28 अगस्त/जन्म-दिवस ,प्रथम प्रचारक बाबासाहब आप्टे : अध्ययन, साधना और राष्ट्रसेवा का अद्भुत समन्वय 28 अगस्त/जन्म-दिवस ,प्रथम प्रचारक बाबासाहब आप्टे : अध्ययन, साधना और राष्ट्रसेवा का अद्भुत समन्वय भारत के राष्ट्रजीवन में ऐसे अनेक व्यक्तित्व हुए हैं, जिन्होंने प्रसिद्धि या पद की अपेक्षा किए बिना अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र और समाज के निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रारंभिक विकास में ऐसे ही कर्मयोगी व्यक्तित्व थे बाबासाहब आप्टे।अध्ययनशीलता, अदम्य जिज्ञासा, संगठन के प्रति निष्ठा और राष्ट्रसेवा की उत्कट भावना उनके जीवन की प्रमुख विशेषताएँ थीं। उन्हें संघ का प्रथम प्रचारक माना जाता है। 28 अगस्त 1903 को महाराष्ट्र के यवतमाल में एक निर्धन परिवार में जन्मे उमाकान्त केशव आप्टे का बचपन कठिन परिस्थितियों में बीता। मात्र 16 वर्ष की आयु में पिता का निधन हो जाने से परिवार की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गई। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उनके भीतर अध्ययन के प्रति ऐसी प्रबल रुचि थी, जिसने आगे चलकर उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाया। कहा जाता है कि जब वे लगभग आठ वर्ष के थे, तब उनके मामा ‘ईसप की कथाएँ’ नामक पुस्तक लेकर आए। उमाकान्त उस पुस्तक में इतने तल्लीन हो गए कि देर रात तक पढ़ते रहे। केवल कुछ घंटे सोने के बाद उन्होंने फिर पढ़ना शुरू कर दिया। अगले दिन मामा को वापस जाना था, इसलिए वे पुस्तक पूरी पढ़ लेना चाहते थे। भोजन के लिए माता के बुलाने पर भी वे नहीं आए। पिता छड़ी लेकर आए तो बालक उमाकान्त ने अपनी पीठ आगे कर दी और कहा कि चाहे जितना मार लें, पुस्तक पढ़े बिना वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। उनकी इस अद्भुत जिज्ञासा और पढ़ने की लगन के सामने अंततः परिवार को झुकना पड़ा।छात्र जीवन में वे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से अत्यंत प्रभावित हुए। एक प्रसंग उनके जीवन की दिशा को समझने के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जब तिलक जी रेल से उस क्षेत्र से गुजरने वाले थे, तब उमाकान्त उनके दर्शन के लिए जाना चाहते थे। विद्यालय के प्रधानाचार्य विद्यार्थियों को जाने देने के पक्ष में नहीं थे और उन्होंने विद्यालय का फाटक बंद करवा दिया। विद्यालय का समय समाप्त होने के बाद भी उमाकान्त को जाने की अनुमति नहीं मिली। उनके आग्रह और जिद पर शिक्षक ने उनकी पिटाई तक कर दी।इसी बीच तिलक जी की रेलगाड़ी निकल गई। बाद में विद्यार्थियों को जाने दिया गया। उमाकान्त ने कहा कि भले ही उन्हें तिलक जी के प्रत्यक्ष दर्शन करने से रोक दिया गया, लेकिन उन्होंने मन ही मन उनके दर्शन कर लिए हैं और उनके विचारों से प्रेरणा लेकर अपना जीवन देश के लिए समर्पित करने का निश्चय भी कर लिया है। यह घटना उनके भीतर विकसित हो रही राष्ट्रभक्ति की गहराई को दर्शाती है। मैट्रिक की शिक्षा पूरी करने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने कुछ समय धामण गाँव में अध्यापन कार्य किया। शिक्षक के रूप में भी उनका राष्ट्रवादी चिंतन निरंतर अभिव्यक्त होता रहा। वे विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम की शिक्षा नहीं देते थे, बल्कि देश, समाज और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का प्रयास करते थे। उन्होंने विद्यालय में तिलक जयंती का आयोजन किया, जिससे प्रधानाचार्य नाराज हो गए। परिणामस्वरूप उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और नागपुर आकर एक प्रेस में काम करने लगे। नागपुर में उनका परिचय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से हुआ। यह परिचय उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। धीरे-धीरे उनका जीवन संघ कार्य के लिए समर्पित होता चला गया। पुस्तकों और अध्ययन के प्रति उनकी असाधारण रुचि के कारण डॉ. हेडगेवार उन्हें स्नेहपूर्वक ‘अक्षर शत्रु’ कहा करते थे। बाबासाहब आप्टे केवल स्वयं पढ़ने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि ज्ञान को अधिक से अधिक युवाओं तक पहुँचाने में भी विश्वास रखते थे। उन्होंने हाथ से लिखकर ‘दासबोध’ तैयार किया तथा विनायक दामोदर सावरकर की प्रतिबंधित पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ को टाइप कर अनेक युवाओं तक पहुँचाया। उस दौर में ऐसे साहित्य का प्रसार जोखिमपूर्ण था, लेकिन राष्ट्रवादी विचारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें इन कठिनाइयों से विचलित नहीं होने दिया।जीवन-निर्वाह के लिए उन्होंने अलग-अलग स्थानों पर नौकरियाँ कीं, लेकिन नौकरी के अतिरिक्त मिलने वाला अधिकांश समय संघ कार्य में लगाते रहे। धीरे-धीरे संघ का कार्यक्षेत्र बढ़ने लगा और उन्हें नागपुर से बाहर भी प्रवास करना पड़ने लगा। अंततः उन्होंने नौकरी छोड़कर स्वयं को पूर्णकालिक रूप से संघ कार्य के लिए समर्पित कर दिया। इस प्रकार वे संघ के प्रथम पूर्णकालिक प्रचारक बने।उस समय संघ का विस्तार प्रारंभिक अवस्था में था। डॉ. हेडगेवार बाबासाहब आप्टे को विभिन्न क्षेत्रों में भेजते रहे। वे लोगों से मिलते, शाखाएँ प्रारंभ करने में सहयोग करते और राष्ट्र तथा संगठन के विचार को समाज तक पहुँचाते। अपने व्यापक प्रवास और प्रभावी संवाद शैली के कारण वे संघ के प्रारंभिक विस्तार के प्रमुख कार्यकर्ताओं में शामिल हो गए। उनकी अध्ययनशीलता, परिश्रम, स्वाभाविक प्रौढ़ता और बातचीत की विशिष्ट शैली से प्रभावित होकर डॉ. हेडगेवार ने उन्हें स्नेह से ‘बाबासाहब’ नाम दिया। भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुराण कथाओं पर उनकी गहरी पकड़ थी। विशेष रूप से दशावतार जैसी प्राचीन कथाओं को वे आधुनिक संदर्भों से जोड़कर जिस रोचक शैली में सुनाते थे, वह श्रोताओं को प्रभावित करती थी। उनके लिए भारतीय संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान राष्ट्रजीवन को दिशा देने वाली जीवंत शक्ति थी। बाबासाहब आप्टे का जीवन यह संदेश देता है कि राष्ट्रसेवा केवल बड़े पदों या संसाधनों से नहीं होती। इसके लिए आवश्यक है—अध्ययन की गहराई, विचारों की स्पष्टता, अनुशासन, परिश्रम और उद्देश्य के प्रति पूर्ण समर्पण। उन्होंने कठिन आर्थिक परिस्थितियों को अपनी राह की बाधा नहीं बनने दिया। व्यक्तिगत सुविधा और करियर की संभावनाओं से ऊपर उन्होंने राष्ट्रकार्य को स्थान दिया।उनका जीवन संघ के प्रारंभिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। उन्होंने संगठन को विस्तार देने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं के निर्माण पर भी बल दिया। उनका विश्वास था कि स्थायी परिवर्तन केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि चरित्रवान और समर्पित व्यक्तियों के निर्माण से होता है। 26 जुलाई 1972 को गुरुपूर्णिमा के पावन दिन बाबासाहब आप्टे का निधन हुआ। उनका जीवन भले ही अब इतिहास का हिस्सा है, लेकिन अध्ययन, संगठन और राष्ट्रसेवा के प्रति उनकी निष्ठा आज भी प्रेरणा देती है।बाबासाहब आप्टे का जन्म-दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि जिस जीवन का लक्ष्य स्वयं से ऊपर उठकर राष्ट्र और समाज के लिए कार्य करना हो, उसकी सार्थकता समय की सीमाओं से परे होती है। उनकी तपस्या, अध्ययनशीलता और समर्पण भारतीय राष्ट्रजीवन के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे। वरुण कुमार लेखक एवं कवि
28 अगस्त/जन्म-दिवस ,प्रथम प्रचारक बाबासाहब आप्टे : अध्ययन, साधना और राष्ट्रसेवा का अद्भुत समन्वय 28 अगस्त/जन्म-दिवस ,प्रथम प्रचारक बाबासाहब आप्टे : अध्ययन, साधना और राष्ट्रसेवा का अद्भुत समन्वय भारत के राष्ट्रजीवन में ऐसे अनेक व्यक्तित्व हुए हैं, जिन्होंने प्रसिद्धि या पद की अपेक्षा किए बिना अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र और समाज के निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रारंभिक विकास में ऐसे ही कर्मयोगी व्यक्तित्व थे बाबासाहब आप्टे।अध्ययनशीलता, अदम्य जिज्ञासा, संगठन के प्रति निष्ठा और राष्ट्रसेवा की उत्कट भावना उनके जीवन की प्रमुख विशेषताएँ थीं। उन्हें संघ का प्रथम प्रचारक माना जाता है। 28 अगस्त 1903 को महाराष्ट्र के यवतमाल में एक निर्धन परिवार में जन्मे उमाकान्त केशव आप्टे का बचपन कठिन परिस्थितियों में बीता। मात्र 16 वर्ष की आयु में पिता का निधन हो जाने से परिवार की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गई। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उनके भीतर अध्ययन के प्रति ऐसी प्रबल रुचि थी, जिसने आगे चलकर उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाया। कहा जाता है कि जब वे लगभग आठ वर्ष के थे, तब उनके मामा ‘ईसप की कथाएँ’ नामक पुस्तक लेकर आए। उमाकान्त उस पुस्तक में इतने तल्लीन हो गए कि देर रात तक पढ़ते रहे। केवल कुछ घंटे सोने के बाद उन्होंने फिर पढ़ना शुरू कर दिया। अगले दिन मामा को वापस जाना था, इसलिए वे पुस्तक पूरी पढ़ लेना चाहते थे। भोजन के लिए माता के बुलाने पर भी वे नहीं आए। पिता छड़ी लेकर आए तो बालक उमाकान्त ने अपनी पीठ आगे कर दी और कहा कि चाहे जितना मार लें, पुस्तक पढ़े बिना वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। उनकी इस अद्भुत जिज्ञासा और पढ़ने की लगन के सामने अंततः परिवार को झुकना पड़ा।छात्र जीवन में वे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से अत्यंत प्रभावित हुए। एक प्रसंग उनके जीवन की दिशा को समझने के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जब तिलक जी रेल से उस क्षेत्र से गुजरने वाले थे, तब उमाकान्त उनके दर्शन के लिए जाना चाहते थे। विद्यालय के प्रधानाचार्य विद्यार्थियों को जाने देने के पक्ष में नहीं थे और उन्होंने विद्यालय का फाटक बंद करवा दिया। विद्यालय का समय समाप्त होने के
बाद भी उमाकान्त को जाने की अनुमति नहीं मिली। उनके आग्रह और जिद पर शिक्षक ने उनकी पिटाई तक कर दी।इसी बीच तिलक जी की रेलगाड़ी निकल गई। बाद में विद्यार्थियों को जाने दिया गया। उमाकान्त ने कहा कि भले ही उन्हें तिलक जी के प्रत्यक्ष दर्शन करने से रोक दिया गया, लेकिन उन्होंने मन ही मन उनके दर्शन कर लिए हैं और उनके विचारों से प्रेरणा लेकर अपना जीवन देश के लिए समर्पित करने का निश्चय भी कर लिया है। यह घटना उनके भीतर विकसित हो रही राष्ट्रभक्ति की गहराई को दर्शाती है। मैट्रिक की शिक्षा पूरी करने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने कुछ समय धामण गाँव में अध्यापन कार्य किया। शिक्षक के रूप में भी उनका राष्ट्रवादी चिंतन निरंतर अभिव्यक्त होता रहा। वे विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम की शिक्षा नहीं देते थे, बल्कि देश, समाज और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का प्रयास करते थे। उन्होंने विद्यालय में तिलक जयंती का आयोजन किया, जिससे प्रधानाचार्य नाराज हो गए। परिणामस्वरूप उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और नागपुर आकर एक प्रेस में काम करने लगे। नागपुर में उनका परिचय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से हुआ। यह परिचय उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। धीरे-धीरे उनका जीवन संघ कार्य के लिए समर्पित होता चला गया। पुस्तकों और अध्ययन के प्रति उनकी असाधारण रुचि के कारण डॉ. हेडगेवार उन्हें स्नेहपूर्वक ‘अक्षर शत्रु’ कहा करते थे। बाबासाहब आप्टे केवल स्वयं पढ़ने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि ज्ञान को अधिक से अधिक युवाओं तक पहुँचाने में भी विश्वास रखते थे। उन्होंने हाथ से लिखकर ‘दासबोध’ तैयार किया तथा विनायक दामोदर सावरकर की प्रतिबंधित पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ को टाइप कर अनेक युवाओं तक पहुँचाया। उस दौर में ऐसे साहित्य का प्रसार जोखिमपूर्ण था, लेकिन राष्ट्रवादी विचारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें इन कठिनाइयों से विचलित नहीं होने दिया।जीवन-निर्वाह के लिए उन्होंने अलग-अलग स्थानों पर नौकरियाँ कीं, लेकिन नौकरी के अतिरिक्त मिलने वाला अधिकांश समय संघ कार्य में लगाते रहे। धीरे-धीरे संघ का कार्यक्षेत्र बढ़ने लगा और उन्हें नागपुर से बाहर भी प्रवास करना पड़ने लगा। अंततः उन्होंने नौकरी छोड़कर स्वयं को पूर्णकालिक
रूप से संघ कार्य के लिए समर्पित कर दिया। इस प्रकार वे संघ के प्रथम पूर्णकालिक प्रचारक बने।उस समय संघ का विस्तार प्रारंभिक अवस्था में था। डॉ. हेडगेवार बाबासाहब आप्टे को विभिन्न क्षेत्रों में भेजते रहे। वे लोगों से मिलते, शाखाएँ प्रारंभ करने में सहयोग करते और राष्ट्र तथा संगठन के विचार को समाज तक पहुँचाते। अपने व्यापक प्रवास और प्रभावी संवाद शैली के कारण वे संघ के प्रारंभिक विस्तार के प्रमुख कार्यकर्ताओं में शामिल हो गए। उनकी अध्ययनशीलता, परिश्रम, स्वाभाविक प्रौढ़ता और बातचीत की विशिष्ट शैली से प्रभावित होकर डॉ. हेडगेवार ने उन्हें स्नेह से ‘बाबासाहब’ नाम दिया। भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुराण कथाओं पर उनकी गहरी पकड़ थी। विशेष रूप से दशावतार जैसी प्राचीन कथाओं को वे आधुनिक संदर्भों से जोड़कर जिस रोचक शैली में सुनाते थे, वह श्रोताओं को प्रभावित करती थी। उनके लिए भारतीय संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान राष्ट्रजीवन को दिशा देने वाली जीवंत शक्ति थी। बाबासाहब आप्टे का जीवन यह संदेश देता है कि राष्ट्रसेवा केवल बड़े पदों या संसाधनों से नहीं होती। इसके लिए आवश्यक है—अध्ययन की गहराई, विचारों की स्पष्टता, अनुशासन, परिश्रम और उद्देश्य के प्रति पूर्ण समर्पण। उन्होंने कठिन आर्थिक परिस्थितियों को अपनी राह की बाधा नहीं बनने दिया। व्यक्तिगत सुविधा और करियर की संभावनाओं से ऊपर उन्होंने राष्ट्रकार्य को स्थान दिया।उनका जीवन संघ के प्रारंभिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। उन्होंने संगठन को विस्तार देने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं के निर्माण पर भी बल दिया। उनका विश्वास था कि स्थायी परिवर्तन केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि चरित्रवान और समर्पित व्यक्तियों के निर्माण से होता है। 26 जुलाई 1972 को गुरुपूर्णिमा के पावन दिन बाबासाहब आप्टे का निधन हुआ। उनका जीवन भले ही अब इतिहास का हिस्सा है, लेकिन अध्ययन, संगठन और राष्ट्रसेवा के प्रति उनकी निष्ठा आज भी प्रेरणा देती है।बाबासाहब आप्टे का जन्म-दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि जिस जीवन का लक्ष्य स्वयं से ऊपर उठकर राष्ट्र और समाज के लिए कार्य करना हो, उसकी सार्थकता समय की सीमाओं से परे होती है। उनकी तपस्या, अध्ययनशीलता और समर्पण भारतीय राष्ट्रजीवन के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे। वरुण कुमार लेखक एवं कवि
- रक्षाबंधन के पावन अवसर पर जगरनाथ सेवा समिति सरायकेला प्रांगण में बहनों ने भाइयों की कलाई पर बांधी राखी, मांगी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना* सरायकेला - रक्षाबंधन के पावन एवं पवित्र अवसर पर सरायकेला जगरनाथ सेवा समिति के प्रांगण में भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व शुक्रवार को हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ मनाया गया। श्रावण पूर्णिमा के शुभ अवसर पर बहनों ने अपने भाइयों की कलाई पर प्रेम और विश्वास की डोर राखी बांधी तथा भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना की। इस दौरान बहनों ने विधि-विधान से भाइयों की आरती उतारी, तिलक लगाया और मिठाई खिलाकर रक्षाबंधन की खुशियां साझा कीं। भाइयों ने भी अपनी बहनों को उपहार देकर जीवनभर उनकी रक्षा और हर सुख-दुख में साथ निभाने का संकल्प लिया। बहनों ने कहा कि भाई उनके केवल परिवार का सदस्य नहीं, बल्कि जीवन के हर कठिन दौर में ढाल बनकर खड़े रहने वाला सबसे मजबूत सहारा है। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा कि उनके भाइयों की उम्र लंबी हो और परिवार में हमेशा सुख, शांति एवं समृद्धि बनी रहे। मौके पर उपस्थित भाजपा अभिनेत्री और समाजसेवी पिंकी मोदक तथा परशुराम कवि का योगदान सराहनीय रहा।2
- जिले भर में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया रक्षाबंधन का पावन पर्व चाईबासा। भाई-बहन के अटूट प्रेम, स्नेह और विश्वास का प्रतीक पवित्र रक्षाबंधन का त्योहार शुक्रवार को जिले भर में हर्षोल्लास एवं उत्साह के साथ मनाया गया। सुबह से ही घरों में रक्षाबंधन को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला। इस अवसर पर बहनों ने अपने भाइयों की कलाई पर प्रेम और विश्वास की डोर राखी बांधी तथा उनके सुखी, स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना की। भाइयों ने भी अपनी बहनों की रक्षा का संकल्प लेते हुए उन्हें उपहार भेंट किए। रक्षाबंधन को लेकर बाजारों में भी काफी चहल-पहल रही। विभिन्न दुकानों पर रंग-बिरंगी और आकर्षक राखियों की खरीदारी के लिए लोगों की भीड़ देखी गई। मिठाई की दुकानों पर भी ग्राहकों की अच्छी-खासी भीड़ रही। पूरे जिले में भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और प्रेम का यह पर्व उत्साह एवं उमंग के साथ मनाया गया।1
- योगी सरकार के फ्री बस सेवा की महिला ने खोल दी पोल #BJP #YogiAdityanath योगी सरकार के फ्री बस सेवा की महिला ने खोल दी पोल #BJP #YogiAdityanath1
- सरकारी जमीन पर कब्जे की तैयारी? चूना भट्टा में अवैध प्लॉटिंग का आरोप, CO ने शुरू कराई जांच! सरकारी जमीन पर कब्जे की तैयारी? चूना भट्टा में अवैध प्लॉटिंग का आरोप, CO ने शुरू कराई जांच!1
- टोंटो पंचायत में महाघोटाला: राशन वितरण में बड़ी धांधली, डिजिटल रसीद थमाकर डकार गए गरीबों का अनाज! अगस्त महीने की पंचिंग कराकर उपभोक्ताओं को दी सिर्फ कागजी रसीद, चावल गायब टोंटो प्रखंड, टोंटो पंचायत | दिनांक: 28 अगस्त 2026 टोंटो पंचायत में महा घोटाला: राशन वितरण में बड़ी धांधली से फूटा ग्रामीणों का गुस्सा "गरीबों का हक मारा जा रहा है, जिम्मेदार अधिकारी चुप क्यों?" टोंटो (झारखंड): टोंटो प्रखंड के टोंटो पंचायत में राशन वितरण को लेकर एक बड़ा घोटाला सामने आया है। स्थानीय ग्रामीणों और कार्डधारकों ने डीलर पर राशन की कालाबाजारी करने और उन्हें उनके हक के अनाज से वंचित करने का गंभीर आरोप लगाया है। ग्रामीणों का कहना है कि "हम भूखे मर सकते हैं, लेकिन अपना हक नहीं छोड़ेंगे।" उनके पास इस धांधली के पुख्ता वीडियो रिकॉर्डिंग और रसीद के रूप में सबूत भी मौजूद हैं। मामला क्या है? (पीड़ितों की जुबानी) ग्रामीणों के अनुसार, डीलर द्वारा अगस्त महीने का थंब इंप्रेशन (पंचिंग) करवा लिया गया है और उन्हें केवल रसीद थमा दी गई है। जब वे राशन मांगने जाते हैं, तो डीलर यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि "आपने जुलाई में पंचिंग नहीं की थी, इसलिए इस बार अगस्त का चावल नहीं मिलेगा।" एक पीड़ित ने रसीद दिखाते हुए कहा, "हमारे पास इस बात का पक्का सबूत है कि चावल किस-किस के पास बेचा गया है। इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी हमारे पास सुरक्षित है।" डीलर की मनमानी के मुख्य बिंदु: अधूरा राशन: डीलर रसीद तो पूरी काटता है, लेकिन ग्रामीणों को पूरा राशन नहीं देता। बहानेबाजी: राशन मांगने पर तरह-तरह के बहाने बनाए जाते हैं। जुलाई की पंचिंग का बहाना: 'जुलाई में पंचिंग नहीं हुई' कहकर अगस्त का राशन देने से साफ मना किया जा रहा है। कालाबाजारी: आधे से अधिक चावल को अवैध रूप से बाजार में बेच दिया जाता है। चावल में कटौती: तौल के समय चावल की मात्रा घटा दी जाती है। नेटवर्क बनी बाधा, लाभुक परेशान चाईबासा: ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क की खराब कनेक्टिविटी एक और बड़ी मुसीबत बन गई है। टोंटो प्रखंड के सुदूरवर्ती पंचायतों में नेटवर्क न होने के कारण पॉइंट ऑफ सेल (PoS) मशीन काम नहीं करती। इस वजह से उपभोक्ताओं का वेरिफिकेशन नहीं हो पाता और उन्हें राशन के लिए बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं। स्थिति इतनी खराब है कि कभी-कभी डीलर को नेटवर्क की तलाश में पहाड़ियों पर 2 से 3 किलोमीटर दूर जाकर पंचिंग करानी पड़ती है, जिससे ग्रामीण बेहद परेशान हैं। ग्रामीणों की प्रमुख मांगें: कड़ी कार्रवाई: दोषी राशन डीलर के खिलाफ तुरंत और सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। पूरा राशन: सभी कार्डधारकों को उनका पूरा राशन उपलब्ध कराया जाए। नेटवर्क का समाधान: क्षेत्र में नेटवर्क की समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाए। पारदर्शिता: राशन वितरण की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाए ताकि गड़बड़ी न हो। न्याय की गुहार: गरीबों का हक उन्हें वापस दिलाया जाए ताकि कोई भी परिवार भूखा न सोए। प्रशासन से अपील यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि टोंटो पंचायत के सभी गरीब और मेहनतकश परिवारों की है। ग्रामीणों ने प्रशासन से हाथ जोड़कर निवेदन किया है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, उचित कानूनी कार्रवाई हो और गरीबों को उनका हक दिलाकर न्याय सुनिश्चित किया जाए। जय हिन्द! जय झारखंड! गरीब एकता जिंदाबाद!2
- रक्षाबंधन के साथ सावन महिना समाप्त, बहनों ने भाईयों के कलाईयों में राखी बांधी। शुरू ऐप्प न्यूज़ संवाददाता। खूंटी। रक्षा बंधन के साथ ही पवित्र सावन महिना समाप्त हो गया। सावन महिना में एक माह तक हिंदु धार्मालम्बियो ने सुद्ध शाकाहारी भोजन किया, बहुत से लोगों ने पुरे सावन महिना प्याज, लहसुन भी खाया।लोग पुरे महिना बाबा भोलेनाथ की पुजा अर्चना में लिन रहे। कर्रा प्रखंड में शुक्रवार को सवान पुर्णिमा के शुभ अवसर पर सुबह से ही प्रत्येक शिवालयों और मंदिरों में पुजा अर्चना के लिए भक्तों का भीड़ उमड़ पड़ी थी। सभी शिवालयों में हर-हर महादेव, जय शिवशंकर भोलेनाथ का उद्घोष से क्षेत्र भक्तिमय हो गया था। कर्रा प्रखंड से भक्तों की हजारों संख्या में अगराबाडी स्थित अमरेश्वर धाम जाकर शिवशंकर भोलेनाथ को जलाभिषेक किया। दुसरी ओर बहनों ने अपने-अपने भाईयों को माथे में तिलक, चंदन लगाकर कलाईयों में रेशम का धागा(राखी) बंधने के बाद मिठाई खिलाई और भगवान भोलेनाथ से भाईयों के लिए लम्बी आयु, सुख समृद्धि एंव खुशहाली का कामना की। भाई ने अपने अपने बहनों को सदा जीवन रक्षा करने और सुख दुख में हमेशा साथ निभाने का वचन दिया। साथ ही बहनों को उपहार स्वरूप सभी भाईयों ने कुछ ना कुछ दिया।1
- Ranchi Junction Me Order Lene Se Roka Aur Dhamki Di? Mera Pura Experience! Aaj Ranchi Junction par ride ke dauran ek bahut hi pareshan karne wala anubhav hua. Mujhe order lene se roka gaya aur dhamki bhi di gayi. Is video me maine apna poora experience share kiya hai aur bataya hai ki us waqt kya hua. Video dekhiye aur apni rai comments me zarur batayein.#RanchiJunction #RapidoRide #RiderLife #JharkhandVlog #RideExperience Ranchi Junction Me Order Lene Se Roka Aur Dhamki Di? Mera Pura Experience! Aaj Ranchi Junction par ride ke dauran ek bahut hi pareshan karne wala anubhav hua. Mujhe order lene se roka gaya aur dhamki bhi di gayi. Is video me maine apna poora experience share kiya hai aur bataya hai ki us waqt kya hua. Video dekhiye aur apni rai comments me zarur batayein.#RanchiJunction #RapidoRide #RiderLife #JharkhandVlog #RideExperience1
- 🚨डायन का आरोप या जमीन विवाद? टोंटो में परिवार के तीन लोगों की हत्या से सनसनी , चार दिन बाद मिला शव चाईबासा में एक परिवार के तीन लोगों की हत्या, घर वालो ने डायन के नाम पर हत्या और पुलिस ने जमीन विवाद बताया, दो आरोपी गिरफ्तार चाईबासा के टोंटो थाना क्षेत्र के केंजरा गांव में एक ही परिवार के तीन सदस्यों की हत्या किए जाने के सनसनीखेज मामले का पांचदिन दिन बाद खुलासा हुआ है। शुक्रवार को एक ही परिवार के तीन लोगों की धारदार हथियार से काटकर हत्या कर दी गई। हत्या के बाद दो शवों को घर के आंगन में ही गाड़ दिया गया, जबकि एक शव को जिलिंगबुरु जंगल में फेंक दिया गया। मृतकों की पहचान जानो दोराईबुरु, उनके पति राजन दोराईबुरु और उनके 12 वर्षीय पुत्र कांडे दोराईबुरु के रूप में हुई है। तीनों की कुल्हाड़ी से वार कर हत्या की गई थी। घटना के बाद गांव में दहशत का माहौल है। घटना की जानकारी मिलने के दो दिन बाद जमशेदपुर में मजदूरी करने गए मृतक के बड़े पुत्र रमिया दोराईबुरु गांव पहुंचे। मृतक के पुत्र के मुताबिक, उसकी मां पर डायन होने का आरोप लगाया जाता था और इसी संदेह में परिवार के तीनों सदस्यों की हत्या की गई। मृतकों ने पहले महिला जानो दोराईबुरु घर लौटने के दौरान कुल्हाड़ी से हत्या कर जंगल में फेंक दिया। इसके बाद पति घटना के बाद पुलिस ने मृतक के दो चचेरे भाइयों बोंज दोराईबुरु और मुचिया दोराईबुरु को गिरफ्तार किया है। जगन्नाथपुर के एसडीपीओ राफेल मुर्मू के मुताबिक, घटना 21 अगस्त की है और पुलिस को करीब एक सप्ताह बाद इसकी सूचना मिली। सूचना मिलने के बाद पुलिस गांव पहुंची और तीनों शवों को बरामद किया। पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल की गई कुल्हाड़ी भी बरामद की है। पुलिस के मुताबिक, हत्या का कारण जमीन विवाद बताया जा रहा है। वहीं, मृतक के पुत्र का आरोप है कि आरोपी उसकी मां पर डायन होने का आरोप लगाते थे। पुलिस मामले की जांच कर रही है । #Chaibasa #Tonto #WestSinghbhum #JharkhandNews #TripleMurder #JharkhandCrime #डायनकेनामपरहत्या #टोंटो #चाईबासा #पश्चिमीसिंहभूम #हत्या #ट्रिपलमर्डर #झारखंड_न्यूज #KolhanBreakingNews1