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पांगी की 33KV बिजली परियोजना पर बड़ा सवाल डॉ जनक राज विधायक भरमौर पांगी विधानसभा के शून्य काल में विधायक डॉ. जनक राज ने उठाया गंभीर मुद्दा। पांगी घाटी में करोड़ों की 33KV विद्युत लाइन परियोजना बिना Forest Clearance के शुरू करने का प्रयास — काम बीच में रुका। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग। ⚡ पांगी जैसे दुर्गम जनजातीय क्षेत्र में बिजली जीवनरेखा है। ⚡ प्रशासनिक लापरवाही से जनता को भुगतनी पड़ रही है कीमत। ⚡ विधायक ने दी चेतावनी — जरूरत पड़ी तो मुद्दा सदन से सड़क तक जाएगा।
PANGI NEWS 24
पांगी की 33KV बिजली परियोजना पर बड़ा सवाल डॉ जनक राज विधायक भरमौर पांगी विधानसभा के शून्य काल में विधायक डॉ. जनक राज ने उठाया गंभीर मुद्दा। पांगी घाटी में करोड़ों की 33KV विद्युत लाइन परियोजना बिना Forest Clearance के शुरू करने का प्रयास — काम बीच में रुका। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग। ⚡ पांगी जैसे दुर्गम जनजातीय क्षेत्र में बिजली जीवनरेखा है। ⚡ प्रशासनिक लापरवाही से जनता को भुगतनी पड़ रही है कीमत। ⚡ विधायक ने दी चेतावनी — जरूरत पड़ी तो मुद्दा सदन से सड़क तक जाएगा।
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- विधानसभा के शून्य काल में विधायक डॉ. जनक राज ने उठाया गंभीर मुद्दा। पांगी घाटी में करोड़ों की 33KV विद्युत लाइन परियोजना बिना Forest Clearance के शुरू करने का प्रयास — काम बीच में रुका। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग। ⚡ पांगी जैसे दुर्गम जनजातीय क्षेत्र में बिजली जीवनरेखा है। ⚡ प्रशासनिक लापरवाही से जनता को भुगतनी पड़ रही है कीमत। ⚡ विधायक ने दी चेतावनी — जरूरत पड़ी तो मुद्दा सदन से सड़क तक जाएगा।1
- किलाड़ (पांगी घाटी): जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में बुधवार को पंगवाल समुदाय का प्रमुख लोकपर्व ‘जुकारू’ एवं ‘पड़ीद’ पूरे हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। अमावस्या की रात्रि को ‘सिल्ल’ के रूप में जुकारू उत्सव की शुरुआत होती है, जबकि अमावस्या के अगले दिन चंद्रमा की प्रथम तिथि को पड़ीद मनाया जाता है। यह दिन विशेष रूप से पितरों को समर्पित माना जाता है। सूर्य अर्घ्य से होता है पड़ीद का शुभारंभ पड़ीद के दिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात लोग भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर पर्व का शुभारंभ करते हैं। इसके बाद छोटे सदस्य घर के बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। चरण स्पर्श से पहले ‘जेवरा’ के फूल एक-दूसरे को भेंट करने की परंपरा निभाई जाती है। जेवरा गेहूं या मक्की के दानों से तैयार की गई कोमल कलियां होती हैं, जिन्हें जुकारू से लगभग 10–15 दिन पूर्व विशेष विधि से उगाया जाता है। घर का मुखिया ‘राजावली’ के समक्ष माथा टेककर प्रार्थना करता है कि समस्त नकारात्मक शक्तियां नाग लोक को प्रस्थान करें और धरती पर सुख-शांति बनी रहे। पितरों की पूजा और सूर्य अर्घ्य के बाद पशुधन को भी पकवान खिलाकर जुकारू किया जाता है। घर लौटते समय शुभ वचन कहे जाते हैं, जिनका उत्तर गृहलक्ष्मी ‘शगुन’ के रूप में देती हैं। पारिवारिक मिलन और सामूहिक उत्सव पर्व के अवसर पर पूरा परिवार एक-दूसरे के चरण स्पर्श कर गले मिलता है। घर में तैयार घी मंडे और अन्य पारंपरिक व्यंजन परोसे जाते हैं। इसके बाद परिवार के सदस्य, गृहस्वामिनी को छोड़कर, भोजपत्र में पकवान सजाकर गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के घर ‘जुकारू भेंट’ लेकर जाते हैं। जेवरा के फूल अर्पित कर आशीर्वाद लिया जाता है। मेजबान परिवार अतिथियों का स्वागत पारंपरिक पकवानों, मांस और स्थानीय पेय से करता है। किलाड़ में रात दो बजे से परंपरा पांगी मुख्यालय किलाड़ में पड़ीद उत्सव की शुरुआत रात दो बजे से ही हो जाती है। प्रातःकाल लोग समीपवर्ती प्राचीन शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ और नाग देवता को जुकारू भेंट अर्पित करते हैं। परंपरा के अनुसार, मंदिर में पूजा के बाद चौकी किलाड़ स्थित ऐतिहासिक राजकोठी में जाकर राजा को भी जुकारू भेंट किया जाता है। यह परंपरा राजतंत्र काल से चली आ रही है। मान्यता है कि पूर्व समय में धरवास और किरयूनी क्षेत्र के लोग भी इस अवसर पर किलाड़ पहुंचते थे, किंतु एक बार भारी हिमपात के कारण वे शामिल नहीं हो सके। तब से किलाड़ के लोगों ने इस परंपरा को अपने स्तर पर निरंतर बनाए रखा है। जेवरा फूल का विशेष महत्व जुकारू पर्व में ‘जेवरा’ का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। माघ पूर्णिमा के तीसरे दिन मिट्टी में भेड़-बकरियों के बारीक गोबर को मिलाकर उसमें गेहूं और मक्की के बीज डाले जाते हैं। लगभग 10–12 दिनों में तैयार हुई इन कलियों का उपयोग 12 दिनों तक फूल के रूप में किया जाता है। स्थानीय पुजारी जयराम के अनुसार, जेवरा की कलियां जितनी अच्छी और शीघ्र तैयार होती हैं, उसे आने वाले वर्ष में अच्छी फसल का संकेत माना जाता है। पड़ीद के दिन सूर्य भगवान को भोग लगाने के बाद बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है। पौराणिक और लोकमान्यताएं जुकारू पर्व से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन अवतार में महादानी राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। राजा बलि के त्याग से प्रसन्न होकर भगवान ने वरदान दिया कि माघ और फाल्गुन मास की विशेष अमावस्याओं पर पृथ्वी पर उनकी पूजा होगी। पांगी का जुकारू पर्व इसी मान्यता से जुड़ा माना जाता है। एक अन्य लोककथा के अनुसार, क्षेत्र में राणा और ठाकुरों के बीच लंबे समय तक संघर्ष रहता था। आपसी वैमनस्य को समाप्त करने और सामाजिक मेल-मिलाप को बढ़ावा देने के लिए वर्ष में कुछ विशेष दिन आपसी मिलन के लिए निर्धारित किए गए, जिन्हें बाद में ‘जुकारू’ नाम दिया गया। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि कड़ाके की सर्दियों में सामाजिक संपर्क सीमित होने के कारण, विशेषकर विवाहित बेटियों को मायके आने का अवसर देने के उद्देश्य से यह पर्व प्रारंभ हुआ। आस्था, संस्कृति और एकता का प्रतीक जुकारू और पड़ीद केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पंगवाल समुदाय की सांस्कृतिक पहचान, पारिवारिक एकता और सामाजिक समरसता के प्रतीक हैं। पितरों की श्रद्धा, देव पूजन, पारिवारिक मिलन और सामूहिक उत्सव की यह परंपरा आज भी पांगी घाटी की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है। लेख एवं प्रस्तुति कृष्ण चंद राणा लेखक देवभूमि पांगी दर्शन एवं सम्पादक पांगी न्यूज़ टुडे। #पांगीघाटी #किलाड़ #जुकारू #पड़ीद #पंगवालसमुदाय #जनजातीयसंस्कृति #हिमाचलप्रदेश #हिमाचलकीसंस्कृति #लोकपर्व #पारंपरिकत्योहार #देवसंस्कृति #सूर्यअर्घ्य #पितृसमर्पण #संस्कृतिकीझलक #IncredibleHimachal लेख एवं प्रस्तुति कृष्ण चंद राणा लेखक देवभूमि पांगी दर्शन एवं सम्पादक पांगी न्यूज़ टुडे।1
- चंबा: सनसनीखेज वारदात: लोथल में पति-पत्नी की मौत, पुलिस जांच में जुटी। मोहम्मद आशिक चंबा हिमाचल प्रदेश चंबा । भरमौर विधानसभा क्षेत्र की उपतहसील धरवाला के अंतर्गत ग्राम पंचायत लोथल के गांव लोथल में एक हृदयविदारक घटना सामने आई है। यहां एक व्यक्ति द्वारा पत्नी की हत्या करने के बाद स्वयं आत्महत्या करने का मामला सामने आया है। घटना से पूरे क्षेत्र में दहशत और सनसनी फैल गई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार मृतक की पहचान सरवन कुमार पुत्र तानी के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि देर रात पति-पत्नी के बीच विवाद हुआ, जो काफी बढ़ गया। इसी दौरान महिला की मौत हो गई और बाद में व्यक्ति ने भी फांसी लगाकर जान दे दी। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और मामले की जांच शुरू कर दी। साथ ही फॉरेंसिक टीम ने भी घटनास्थल पर पहुंचकर आवश्यक साक्ष्य एकत्र किए हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार व्यक्ति का व्यवहार अक्सर हिंसक रहता था और वह पत्नी के साथ मारपीट करता था। पुलिस ने दोनों शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच पूरी होने के बाद ही घटना के वास्तविक कारणों का स्पष्ट खुलासा हो सकेगा। फिलहाल मामले की विस्तृत जांच जारी है।2
- Post by Mahi Khan1
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- पांगी: जनजातीय क्षेत्र पांगी इन दिनों ‘जुकारू’ पर्व की रंगत में पूरी तरह रंगा हुआ है। बर्फ की सफेद चादर ओढ़े पहाड़, ठंडी हवाओं के बीच घर-घर में जलते दीये और पारंपरिक वेशभूषा में सजे लोग इस पर्व की गरिमा को और भी भव्य बना रहे हैं। स्थानीय बोली में ‘पडीद’ कहलाने वाला यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता, बड़ों के सम्मान और आपसी भाईचारे का जीवंत उत्सव भी है। ब्रह्म मुहूर्त से आरंभ होती है पर्व की पावन शुरुआत। जुकारू के दिन लोग प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि कर नए या स्वच्छ पारंपरिक वस्त्र धारण करते हैं। इसके पश्चात भगवान राजा बलि की पूजा-अर्चना की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार राजा बलि दान, त्याग और समर्पण के प्रतीक माने जाते हैं, इसलिए इस दिन उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है। राजा बलि की पूजा के उपरांत सूर्य भगवान को पुष्प अर्पित कर परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। जैसे ही परिवार का सदस्य पुष्प अर्पित कर घर में प्रवेश करता है, वह “शुभ” कहता है और सामने से “शगण” में उत्तर दिया जाता है। यह परंपरा घर में सकारात्मक ऊर्जा और मंगलकामना का संदेश देती है। जल देवता और ‘चूर’ की पूजा का विशेष महत्व। जुकारू के दिन पनघट से विशेष रूप से जल लाकर जल देवता की पूजा की जाती है। पहाड़ी जीवन में जल का विशेष महत्व है, इसलिए इसे जीवनदाता मानकर आभार प्रकट किया जाता है। घर का मुखिया इस दिन ‘चूर’ अर्थात हल की पूजा करता है। खेती-किसानी पांगी की जीवनरेखा रही है, और हल को समृद्धि व परिश्रम का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा आने वाले कृषि वर्ष के लिए शुभ संकेत मानी जाती है। जुकारू – बड़ों के सम्मान और आशीर्वाद का पर्व। ‘पडीद’ की सुबह होते ही ‘जुकारू’ की विधिवत शुरुआत होती है। जुकारू का शाब्दिक अर्थ है—बड़ों का आदर और सम्मान। घर के छोटे सदस्य बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। बड़े उन्हें दीर्घायु, समृद्धि और सुखी जीवन का आशीर्वाद देते हैं। सर्दियों और भारी बर्फबारी के कारण कई सप्ताह तक लोग अपने घरों में सीमित रहते हैं। ऐसे में जुकारू सामाजिक मेल-मिलाप का भी अवसर बनता है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर गले मिलते हैं और पारंपरिक शब्दों में शुभकामनाएं देते हैं—मिलते समय “तकडा थिया न” और विदा लेते समय “मठे मठे विश” कहा जाता है। सबसे पहले बड़े भाई के घर जाकर सम्मान प्रकट करना परंपरा का हिस्सा है, उसके बाद अन्य संबंधियों और गांववासियों से भेंट की जाती है। इस दिन लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर नई शुरुआत का संकल्प लेते हैं। संस्कृति संरक्षण का जीवंत उदाहरण। जुकारू पर्व पांगी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का माध्यम है। युवा पीढ़ी भी बढ़-चढ़कर इस पर्व में भाग ले रही है, जिससे पारंपरिक रीति-रिवाजों का संरक्षण सुनिश्चित हो रहा है। महिलाएं पारंपरिक व्यंजन तैयार करती हैं और घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। पूरा क्षेत्र उत्सव के रंग में डूबा नजर आता है, और गांव-गांव में आपसी प्रेम और सद्भाव की मिसाल देखने को मिलती है। जनप्रतिनिधियों ने दी शुभकामनाएं। इस अवसर पर भरमौर-पांगी विधायक Dr. Janak Raj, एपीएमसी चेयरमैन Lalit Thakur, जिला कांग्रेस अध्यक्ष Surjit Singh Bharmouri तथा आवासीय आयुक्त पांगी Amandeep Singh ने समस्त पंगवाल समुदाय को जुकारू पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई दी है। उन्होंने कहा कि ऐसे पारंपरिक पर्व हमारी संस्कृति की आत्मा हैं और इन्हें सहेजकर रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। पांगी न्यूज 24 भी जुकारू पर्व से जुड़ी हर गतिविधि और आयोजन की ताजा अपडेट आप तक निरंतर पहुंचाता रहेगा।1