सरकारी शिक्षा का मौन संकट: क्या शिक्षक कमजोर हैं या व्यवस्था? सरकारी शिक्षा का मौन संकट: क्या शिक्षक कमजोर हैं या व्यवस्था? गैर-शैक्षिक बोझ, संसाधनों की कमी और सामाजिक विषमता के बीच सरकारी स्कूलों की तुलना—क्या यह न्यायसंगत है? आज के समय में समाज में एक धारणा तेजी से स्थापित की जा रही है कि सरकारी स्कूलों, विशेषकर हिमाचल प्रदेश बोर्ड से संबद्ध विद्यालयों के शिक्षक, निजी एवं सी बी एस ई स्कूलों के शिक्षकों की तुलना में कमजोर हैं। यह धारणा जितनी सरल प्रतीत होती है, उतनी ही भ्रामक और अधूरी भी है। यदि इस विषय को गहराई से समझा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या शिक्षक की क्षमता में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में है जिसमें उसे काम करना पड़ रहा है। सरकारी स्कूलों का शिक्षक आज केवल “शिक्षक” नहीं रहा, बल्कि उसे एक बहुउद्देश्यीय सरकारी कर्मचारी बना दिया गया है। चुनाव ड्यूटी, जनगणना, विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षण, स्वास्थ्य एवं टीकाकरण अभियान, मिड-डे मील प्रबंधन, डेटा एंट्री, बैंकिंग कार्य, सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन, स्कॉलरशिप ऑन लाइन रिकॉर्ड भरना, पुस्तकालय प्रभार और प्रशासनिक रिपोर्टिंग—इन सब कार्यों का बोझ उसके कंधों पर डाल दिया गया है। “जब शिक्षक को पढ़ाने का समय ही नहीं मिलेगा, तो परिणामों की तुलना कैसे न्यायसंगत हो सकती है?” जब एक शिक्षक का अधिकांश समय इन गैर-शैक्षिक कार्यों में व्यतीत हो जाता है, तो उससे यह अपेक्षा करना कि वह निजी और सी बी एस ई स्कूलों के समान परिणाम दे—यह न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि अन्यायपूर्ण भी है। इसके विपरीत, निजी और सी बी एस ई स्कूलों में शिक्षकों को इन कार्यों से लगभग पूर्णतः मुक्त रखा जाता है। वहां शिक्षक का एकमात्र कार्य शिक्षण होता है और उसे पूरा स्टाफ, संसाधन तथा अनुकूल वातावरण भी उपलब्ध कराया जाता है। विडंबना यह है कि सरकार स्वयं नए सी बी एस ई स्कूल खोलते समय यह स्वीकार कर रही है कि वहां शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कार्यों से मुक्त रखा जाएगा और पूर्ण स्टाफ उपलब्ध कराया जाएगा। यदि यही व्यवस्था गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का आधार है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यही व्यवस्था हिमाचल शिक्षा बोर्ड के स्कूलों में क्यों लागू नहीं की जाती। जमीनी हकीकत: - "रिक्त पद और एकल शिक्षक स्कूल" सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति और भी गंभीर है। हजारों पद रिक्त हैं— 10,000 से 12,000 पद रिक्त पड़े हैं। अनेक विद्यालय एकल शिक्षक के सहारे चल रहे हैं और कई स्थानों पर डेप्यूटेशन के आधार पर कार्य किया जा रहा है। ऐसे में इन विद्यालयों के परिणामों की तुलना निजी और सी बी एस ई स्कूलों से करना वस्तुतः आंकड़ों के भ्रम से अधिक कुछ नहीं है। तुलना का दूसरा पक्ष: "बच्चों की सामाजिक पृष्ठभूमि" तुलना केवल शिक्षकों के आधार पर नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर भी की जानी चाहिए। निजी और सी बी एस ई स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे उन परिवारों से आते हैं जो आर्थिक रूप से सक्षम, शिक्षित और जागरूक होते हैं। वे अपने बच्चों को घर पर भी पढ़ाते हैं या ट्यूशन की व्यवस्था भी करते हैं। इसके विपरीत, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे— गरीब, मजदूर, सर्वहारा वर्ग से आते हैं। इनमें दिव्यांग छात्र भी होते हैं और कमजोर मानसिक एवं बौद्धिक क्षमता वाले विद्यार्थी भी होते हैं, जिन्हें समावेशी शिक्षा के अंतर्गत एक ही कक्षा में पढ़ाया जाता है। “समान संसाधन नहीं, समान पृष्ठभूमि नहीं—फिर समान परिणाम की अपेक्षा क्यों?” जब अभिभावकों के पास अपने बच्चों को पढ़ाने का समय और संसाधन दोनों नहीं हैं, तो ऐसे बच्चों से निजी स्कूलों के बच्चों के समान प्रदर्शन की अपेक्षा करना वस्तुतः वास्तविकता से मुंह मोड़ना है। 👉 शिक्षा में “रेफरल मॉडल” की आवश्यकता:- यदि सी बी एस ई स्कूलों को वास्तव में “उच्च गुणवत्ता” के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, तो उनका उपयोग भी उसी उद्देश्य के अनुरूप होना चाहिए। जैसे चिकित्सा क्षेत्र में गंभीर रोगियों को उच्च संस्थानों में रेफर किया जाता है, उसी प्रकार— सरकारी स्कूलों के उन छात्रों को, जो अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रहे, सी बी एस ई विद्यालय में रेफर किया जाना चाहिए। यदि वहां के शिक्षक ऐसे छात्रों को सामान्य या उत्कृष्ट स्तर तक ले आते हैं, तभी उन्हें इंसेंटिव देना न्यायोचित होगा। अन्यथा केवल एक स्क्रीनिंग टेस्ट के आधार पर सी बी एस ई स्कूलों के शिक्षकों को इंसेंटिव देना— न तो वैधानिक रूप से उचित है, न ही शैक्षिक दृष्टि से तार्किक। क्योंकि सभी शिक्षक हिमाचल प्रदेश सरकार ने एक ही भर्ती और पदोन्नति नियम के तहत भर्ती किए हैं,जिनकी शैक्षणिक योग्यताएं भी एक समान है। विभाग भी एक ही शिक्षा विभाग है। बस बोर्ड बदल दिए जाएंगे। फिर एक बोर्ड में शिक्षकों को इंसेंटिव और दूसरे में कुछ नहीं। यह घोर विडम्बना है। हां यदि ये सी बी एस ई में जाने वाले शिक्षक विषय विशेषज्ञों की तरह काम करें,जैसे चिकित्सा विभाग में होता है कि जिसका इलाज निचले हस्पताल में नहीं होता उसे उच्च हस्पताल में भेजा जाता है। ठीक यही व्यवस्था शिक्षा विभाग में की जाए कि जो बच्चे हिमाचल प्रदेश शिक्षा बोर्ड में ठीक से पढ़ न पाएं या समझ न पाए तो उन्हें सी बी एस ई स्कूलों में भर्ती किया जाए और वहां के योग्य शिक्षकों की निगरानी में उचित निदान प्राप्त कर सके। तभी इंसेंटिव वैधानिक है। वरना वहीं होगा कि इन सी बी एस ई स्कूलों में उच्च बौद्धिक और मानसिक क्षमता वाले बच्चे पढ़ेंगे और उन्हें ही वे सी बी एस ई स्कूलों वाले मॉडल शिक्षक पढ़ाएंगे।जिन्हें कोई भी पढ़ा सकता है। जरूरत तो उन बच्चों के बारे सोचने की है,जो कमजोर बौद्धिक क्षमता और कमजोर मानसिक क्षमता के हैं। पिछड़े,गरीब,वंचित,सर्वहारा और दिव्यांगों बच्चों के लिए विशेष शिक्षकों की जरूरत है। यहां उल्टा किया जा रहा है, जो निरन्तर गलत होता जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों की अनदेखी :- सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सी बी एस ई स्कूल कहां खोले जा रहे हैं? जहां पहले से सड़क, संसाधन और सुविधाएं उपलब्ध हैं—यानी शहरों और कस्बों में। जबकि वास्तविक आवश्यकता कहां है? ठेठ ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां से बच्चों का पलायन सबसे अधिक हो रहा है। हिमाचल प्रदेश की लगभग 80 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है, फिर भी शिक्षा सुधार की शुरुआत शहरों से ही क्यों? "सी बी एस ई स्कूलों की स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिकता से होनी चाहिए, जहां शिक्षा का वास्तविक अभाव है। हिमाचल प्रदेश की अधिकांश आबादी गांवों में रहती है, परंतु सुविधाएं आजादी के 75 साल बाद भी शहरों से शुरू की जाती हैं, जहां सुविधाएं पहले से ही उन्नत हैं। वे भले ही निजी स्कूलों में हो पर उपलब्ध हैं। समस्या तो ठेठ ग्रामीण क्षेत्रों की हैं,जहां उच्च गुणवत्तायुक्त शिक्षा का नितान्त अभाव है और अभिभावक अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए अपने बच्चों को शहर ले जाते हैं। घरों में बूढ़े बजुर्ग बुढ़ापे में अकेलेपन का शिकार होते जा रहे हैं और भारतीय परिवार व्यवस्था भी विकृत होती जा रही है। होना तो यह चाहिए कि हर पंचायत में एक एक बोर्डिंग स्कूल खुले और उस स्कूल में डे और इवनिंग के लिए अलग अलग स्टाफ हो। ताकि दिन में बच्चों की पढ़ाई कक्षा में हो और शाम को होम वर्क,कोचिंग अन्य सह शैक्षणिक गतिविधियां करवाई जाए। आज के व्यस्त वातावरण में अभिभावकों के पास अपने बच्चों को घर में पढ़ाने का समय नहीं है और ग्रामीण क्षेत्रों में ट्यूशन की भी उचित व्यवस्था नहीं हो पाती है। इसलिए इन स्कूलों की छात्र हित में नितान्त आवश्यकता है। भारत की प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था भी इसी प्रकार की थी। छात्र गुरुओं के हवाले होते थे। " अंग्रेजी माध्यम: आवश्यकता या मनोवैज्ञानिक दबाव? आज अंग्रेजी माध्यम को लेकर एक अनावश्यक होड़ पैदा की जा रही है। क्या जापान और चीन जैसे देश अपनी मातृभाषा में शिक्षा देकर विश्व में प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहे? सच्चाई यह है कि बच्चा अपनी मातृभाषा में ही विषय को गहराई से समझता है, जबकि दूसरी भाषा में वह भाषा के जाल में उलझ जाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी स्पष्ट रूप से कहती है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में दी जानी चाहिए। हिन्दी भाषी राज्यों में तो अंग्रेजी मीडियम को अनिवार्य बनाना यूं भी विडम्बना है। अंग्रेजी विषय के रूप में पढ़ाई जाए न कि माध्यम बनाया जाए। अन्यथा इसके दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं होंगे। यह व्यवस्था भविष्य की पीढ़ी को न ही तो हिंदी का छोड़ेगी न अंग्रेजी का बना पाएगी। दोहरी शिक्षा व्यवस्था: भविष्य के लिए खतरा आज एक खतरनाक प्रवृत्ति उभर रही है— समाज के नीति-निर्माता, अधिकारी और शिक्षित वर्ग और सम्पन्न लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, जबकि सरकारी स्कूल केवल वंचित वर्गों के बच्चों तक सीमित होते जा रहे हैं। यह केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का भी प्रश्न है। इससे भविष्य में यह अवधारणा बन जाएगी कि ये HP बोर्ड के स्कूल तो गरीबों और कमजोरों के स्कूल है। उच्च मध्य वर्ग से ऊपर वाले लोग इन स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ना अपनी हेठी समझेंगे, जो भविष्य के समाज के लिए अच्छा नहीं है। इससे समाज का वर्गीकरण हो जाएगा। “जब समाज का नेतृत्व ही सरकारी शिक्षा से अलग हो जाएगा, तो सुधार की उम्मीद किससे की जाएगी?” 👉 साहसिक समाधान की आवश्यकता यदि सरकार वास्तव में सुधार चाहती है, तो उसे— शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कार्यों से मुक्त करना होगा, रिक्त पदों को भरना होगा, ग्रामीण क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी होगी और एक समान शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी। एक राष्ट्र ,एक बोर्ड और एक पाठ्यक्रम की व्यवस्था बनानी होगी। तभी शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक स्तर पर लोकतांत्रिक न्याय होगा। ✍️ निष्कर्ष :- आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि शिक्षक से पढ़ाने का समय छीन लिया गया है, और फिर उसी से परिणाम की अपेक्षा की जा रही है।जब शिक्षक को पढ़ाने ही नहीं दिया जाएगा, तो वह परिणाम कैसे देगा? यह केवल एक शिक्षक का प्रश्न नहीं है—यह देश के भविष्य का प्रश्न है।
सरकारी शिक्षा का मौन संकट: क्या शिक्षक कमजोर हैं या व्यवस्था? सरकारी शिक्षा का मौन संकट: क्या शिक्षक कमजोर हैं या व्यवस्था? गैर-शैक्षिक बोझ, संसाधनों की कमी और सामाजिक विषमता के बीच सरकारी स्कूलों की तुलना—क्या यह न्यायसंगत है? आज के समय में समाज में एक धारणा तेजी से स्थापित की जा रही है कि सरकारी स्कूलों, विशेषकर हिमाचल प्रदेश बोर्ड से संबद्ध विद्यालयों के शिक्षक, निजी एवं सी बी एस ई स्कूलों के शिक्षकों की तुलना में कमजोर हैं। यह धारणा जितनी सरल प्रतीत होती है, उतनी ही भ्रामक और अधूरी भी है। यदि इस विषय को गहराई से समझा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या शिक्षक की क्षमता में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में है जिसमें उसे काम करना पड़ रहा है। सरकारी स्कूलों का शिक्षक आज केवल “शिक्षक” नहीं रहा, बल्कि उसे एक बहुउद्देश्यीय सरकारी कर्मचारी बना दिया गया है। चुनाव ड्यूटी, जनगणना, विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षण, स्वास्थ्य एवं टीकाकरण अभियान, मिड-डे मील प्रबंधन, डेटा एंट्री, बैंकिंग कार्य, सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन, स्कॉलरशिप ऑन लाइन रिकॉर्ड भरना, पुस्तकालय प्रभार और प्रशासनिक रिपोर्टिंग—इन सब कार्यों का बोझ उसके कंधों पर डाल दिया गया है। “जब शिक्षक को पढ़ाने का समय ही नहीं मिलेगा, तो परिणामों की तुलना कैसे न्यायसंगत हो सकती है?” जब एक शिक्षक का अधिकांश समय इन गैर-शैक्षिक कार्यों में व्यतीत हो जाता है, तो उससे यह अपेक्षा करना कि वह निजी और सी बी एस ई स्कूलों के समान परिणाम दे—यह न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि अन्यायपूर्ण भी है। इसके विपरीत, निजी और सी बी एस ई स्कूलों में शिक्षकों को इन कार्यों से लगभग पूर्णतः मुक्त रखा जाता है। वहां शिक्षक का एकमात्र कार्य शिक्षण होता है और उसे पूरा स्टाफ, संसाधन तथा अनुकूल वातावरण भी उपलब्ध कराया जाता है। विडंबना यह है कि सरकार स्वयं नए सी बी एस ई स्कूल खोलते समय यह स्वीकार कर रही है कि वहां शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कार्यों से मुक्त रखा जाएगा और पूर्ण स्टाफ उपलब्ध कराया जाएगा। यदि यही व्यवस्था गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का आधार है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यही व्यवस्था हिमाचल शिक्षा बोर्ड के स्कूलों में क्यों लागू नहीं की जाती। जमीनी हकीकत: - "रिक्त पद और एकल शिक्षक स्कूल" सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति और भी गंभीर है। हजारों पद रिक्त हैं— 10,000 से 12,000 पद रिक्त पड़े हैं। अनेक विद्यालय एकल शिक्षक के सहारे चल रहे हैं और कई स्थानों पर डेप्यूटेशन के आधार पर कार्य किया जा रहा है। ऐसे में इन विद्यालयों के परिणामों की तुलना निजी और सी बी एस ई स्कूलों से करना वस्तुतः आंकड़ों के भ्रम से अधिक कुछ नहीं है। तुलना का दूसरा पक्ष: "बच्चों की सामाजिक पृष्ठभूमि" तुलना केवल शिक्षकों के आधार पर नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर भी की जानी चाहिए। निजी और सी बी एस ई स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे उन परिवारों से आते हैं जो आर्थिक रूप से सक्षम, शिक्षित और जागरूक होते हैं। वे अपने बच्चों को घर पर भी पढ़ाते हैं या ट्यूशन की व्यवस्था भी करते हैं। इसके विपरीत, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे— गरीब, मजदूर, सर्वहारा वर्ग से आते हैं। इनमें दिव्यांग छात्र भी होते हैं और कमजोर मानसिक एवं बौद्धिक क्षमता वाले विद्यार्थी भी होते हैं, जिन्हें समावेशी शिक्षा के अंतर्गत एक ही कक्षा में पढ़ाया जाता है। “समान संसाधन नहीं, समान पृष्ठभूमि नहीं—फिर समान परिणाम की अपेक्षा क्यों?” जब अभिभावकों के पास अपने बच्चों को पढ़ाने का समय और संसाधन दोनों नहीं हैं, तो ऐसे बच्चों से निजी स्कूलों के बच्चों के समान प्रदर्शन की अपेक्षा करना वस्तुतः वास्तविकता से मुंह मोड़ना है। 👉 शिक्षा में “रेफरल मॉडल” की आवश्यकता:- यदि सी बी एस ई स्कूलों को वास्तव में “उच्च गुणवत्ता” के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, तो उनका उपयोग भी उसी उद्देश्य के अनुरूप होना चाहिए। जैसे चिकित्सा क्षेत्र में गंभीर रोगियों को उच्च संस्थानों में रेफर किया जाता है, उसी प्रकार— सरकारी स्कूलों के उन छात्रों को, जो अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रहे, सी बी एस ई विद्यालय में रेफर किया जाना चाहिए। यदि वहां के शिक्षक ऐसे छात्रों को सामान्य या उत्कृष्ट स्तर तक ले आते हैं, तभी उन्हें इंसेंटिव देना न्यायोचित होगा। अन्यथा केवल एक स्क्रीनिंग टेस्ट के आधार पर सी बी एस ई स्कूलों के शिक्षकों को इंसेंटिव देना— न तो वैधानिक रूप से उचित है, न ही शैक्षिक दृष्टि से तार्किक। क्योंकि सभी शिक्षक हिमाचल प्रदेश सरकार ने एक ही भर्ती और पदोन्नति नियम के तहत भर्ती किए हैं,जिनकी शैक्षणिक योग्यताएं भी एक समान है। विभाग भी एक ही शिक्षा विभाग है। बस बोर्ड बदल दिए जाएंगे। फिर एक बोर्ड में शिक्षकों को इंसेंटिव और दूसरे में कुछ नहीं। यह घोर विडम्बना है। हां यदि ये सी बी एस ई में जाने वाले शिक्षक विषय विशेषज्ञों की तरह काम करें,जैसे चिकित्सा विभाग में होता है कि जिसका इलाज निचले हस्पताल में नहीं होता उसे उच्च हस्पताल में भेजा जाता है। ठीक यही व्यवस्था शिक्षा विभाग में की जाए कि जो बच्चे हिमाचल प्रदेश शिक्षा बोर्ड में ठीक से पढ़ न पाएं या समझ न पाए तो उन्हें सी बी एस ई स्कूलों में भर्ती किया जाए और वहां के योग्य शिक्षकों की निगरानी में उचित निदान प्राप्त कर सके। तभी इंसेंटिव वैधानिक है। वरना वहीं होगा कि इन सी बी एस ई स्कूलों में उच्च बौद्धिक और मानसिक क्षमता वाले बच्चे पढ़ेंगे और उन्हें ही वे सी बी एस ई स्कूलों वाले मॉडल शिक्षक पढ़ाएंगे।जिन्हें कोई भी पढ़ा सकता है। जरूरत तो उन बच्चों के बारे सोचने की है,जो कमजोर बौद्धिक क्षमता और कमजोर मानसिक क्षमता के हैं। पिछड़े,गरीब,वंचित,सर्वहारा और दिव्यांगों बच्चों के लिए विशेष शिक्षकों की जरूरत है। यहां उल्टा किया जा रहा है, जो निरन्तर गलत होता जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों की अनदेखी :- सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सी बी एस ई स्कूल कहां खोले जा रहे हैं? जहां पहले से सड़क, संसाधन और सुविधाएं उपलब्ध हैं—यानी शहरों और कस्बों में। जबकि वास्तविक आवश्यकता कहां है? ठेठ ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां से बच्चों का पलायन सबसे अधिक हो रहा है। हिमाचल प्रदेश की लगभग 80 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है, फिर भी शिक्षा सुधार की शुरुआत शहरों से ही क्यों? "सी बी एस ई स्कूलों की स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिकता से होनी चाहिए, जहां शिक्षा का वास्तविक अभाव है। हिमाचल प्रदेश की अधिकांश आबादी गांवों में रहती है, परंतु सुविधाएं आजादी के 75 साल बाद भी शहरों से शुरू की जाती हैं, जहां सुविधाएं पहले से ही उन्नत हैं। वे भले ही निजी स्कूलों में हो पर उपलब्ध हैं। समस्या तो ठेठ ग्रामीण क्षेत्रों की हैं,जहां उच्च गुणवत्तायुक्त शिक्षा का नितान्त अभाव है और अभिभावक अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए अपने बच्चों को शहर ले जाते हैं। घरों में बूढ़े बजुर्ग बुढ़ापे में अकेलेपन का शिकार होते जा रहे हैं और भारतीय परिवार व्यवस्था भी विकृत होती जा रही है। होना तो यह चाहिए कि हर पंचायत में एक एक बोर्डिंग स्कूल खुले और उस स्कूल में डे और इवनिंग के लिए अलग अलग स्टाफ हो। ताकि दिन में बच्चों की पढ़ाई कक्षा में हो और शाम को होम वर्क,कोचिंग अन्य सह शैक्षणिक गतिविधियां करवाई जाए। आज के व्यस्त वातावरण में अभिभावकों के पास अपने बच्चों को घर में पढ़ाने का समय नहीं है और ग्रामीण क्षेत्रों में ट्यूशन की भी उचित व्यवस्था नहीं हो पाती है। इसलिए इन स्कूलों की छात्र हित में नितान्त आवश्यकता है। भारत की प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था भी इसी प्रकार की थी। छात्र गुरुओं के हवाले होते थे। " अंग्रेजी माध्यम: आवश्यकता या मनोवैज्ञानिक दबाव? आज अंग्रेजी माध्यम को लेकर एक अनावश्यक होड़ पैदा की जा रही है। क्या जापान और चीन जैसे देश अपनी मातृभाषा में शिक्षा देकर विश्व में प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहे? सच्चाई यह है कि बच्चा अपनी मातृभाषा में ही विषय को गहराई से समझता है, जबकि दूसरी भाषा में वह भाषा के जाल में उलझ जाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी स्पष्ट रूप से कहती है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में दी जानी चाहिए। हिन्दी भाषी राज्यों में तो अंग्रेजी मीडियम को अनिवार्य बनाना यूं भी विडम्बना है। अंग्रेजी विषय के रूप में पढ़ाई जाए न कि माध्यम बनाया जाए। अन्यथा इसके दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं होंगे। यह व्यवस्था भविष्य की पीढ़ी को न ही तो हिंदी का छोड़ेगी न अंग्रेजी का बना पाएगी। दोहरी शिक्षा व्यवस्था: भविष्य के लिए खतरा आज एक खतरनाक प्रवृत्ति उभर रही है— समाज के नीति-निर्माता, अधिकारी और शिक्षित वर्ग और सम्पन्न लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, जबकि सरकारी स्कूल केवल वंचित वर्गों के बच्चों तक सीमित होते जा रहे हैं। यह केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का भी प्रश्न है। इससे भविष्य में यह अवधारणा बन जाएगी कि ये HP बोर्ड के स्कूल तो गरीबों और कमजोरों के स्कूल है। उच्च मध्य वर्ग से ऊपर वाले लोग इन स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ना अपनी हेठी समझेंगे, जो भविष्य के समाज के लिए अच्छा नहीं है। इससे समाज का वर्गीकरण हो जाएगा। “जब समाज का नेतृत्व ही सरकारी शिक्षा से अलग हो जाएगा, तो सुधार की उम्मीद किससे की जाएगी?” 👉 साहसिक समाधान की आवश्यकता यदि सरकार वास्तव में सुधार चाहती है, तो उसे— शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कार्यों से मुक्त करना होगा, रिक्त पदों को भरना होगा, ग्रामीण क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी होगी और एक समान शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी। एक राष्ट्र ,एक बोर्ड और एक पाठ्यक्रम की व्यवस्था बनानी होगी। तभी शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक स्तर पर लोकतांत्रिक न्याय होगा। ✍️ निष्कर्ष :- आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि शिक्षक से पढ़ाने का समय छीन लिया गया है, और फिर उसी से परिणाम की अपेक्षा की जा रही है।जब शिक्षक को पढ़ाने ही नहीं दिया जाएगा, तो वह परिणाम कैसे देगा? यह केवल एक शिक्षक का प्रश्न नहीं है—यह देश के भविष्य का प्रश्न है।
- *सरदार पटेल विश्वविद्यालय मंडी में ABVP का हंगामा | कुलपति का घेराव, 10 दिन का अल्टीमेटम | Mandi News*1
- Hamari wife Anjali Ghar se chale gaye hai Ham apni wife Anjali Ko Bulana Chahte Hain Hamari wife Anjali Hamare Sath 11 mahine rahi hai Hamare wife Anjali ke Garv per Hamari Pyar Ke Nishani Thi unhone Apne Hathon Se Hi Maar Diya Fir Bhi Ham apni wife Anjali ko ghar per Bulana Chahte Hain kripya Karke Aapko Hamari wife Anjali Mile To unko batana ki aapka patidev Ghar per bula raha hai aur aapko Apni Jaan Se Bhi Jyada Pyar Karta Hai3
- Turn your bedroom into a calm, aesthetic escape. Soft tones, clean lines, and cozy vibes that feel like a dream every day. For interior design ideas and customized solutions, contact Decoory Interiors 📩 DM for inquiries 📞 Contact us: 9821545511 📍Location: GF -71, Gaur City Center, Greater Noida West, Gautam Buddha Nagar, Uttar Pradesh 2013181
- रिपोर्ट 30 मार्च बुद्धि सिंह ठाकुर सैंज। पीएम श्री आदर्श वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय सैंज का वर्ष 2025 26 का Eagerly परिणाम घोषित कर दिया गया है जिसमें प्रधानाचार्य मनोज महाजन द्वारा कक्षा छठी सातवीं, नवी तथा जमा एक के परीक्षा परिणाम घोषित किए गए छठी कक्षा में दीवान ठाकुर ने 1600 में से 1383 अंक हासिल कर प्रथम स्थान प्राप्त किया है। परीक्षाओं में मुद्दा प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को स्कूल प्रबंधन द्वारा सम्मान भी दिया गया तथा उनके उज्जवल भविष्य की कामना की गई1
- Post by Himachal Ab Tak1
- Ladange Saathi Theater Garup Patiala Punjab Written by Director Inayat Ali ji1
- सुजानपुर हिमाचल प्रदेश में वाहनों पर प्रवेश कर के मुद्दे पर प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ता एवं पूर्व विधायक राजेंद्र राणा ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू पर करारा हमला बोला है। राजेंद्र राणा ने कहा कि प्रवेश कर में बढ़ोतरी से बाहरी राज्यों से हिमाचल में रोजमर्रा का सामान लाने वाले व्यापारियों पर भारी बोझ पड़ेगा, जिसका सीधा असर आम जनता पर होगा और प्रदेश में जरूरत का सामान और महंगा मिलेगा। राजेंद्र राणा ने कहा कि एक तरफ नरेंद्र मोदी द्वारा हिमाचल के लिए वित्तीय सहायता के रूप में ₹3,920 करोड़ जारी किए गए हैं, वहीं दूसरी तरफ हिमाचल सरकार पेट्रोल और डीजल पर पाँच रुपये बढ़ाने और करों में वृद्धि कर जनता को निचोड़ने की नीति अपना रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की जिद के आगे प्रदेश की जनता को नुकसान उठाना पड़ रहा है और प्रवेश कर बढ़ाने का फैसला तुरंत प्रभाव से वापस लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे फैसलों से हिमाचल प्रदेश की छवि पहले ही खराब हो चुकी है और अब बची-खुची कसर भी पूरी हो जाएगी। फर्क केवल आम जनता को पड़ता है, लेकिन यह बात मुख्यमंत्री समझ नहीं पा रहे हैं। राणा ने मुख्यमंत्री सुक्खू से सवाल उठाते हुए कहा कि दिल्ली के रेडिसन होटल में कमरा नंबर 411 में 72 घंटे तक वह क्या कर रहे थे। यदि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है तो इस बारे में जनता को स्पष्ट जवाब देना चाहिए। इस मुद्दे पर उनकी खामोशी से जनता के बीच मुख्यमंत्री की छवि और खराब हो रही है और यदि जल्द जवाब नहीं दिया गया तो स्थिति और गंभीर होगी।1
- रिवालसर स्कूल का 100% रिजल्ट 🔥 श्रुति ने 96.3% के साथ किया टॉप | Mandi School Result 20261