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iit Bhu संस्थान से किशन श्रीवास्तव जी से बातचित
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iit Bhu संस्थान से किशन श्रीवास्तव जी से बातचित
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- वाराणसी | पंचकोशी यात्रा शुरू, सुरक्षा के कड़े इंतजाम वाराणसी में आस्था की परंपरा पंचकोशी यात्रा की शुरुआत हो चुकी है। हजारों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। यात्रा मार्ग पर जगह-जगह पर्याप्त पुलिस बल, पीएसी और स्वयंसेवकों की तैनाती की गई है। भीड़ प्रबंधन, यातायात व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को लेकर पुलिस-प्रशासन पूरी तरह अलर्ट है। कंट्रोल रूम से लगातार निगरानी की जा रही है, वहीं संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त फोर्स तैनात की गई है। प्रशासन ने श्रद्धालुओं से अनुशासन बनाए रखने और सहयोग करने की अपील की है, ताकि यात्रा शांतिपूर्ण और सुरक्षित ढंग से संपन्न हो सके।2
- 52 थाल चढ़ावा, पगड़ी बांधे ससुरालीजन; नवरत्न जड़ित छत्र तले सजा राजसी श्रृंगार, बांसफाटक से टेढ़ीनीम तक गूंजा ‘हर-हर महादेव’ वाराणसी। विजया एकादशी की संध्या काशी के लिए केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि लोकआस्था, परंपरा और उल्लास का विराट उत्सव बन गई। सगुन की पीली-पीली हल्दी ने जब भोलेनाथ को दूल्हे के रूप में सजा दिया, तो पूरी नगरी शिवमय हो उठी। बांसफाटक स्थित श्रीमहंत लिंगिया महाराज (शिवप्रसाद पाण्डेय) के आवास ‘धर्म निवास’ से निकली भव्य शोभायात्रा ने टेढ़ीनीम तक ऐसा आध्यात्मिक दृश्य रचा, जिसे देखने हजारों श्रद्धालु उमड़ पड़े। डमरुओं की थाप, शंखनाद और “हर-हर महादेव” के गगनभेदी उद्घोष के बीच शोभायात्रा आगे बढ़ी। मार्ग में जगह-जगह पुष्पवर्षा हुई। महिलाएं मंगलगीत गाती रहीं और युवा शिवभक्ति में झूमते नजर आए। जब यह यात्रा टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पहुंची, तब वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य काशी विश्वनाथ मंदिर की पंचबदन चल प्रतिमा पर विधि-विधान से सगुन की हल्दी अर्पित की गई। हल्दी लगते ही बाबा का स्वरूप दूल्हे के तेज में आलोकित हो उठा। दीपों की आभा, धूप-चंदन की सुवास और मंत्रों की गंभीर ध्वनि ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। लोकगीतों में झूमी काशी, परंपरा ने लिया भावनात्मक रूप हल्दी अनुष्ठान के दौरान महिलाओं के कंठ से निकले मंगलस्वर पूरे परिसर में गूंजते रहे— “पीली-पीली हल्दी भोला के लगावा सखी, जल्दी-जल्दी अड़भंगी के भस्म छुड़ावा सखी…” इसके साथ ही और भी लोकगीत गूंजे— “हल्दी के रंग में रंगलें महादेव, गौरा के संग सजे आज देवाधिदेव…” “भोला के अंगेना सजी आज बारात, हल्दी लगावें सखियन, गावे मंगल गात…” इन गीतों ने स्पष्ट कर दिया कि काशी में शिव केवल आराध्य नहीं, बल्कि घर के दूल्हे हैं। यहां हर रस्म में परिवार जैसा अपनापन झलकता है। 52 थालों में सजी श्रद्धा, ससुराल से निभी परंपरा शोभायात्रा की विशेषता रही 52 थालों में सजा चढ़ावा। इन थालों में हल्दी, चंदन, फल, मेवा और मांगलिक सामग्री सजाई गई थी। श्रद्धालुओं ने इन्हें सिर पर धारण कर बाबा के विवाहोत्सव में अपनी सहभागिता निभाई। बाबा के ससुराल माने जाने वाले सारंगनाथ मंदिर से पगड़ी बांधे ससुरालीजन हल्दी लेकर पहुंचे। यह दृश्य किसी पारंपरिक विवाह से कम नहीं था। श्रीमहंत लिंगिया महाराज के नेतृत्व में ससुराली परंपरा निभाई गई। मार्ग में श्रद्धालुओं ने जयघोष किया, बच्चों ने डमरू बजाया और महिलाओं ने मंगलगीतों से वातावरण को भावपूर्ण बना दिया। 11 वैदिक ब्राह्मणों के मंत्रोच्चार से संपन्न हुआ पूजन टेढ़ीनीम पहुंचने पर 11 वैदिक ब्राह्मणों ने विधि-विधान से पूजन संपन्न कराया। मंत्रों की गूंज और घी के दीपों की रोशनी के बीच बाबा की पंचबदन प्रतिमा पर हल्दी अर्पित की गई। यह क्षण शिव विवाह की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक बना। श्रद्धालुओं ने इसे अत्यंत मंगलकारी माना और बाबा के दूल्हा स्वरूप के दर्शन कर स्वयं को धन्य समझा। नवरत्न जड़ित छत्र तले सजा राजसी स्वरूप सायंकाल आयोजन से जुड़े संजीव रत्न मिश्र ने बाबा का भव्य श्रृंगार किया। पारंपरिक आभूषणों और पुष्पमालाओं से सुसज्जित बाबा का स्वरूप देखते ही बन रहा था। इसी क्रम में महंत वाचस्पति तिवारी के सानिध्य में नवरत्न जड़ित छत्र का विधिवत पूजन किया गया। छत्र के नीचे विराजमान बाबा का स्वरूप राजसी और अलौकिक प्रतीत हुआ—मानो स्वयं कैलाशपति विवाहोत्सव के लिए काशी के आंगन में विराजे हों। श्रद्धालु देर रात तक दर्शन करते रहे और वातावरण में भक्ति की अविरल धारा बहती रही। धर्म निवास से टेढ़ीनीम तक उमड़ा आस्था का सैलाब बांसफाटक स्थित धर्म निवास से लेकर टेढ़ीनीम तक का मार्ग केवल शोभायात्रा का रास्ता नहीं रहा, बल्कि आस्था की जीवंत धारा बन गया। हर गली-चौराहे पर श्रद्धालु खड़े होकर शोभायात्रा का स्वागत करते रहे। “हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के उद्घोष से पूरा क्षेत्र गुंजायमान रहा। युवाओं की टोली डमरू बजाती आगे बढ़ी तो महिलाएं थाल सजाकर मंगलगीत गाती रहीं। शिव विवाह की पहली आहट, महाशिवरात्रि की ओर बढ़ते कदम विजया एकादशी पर चढ़ी यह सगुन की हल्दी शिव विवाह की रस्मों की पहली आहट है। अब महाशिवरात्रि तक काशी में विवाहोत्सव की तैयारियां और तेज होंगी। हल्दी की यह रस्म केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव है। यहां परंपरा केवल निभाई नहीं जाती—उसे जिया जाता है, संजोया जाता है और पीढ़ियों तक आगे बढ़ाया जाता है। आस्था, उल्लास और लोकसंस्कृति का संगम पीली-पीली हल्दी के रंग में रची यह शाम एक बार फिर साबित कर गई कि काशी की पहचान उसकी जीवंत लोकपरंपराओं में बसती है। 52 थालों में सजी श्रद्धा, पगड़ी बांधे ससुरालीजन, वैदिक मंत्रों की गूंज और नवरत्न जड़ित छत्र के नीचे सजा दूल्हा स्वरूप—इन सबने मिलकर एक ऐसा दृश्य रचा, जो काशी की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत चित्र बन गया। विजया एकादशी की यह संध्या शिव विवाह की औपचारिक शुरुआत के रूप में याद रखी जाएगी। अब पूरा शहर अपने दूल्हे बाबा की बारात के इंतजार में है—और काशी, एक बार फिर, शिवभक्ति की अनुपम छटा में डूबी हुई है।1