*खैरात खाना पर माफिया का मंगलराज जब साहब के कान पर जूँ नहीं, घूस रेंगती है,* *प्रशासनिक नींद या मिलीभगत का नशा? नसरुद्दीन हैदर ट्रस्ट की नाक के नीचे धरोहर का सौदा,* लखनऊ। नवाबों के शहर में अब तहजीब का नया दौर शुरू हो चुका है। यहाँ की ऐतिहासिक इमारतें अब अपनी मजबूती के लिए नहीं, बल्कि प्रशासन के मौन समर्थन और भ्रष्टाचार के गारे से टिके रहने के लिए जानी जा रही हैं। ताजा मामला विक्टोरिया स्टेट रोड स्थित खैरात खाना का है, जिसे देखकर लगता है कि प्रशासन ने इसे संरक्षित घोषित नहीं किया, बल्कि बिक्री के लिए उपलब्ध की अदृश्य सूची में डाल दिया है। *नगर निगम जोन-2* के कर्ताधर्ता संजय यादव साहब और उनकी टीम को दाद देनी होगी। इलाके में अवैध कब्जा चीख-चीख कर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है, लेकिन साहब ने कानों में कौन सा खास तेल डाला है, इसकी चर्चा पूरे लखनऊ में है। खबरें छप गईं, सीएम पोर्टल पर शिकायतें दर्ज हो गईं, पर मजाल है कि साहब की वातानुकूलित कुर्सी एक इंच भी हिली हो! शायद रद्दी में खबर बेचकर जो चवन्नियां आती हैं, प्रशासन उसे ही अपना असली राजस्व मान बैठा है। नसरुद्दीन हैदर ट्रस्ट की नाक के नीचे चल रहा यह खेल किसी चमत्कार से कम नहीं है। *मुतवल्ली हसन जै़दी* की चुप्पी अब किसी संत की तपस्या जैसी लगने लगी है। जानकार कहते हैं कि यह चुप्पी मुफ्त नहीं है, इसके पीछे अवैध दुकानों से आने वाली उस मलाई का हाथ है, जिसकी खुशबू फाइलों के बंद होने का जश्न मना रही है। आखिर विरासत की बर्बादी की कीमत अगर मोटी रकम से चुकाई जा रही हो, तो नैतिकता की बात करना पुराने जमाने की बात लगती है। बाजार खाला क्षेत्र का भीषण ट्रैफिक जाम और ऐतिहासिक गेट को निगलती दुकानें प्रशासन की सक्रियता का जीता-जागता सबूत हैं। पुलिस की आंखों पर शायद सद्भावना और सुविधा शुल्क की ऐसी पट्टी बंधी है कि उन्हें अतिक्रमण की जगह केवल हरियाली नजर आती है। पूर्व में की गई फोटो खिंचवाओ वाली कार्रवाई ने यह साबित कर दिया कि साहब की रीढ़ की हड्डी या तो मोम की बनी है, या फिर भू-माफियाओं के बटुए ने उसे अपनी सुविधा अनुसार लचीला बना दिया है। ऐसा लगता है कि लखनऊ का नया डेवलपमेंट मॉडल यही है, ऐतिहासिक धरोहरों को तब तक जर्जर होने दो, जब तक कि वो किसी आलीशान कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के लिए प्लॉट न बन जाएं। प्रशासन शायद इसी शुभ मुहूर्त का इंतजार कर रहा है। आज स्थानीय लोग हार मानकर *डीएम साहब* के पास लिखित शिकायत लेकर जा रहे हैं। हालांकि उम्मीद कम ही है, क्योंकि जब पूरा सिस्टम ही सब चंगा सी के मोड में चादर तान कर सो रहा हो, तो जागने की जहमत कौन उठाए?
*खैरात खाना पर माफिया का मंगलराज जब साहब के कान पर जूँ नहीं, घूस रेंगती है,* *प्रशासनिक नींद या मिलीभगत का नशा? नसरुद्दीन हैदर ट्रस्ट की नाक के नीचे धरोहर का सौदा,* लखनऊ। नवाबों के शहर में अब तहजीब का नया दौर शुरू हो चुका है। यहाँ की ऐतिहासिक इमारतें अब अपनी मजबूती के लिए नहीं, बल्कि प्रशासन के मौन समर्थन और भ्रष्टाचार के गारे से टिके रहने के लिए जानी जा रही हैं। ताजा मामला विक्टोरिया स्टेट रोड स्थित खैरात खाना का है, जिसे देखकर लगता है कि प्रशासन ने इसे संरक्षित घोषित नहीं किया, बल्कि बिक्री के लिए उपलब्ध की अदृश्य सूची में डाल दिया है। *नगर निगम जोन-2* के कर्ताधर्ता संजय यादव साहब और उनकी टीम को दाद देनी होगी। इलाके में अवैध कब्जा चीख-चीख कर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है, लेकिन साहब ने कानों में कौन सा खास तेल डाला है, इसकी चर्चा पूरे लखनऊ में है। खबरें छप गईं, सीएम पोर्टल पर शिकायतें दर्ज हो गईं, पर मजाल है कि साहब की वातानुकूलित कुर्सी एक इंच भी हिली हो! शायद रद्दी में खबर बेचकर जो चवन्नियां आती हैं, प्रशासन उसे ही अपना असली राजस्व मान बैठा है। नसरुद्दीन हैदर ट्रस्ट की नाक के नीचे चल रहा यह खेल किसी चमत्कार से कम नहीं है। *मुतवल्ली हसन जै़दी* की चुप्पी अब किसी संत की तपस्या जैसी लगने लगी है। जानकार कहते हैं कि यह चुप्पी मुफ्त नहीं है, इसके पीछे अवैध दुकानों से आने वाली उस मलाई का हाथ है, जिसकी खुशबू फाइलों के बंद होने का जश्न मना रही है। आखिर विरासत की बर्बादी की कीमत अगर मोटी रकम से चुकाई जा रही हो, तो नैतिकता की बात करना पुराने जमाने की बात लगती है। बाजार खाला क्षेत्र का भीषण ट्रैफिक जाम और ऐतिहासिक गेट को निगलती दुकानें प्रशासन की सक्रियता का जीता-जागता सबूत हैं। पुलिस की आंखों पर शायद सद्भावना और सुविधा शुल्क की ऐसी पट्टी बंधी है कि उन्हें अतिक्रमण की जगह केवल हरियाली नजर आती है। पूर्व में की गई फोटो खिंचवाओ वाली कार्रवाई ने यह साबित कर दिया कि साहब की रीढ़ की हड्डी या तो मोम की बनी है, या फिर भू-माफियाओं के बटुए ने उसे अपनी सुविधा अनुसार लचीला बना दिया है। ऐसा लगता है कि लखनऊ का नया डेवलपमेंट मॉडल यही है, ऐतिहासिक धरोहरों को तब तक जर्जर होने दो, जब तक कि वो किसी आलीशान कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के लिए प्लॉट न बन जाएं। प्रशासन शायद इसी शुभ मुहूर्त का इंतजार कर रहा है। आज स्थानीय लोग हार मानकर *डीएम साहब* के पास लिखित शिकायत लेकर जा रहे हैं। हालांकि उम्मीद कम ही है, क्योंकि जब पूरा सिस्टम ही सब चंगा सी के मोड में चादर तान कर सो रहा हो, तो जागने की जहमत कौन उठाए?
- *वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एटा के निर्देशन में क्षेत्राधिकारी सकीट द्वारा थाना मलावन क्षेत्रांतर्गत आमजन में सुरक्षा की भावना उत्पन्न करने के उद्देश्य से भारी पुलिस बल सहित किया गया फ्लैग मार्च।* *(रवेन्द्र जादौन की खास रिपोर्ट एटा)* एटा-वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉ0 इलामारन के निर्देशन में क्षेत्राधिकारी सकीट नीतीश गर्ग द्वारा थाना मलावन क्षेत्रांतर्गत कानून एवं शांति व्यवस्था बनाए रखने, तथा आम जन में सुरक्षा की भावना जागृत करने के उद्देश्य से भारी पुलिस बल के साथ फ्लैग मार्च किया गया। साथ ही सुरक्षा के दृष्टिगत सोशल मीडिया पर किसी भी तरह की अफवाह/भ्रामक सूचना या झूठी सूचना प्रसारित करने वालों के विरुद्ध कार्यवाही करने हेतु शख्त हिदायत दी गयी है तथा सभी से सौहार्द बनाए रखने की अपील की गयी।1
- *खैरात खाना पर माफिया का मंगलराज जब साहब के कान पर जूँ नहीं, घूस रेंगती है,* *प्रशासनिक नींद या मिलीभगत का नशा? नसरुद्दीन हैदर ट्रस्ट की नाक के नीचे धरोहर का सौदा,* लखनऊ। नवाबों के शहर में अब तहजीब का नया दौर शुरू हो चुका है। यहाँ की ऐतिहासिक इमारतें अब अपनी मजबूती के लिए नहीं, बल्कि प्रशासन के मौन समर्थन और भ्रष्टाचार के गारे से टिके रहने के लिए जानी जा रही हैं। ताजा मामला विक्टोरिया स्टेट रोड स्थित खैरात खाना का है, जिसे देखकर लगता है कि प्रशासन ने इसे संरक्षित घोषित नहीं किया, बल्कि बिक्री के लिए उपलब्ध की अदृश्य सूची में डाल दिया है। *नगर निगम जोन-2* के कर्ताधर्ता संजय यादव साहब और उनकी टीम को दाद देनी होगी। इलाके में अवैध कब्जा चीख-चीख कर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है, लेकिन साहब ने कानों में कौन सा खास तेल डाला है, इसकी चर्चा पूरे लखनऊ में है। खबरें छप गईं, सीएम पोर्टल पर शिकायतें दर्ज हो गईं, पर मजाल है कि साहब की वातानुकूलित कुर्सी एक इंच भी हिली हो! शायद रद्दी में खबर बेचकर जो चवन्नियां आती हैं, प्रशासन उसे ही अपना असली राजस्व मान बैठा है। नसरुद्दीन हैदर ट्रस्ट की नाक के नीचे चल रहा यह खेल किसी चमत्कार से कम नहीं है। *मुतवल्ली हसन जै़दी* की चुप्पी अब किसी संत की तपस्या जैसी लगने लगी है। जानकार कहते हैं कि यह चुप्पी मुफ्त नहीं है, इसके पीछे अवैध दुकानों से आने वाली उस मलाई का हाथ है, जिसकी खुशबू फाइलों के बंद होने का जश्न मना रही है। आखिर विरासत की बर्बादी की कीमत अगर मोटी रकम से चुकाई जा रही हो, तो नैतिकता की बात करना पुराने जमाने की बात लगती है। बाजार खाला क्षेत्र का भीषण ट्रैफिक जाम और ऐतिहासिक गेट को निगलती दुकानें प्रशासन की सक्रियता का जीता-जागता सबूत हैं। पुलिस की आंखों पर शायद सद्भावना और सुविधा शुल्क की ऐसी पट्टी बंधी है कि उन्हें अतिक्रमण की जगह केवल हरियाली नजर आती है। पूर्व में की गई फोटो खिंचवाओ वाली कार्रवाई ने यह साबित कर दिया कि साहब की रीढ़ की हड्डी या तो मोम की बनी है, या फिर भू-माफियाओं के बटुए ने उसे अपनी सुविधा अनुसार लचीला बना दिया है। ऐसा लगता है कि लखनऊ का नया डेवलपमेंट मॉडल यही है, ऐतिहासिक धरोहरों को तब तक जर्जर होने दो, जब तक कि वो किसी आलीशान कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के लिए प्लॉट न बन जाएं। प्रशासन शायद इसी शुभ मुहूर्त का इंतजार कर रहा है। आज स्थानीय लोग हार मानकर *डीएम साहब* के पास लिखित शिकायत लेकर जा रहे हैं। हालांकि उम्मीद कम ही है, क्योंकि जब पूरा सिस्टम ही सब चंगा सी के मोड में चादर तान कर सो रहा हो, तो जागने की जहमत कौन उठाए?1
- साधू ने जो फल दिया वह धुंधली ने गाय को खिला दिया जिससे गौकरण का जन्म हुआ . . . . .. . ..1
- Post by Mohit kumar1
- गुस्से से भरी पब्लिक ने जमकर जूते चप्पल बरसाएं और खदेड़ दिया..!! *ऐसे कचरे को डस्टबिन में ही डालें हर राम भक्त मिल कर सभी।1
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- निजी स्कूलों की बढ़ती मनमानी और निजी प्रकासन की किताबों को लेने के दवाब से आक्रोशित भारतीय किसान यूनियन ने प्रेसवार्ता कर कार्रवाई न होने पर आंदोलन की दी चेतावनी ।1
- कानपुर में दिखा आंधी तूफान का कहर | मौसम का बदला रूख़ तेज आंधी तूफान के साथ भारी बारिश ओले से मौसम का रुख बदला कानपुर सहित अन्य जिलों में किसानों पर छाए संकट के बादल | तेज आंधी तूफान से जगह-जगह पेड़ो के गिरने से दबे कई वाहन लोगों को करना पढ़ा भारी नुकसान का सामना |1