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चित्रकूट गौरव दिवस: रामनवमी पर 21 लाख दीयों से जगमगाएगा मंदाकिनी तट
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चित्रकूट गौरव दिवस: रामनवमी पर 21 लाख दीयों से जगमगाएगा मंदाकिनी तट
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- घंसौर तहसील के कहानी वन परिक्षेत्र अंतर्गत दुर्जनपुर गांव में उस समय हड़कंप मच गया, जब गांव के पास खेत में एक तेंदुआ नजर आया। बताया जा रहा है कि तेंदुआ खेतों से होते हुए गांव की ओर बढ़ता दिखाई दिया, जिससे ग्रामीणों में दहशत का माहौल बन गया। शनिवार, 28 मार्च 2026 ग्रामीणों ने तेंदुए का वीडियो भी बना लिया, जो अब क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। तेंदुए की आहट से लोग अपने घरों में दुबक गए और बच्चों को बाहर न निकलने की हिदायत दी गई। घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग का अमला मौके पर पहुंचा। वन विभाग के एसडीओ गोपाल सिंह ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि तेंदुए को सुरक्षित रूप से जंगल की ओर खदेड़ दिया गया है। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन गांव में अभी भी डर का माहौल बना हुआ है। वन विभाग ने ग्रामीणों से सतर्क रहने और अकेले खेतों की ओर न जाने की अपील की है1
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- Post by Salim khan1
- आदिवासी बहुल क्षेत्र मवई इन दिनों महुआ की मिठास से सराबोर है। जंगल की धरती पर बिछे महुआ के फूल केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यह यहां के हजारों परिवारों की आजीविका का आधार हैं। सुबह की पहली किरण से पहले ही महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग और बच्चे टोकरी-बोरे लेकर जंगल की ओर निकल पड़ते हैं। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने का जरिया है—जहां हर गिरा हुआ फूल उनके घर के चूल्हे को जलाने की उम्मीद बन जाता है। जंगल की हरियाली और साल का वैभव मवई का वन क्षेत्र अपनी अनूठी प्रकृति के कारण विशेष पहचान रखता है। जब अन्य स्थानों पर पतझड़ के कारण पेड़ सूने हो जाते हैं, तब यहां के साल वृक्ष निरंतर हरियाली बनाए रखते हैं। साल के पत्ते धीरे-धीरे गिरते हैं और उसी क्रम में नए पत्ते आते रहते हैं, जिससे जंगल साल भर जीवंत और हरा-भरा दिखाई देता है। महुआ के बाद साल में फूल और फल (बीज/वीजा) लगते हैं, जो ग्रामीणों की आय का दूसरा बड़ा स्रोत है। पहले इन वन उपजों की खरीदी सहकारी समितियों और वन विभाग के माध्यम से समर्थन मूल्य पर होती थी, जिससे ग्रामीणों को उचित दाम मिल जाता था। लेकिन वर्तमान में यह व्यवस्था कमजोर हो गई है, जिससे ग्रामीणों को अपनी मेहनत का फल औने-पौने दामों पर व्यापारियों को बेचना पड़ रहा है। आजीविका का एकमात्र आधार मवई क्षेत्र में रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं। खेती भी पूरी तरह मौसम पर निर्भर है। ऐसे में महुआ और साल बीज ही ग्रामीणों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इन्हीं से मिलने वाली आय से वे बीज, बैल, खाद, बच्चों की पढ़ाई और दैनिक जरूरतों की पूर्ति करते हैं। मनरेगा जैसी योजनाएं कागजों तक सीमित होकर रह गई हैं। निजी रोजगार के अवसर नगण्य हैं। परिणामस्वरूप वन संपदा ही यहां के लोगों का एकमात्र सहारा बन गई है। लेकिन जब इस संपदा का उचित मूल्य नहीं मिलता, तो यह सहारा भी कमजोर पड़ने लगता है। वन कटाई : बढ़ता हुआ संकट वन विभाग द्वारा निरंतर और अनियंत्रित कटाई से जंगलों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। जहां पहले घने वृक्षों की छाया थी, वहां अब खालीपन नजर आने लगा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में यह वनांचल अपनी पहचान खो सकता है। वन कटाई के दुष्परिणाम केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं हैं जल स्रोतों का सूखना वन्य जीवों का पलायन जलवायु असंतुलन ग्रामीणों की आय में गिरावट यह संकट पर्यावरणीय होने के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक भी है। बाजार और मूल्य का असंतुलन एक ओर शहरों में महुआ से बने उत्पाद—जैसे मिठाइयां, चॉकलेट और अन्य खाद्य सामग्री—महंगे दामों पर बिकते हैं, वहीं दूसरी ओर वनांचल में महुआ का मूल्य इतना कम मिलता है कि मजदूरी तक नहीं निकल पाती। यह स्पष्ट रूप से बाजार व्यवस्था की असमानता को दर्शाता है। इसी प्रकार, महुआ से पारंपरिक रूप से बनाई जाने वाली शराब भी ग्रामीणों के लिए आय का स्रोत है, लेकिन उसे न तो उचित पहचान मिल पाई है और न ही बेहतर बाजार। संभावनाएं और समाधान यदि सरकार और समाज मिलकर प्रयास करें, तो मवई का वनांचल आत्मनिर्भरता का एक आदर्श मॉडल बन सकता है। महुआ और साल बीज की समर्थन मूल्य पर खरीदी पुनः शुरू की जाए। टोना-पत्तल (पत्तों से बने उत्पाद) जैसी वन उपज को भी बाजार और न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाए। मनरेगा और अन्य रोजगार योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। वन कटाई पर नियंत्रण रखते हुए स्थानीय समुदाय को वन प्रबंधन में भागीदार बनाया जाए। महुआ आधारित उत्पादों (खाद्य पदार्थ और पेय) पर शोध कर उनकी गुणवत्ता, स्वाद और सुगंध में सुधार किया जाए, ताकि उन्हें बड़े बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक स्थान मिल सके। महुआ से बनने वाले पारंपरिक पेय को वैज्ञानिक तरीके से विकसित कर उसे कानूनी और आर्थिक रूप से संगठित उद्योग का रूप दिया जाए, जिससे आदिवासी समुदाय को सीधा लाभ मिल सके। मवई का जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि वहां के आदिवासी समाज की जीवनरेखा है। महुआ की खुशबू में उनकी आशाएं बसती हैं और साल के वृक्षों में उनका भविष्य छिपा है। यदि जंगल सुरक्षित रहेगा, तो ही यह जीवन चक्र चलता रहेगा। अन्यथा, यह वनांचल केवल स्मृतियों और कहानियों में सिमट कर रह जाएगा। वनों का संरक्षण केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के अस्तित्व की रक्षा है, जिनकी रोजी-रोटी इन जंगलों से जुड़ी हुई है।1
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- Post by प्रशांत पटैल1
- Post by Neelesh THAKUR1