती है। पारंपरिक ज्ञान को सहेजने की जरूरत किन्नौर जैसे जनजातीय क्षेत्रों में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि स्थानीय जीवनशैली और परंपराओं का हिस्सा भी है। मुसरंग कंडे में आलू की खेती और सात महीने तक उसके पारंपरिक भंडारण की पद्धति इस बात को रेखांकित करती है कि स्थानीय अनुभव और पुरानी तकनीकें आज भी उपयोगी हो सकती हैं। जमीन के अंदर पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में 6 महीने तक सुरक्षित रखते हैं आलू जनजातीय जिला किन्नौर के मुसरंग कंडे में किसान पारंपरिक तरीके से आलू की खेती और उसके भंडारण की अनूठी पद्धति अपनाते हैं। यहां बिना केमिकल के आलू उगाने के साथ उसे जमीन के अंदर बनाए गए पारंपरिक कोल्ड स्टोरेज में करीब 6 महीने तक सुरक्षित रखा जाता है। इस पारंपरिक व्यवस्था में जमीन के भीतर बनी संरचना का उपयोग आलू के भंडारण के लिए किया जाता है। मिट्टी के प्राकृतिक तापमान का लाभ उठाकर आलू को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है। इससे किसानों को फसल को तुरंत बेचने की मजबूरी नहीं रहती और वे जरूरत के अनुसार उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि इन पारंपरिक तरीकों का वैज्ञानिक अध्ययन और दस्तावेजीकरण किया जाए, तो इन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के साथ टिकाऊ खेती को भी बढ़ावा मिल सकता है।1
- रकछम-चितकुल में सात देशों के पक्षी प्रेमियों का जमावड़ा, 35 से अधिक प्रजातियों का दीदार हिमालय की गोद में बसे किन्नौर के रकछम-चितकुल वन्यजीव अभयारण्य में सात देशों के पक्षी प्रेमियों ने हिमालयी जैव विविधता को करीब से निहारा। यहां आयोजित अंतरराष्ट्रीय पक्षी अवलोकन कार्यक्रम में ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड, स्कॉटलैंड, इंग्लैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और स्पेन के प्रतिनिधियों सहित देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे प्रकृति प्रेमियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान 35 से अधिक पक्षी प्रजातियों का अवलोकन किया गया। इस पहल से किन्नौर की प्राकृतिक संपदा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के साथ क्षेत्र में जिम्मेदार इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने की उम्मीद जगी है।1
- नादौन की जनता के हम ऋणी, सात जन्म तक नहीं उतार पाएंगे कर्ज। आपके आशीर्वाद व सहयोग से यहां पहुंचे : विधायक कमलेश ठाकुर1
- Himachal Weather Update: 13 से 15 अक्टूबर तक बारिश का अलर्ट | ठंड बढ़ी | IMD Shimla हिमाचल प्रदेश मौसम समाचार | Himachal Weather Update Today Himachal Weather Update: 13 से 15 अक्टूबर तक बारिश का अलर्ट | ठंड बढ़ी | IMD Shimla हिमाचल प्रदेश मौसम समाचार | Himachal Weather Update Today1
- कुल्लू अस्पताल के एमसीएच में 6 डॉक्टर के पद भरने को मिली मंजूरी केथ लैब खुलने से दिल की बीमारियों का होगा इलाज तेगुबेहड में जल्द बनेगा क्रिटिकल केयर भवन जिला कुल्लू के मुख्यालय ढालपुर अस्पताल में मातृ शिशु विंग के लिए प्रदेश सरकार के द्वारा 10 पदों को भरने की अनुमति दे दी गई है और इसमें 6 पद डॉक्टर के यहां पर भरे जाएंगे। इस यहां पर मातृ शिशु अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाएं मजबूत होगी। ढालपुर में पत्रकारों को जानकारी देते हुए विधायक सुंदर सिंह ठाकुर ने कहा कि तेगु बेहड अस्पताल में भी क्रिटिकल केयर भवन का निर्माण कार्य जल्द पूरा किया जाएगा और ढालपुर अस्पताल में कैथ लैब खोलने से दिल की बीमारियों का भी यहीं पर इलाज संभव हो पाएगा। विधायक सुंदर ठाकुर ने कहा कि प्रदेश सरकार के द्वारा इन सभी स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने के लिए बजट का प्रावधान किया गया है और यह सभी कार्य जल्द पूरे होंगे। ढालपुर अस्पताल में जिला कुल्लू के अलावा जिला मंडी, जिला लाहौल स्पीति और पांगी से भी लोग इलाज के लिए आते हैं। ऐसे में ढालपुर अस्पताल में सभी लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही है। विधायक सुंदर ठाकुर ने कहा कि बीते दिनों केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के साथ भी उन्होंने मुख्यमंत्री के साथ मिलकर मुलाकात की थी और कुल्लू में मेडिकल कॉलेज खोलने की भी मांग रखी थी। ऐसे में उन्हें उम्मीद है कि केंद्र स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा इस मांग को स्वीकार करेंगे और कल्लू को भी केंद्र सरकार की ओर से बड़ी सौगात देंगे।1
- पिंजौर-नालागढ़ रोड पर गांव धमाला के पास दो बसों और एक महिंद्रा पिकअप गाड़ी के बीच टक्कर टक्कर इतनी जोरदार थी कि पिकअप गाड़ी का अगला हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, मिली जानकारी के अनुसार, सोमवार रात पिंजौर-नालागढ़ रोड पर गांव धमाला के पास चंडीगढ़ नंबर की एक बस का टायर पंचर होने के कारण वह सड़क किनारे खड़ी थी, बस के पिछले एक महिंद्रा पिकअप गाड़ी भी वहां खड़ी थी, इसी दौरान पीछे से आ रही हिमाचल नंबर की एक अन्य बस की पिकअप गाड़ी से टक्कर हो गई, टक्कर के कारण पिकअप का अगला हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, वहीं बस का अगला शीशा टूट गया और उसके अगले हिस्से को भी नुकसान पहुंचा, राहत की बात यह रही कि हादसे के समय पिकअप गाड़ी में कोई भी व्यक्ति बैठा नहीं था, इसके चलते एक बड़ा हादसा होने से टल गया, हादसे में किसी के गंभीर रूप से घायल होने की सूचना नहीं है, फिलहाल इस सड़क हादसे में किसकी गलती रही और किन परिस्थितियों में टक्कर हुई, यह जांच का विषय है, हादसे के वास्तविक कारणों का पता जांच के बाद ही चल सकेगा।1
- टूटू एयरपोर्ट मार्ग पर सड़क किनारे फेंकती भवन निर्माण सामग्री, लग रहा जाम टूटू एयरपोर्ट मार्ग पर विजयनगर में सड़क पर भवन सामग्री सड़कों पर फेंकने से यहां पर बड़े वाहनों को क्रॉस करने में परेशानी आ रही है। सोमवार को भी इसी तरह शाम को यहां पर भारी जाम लग गया। एचआरटीसी के चालकों ने कड़ी मशक्कत के बाद बसों को यहां से क्रॉस करवाया। रोजाना सफर करने वाले लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। लोगों का कहना है कि इस जाम से वह रोजाना परेशान होते है। लोग रास्ते पर ही भवन सामग्री फेंक देते हैं, वही गाड़ियां भी बेतरतीब तरीके से पार्क की होती है। इसकी शिकायत उन्होंने एसपी शिमला से भी की है।1