सरकार बदलने से विपक्षी दल से जुड़े नगर कौंसिल प्रधान की कुर्सी अपने-आप नहीं जाती Punjab Municipal Act, 1911 की धारा 22 में हटाने के आधार और 2/3 सदस्यों के प्रस्ताव का प्रावधान — संबंधित MLA भी नगर कौंसिल का सदस्य पंजाब। राज्य में सरकार बदलने के बाद अक्सर यह सवाल चर्चा में आता है कि यदि किसी नगर कौंसिल का प्रधान सत्तारूढ़ सरकार के बजाय किसी विपक्षी दल से जुड़ा हुआ है, तो क्या नई सरकार उसे पद से हटा सकती है। कानूनी प्रावधानों के अनुसार केवल राजनीतिक संबंध या सरकार बदलना अपने-आप में प्रधान को पद से हटाने का आधार नहीं बनता। प्रधान को हटाने के लिए Punjab Municipal Act, 1911 में निर्धारित आधार और प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। धारा 22 में क्या है प्रावधान? Punjab Municipal Act, 1911 की धारा 22 के तहत नगर कौंसिल के President या Vice-President को राज्य सरकार द्वारा हटाया जा सकता है। इसके लिए कानून में powers के दुरुपयोग, कर्तव्यों के निर्वहन में habitual failure अथवा नगर कौंसिल के दो-तिहाई सदस्यों द्वारा हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किए जाने का प्रावधान है। कानून के अनुसार यदि दो-तिहाई सदस्यों द्वारा प्रधान को हटाने का प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो प्रस्ताव पारित होते ही प्रधान को suspension में माना जाता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि उसी क्षण अंतिम रूप से पद से हटा दिया गया। अंतिम removal के लिए राज्य सरकार की निर्धारित प्रक्रिया लागू होती है। 21 दिन में देना होता है लिखित जवाब धारा 22 के दूसरे proviso के अनुसार राज्य सरकार द्वारा removal की notification जारी करने से पहले प्रस्तावित कार्रवाई के कारण संबंधित प्रधान को बताए जाने होते हैं। उसे 21 दिन के भीतर लिखित स्पष्टीकरण देने का अवसर दिया जाता है। इसके बाद सरकार कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकती है। Punjab and Haryana High Court के हालिया फैसलों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि धारा 22 के तहत removal की कार्रवाई के लिए संबंधित वैधानिक आधार स्पष्ट रूप से स्थापित होना चाहिए और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत प्रधान को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। 2/3 बहुमत का गणित क्यों महत्वपूर्ण है? धारा 22 में दो-तिहाई सदस्यों के प्रस्ताव की बात होने के कारण नगर कौंसिल की कुल वैधानिक सदस्य संख्या महत्वपूर्ण हो जाती है। सामान्य गणित के अनुसार: कुल संबंधित सदस्य × 2 ÷ 3 = दो-तिहाई मसलन, यदि किसी स्थिति में कुल संबंधित सदस्य 16 हों, तो दो-तिहाई 10⅔ होगा और दो-तिहाई की पूर्ण संख्या तक पहुंचने के लिए 11 सदस्यों की आवश्यकता होगी। इसी प्रकार 22 सदस्यों में 15 और 25 सदस्यों में 17 का आंकड़ा दो-तिहाई सीमा तक पहुंचता है। हालांकि किसी वास्तविक नगर कौंसिल में केवल निर्वाचित पार्षदों की संख्या देखकर यह गणना करना पर्याप्त नहीं है। कानून के अनुसार नगर कौंसिल की सदस्यता में शामिल सभी संबंधित सदस्यों की स्थिति देखना जरूरी है। MLA की सदस्यता और वोट का क्या महत्व है? Punjab Municipal Act, 1911 की धारा 12(3) के अनुसार Municipal Council में राज्य विधानसभा के वे सभी सदस्य भी शामिल होते हैं, जिनकी विधानसभा constituencies नगर क्षेत्र को पूरी तरह या आंशिक रूप से cover करती हैं। 1994 के संशोधन के बाद MLA की भूमिका में महत्वपूर्ण बदलाव आया और उन्हें वोट देने का अधिकार भी मिला। इसका मतलब है कि किसी वर्तमान नगर कौंसिल के मामले में संबंधित MLA की वैधानिक सदस्यता और voting status को नजरअंदाज करके दो-तिहाई बहुमत की गणना करना उचित नहीं होगा। उदाहरण के तौर पर यदि किसी नगर कौंसिल में 24 निर्वाचित पार्षद और एक संबंधित MLA है, तो कुल सदस्य संख्या 25 मानी जाने वाली स्थिति में दो-तिहाई सीमा 16⅔ होगी। ऐसे में 17 सदस्यों का समर्थन आवश्यक हो सकता है। यदि 16 पार्षद प्रस्ताव के पक्ष में हों और संबंधित MLA का वैध वोट भी प्रस्ताव के पक्ष में हो, तो संख्या 17 तक पहुंच सकती है। हालांकि वास्तविक मामले में सदस्यता, लागू प्रावधान और मतदान की वैधता की स्वतंत्र रूप से जांच आवश्यक होगी। पुराने और नए मामलों में अंतर MLA के मतदान अधिकार को लेकर पुराने नगर निकायों और 1994 के संशोधन के बाद गठित नगरपालिकाओं की स्थिति में अंतर रहा है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 1994 के संशोधन की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया था कि संशोधित धारा 12 के तहत संबंधित विधानसभा सदस्य को नगर कौंसिल की सदस्यता और मतदान का अधिकार दिया गया। इसलिए किसी पुराने मामले के न्यायिक निर्णय को वर्तमान नगर कौंसिल पर सीधे लागू करने से पहले संबंधित समय की कानून व्यवस्था और नगर निकाय की स्थिति देखना आवश्यक है। 2/3 प्रस्ताव के बाद क्या होता है? यदि धारा 22 के तहत आवश्यक दो-तिहाई सदस्यों का removal resolution पारित होता है, तो प्रधान suspension में माना जाता है। ऐसी स्थिति में नगर कौंसिल की बैठकों की अध्यक्षता संबंधी कानून में भी विशेष व्यवस्था है। इसके बाद राज्य सरकार द्वारा removal की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है और संबंधित प्रधान को अपना लिखित पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है। प्रधान का हटना और पूरी नगर कौंसिल का भंग होना अलग-अलग प्रधान को हटाने की प्रक्रिया और पूरी Municipality को dissolve करने की कार्रवाई दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। प्रधान के संबंध में मुख्य प्रावधान Section 22 में है, जबकि Municipality के dissolution से संबंधित अलग प्रावधान लागू होते हैं। इसलिए केवल प्रधान के खिलाफ कार्रवाई को पूरी नगर कौंसिल को भंग करने के बराबर नहीं माना जा सकता। कानूनी स्थिति का सार कानून के प्रावधानों और न्यायिक व्याख्याओं से यह स्पष्ट होता है कि केवल राज्य सरकार बदलने या नगर कौंसिल प्रधान के विपक्षी दल से जुड़े होने के कारण प्रधान अपने-आप पद से नहीं हटता। हटाने के लिए Section 22 में निर्धारित कानूनी आधार या दो-तिहाई सदस्यों द्वारा removal resolution तथा उसके बाद निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। साथ ही संबंधित MLA की सदस्यता और मतदान की स्थिति भी वास्तविक मामले में 2/3 की गणना को प्रभावित कर सकती है। नोट: यह रिपोर्ट सामान्य कानूनी जानकारी पर आधारित है। किसी विशेष नगर कौंसिल के प्रधान के मामले में वास्तविक सदस्य संख्या, संबंधित MLA की स्थिति, प्रस्ताव की वैधता, बैठक की प्रक्रिया, सरकारी आदेश और उस समय लागू कानून/संशोधनों की जांच के बाद ही अंतिम कानूनी निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
सरकार बदलने से विपक्षी दल से जुड़े नगर कौंसिल प्रधान की कुर्सी अपने-आप नहीं जाती Punjab Municipal Act, 1911 की धारा 22 में हटाने के आधार और 2/3 सदस्यों के प्रस्ताव का प्रावधान — संबंधित MLA भी नगर कौंसिल का सदस्य पंजाब। राज्य में सरकार बदलने के बाद अक्सर यह सवाल चर्चा में आता है कि यदि किसी नगर कौंसिल का प्रधान सत्तारूढ़ सरकार के बजाय किसी विपक्षी दल से जुड़ा हुआ है, तो क्या नई सरकार उसे पद से हटा सकती है। कानूनी प्रावधानों के अनुसार केवल राजनीतिक संबंध या सरकार बदलना अपने-आप में प्रधान को पद से हटाने का आधार नहीं बनता। प्रधान को हटाने के लिए Punjab Municipal Act, 1911 में निर्धारित आधार और प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। धारा 22 में क्या है प्रावधान? Punjab Municipal Act, 1911 की धारा 22 के तहत नगर कौंसिल के President या Vice-President को राज्य सरकार द्वारा हटाया जा सकता है। इसके लिए कानून में powers के दुरुपयोग, कर्तव्यों के निर्वहन में habitual failure अथवा नगर कौंसिल के दो-तिहाई सदस्यों द्वारा हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किए जाने का प्रावधान है। कानून के अनुसार यदि दो-तिहाई सदस्यों द्वारा प्रधान को हटाने का प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो प्रस्ताव पारित होते ही प्रधान को suspension में माना जाता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि उसी क्षण अंतिम रूप से पद से हटा दिया गया। अंतिम removal के लिए राज्य सरकार की निर्धारित प्रक्रिया लागू होती है। 21 दिन में देना होता है लिखित जवाब धारा 22 के दूसरे proviso के अनुसार राज्य सरकार द्वारा removal की notification जारी करने से पहले प्रस्तावित कार्रवाई के कारण संबंधित प्रधान को बताए जाने होते हैं। उसे 21 दिन के भीतर लिखित स्पष्टीकरण देने का अवसर दिया जाता है। इसके बाद सरकार कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकती है। Punjab and Haryana High Court के हालिया फैसलों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि धारा 22 के तहत removal की कार्रवाई के लिए संबंधित वैधानिक आधार स्पष्ट रूप से स्थापित होना चाहिए और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत प्रधान को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। 2/3 बहुमत का गणित क्यों महत्वपूर्ण है? धारा 22 में दो-तिहाई सदस्यों के प्रस्ताव की बात होने के कारण नगर कौंसिल की कुल वैधानिक सदस्य संख्या महत्वपूर्ण हो जाती है। सामान्य गणित के अनुसार: कुल संबंधित सदस्य × 2 ÷ 3 = दो-तिहाई मसलन, यदि किसी स्थिति में कुल संबंधित सदस्य 16 हों, तो दो-तिहाई 10⅔ होगा और दो-तिहाई की पूर्ण संख्या तक पहुंचने के लिए 11 सदस्यों की आवश्यकता होगी। इसी प्रकार 22 सदस्यों में 15 और 25 सदस्यों में 17 का आंकड़ा दो-तिहाई सीमा तक पहुंचता है। हालांकि किसी वास्तविक नगर कौंसिल में केवल निर्वाचित पार्षदों की संख्या देखकर यह गणना करना पर्याप्त नहीं है। कानून के अनुसार नगर कौंसिल की सदस्यता में शामिल सभी संबंधित सदस्यों की स्थिति देखना जरूरी है। MLA की सदस्यता और वोट का क्या महत्व है? Punjab Municipal Act, 1911 की धारा 12(3) के अनुसार Municipal Council में राज्य विधानसभा के वे सभी सदस्य भी शामिल होते हैं, जिनकी विधानसभा constituencies नगर क्षेत्र को पूरी तरह या आंशिक रूप से cover करती हैं। 1994 के संशोधन के बाद MLA की भूमिका में महत्वपूर्ण बदलाव आया और उन्हें वोट देने का अधिकार भी मिला। इसका मतलब है कि किसी वर्तमान नगर कौंसिल के मामले में संबंधित MLA की वैधानिक सदस्यता और voting status को नजरअंदाज करके दो-तिहाई बहुमत की गणना करना उचित नहीं होगा। उदाहरण के तौर पर यदि किसी नगर कौंसिल में 24 निर्वाचित पार्षद और एक संबंधित MLA है, तो कुल सदस्य संख्या 25 मानी जाने वाली स्थिति में दो-तिहाई सीमा 16⅔ होगी। ऐसे में 17 सदस्यों का समर्थन आवश्यक हो सकता है। यदि 16 पार्षद प्रस्ताव के पक्ष में हों और संबंधित MLA का वैध वोट भी प्रस्ताव के पक्ष में हो, तो संख्या 17 तक पहुंच सकती है। हालांकि वास्तविक मामले में सदस्यता, लागू प्रावधान और मतदान की वैधता की स्वतंत्र रूप से जांच आवश्यक होगी। पुराने और नए मामलों में अंतर MLA के मतदान अधिकार को लेकर पुराने नगर निकायों और 1994 के संशोधन के बाद गठित नगरपालिकाओं की स्थिति में अंतर रहा है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 1994 के संशोधन की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया था कि संशोधित धारा 12 के तहत संबंधित विधानसभा सदस्य को नगर कौंसिल की सदस्यता और मतदान का अधिकार दिया गया। इसलिए किसी पुराने मामले के न्यायिक निर्णय को वर्तमान नगर कौंसिल पर सीधे लागू करने से पहले संबंधित समय की कानून व्यवस्था और नगर निकाय की स्थिति देखना आवश्यक है। 2/3 प्रस्ताव के बाद क्या होता है? यदि धारा 22 के तहत आवश्यक दो-तिहाई सदस्यों का removal resolution पारित होता है, तो प्रधान suspension में माना जाता है। ऐसी स्थिति में नगर कौंसिल की बैठकों की अध्यक्षता संबंधी कानून में भी विशेष व्यवस्था है। इसके बाद राज्य सरकार द्वारा removal की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है और संबंधित प्रधान को अपना लिखित पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है। प्रधान का हटना और पूरी नगर कौंसिल का भंग होना अलग-अलग प्रधान को हटाने की प्रक्रिया और पूरी Municipality को dissolve करने की कार्रवाई दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। प्रधान के संबंध में मुख्य प्रावधान Section 22 में है, जबकि Municipality के dissolution से संबंधित अलग प्रावधान लागू होते हैं। इसलिए केवल प्रधान के खिलाफ कार्रवाई को पूरी नगर कौंसिल को भंग करने के बराबर नहीं माना जा सकता। कानूनी स्थिति का सार कानून के प्रावधानों और न्यायिक व्याख्याओं से यह स्पष्ट होता है कि केवल राज्य सरकार बदलने या नगर कौंसिल प्रधान के विपक्षी दल से जुड़े होने के कारण प्रधान अपने-आप पद से नहीं हटता। हटाने के लिए Section 22 में निर्धारित कानूनी आधार या दो-तिहाई सदस्यों द्वारा removal resolution तथा उसके बाद निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। साथ ही संबंधित MLA की सदस्यता और मतदान की स्थिति भी वास्तविक मामले में 2/3 की गणना को प्रभावित कर सकती है। नोट: यह रिपोर्ट सामान्य कानूनी जानकारी पर आधारित है। किसी विशेष नगर कौंसिल के प्रधान के मामले में वास्तविक सदस्य संख्या, संबंधित MLA की स्थिति, प्रस्ताव की वैधता, बैठक की प्रक्रिया, सरकारी आदेश और उस समय लागू कानून/संशोधनों की जांच के बाद ही अंतिम कानूनी निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
- सरकार बदलने से विपक्षी दल से जुड़े नगर कौंसिल प्रधान की कुर्सी अपने-आप नहीं जाती Punjab Municipal Act, 1911 की धारा 22 में हटाने के आधार और 2/3 सदस्यों के प्रस्ताव का प्रावधान — संबंधित MLA भी नगर कौंसिल का सदस्य पंजाब। राज्य में सरकार बदलने के बाद अक्सर यह सवाल चर्चा में आता है कि यदि किसी नगर कौंसिल का प्रधान सत्तारूढ़ सरकार के बजाय किसी विपक्षी दल से जुड़ा हुआ है, तो क्या नई सरकार उसे पद से हटा सकती है। कानूनी प्रावधानों के अनुसार केवल राजनीतिक संबंध या सरकार बदलना अपने-आप में प्रधान को पद से हटाने का आधार नहीं बनता। प्रधान को हटाने के लिए Punjab Municipal Act, 1911 में निर्धारित आधार और प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। धारा 22 में क्या है प्रावधान? Punjab Municipal Act, 1911 की धारा 22 के तहत नगर कौंसिल के President या Vice-President को राज्य सरकार द्वारा हटाया जा सकता है। इसके लिए कानून में powers के दुरुपयोग, कर्तव्यों के निर्वहन में habitual failure अथवा नगर कौंसिल के दो-तिहाई सदस्यों द्वारा हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किए जाने का प्रावधान है। कानून के अनुसार यदि दो-तिहाई सदस्यों द्वारा प्रधान को हटाने का प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो प्रस्ताव पारित होते ही प्रधान को suspension में माना जाता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि उसी क्षण अंतिम रूप से पद से हटा दिया गया। अंतिम removal के लिए राज्य सरकार की निर्धारित प्रक्रिया लागू होती है। 21 दिन में देना होता है लिखित जवाब धारा 22 के दूसरे proviso के अनुसार राज्य सरकार द्वारा removal की notification जारी करने से पहले प्रस्तावित कार्रवाई के कारण संबंधित प्रधान को बताए जाने होते हैं। उसे 21 दिन के भीतर लिखित स्पष्टीकरण देने का अवसर दिया जाता है। इसके बाद सरकार कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकती है। Punjab and Haryana High Court के हालिया फैसलों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि धारा 22 के तहत removal की कार्रवाई के लिए संबंधित वैधानिक आधार स्पष्ट रूप से स्थापित होना चाहिए और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत प्रधान को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। 2/3 बहुमत का गणित क्यों महत्वपूर्ण है? धारा 22 में दो-तिहाई सदस्यों के प्रस्ताव की बात होने के कारण नगर कौंसिल की कुल वैधानिक सदस्य संख्या महत्वपूर्ण हो जाती है। सामान्य गणित के अनुसार: कुल संबंधित सदस्य × 2 ÷ 3 = दो-तिहाई मसलन, यदि किसी स्थिति में कुल संबंधित सदस्य 16 हों, तो दो-तिहाई 10⅔ होगा और दो-तिहाई की पूर्ण संख्या तक पहुंचने के लिए 11 सदस्यों की आवश्यकता होगी। इसी प्रकार 22 सदस्यों में 15 और 25 सदस्यों में 17 का आंकड़ा दो-तिहाई सीमा तक पहुंचता है। हालांकि किसी वास्तविक नगर कौंसिल में केवल निर्वाचित पार्षदों की संख्या देखकर यह गणना करना पर्याप्त नहीं है। कानून के अनुसार नगर कौंसिल की सदस्यता में शामिल सभी संबंधित सदस्यों की स्थिति देखना जरूरी है। MLA की सदस्यता और वोट का क्या महत्व है? Punjab Municipal Act, 1911 की धारा 12(3) के अनुसार Municipal Council में राज्य विधानसभा के वे सभी सदस्य भी शामिल होते हैं, जिनकी विधानसभा constituencies नगर क्षेत्र को पूरी तरह या आंशिक रूप से cover करती हैं। 1994 के संशोधन के बाद MLA की भूमिका में महत्वपूर्ण बदलाव आया और उन्हें वोट देने का अधिकार भी मिला। इसका मतलब है कि किसी वर्तमान नगर कौंसिल के मामले में संबंधित MLA की वैधानिक सदस्यता और voting status को नजरअंदाज करके दो-तिहाई बहुमत की गणना करना उचित नहीं होगा। उदाहरण के तौर पर यदि किसी नगर कौंसिल में 24 निर्वाचित पार्षद और एक संबंधित MLA है, तो कुल सदस्य संख्या 25 मानी जाने वाली स्थिति में दो-तिहाई सीमा 16⅔ होगी। ऐसे में 17 सदस्यों का समर्थन आवश्यक हो सकता है। यदि 16 पार्षद प्रस्ताव के पक्ष में हों और संबंधित MLA का वैध वोट भी प्रस्ताव के पक्ष में हो, तो संख्या 17 तक पहुंच सकती है। हालांकि वास्तविक मामले में सदस्यता, लागू प्रावधान और मतदान की वैधता की स्वतंत्र रूप से जांच आवश्यक होगी। पुराने और नए मामलों में अंतर MLA के मतदान अधिकार को लेकर पुराने नगर निकायों और 1994 के संशोधन के बाद गठित नगरपालिकाओं की स्थिति में अंतर रहा है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 1994 के संशोधन की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया था कि संशोधित धारा 12 के तहत संबंधित विधानसभा सदस्य को नगर कौंसिल की सदस्यता और मतदान का अधिकार दिया गया। इसलिए किसी पुराने मामले के न्यायिक निर्णय को वर्तमान नगर कौंसिल पर सीधे लागू करने से पहले संबंधित समय की कानून व्यवस्था और नगर निकाय की स्थिति देखना आवश्यक है। 2/3 प्रस्ताव के बाद क्या होता है? यदि धारा 22 के तहत आवश्यक दो-तिहाई सदस्यों का removal resolution पारित होता है, तो प्रधान suspension में माना जाता है। ऐसी स्थिति में नगर कौंसिल की बैठकों की अध्यक्षता संबंधी कानून में भी विशेष व्यवस्था है। इसके बाद राज्य सरकार द्वारा removal की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है और संबंधित प्रधान को अपना लिखित पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है। प्रधान का हटना और पूरी नगर कौंसिल का भंग होना अलग-अलग प्रधान को हटाने की प्रक्रिया और पूरी Municipality को dissolve करने की कार्रवाई दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। प्रधान के संबंध में मुख्य प्रावधान Section 22 में है, जबकि Municipality के dissolution से संबंधित अलग प्रावधान लागू होते हैं। इसलिए केवल प्रधान के खिलाफ कार्रवाई को पूरी नगर कौंसिल को भंग करने के बराबर नहीं माना जा सकता। कानूनी स्थिति का सार कानून के प्रावधानों और न्यायिक व्याख्याओं से यह स्पष्ट होता है कि केवल राज्य सरकार बदलने या नगर कौंसिल प्रधान के विपक्षी दल से जुड़े होने के कारण प्रधान अपने-आप पद से नहीं हटता। हटाने के लिए Section 22 में निर्धारित कानूनी आधार या दो-तिहाई सदस्यों द्वारा removal resolution तथा उसके बाद निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। साथ ही संबंधित MLA की सदस्यता और मतदान की स्थिति भी वास्तविक मामले में 2/3 की गणना को प्रभावित कर सकती है। नोट: यह रिपोर्ट सामान्य कानूनी जानकारी पर आधारित है। किसी विशेष नगर कौंसिल के प्रधान के मामले में वास्तविक सदस्य संख्या, संबंधित MLA की स्थिति, प्रस्ताव की वैधता, बैठक की प्रक्रिया, सरकारी आदेश और उस समय लागू कानून/संशोधनों की जांच के बाद ही अंतिम कानूनी निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।1
- ਬਾਬਾ ਸ਼ੇਖ ਫਰੀਦ ਜੀ ਦੇ ਆਗਮਨ ਪੁਰਬ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਸ਼ਹਿਰ ਵਾਸੀਆਂ ਨੂੰ ਅਪੀਲ ਅਤੇ ਬਾਬਾ ਸ਼ੇਖ ਫਰੀਦ ਜੀ ਦੇ ਆਗਮਨ ਪੁਰਬ ਦੀਆਂ ਲੱਖ ਲੱਖ ਮੁਬਾਰਕਾਂ, ਐਡਵੋਕੇਟ ਗਗਨਦੀਪ ਸਿੰਘ ਸੁਖੀਜਾ ਬਾਬਾ ਸ਼ੇਖ ਫਰੀਦ ਜੀ ਦੇ ਆਗਮਨ ਪੁਰਬ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਸ਼ਹਿਰ ਵਾਸੀਆਂ ਨੂੰ ਅਪੀਲ ਅਤੇ ਬਾਬਾ ਸ਼ੇਖ ਫਰੀਦ ਜੀ ਦੇ ਆਗਮਨ ਪੁਰਬ ਦੀਆਂ ਲੱਖ ਲੱਖ ਮੁਬਾਰਕਾਂ, ਐਡਵੋਕੇਟ ਗਗਨਦੀਪ ਸਿੰਘ ਸੁਖੀਜਾ, #BabaSheikhFaridJi #BabaFaridAagmanPurab #AagmanPurab2026 #Faridkot #BabaFaridJi #FaridkotMela #SufiSantBabaFarid #BabaFarid #Punjab #FaridkotNews #AagmanPurab #LakhLakhMubarkan #AdvocateGagandeepSinghSukhija #GagandeepSinghSukhija #CityResidents #ਧੰਨਧੰਨਬਾਬਾਫਰੀਦਜੀ #ਬਾਬਾਫਰੀਦਜੀਆਗਮਨਪੁਰਬ #ਫਰੀਦਕੋਟ #ਆਗਮਨਪੁਰਬ #ਲੱਖਲੱਖਮੁਬਾਰਕਾਂ1
- ਭਗਤ ਗਏ ਮਾਤਾ ਜੀ ਨੂੰ ਲੈਣ ਤੇ ਫਿਰ ਹੋਏਗਾ 19 ਸਤੰਬਰ ਨੂੰ ਸ਼ਹਿਰ ਦੇ ਨਾਮਦੇਵ ਚੋਕ ਚ ਸਾਲਾਨਾ ਜਾਗਰਣ। ਭਗਤ ਗਏ ਮਾਤਾ ਜੀ ਨੂੰ ਲੈਣ ਤੇ ਫਿਰ ਹੋਏਗਾ 19 ਸਤੰਬਰ ਨੂੰ ਸ਼ਹਿਰ ਦੇ ਨਾਮਦੇਵ ਚੋਕ ਚ ਸਾਲਾਨਾ ਜਾਗਰਣ।1
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