भीलवाड़ा की 428 साल पुरानी अनोखी परंपरा | जिंदा आदमी की निकलती है शव यात्रा | मुर्दे की सवारी शीतला सप्तमी राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र का भीलवाड़ा अपनी अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है। होली के सात दिन बाद शीतला सप्तमी के दिन यहां पिछले 428 वर्षों से “मुर्दे की सवारी” की अनोखी परंपरा निभाई जा रही है। इस परंपरा में एक जिंदा युवक को अर्थी पर लिटाकर उसकी शव यात्रा निकाली जाती है। यह सवारी भीलवाड़ा शहर की चित्तौड़ वालों की हवेली से शुरू होकर शहर के मुख्य मार्गों से गुजरती हुई बड़े मंदिर के पास समाप्त होती है। जुलूस के दौरान अर्थी पर लेटा युवक कभी उठकर बैठ जाता है, कभी हाथ हिलाता है तो कभी पानी भी पी लेता है, जिसे देखकर लोग हैरान रह जाते हैं। इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए भीलवाड़ा ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों से भी हजारों लोग पहुंचते हैं और रंग-गुलाल उड़ाते हुए इस जुलूस में शामिल होते हैं। यह परंपरा मेवाड़ की संस्कृति, आस्था और लोक परंपराओं की एक अनूठी मिसाल है।
भीलवाड़ा की 428 साल पुरानी अनोखी परंपरा | जिंदा आदमी की निकलती है शव यात्रा | मुर्दे की सवारी शीतला सप्तमी राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र का भीलवाड़ा अपनी अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है। होली के सात दिन बाद शीतला सप्तमी के दिन यहां पिछले 428 वर्षों से “मुर्दे की सवारी” की अनोखी परंपरा निभाई जा रही है। इस परंपरा में एक जिंदा युवक को अर्थी पर लिटाकर उसकी शव यात्रा निकाली जाती है। यह सवारी भीलवाड़ा शहर की चित्तौड़ वालों की हवेली से शुरू होकर शहर के मुख्य मार्गों से गुजरती हुई बड़े मंदिर के पास समाप्त होती है। जुलूस के दौरान अर्थी पर लेटा युवक कभी उठकर बैठ जाता है, कभी हाथ हिलाता है तो कभी पानी भी पी लेता है, जिसे देखकर लोग हैरान रह जाते हैं। इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए भीलवाड़ा ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों से भी हजारों लोग पहुंचते हैं और रंग-गुलाल उड़ाते हुए इस जुलूस में शामिल होते हैं। यह परंपरा मेवाड़ की संस्कृति, आस्था और लोक परंपराओं की एक अनूठी मिसाल है।
- राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र का भीलवाड़ा अपनी अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है। होली के सात दिन बाद शीतला सप्तमी के दिन यहां पिछले 428 वर्षों से “मुर्दे की सवारी” की अनोखी परंपरा निभाई जा रही है। इस परंपरा में एक जिंदा युवक को अर्थी पर लिटाकर उसकी शव यात्रा निकाली जाती है। यह सवारी भीलवाड़ा शहर की चित्तौड़ वालों की हवेली से शुरू होकर शहर के मुख्य मार्गों से गुजरती हुई बड़े मंदिर के पास समाप्त होती है। जुलूस के दौरान अर्थी पर लेटा युवक कभी उठकर बैठ जाता है, कभी हाथ हिलाता है तो कभी पानी भी पी लेता है, जिसे देखकर लोग हैरान रह जाते हैं। इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए भीलवाड़ा ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों से भी हजारों लोग पहुंचते हैं और रंग-गुलाल उड़ाते हुए इस जुलूस में शामिल होते हैं। यह परंपरा मेवाड़ की संस्कृति, आस्था और लोक परंपराओं की एक अनूठी मिसाल है।1
- Post by Narendra kumar Regar1
- Post by Jalampura AC morcha adhyaks D.s.1
- Post by Dr CP Patel 8302083835 आयुष हॉस्पिटल1
- 🌷🌷🙏🏻🙏🌷🌷SRI Lakshminath Bhagvan ♥️ SRI SIV SANKAR JI VASAKRAJ MAHARAJ GOVIND 🙏🙏🏻🌹🌹SRI SAWARIYA SETH JI Aapki ♥️ 🙏🏽 JAY Ho JAY Ho Aap hi Aap 🌹🙌🌹🌹🙌🌹🌹Ho Hari Om 🕉 Nmo Bhagvate Vasuydevay Hari Om 🕉1
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