logo
Shuru
Apke Nagar Ki App…
  • Latest News
  • News
  • Politics
  • Elections
  • Viral
  • Astrology
  • Horoscope in Hindi
  • Horoscope in English
  • Latest Political News
logo
Shuru
Apke Nagar Ki App…

अन्ना हजारे द्वारा चलाया गया आंदोलन महीनों तक चलाया गया और हिंसा की कोई घटना सामने नहीं आयी जबकि नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के बाद सभी आंदोलन हिंसा उपद्रव और अराजकता से भरे हुए है, इसके पीछे तार्किक वजह क्या है? . आन्दोलन मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है : . नेता निर्देशित केन्द्रीकृत आन्दोलन (Leader Guided Centralized Movement) कार्यकर्ता निर्देशित विकेन्द्रीकृत आन्दोलन (Activist Guided DeCentralized Movement) . (A) नेता निर्देशित केन्द्रीकृत आन्दोलन ( Leader Guided Centralized Movement ) : इस आन्दोलन के केंद्र में हमेशा एक नेता होता है। यह नेता ही इस आन्दोलन को लीड करता है। कभी कभी शीर्ष स्तर पर एक से अधिक यानी 10-15 नेता भी हो सकते है। किन्तु शीर्ष स्तर पर तब भी एक ही चेहरा रहेगा, और शेष सभी 10-15 नेता मानते है कि हम अमुक व्यक्ति के नेतृत्व में काम कर रहे है। . इन 10-15 लोगो के इस झुण्ड के अलावा शेष लोग ब्रेन डेड होते है। नेता इन्हें जो निर्देश देगा ये भीड़ वैसा करेगी। ये भीड़ अपने नेता से प्रश्न नहीं करती, उसके किसी कदम का विरोध नहीं करती, उसकी आलोचना नहीं करती और पूर्ण रूप से आज्ञा का पालन करती है। उनकी इस आज्ञाकारिता को "एकता एवं अनुशासन" के आदर सूचक व्यंजक से संबोधित किया जाता है। . इस प्रकार के आन्दोलन की बॉटम लाइन में कुछ कार्यकर्ता हो सकते है, जिनका दिमाग सक्रिय है, एवं वे पूरी तरह से सोच समझकर अमुक आन्दोलन का समर्थन कर रहे है। किन्तु ध्यान देने वाली बात यह है कि, तब भी इन्हें अपने विवेक से फैसला लेने की अनुमति नहीं होती है। इन्हें नेता द्वारा दिए गये निर्देशों का ही पालन करना होता है। यदि कोई कार्यकर्ता नेता की लाइन से अलग हटकर बात कहेगा तो उसे यह कहकर बाहर कर दिया जाएगा की, यह आदमी अनुशासित नहीं है और हमारी एकता भंग कर रहा है। . चूंकि इस तरह के आन्दोलन का स्विच नेता के हाथ में होता है, अत: इसे खड़ा करना एवं तोडना बहुत आसान है। नेता को दबाने / मारने / खरीदने या इसी प्रकार का कोई समझौता करके आन्दोलन को आसानी से निपटाया जा सकता है। यदि ऐसे आन्दोलन की रिपोर्टिंग पेड मीडिया द्वारा की जा रही है तो इसका नियंत्रण पेड मीडिया के पास रहता है। पेड मीडिया यदि आन्दोलन को रिपोर्ट करना बंद कर देगा तो आन्दोलन टूटने लगेगा और कुछ ही दिन में ढह जाएगा। . दुसरे शब्दों में, इस तरह के आन्दोलन में एक हाथी होता है, जिसके पीछे 1 लाख बकरियां खड़ी होती है। बकरियों का कहना होता है कि, हमारी जगह पर ये हाथी सोचेगा और हाथी जैसा करने को कहेगा हम वैसा करेंगे। इस तरह एक लाख के इस झुण्ड में सिर्फ एक दिमाग है। इससे प्रतिद्वंदी का काम आसान हो जाता है। . अब पूरे झुण्ड को ब्रेन डेड करने के लिए उसे सिर्फ एक गोली चलानी है। वह जैसे तैसे हाथी को कंट्रोल कर लेगा या हाथी को गोली मार देगा। हाथी के मरने के साथ ही, बकरियों में अफरा तफरी मच जाएगी, और आन्दोलन टूट जाएगा। अब बकरियों को नहीं पता कि आगे क्या करना है। अब ये बकरियां तब तक किसी बाड़े में बैठी चारा खाती रहेगी जब तक कोई दूसरा हाथी आकर इन्हें चाबी न दे। स्थिति तब और भी बदतर हो जाती है, जब पेड मीडिया किसी बकरी का फोटो छापकर कर कहता है कि — यही हाथी है !! . भारत की सभी राजनैतिक पार्टियां एवं संगठन इसी मॉडल पर काम करते है। शीर्ष स्तर पर बैठे नेता उन्हें निर्देश भेजते है और सभी सदस्यों को अमुक निर्देशों का पालन करना होता है। मुख्य लक्षण : सोचने और फैसला लेने का काम हमेशा नेता करेगा। नेता आन्दोलन को जिस दिशा में ले जायेगा, आन्दोलनकारी बिना किसी प्रतिरोध के उस दिशा में बढ़ने लगेंगे। उदाहरण : मोहन दास द्वारा किये गए आजादी के सभी आन्दोलन केन्द्रीकृत आन्दोलन थे। मोहन दास इन्हें शुरू भी अपनी मर्जी से करते थे, और ख़त्म भी अपनी मर्जी से। कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि, आन्दोलन कारियों ने मोहन से कहा हो कि -- तायाजी, आप थक गए हो तो थोडा रेस्ट करो। हम अब रुकने वाले नहीं है। जाहिर है, मोहन का आंदोलनों पर हमेशा पूर्ण नियंत्रण रहता था। राम मंदिर पर रथ यात्रा भी इसी तरह का आन्दोलन था। . (B) कार्यकर्ता निर्देशित विकेन्द्रीकृत आन्दोलन ( Activist Guided DeCentralized Movement ) : इसमें शीर्ष स्तर पर नेता नहीं होता। नेता की जगह समानांतर स्तर पर कई छोटे छोटे कार्यकर्ता होते है। ये सभी कार्यकर्ता किसी शीर्ष नेता से निर्देश नहीं लेते है। किसी मुद्दे को लेकर ये अपने छोटे छोटे समूहों के माध्यम से मूवमेंट करते है। किन्तु इन सभी कार्यकर्ताओ का मुद्दा एक ही होने के कारण यह सभी आपस में एलाइन होकर काम करते है। . यदि इन कार्यकर्ताओ को अमुक मुद्दे पर नागरिको का समर्थन मिलने लगता है तो यह आन्दोलन जनआन्दोलन में बदल जाएगा। किन्तु यदि कार्यकर्ता अमुक मुद्दे पर जन समर्थन जुटाने में असफल रहते है तो यह आन्दोलन बढेगा नहीं। किन्तु तब भी यह आन्दोलन एकदम से ख़त्म नही होता है। कार्यकर्ताओ के निर्देशन में कई इकाइयां होती है और वे इसे बनाए रखते है। यदि इस तरह का आन्दोलन बढ़ने लगे तो इसे रोकना काफी मुश्किल होता है। क्योंकि आपको सैंकड़ो एवं हजारो कार्यकर्ताओ से संवाद करना होगा, या उन्हें दबाना, मारना होगा। . मुख्य लक्षण : कार्यकर्ता किसी साझा विषय पर सहमत होते है एवं अपने दिमाग से सोचकर अपने संसाधनों से आन्दोलन आगे बढाते है। यदि आन्दोलन के केंद्र में कोई नेता है तब भी कार्यकर्ता उसके आदेशो का पालन करने के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होते। मतलब, आन्दोलन की दिशा पर कंट्रोल नेता का न होकर कई छोटे छोटे कार्यकर्ताओ का ही होता है। उदाहरण : अहिंसामूर्ती भगत सिंह जी, अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी, अहिन्सामूर्ती महात्मा सच्चिन्द्र्नाथ सान्याल, बारहठ बंधू, आदि सभी क्रांतिकारी इसी फोर्मेट में काम कर रहे थे। उनके पास केंद्र में कोई नेता नहीं था। सभी ने अपने अपने स्तर पर कुछ छोटे छोटे संगठन बना रखे थे और नहीं भी बना रखे थे। वे अपने हिसाब से प्लानिंग बनाते थे, और गतिविधियाँ करते थे। इंदिरा जी खिलाफ शुरू होने वाला आन्दोलन प्रथम चरण में केन्द्रीकृत था। लेकिन इमरजेंसी के कारण यह विकेंद्रीकृत आन्दोलन में बदल गया, और बाद में नागरिको का भी इसे समर्थन मिलने लगा और यह विकेंद्रीकृत जन आन्दोलन बन गया। हालांकि, इस आन्दोलन में शामिल होने वाले कार्यकर्ताओ, नेताओं, नागरिको के पास कोई साझा एजेंडा नहीं था। राजनैतिक दल इसे सिर्फ "इंदिरा हटाओ" की लाइन पर बनाए रखने में कामयाब रहे, और इस लिहाज से आन्दोलन ने अपने कई लक्ष्यों में से एक लक्ष्य हासिल कर लिया था। आरक्षण विरोधी आन्दोलन भी एक विकेन्द्रीकृत आन्दोलन था। . विकेन्द्रित आन्दोलन आन्दोलन के 2 और प्रकार है : . B1. कार्यकर्ता निर्देशित विकेन्द्रीकृत जन आन्दोलन ( Activist Guided DeCentralised Mass Movement ) : जब विकेंद्रीकृत आन्दोलन को जन समर्थन मिलने लगे और आम नागरिक भी इसमें भागीदार हो जाते है तो यह जन आन्दोलन बन जाता है। यदि एक बार जन आन्दोलन खड़ा हो जाए तो इसे रोकने का कोई उपाय नहीं है। यह पूरी तरह से अनियंत्रित होता है, और अमूमन यह अपने लक्ष्य को हासिल करके ही रुकता है। जन आन्दोलन में सत्ता के खिलाफ छिटपुट हिंसा होना मामूली बात है। मतलब, यदि हिंसा शुरू हो गयी है, तो फिर हिंसा रुकेगी भी नहीं। इसी जन आन्दोलन में जब आशय के साथ सशस्त्र संघर्ष शुरू हो जाए तो यह क्रांति बन जाती है। . मुख्य लक्षण : इसमें एवं विकेन्द्रित आन्दोलन में सिर्फ इतना फर्क है कि, जन समर्थन होने के कारण इसका पैमाना बेहद बड़ा हो जाता है। उदाहरण : मैग्नाकार्टा, अमेरिका स्वतंत्रता आन्दोलन, बोल्शेविक क्रांति आदि जनआन्दोलन थे। नन्द वंश के खिलाफ आचार्य चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त जिस आन्दोलन को आगे बढ़ा रहे थे, वह भी एक जनआन्दोलन था। आचार्य एवं चन्द्रगुप्त का इस पर उतना नियंत्रण नहीं रह गया था। . B2. क़ानून ड्राफ्ट के नेतृत्व में कार्यकर्ता निर्देशित विकेंद्रीकृत जन आन्दोलन ( Draft Leaded Activist Guided Mass movement ) : विकेन्द्रित जन आन्दोलन एवं इस आन्दोलन में सिर्फ इतना फर्क है कि इस आन्दोलन के केंद्र में नेता के रूप में एक लिखित दस्तावेज होता है। इस दस्तावेज में स्पष्ट रूप से आन्दोलनकारियों की मांगे आदि लिखी हुयी होती है, और सभी कार्यकर्ता इस लिखित मांग को अपना नेता मानते हुए आन्दोलन को आगे बढाने के लिए अपने अपने हिसाब से अपने संसाधनों से काम करते है। . मुख्य लक्षण : यह जन आन्दोलन नेता विहीन नहीं होता। शीर्ष नेता के रूप में कोई न कोई लिखित दस्तावेज अवश्य होता है। उदाहरण : जूरी कोर्ट आन्दोलन, वोट वापसी पासबुक आन्दोलन, रिक्त भूमि कर आन्दोलन आदि । . ————- . अन्ना के अनशन को आन्दोलन कहना आन्दोलन शब्द का मजाक उड़ाना है। यह एक पैसिव डेमोंस्ट्रेशन था जिसे पेड मीडिया द्वारा पम्प किया जा रहा था। दुसरे शब्दों में यह अनशन का एक शो था !! . (1) द अन्ना शो : 1.1. नेतृत्व : यह एक नेता निर्देशित केन्द्रीकृत शो था और दर्जन भर लोगो की टीम सारे फैसले ले रही थी। अनशन का विषय, स्थान, तिथि, फोर्मेंट आदि सभी कुछ अन्ना एवं अन्ना टीम द्वारा तय किया जाता था। उनके मंच के निचे जो लाख-पचास हजार लोग बैठे थे, उनका काम बैठे रहना था। सोचने एवं फैसले लेने में उनकी भूमिका नगण्य थी। जैसे अन्ना तय करते थे, वैसे सब होता था। . 1.2. कार्यकर्ताओ का समर्थन : कार्यकर्ता या एक्टिविस्ट वह है जो खुद सोचता है और दिशा बनाने के लिए खुद फैसला लेता है। अन्ना के शो में जो भीड़ बैठी थी, उनकी भूमिका सिर्फ टीवी कैमरों के लिए भीड़ बनाने की थी। इनमे ज्यादातर वे लोग भी शामिल थे जिनका जन लोकपाल से कोई लेना देना नहीं था, और मनमोहन सरकार का विरोध करने के लिए वे यहाँ आकर बैठ जाते थे। उनमे से 1% आदमियों ने भी जनलोकपाल के ड्राफ्ट की शक्ल नहीं देखी थी !! . 1.3. जन समर्थन : मुझे नहीं पता कि आपकी उम्र क्या है। लेकिन जब भारत में सिर्फ दूरदर्शन होता था तो हर सप्ताह एक फिल्म आती थी। यह फिल्म शनिवार को सांय 7 बजे दिखाई जाती थी। अब मान लीजिये कि टीवी पर "घरोंदा" आ रही है, तो उस दिन पूरा भारत घरोंदा फिल्म ही देखता था। अब यदि कोई कहे कि लोग घरोंदा इसीलिए देख रहे है क्योंकि लोगो को घरोंदा फिल्म बहुत पसंद है, और घरोंदा पब्लिक डिमांड पर दिखाई जा रही है, मैं ऐसे व्यक्ति को बुद्धिजीवी कहूँगा !! क्योंकि बुद्धिजीवी लोग इस तरह की सामान्य बातों पर विचार नही करते कि, जब एक ही चेनल है, और उस पर सप्ताह में एक ही फिल्म आती है, और आज घरोंदा ही आ रही है, तो घरोंदा ही तो देखेंगे न। शोले किधर से देखेंगे !! . अन्ना का शो शुरू होने से पहले भारत के कितने करोड़ लोगो ने जनलोकपाल लफ्ज के बारे में सुना था !! क्या आपने सुना था !! उन्होंने देश के “सभी” चैनल्स पर जनलोकपाल का शो दिखाना शुरू कर दिया और लोग देखने लगे। टीवी से लोकपाल गायब और लोगो के जेहन से भी गायब !! . मेरा बिंदु यह है कि, जन लोकपाल का समर्थन देश में कभी मौजूद नहीं नहीं था। जिन्हें आप समर्थक कह रहे है वे समर्थक नहीं थे। वे दर्शक थे। जैसे उन्हें घरोंदा दिखाई जा रही थी, वैसे ही जनलोकपाल दिखाया जा रहा था। जैसे दूरदर्शन अध्यक्ष तय करता है कि आज घरोंदा दिखाई जायेगी, वैसे ही पेड मीडिया के स्पोंसर्स ने तय किया कि सभी भारतीयों को यह शो दिखाया जायेगा !! उन्होंने ही इस ड्रामे को आन्दोलन भी कहा और यह भी साबित करने की कोशिस की कि यह जन आन्दोलन था !! . 1.4. अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक शो के प्रसारण के लिए पेमेंट क्यों कर रहे थे ? . भारत ने 2005 में भ्रष्टाचार रोकने के लिए UN ट्रिटी पर साइन किये थे, और इसके प्रावधानों को 2011 तक इम्प्लीमेंट करना था। इस ट्रीटी के अनुसार भारत को केंद्र एवं राज्य स्तर पर एक स्वायत्त संस्था का गठन करना था जिसके पास उच्च स्तर के अधिकारीयों एवं मंत्रियो के खिलाफ जांच करने का अधिकार हो। . मान लीजिये कि वॉल मार्ट को पूरे देश में स्टोर खोलने है। स्टोर के लिए जमीन चाहिए। राज्यों में अलग अलग दलों की सरकारें होती है, अत: हर चरण पर वॉल मार्ट को इन्हें घूस खिलानी होगी। यदि लोकपाल जैसी संस्था बनाकर उसे मुख्यमंत्री के खिलाफ जांच खोलने एवं अरेस्ट करने का पॉवर दे दिया जाए तो वॉल मार्ट का काम आसानी से हो जाता है। क्योंकि तब वॉल मार्ट सिर्फ लोकपाल को खरीद लेगा, और लोकपाल के माध्यम से मुख्यमंत्रियों को धमकाएगा कि मुझे चिल्लर दाम में जमीन दें वर्ना लोकपाल को तेरे पीछे लगा दूंगा !! . 1.5. शो की दिशा : पूरा शो स्क्रिप्टेड था, और पेड मीडिया पर निर्भर था। चूंकि भारत UNAC साइन कर चुका था तो लोकपाल आना ही था। पर ड्राफ्टिंग पर विवाद चल रहा था। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भयंकर वाला लोकपाल चाहते थे। ऐसा लोकपाल जो पीएम और सीबीआई डायरेक्टर को भी जेल में डाल सके !! मतलब, भारत के पीएम को कंट्रोल करने के लिए एक और आदमी !! कोंग्रेस एवं बीजेपी समेत सभी सांसद इस ड्राफ्टिंग के खिलाफ थे। अत: ये सब एकजुट हो गए। तब उन्होंने पेड मीडिया के माध्यम से एक फर्जी आन्दोलन खड़ा करने के लिए फंडिंग करनी शुरू की। उन्होंने अरविन्द केजरीवाल को एप्रोच किया और केजरीवाल जी द अन्ना को दिल्ली ले आये। . दुसरे शब्दों में, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको द्वारा पेड मीडिया के माध्यम से यह ड्रामा खड़ा किया गया था, ताकि जनसमर्थन दिखाकर संसद पर दबाव बनाया जा सके। ( इसके अलावा भी कई राजनैतिक कारण थे ) . 1.6. अन्ना के शो में हिंसा क्यों नहीं हुयी ? दो वजहें है : . 1.6.1. इस तरह के नियंत्रित, स्क्रिप्टेड, नेता निर्देशित और पूरी तरह से पेड मीडिया पर निर्भर शो में जो लोग जुड़े होते है वे स्वत: स्फूर्त नहीं होते है। ऐसे शो में हिंसा सिर्फ तभी होगी जब प्रायोजक हिंसा की स्क्रिप्ट लिखेंगे। शुरू से ही उनकी स्क्रिप्ट इस तरह की थी कि हिंसा उनके एजेंडे में नहीं था। यह एक शूटिंग स्पॉट था। जहाँ मंच था, सामने कुर्सियां थी, जाजम थी, और सभी लोगो एक चार दिवारी में बैठे थे। हिंसा किधर करेंगे ? एक दुसरे के कपडे फाड़ेंगे क्या ? . 1.6.2. खड़ा झुण्ड भीड़ होता है, और यदि झुण्ड को बिठा दिया जाए तो यह सभा बन जाता था। यदि आप लोगो को बिठा देंगे तो उनका दिमाग अलग तरीके से चलने लगता है, और इन्ही लोगो को यदि आप खड़ा कर देंगे ये अलग तरीके से पेश आने लगेंगे। बैठे आदमीयों को यदि आप लाठी एवं पत्थर दे देंगे तो वे इसे हाथ में पकड़ कर नहीं रखेंगे। इसे किनारे रख देंगे, और बोलना, या सुनना शुरू कर देंगे। लेकिन यदि आपने इन्हें खड़ा कर दिया तो अब ये भीड़ है। और थोड़े से आवेश के साथ ही ये हिंसा शुरू कर सकते है। भीड़ का मनोविज्ञान इसी तरह से काम करता है। यदि आपके प्रदर्शन का डिजाइन इस तरह का है की सभी लोग बैठे हुए है तो उन्हें आवेश में नहीं लाया जा सकता, और हिंसा नहीं होगी। . अन्ना के शो में सभी लोगो बैठे हुए थे, अत: यह प्रदर्शन सभा के रूप में चल रहा था। मोहन भी अपने अनशन इसी तर्ज पर किया करता था। वह लोगो को जाजम पर बिठाकर उन्हें भजन आदि गाने पर लगा लेता था। चोरी चोरा में सभा नहीं थी। लोग खड़े थे, अत: उन्होंने थाना फूंक दिया !! . (2) CAA पर विरोध प्रदर्शन : . 2.1. नेतृत्व : इसके केंद्र में कोई नेता नहीं है। पेड मीडिया पर निर्भर कई राजनैतिक पार्टियों के छोटे बड़े नेता है, और ये सभी नेता अलग अलग तरीके से ब्रेन डेड कार्यकर्ताओ को चाबी दे रहे है। किन्तु इनके हाथ में भी प्रदर्शन का निर्णायक नियंत्रण नहीं है। वे सिर्फ इन्हें सड़को पर ठेल रहे है, किन्तु लीड नहीं कर रहे है। चाबी देने के बाद इस तरह के प्रदर्शनो की कोई तय दिशा नहीं होती है। यह किसी भी दिशा में चलना शुरू कर कर देता है। . 2.2. प्लग : असम को छोड़कर शेष देश में प्रदर्शनकारियों को पेड मीडिया द्वारा भ्रमित किया गया है। अब पेड मीडिया के स्पोंसर्स ने इसमें हवा भरना बंद कर दिया है, अत: धीरे धीरे यह शांत हो जाएगा। यदि पेड मीडिया के स्पोंसर्स इसमें ईंधन डालना शुरू करें तो यह फिर से बढ़ने लगेगा। किन्तु पेड मीडिया इसे पम्प नहीं करेगा तो यह आगे नहीं बढेगा, क्योंकि इन्हें जन समर्थन हासिल नहीं है। जन समर्थन लेने के लिए वाजिब वजह होनी चाहिए। जो कि यहाँ मौजूद नहीं है। . 2.3. कैसे पेड मीडिया के प्रायोजको ने इसे ट्रिगर किया ? . संसद ने CAA बिल पास किया था। यदि वे इसे शान्तिपूर्ण ढंग से पास करना चाहते तो उन्हें NRC का नाम लेने की जरूरत ही नहीं थी। लेकिन CAA का भारतीय मुस्लिमो से कोई सरोकार नहीं होने के कारण भारतीय मुस्लिम सड़को पर उतरने से इनकार कर सकते थे। अत: श्री अमित शाह ने संसद में धमकाने के अंदाज में इस बात को बार बार जोर देकर कहा कि, हम NRC लाने वाले है। फिर पेड मीडिया के प्रायोजको ने ध्रुव B के नेताओं, बुद्धिजीवियों एवं मीडिया हाउस से कहा कि वे CAA को NRC से मिक्स करके अपने फोलोवर्स को भ्रमित करें। ध्रुव A के नेताओं, बुद्धिजीवियों, एवं मीडिया हॉउस को कहा गया कि वे अपने फोलोवर्स को जानकारी दें कि भारतीय मुस्लिम जाया तौर पर इस बिल का विरोध कर रहे है !! 2.4. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको को इससे क्या लाभ है ? . अमेरिकी धनिक ईरान के खिलाफ युद्ध में भारत की सेना एवं संसाधनों का इस्तेमाल करना चाहते है। इसके लिए हिन्दू-मुस्लिम तनाव को चरम पर ले जाना जरुरी है। हिन्दू-मुस्लिम दंगे एवं तनाव बढ़ाने से भारत के हिन्दुओ में एंटी-मुस्लिम सेंटिमेंट बनेगा और तब भारत के हिन्दुओ को कन्विंस किया जा सकता है कि, वे ईरान-अफगानिस्तान में भारतीय सेना भेजने का समर्थन करना शुरू करें। . दूसरा कारण, अंतराष्ट्रीय प्रोपेगेंडा है। अभी अंतराष्ट्रीय मीडिया में इस बात को बड़े पैमाने पर रिपोर्ट किया जा रहा है कि, भारत में मुस्लिमों पर जुल्म हो रहा है, और वहां पर हालात बेकाबू होने के कगार पर है। ट्रंप का “भारत में हिन्दू मुस्लिम साथ नहीं रह सकते” बयान इसी कड़ी का हिस्सा था। जब अमेरिका ईरान पर हमला करेगा तो उसे भारत के हिन्दुओ का सहयोग चाहिए, और भारत के हिन्दु-मुस्लिम को आमने सामने लाकर इसी के लिए सधाया जा रहा है। . तीसरी वजह, अमेरिकी धनिक भारत में हिन्दू-मुस्लिम के बीच तनाव को उस उच्च बिंदु तक पहुँचाना चाहते है कि यदि वे “चाहे” तो पेड मीडिया का इस्तेमाल करके किसी भी समय एक सिविल वॉर को ट्रिगर कर सके। और भी इसमें कई पहलू है, मैं फिर किसी जवाब में इस पर विस्तार से लिखूंगा। . 2.5. CAA के प्रदर्शन में हिंसा : इसका स्ट्रक्चर ही ऐसा है कि, हिंसा होने की सम्भावना बढ़ी हुयी है। 90 के दशक में शुरू हुए आरक्षण विरोधी प्रदर्शन, हरियाणा का जाट आरक्षण प्रदर्शन आदि का स्ट्रक्चर भी ऐसा ही था। सड़को पर निकलकर प्रदर्शन करने वाले इस तरह के हुजुम क्यों हिंसक हो जाते है, और किन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित करके इस तरह के हिंसात्मक प्रदर्शनों को रोका जा सकता है, इस बारे में विस्तृत विवरण मैंने इस जवाब में बताया है – देश में बढ़ते हिंसक प्रदर्शन के पीछे किसका हाथ है? .

2 hrs ago
user_Sonu Kumar
Sonu Kumar
गायघाट, मुजफ्फरपुर, बिहार•
2 hrs ago

अन्ना हजारे द्वारा चलाया गया आंदोलन महीनों तक चलाया गया और हिंसा की कोई घटना सामने नहीं आयी जबकि नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के बाद सभी आंदोलन हिंसा उपद्रव और अराजकता से भरे हुए है, इसके पीछे तार्किक वजह क्या है? . आन्दोलन मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है : . नेता निर्देशित केन्द्रीकृत आन्दोलन (Leader Guided Centralized Movement) कार्यकर्ता निर्देशित विकेन्द्रीकृत आन्दोलन (Activist Guided DeCentralized Movement) . (A) नेता निर्देशित केन्द्रीकृत आन्दोलन ( Leader Guided Centralized Movement ) : इस आन्दोलन के केंद्र में हमेशा एक नेता होता है। यह नेता ही इस आन्दोलन को लीड करता है। कभी कभी शीर्ष स्तर पर एक से अधिक यानी 10-15 नेता भी हो सकते है। किन्तु शीर्ष स्तर पर तब भी एक ही चेहरा रहेगा, और शेष सभी 10-15 नेता मानते है कि हम अमुक व्यक्ति के नेतृत्व में काम कर रहे है। . इन 10-15 लोगो के इस झुण्ड के अलावा शेष लोग ब्रेन डेड होते है। नेता इन्हें जो निर्देश देगा ये भीड़ वैसा करेगी। ये भीड़ अपने नेता से प्रश्न नहीं करती, उसके किसी कदम का विरोध नहीं करती, उसकी आलोचना नहीं करती और पूर्ण रूप से आज्ञा का पालन करती है। उनकी इस आज्ञाकारिता को "एकता एवं अनुशासन" के आदर सूचक व्यंजक से संबोधित किया जाता है। . इस प्रकार के आन्दोलन की बॉटम लाइन में कुछ कार्यकर्ता हो सकते है, जिनका दिमाग सक्रिय है, एवं वे पूरी तरह से सोच समझकर अमुक आन्दोलन का समर्थन कर रहे है। किन्तु ध्यान देने वाली बात यह है कि, तब भी इन्हें अपने विवेक से फैसला लेने की अनुमति नहीं होती है। इन्हें नेता द्वारा दिए गये निर्देशों का ही पालन करना होता है। यदि कोई कार्यकर्ता नेता की लाइन से अलग हटकर बात कहेगा तो उसे यह कहकर बाहर कर दिया जाएगा की, यह आदमी अनुशासित नहीं है और हमारी एकता भंग कर रहा है। . चूंकि इस तरह के आन्दोलन का स्विच नेता के हाथ में होता है, अत: इसे खड़ा करना एवं तोडना बहुत आसान है। नेता को दबाने / मारने / खरीदने या इसी प्रकार का कोई समझौता करके आन्दोलन को आसानी से निपटाया जा सकता है। यदि ऐसे आन्दोलन की रिपोर्टिंग पेड मीडिया द्वारा की जा रही है तो इसका नियंत्रण पेड मीडिया के पास रहता है। पेड मीडिया यदि आन्दोलन को रिपोर्ट करना बंद कर देगा तो आन्दोलन टूटने लगेगा और कुछ ही दिन में ढह जाएगा। . दुसरे शब्दों में, इस तरह के आन्दोलन में एक हाथी होता है, जिसके पीछे 1 लाख बकरियां खड़ी होती है। बकरियों का कहना होता है कि, हमारी जगह पर ये हाथी सोचेगा और हाथी जैसा करने को कहेगा हम वैसा करेंगे। इस तरह एक लाख के इस झुण्ड में सिर्फ एक दिमाग है। इससे प्रतिद्वंदी का काम आसान हो जाता है। . अब पूरे झुण्ड को ब्रेन डेड करने के लिए उसे सिर्फ एक गोली चलानी है। वह जैसे तैसे हाथी को कंट्रोल कर लेगा या हाथी को गोली मार देगा। हाथी के मरने के साथ ही, बकरियों में अफरा तफरी मच जाएगी, और आन्दोलन टूट जाएगा। अब बकरियों को नहीं पता कि आगे क्या करना है। अब ये बकरियां तब तक किसी बाड़े में बैठी चारा खाती रहेगी जब तक कोई दूसरा हाथी आकर इन्हें चाबी न दे। स्थिति तब और भी बदतर हो जाती है, जब पेड मीडिया किसी बकरी का फोटो छापकर कर कहता है कि — यही हाथी है !! . भारत की सभी राजनैतिक पार्टियां एवं संगठन इसी मॉडल पर काम करते है। शीर्ष स्तर पर बैठे नेता उन्हें निर्देश भेजते है और सभी सदस्यों को अमुक निर्देशों का पालन करना होता है। मुख्य लक्षण : सोचने और फैसला लेने का काम हमेशा नेता करेगा। नेता आन्दोलन को जिस दिशा में ले जायेगा, आन्दोलनकारी बिना किसी प्रतिरोध के उस दिशा में बढ़ने लगेंगे। उदाहरण : मोहन दास द्वारा किये गए आजादी के सभी आन्दोलन केन्द्रीकृत आन्दोलन थे। मोहन दास इन्हें शुरू भी अपनी मर्जी से करते थे, और ख़त्म भी अपनी मर्जी से। कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि, आन्दोलन कारियों ने मोहन से कहा हो कि -- तायाजी, आप थक गए हो तो थोडा रेस्ट करो। हम अब रुकने वाले नहीं है। जाहिर है, मोहन का आंदोलनों पर हमेशा पूर्ण नियंत्रण रहता था। राम मंदिर पर रथ यात्रा भी इसी तरह का आन्दोलन था। . (B) कार्यकर्ता निर्देशित विकेन्द्रीकृत आन्दोलन ( Activist Guided DeCentralized Movement ) : इसमें शीर्ष स्तर पर नेता नहीं होता। नेता की जगह समानांतर स्तर पर कई छोटे छोटे कार्यकर्ता होते है। ये सभी कार्यकर्ता किसी शीर्ष नेता से निर्देश नहीं लेते है। किसी मुद्दे को लेकर ये अपने छोटे छोटे समूहों के माध्यम से मूवमेंट करते है। किन्तु इन सभी कार्यकर्ताओ का मुद्दा एक ही होने के कारण यह सभी आपस में एलाइन होकर काम करते है। . यदि इन कार्यकर्ताओ को अमुक मुद्दे पर नागरिको का समर्थन मिलने लगता है तो यह आन्दोलन जनआन्दोलन में बदल जाएगा। किन्तु यदि कार्यकर्ता अमुक मुद्दे पर जन समर्थन जुटाने में असफल रहते है तो यह आन्दोलन बढेगा नहीं। किन्तु तब भी यह आन्दोलन एकदम से ख़त्म नही होता है। कार्यकर्ताओ के निर्देशन में कई इकाइयां होती है और वे इसे बनाए रखते है। यदि इस तरह का आन्दोलन बढ़ने लगे तो इसे रोकना काफी मुश्किल होता है। क्योंकि आपको सैंकड़ो एवं हजारो कार्यकर्ताओ से संवाद करना होगा, या उन्हें दबाना, मारना होगा। . मुख्य लक्षण : कार्यकर्ता किसी साझा विषय पर सहमत होते है एवं अपने दिमाग से सोचकर अपने संसाधनों से आन्दोलन आगे बढाते है। यदि आन्दोलन के केंद्र में कोई नेता है तब भी कार्यकर्ता उसके आदेशो का पालन करने के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होते। मतलब, आन्दोलन की दिशा पर कंट्रोल नेता का न होकर कई छोटे छोटे कार्यकर्ताओ का ही होता है। उदाहरण : अहिंसामूर्ती भगत सिंह जी, अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी, अहिन्सामूर्ती महात्मा सच्चिन्द्र्नाथ सान्याल, बारहठ बंधू, आदि सभी क्रांतिकारी इसी फोर्मेट में काम कर रहे थे। उनके पास केंद्र में कोई नेता नहीं था। सभी ने अपने अपने स्तर पर कुछ छोटे छोटे संगठन बना रखे थे और नहीं भी बना रखे थे। वे अपने हिसाब से प्लानिंग बनाते थे, और गतिविधियाँ करते थे। इंदिरा जी खिलाफ शुरू होने वाला आन्दोलन प्रथम चरण में केन्द्रीकृत था। लेकिन इमरजेंसी के कारण यह विकेंद्रीकृत आन्दोलन में बदल गया, और बाद में नागरिको का भी इसे समर्थन मिलने लगा और यह विकेंद्रीकृत जन आन्दोलन बन गया। हालांकि, इस आन्दोलन में शामिल होने वाले कार्यकर्ताओ, नेताओं, नागरिको के पास कोई साझा एजेंडा नहीं था। राजनैतिक दल इसे सिर्फ "इंदिरा हटाओ" की लाइन पर बनाए रखने में कामयाब रहे, और इस लिहाज से आन्दोलन ने अपने कई लक्ष्यों में से एक लक्ष्य हासिल कर लिया था। आरक्षण विरोधी आन्दोलन भी एक विकेन्द्रीकृत आन्दोलन था। . विकेन्द्रित आन्दोलन आन्दोलन के 2 और प्रकार है : . B1. कार्यकर्ता निर्देशित विकेन्द्रीकृत जन आन्दोलन ( Activist Guided DeCentralised Mass Movement ) : जब विकेंद्रीकृत आन्दोलन को जन समर्थन मिलने लगे और आम नागरिक भी इसमें भागीदार हो जाते है तो यह जन आन्दोलन बन जाता है। यदि एक बार जन आन्दोलन खड़ा हो जाए तो इसे रोकने का कोई उपाय नहीं है। यह पूरी तरह से अनियंत्रित होता है, और अमूमन यह अपने लक्ष्य को हासिल करके ही रुकता है। जन आन्दोलन में सत्ता के खिलाफ छिटपुट हिंसा होना मामूली बात है। मतलब, यदि हिंसा शुरू हो गयी है, तो फिर हिंसा रुकेगी भी नहीं। इसी जन आन्दोलन में जब आशय के साथ सशस्त्र संघर्ष शुरू हो जाए तो यह क्रांति बन जाती है। . मुख्य लक्षण : इसमें एवं विकेन्द्रित आन्दोलन में सिर्फ इतना फर्क है कि, जन समर्थन होने के कारण इसका पैमाना बेहद बड़ा हो जाता है। उदाहरण : मैग्नाकार्टा, अमेरिका स्वतंत्रता आन्दोलन, बोल्शेविक क्रांति आदि जनआन्दोलन थे। नन्द वंश के खिलाफ आचार्य चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त जिस आन्दोलन को आगे बढ़ा रहे थे, वह भी एक जनआन्दोलन था। आचार्य एवं चन्द्रगुप्त का इस पर उतना नियंत्रण नहीं रह गया था। . B2. क़ानून ड्राफ्ट के नेतृत्व में कार्यकर्ता निर्देशित विकेंद्रीकृत जन आन्दोलन ( Draft Leaded Activist Guided Mass movement ) : विकेन्द्रित जन आन्दोलन एवं इस आन्दोलन में सिर्फ इतना फर्क है कि इस आन्दोलन के केंद्र में नेता के रूप में एक लिखित दस्तावेज होता है। इस दस्तावेज में स्पष्ट रूप से आन्दोलनकारियों की मांगे आदि लिखी हुयी होती है, और सभी कार्यकर्ता इस लिखित मांग को अपना नेता मानते हुए आन्दोलन को आगे बढाने के लिए अपने अपने हिसाब से अपने संसाधनों से काम करते है। . मुख्य लक्षण : यह जन आन्दोलन नेता विहीन नहीं होता। शीर्ष नेता के रूप में कोई न कोई लिखित दस्तावेज अवश्य होता है। उदाहरण : जूरी कोर्ट आन्दोलन, वोट वापसी पासबुक आन्दोलन, रिक्त भूमि कर आन्दोलन आदि । . ————- . अन्ना के अनशन को आन्दोलन कहना आन्दोलन शब्द का मजाक उड़ाना है। यह एक पैसिव डेमोंस्ट्रेशन था जिसे पेड मीडिया द्वारा पम्प किया जा रहा था। दुसरे शब्दों में यह अनशन का एक शो था !! . (1) द अन्ना शो : 1.1. नेतृत्व : यह एक नेता निर्देशित केन्द्रीकृत शो था और दर्जन भर लोगो की टीम सारे फैसले ले रही थी। अनशन का विषय, स्थान, तिथि, फोर्मेंट आदि सभी कुछ अन्ना एवं अन्ना टीम द्वारा तय किया जाता था। उनके मंच के निचे जो लाख-पचास हजार लोग बैठे थे, उनका काम बैठे रहना था। सोचने एवं फैसले लेने में उनकी भूमिका नगण्य थी। जैसे अन्ना तय करते थे, वैसे सब होता था। . 1.2. कार्यकर्ताओ का समर्थन : कार्यकर्ता या एक्टिविस्ट वह है जो खुद सोचता है और दिशा बनाने के लिए खुद फैसला लेता है। अन्ना के शो में जो भीड़ बैठी थी, उनकी भूमिका सिर्फ टीवी कैमरों के लिए भीड़ बनाने की थी। इनमे ज्यादातर वे लोग भी शामिल थे जिनका जन लोकपाल से कोई लेना देना नहीं था, और मनमोहन सरकार का विरोध करने के लिए वे यहाँ आकर बैठ जाते थे। उनमे से 1% आदमियों ने भी जनलोकपाल के ड्राफ्ट की शक्ल नहीं देखी थी !! . 1.3. जन समर्थन : मुझे नहीं पता कि आपकी उम्र क्या है। लेकिन जब भारत में सिर्फ दूरदर्शन होता था तो हर सप्ताह एक फिल्म आती थी। यह फिल्म शनिवार को सांय 7 बजे दिखाई जाती थी। अब मान लीजिये कि टीवी पर "घरोंदा" आ रही है, तो उस दिन पूरा भारत घरोंदा फिल्म ही देखता था। अब यदि कोई कहे कि लोग घरोंदा इसीलिए देख रहे है क्योंकि लोगो को घरोंदा फिल्म बहुत पसंद है, और घरोंदा पब्लिक डिमांड पर दिखाई जा रही है, मैं ऐसे व्यक्ति को बुद्धिजीवी कहूँगा !! क्योंकि बुद्धिजीवी लोग इस तरह की सामान्य बातों पर विचार नही करते कि, जब एक ही चेनल है, और उस पर सप्ताह में एक ही फिल्म आती है, और आज घरोंदा ही आ रही है, तो घरोंदा ही तो देखेंगे न। शोले किधर से देखेंगे !! . अन्ना का शो शुरू होने से पहले भारत के कितने करोड़ लोगो ने जनलोकपाल लफ्ज के बारे में सुना था !! क्या आपने सुना था !! उन्होंने देश के “सभी” चैनल्स पर जनलोकपाल का शो दिखाना शुरू कर दिया और लोग देखने लगे। टीवी से लोकपाल गायब और लोगो के जेहन से भी गायब !! . मेरा बिंदु यह है कि, जन लोकपाल का समर्थन देश में कभी मौजूद नहीं नहीं था। जिन्हें आप समर्थक कह रहे है वे समर्थक नहीं थे। वे दर्शक थे। जैसे उन्हें घरोंदा दिखाई जा रही थी, वैसे ही जनलोकपाल दिखाया जा रहा था। जैसे दूरदर्शन अध्यक्ष तय करता है कि आज घरोंदा दिखाई जायेगी, वैसे ही पेड मीडिया के स्पोंसर्स ने तय किया कि सभी भारतीयों को यह शो दिखाया जायेगा !! उन्होंने ही इस ड्रामे को आन्दोलन भी कहा और यह भी साबित करने की कोशिस की कि यह जन आन्दोलन था !! . 1.4. अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक शो के प्रसारण के लिए पेमेंट क्यों कर रहे थे ? . भारत ने 2005 में भ्रष्टाचार रोकने के लिए UN ट्रिटी पर साइन किये थे, और इसके प्रावधानों को 2011 तक इम्प्लीमेंट करना था। इस ट्रीटी के अनुसार भारत को केंद्र एवं राज्य स्तर पर एक स्वायत्त संस्था का गठन करना था जिसके पास उच्च स्तर के अधिकारीयों एवं मंत्रियो के खिलाफ जांच करने का अधिकार हो। . मान लीजिये कि वॉल मार्ट को पूरे देश में स्टोर खोलने है। स्टोर के लिए जमीन चाहिए। राज्यों में अलग अलग दलों की सरकारें होती है, अत: हर चरण पर वॉल मार्ट को इन्हें घूस खिलानी होगी। यदि लोकपाल जैसी संस्था बनाकर उसे मुख्यमंत्री के खिलाफ जांच खोलने एवं अरेस्ट करने का पॉवर दे दिया जाए तो वॉल मार्ट का काम आसानी से हो जाता है। क्योंकि तब वॉल मार्ट सिर्फ लोकपाल को खरीद लेगा, और लोकपाल के माध्यम से मुख्यमंत्रियों को धमकाएगा कि मुझे चिल्लर दाम में जमीन दें वर्ना लोकपाल को तेरे पीछे लगा दूंगा !! . 1.5. शो की दिशा : पूरा शो स्क्रिप्टेड था, और पेड मीडिया पर निर्भर था। चूंकि भारत UNAC साइन कर चुका था तो लोकपाल आना ही था। पर ड्राफ्टिंग पर विवाद चल रहा था। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भयंकर वाला लोकपाल चाहते थे। ऐसा लोकपाल जो पीएम और सीबीआई डायरेक्टर को भी जेल में डाल सके !! मतलब, भारत के पीएम को कंट्रोल करने के लिए एक और आदमी !! कोंग्रेस एवं बीजेपी समेत सभी सांसद इस ड्राफ्टिंग के खिलाफ थे। अत: ये सब एकजुट हो गए। तब उन्होंने पेड मीडिया के माध्यम से एक फर्जी आन्दोलन खड़ा करने के लिए फंडिंग करनी शुरू की। उन्होंने अरविन्द केजरीवाल को एप्रोच किया और केजरीवाल जी द अन्ना को दिल्ली ले आये। . दुसरे शब्दों में, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको द्वारा पेड मीडिया के माध्यम से यह ड्रामा खड़ा किया गया था, ताकि जनसमर्थन दिखाकर संसद पर दबाव बनाया जा सके। ( इसके अलावा भी कई राजनैतिक कारण थे ) . 1.6. अन्ना के शो में हिंसा क्यों नहीं हुयी ? दो वजहें है : . 1.6.1. इस तरह के नियंत्रित, स्क्रिप्टेड, नेता निर्देशित और पूरी तरह से पेड मीडिया पर निर्भर शो में जो लोग जुड़े होते है वे स्वत: स्फूर्त नहीं होते है। ऐसे शो में हिंसा सिर्फ तभी होगी जब प्रायोजक हिंसा की स्क्रिप्ट लिखेंगे। शुरू से ही उनकी स्क्रिप्ट इस तरह की थी कि हिंसा उनके एजेंडे में नहीं था। यह एक शूटिंग स्पॉट था। जहाँ मंच था, सामने कुर्सियां थी, जाजम थी, और सभी लोगो एक चार दिवारी में बैठे थे। हिंसा किधर करेंगे ? एक दुसरे के कपडे फाड़ेंगे क्या ? . 1.6.2. खड़ा झुण्ड भीड़ होता है, और यदि झुण्ड को बिठा दिया जाए तो यह सभा बन जाता था। यदि आप लोगो को बिठा देंगे तो उनका दिमाग अलग तरीके से चलने लगता है, और इन्ही लोगो को यदि आप खड़ा कर देंगे ये अलग तरीके से पेश आने लगेंगे। बैठे आदमीयों को यदि आप लाठी एवं पत्थर दे देंगे तो वे इसे हाथ में पकड़ कर नहीं रखेंगे। इसे किनारे रख देंगे, और बोलना, या सुनना शुरू कर देंगे। लेकिन यदि आपने इन्हें खड़ा कर दिया तो अब ये भीड़ है। और थोड़े से आवेश के साथ ही ये हिंसा शुरू कर सकते है। भीड़ का मनोविज्ञान इसी तरह से काम करता है। यदि आपके प्रदर्शन का डिजाइन इस तरह का है की सभी लोग बैठे हुए है तो उन्हें आवेश में नहीं लाया जा सकता, और हिंसा नहीं होगी। . अन्ना के शो में सभी लोगो बैठे हुए थे, अत: यह प्रदर्शन सभा के रूप में चल रहा था। मोहन भी अपने अनशन इसी तर्ज पर किया करता था। वह लोगो को जाजम पर बिठाकर उन्हें भजन आदि गाने पर लगा लेता था। चोरी चोरा में सभा नहीं थी। लोग खड़े थे, अत: उन्होंने थाना फूंक दिया !! . (2) CAA पर विरोध प्रदर्शन : . 2.1. नेतृत्व : इसके केंद्र में कोई नेता नहीं है। पेड मीडिया पर निर्भर कई राजनैतिक पार्टियों के छोटे बड़े नेता है, और ये सभी नेता अलग अलग तरीके से ब्रेन डेड कार्यकर्ताओ को चाबी दे रहे है। किन्तु इनके हाथ में भी प्रदर्शन का निर्णायक नियंत्रण नहीं है। वे सिर्फ इन्हें सड़को पर ठेल रहे है, किन्तु लीड नहीं कर रहे है। चाबी देने के बाद इस तरह के प्रदर्शनो की कोई तय दिशा नहीं होती है। यह किसी भी दिशा में चलना शुरू कर कर देता है। . 2.2. प्लग : असम को छोड़कर शेष देश में प्रदर्शनकारियों को पेड मीडिया द्वारा भ्रमित किया गया है। अब पेड मीडिया के स्पोंसर्स ने इसमें हवा भरना बंद कर दिया है, अत: धीरे धीरे यह शांत हो जाएगा। यदि पेड मीडिया के स्पोंसर्स इसमें ईंधन डालना शुरू करें तो यह फिर से बढ़ने लगेगा। किन्तु पेड मीडिया इसे पम्प नहीं करेगा तो यह आगे नहीं बढेगा, क्योंकि इन्हें जन समर्थन हासिल नहीं है। जन समर्थन लेने के लिए वाजिब वजह होनी चाहिए। जो कि यहाँ मौजूद नहीं है। . 2.3. कैसे पेड मीडिया के प्रायोजको ने इसे ट्रिगर किया ? . संसद ने CAA बिल पास किया था। यदि वे इसे शान्तिपूर्ण ढंग से पास करना चाहते तो उन्हें NRC का नाम लेने की जरूरत ही नहीं थी। लेकिन CAA का भारतीय मुस्लिमो से कोई सरोकार नहीं होने के कारण भारतीय मुस्लिम सड़को पर उतरने से इनकार कर सकते थे। अत: श्री अमित शाह ने संसद में धमकाने के अंदाज में इस बात को बार बार जोर देकर कहा कि, हम NRC लाने वाले है। फिर पेड मीडिया के प्रायोजको ने ध्रुव B के नेताओं, बुद्धिजीवियों एवं मीडिया हाउस से कहा कि वे CAA को NRC से मिक्स करके अपने फोलोवर्स को भ्रमित करें। ध्रुव A के नेताओं, बुद्धिजीवियों, एवं मीडिया हॉउस को कहा गया कि वे अपने फोलोवर्स को जानकारी दें कि भारतीय मुस्लिम जाया तौर पर इस बिल का विरोध कर रहे है !! 2.4. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको को इससे क्या लाभ है ? . अमेरिकी धनिक ईरान के खिलाफ युद्ध में भारत की सेना एवं संसाधनों का इस्तेमाल करना चाहते है। इसके लिए हिन्दू-मुस्लिम तनाव को चरम पर ले जाना जरुरी है। हिन्दू-मुस्लिम दंगे एवं तनाव बढ़ाने से भारत के हिन्दुओ में एंटी-मुस्लिम सेंटिमेंट बनेगा और तब भारत के हिन्दुओ को कन्विंस किया जा सकता है कि, वे ईरान-अफगानिस्तान में भारतीय सेना भेजने का समर्थन करना शुरू करें। . दूसरा कारण, अंतराष्ट्रीय प्रोपेगेंडा है। अभी अंतराष्ट्रीय मीडिया में इस बात को बड़े पैमाने पर रिपोर्ट किया जा रहा है कि, भारत में मुस्लिमों पर जुल्म हो रहा है, और वहां पर हालात बेकाबू होने के कगार पर है। ट्रंप का “भारत में हिन्दू मुस्लिम साथ नहीं रह सकते” बयान इसी कड़ी का हिस्सा था। जब अमेरिका ईरान पर हमला करेगा तो उसे भारत के हिन्दुओ का सहयोग चाहिए, और भारत के हिन्दु-मुस्लिम को आमने सामने लाकर इसी के लिए सधाया जा रहा है। . तीसरी वजह, अमेरिकी धनिक भारत में हिन्दू-मुस्लिम के बीच तनाव को उस उच्च बिंदु तक पहुँचाना चाहते है कि यदि वे “चाहे” तो पेड मीडिया का इस्तेमाल करके किसी भी समय एक सिविल वॉर को ट्रिगर कर सके। और भी इसमें कई पहलू है, मैं फिर किसी जवाब में इस पर विस्तार से लिखूंगा। . 2.5. CAA के प्रदर्शन में हिंसा : इसका स्ट्रक्चर ही ऐसा है कि, हिंसा होने की सम्भावना बढ़ी हुयी है। 90 के दशक में शुरू हुए आरक्षण विरोधी प्रदर्शन, हरियाणा का जाट आरक्षण प्रदर्शन आदि का स्ट्रक्चर भी ऐसा ही था। सड़को पर निकलकर प्रदर्शन करने वाले इस तरह के हुजुम क्यों हिंसक हो जाते है, और किन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित करके इस तरह के हिंसात्मक प्रदर्शनों को रोका जा सकता है, इस बारे में विस्तृत विवरण मैंने इस जवाब में बताया है – देश में बढ़ते हिंसक प्रदर्शन के पीछे किसका हाथ है? .

More news from बिहार and nearby areas
  • 🔥 नई शुरुआत के साथ चमकदार ऑफर! ✨ 💎 TRISHA JEWELLERS Hallmark Jewellery Showroom | च्छाता चौक, मुजफ्फरपुर खास ऑफर्स: 60% छूट सोने के आभूषण की बनाई पर 0% मेकिंग चार्ज डायमंड ज्वेलरी पर 100% शुद्धता & 100% वापसी की गारंटी BIS 916 Hallmark अपने खूबसूरत पलों को और भी यादगार बनाएं Trisha Jewellers के साथ 💖 📍 च्छाता चौक, मुजफ्फरपुर 📞 9608860933 DM करें या कॉल करें अभी! 🔥 नई शुरुआत के साथ चमकदार ऑफर! ✨ 💎 TRISHA JEWELLERS Hallmark Jewellery Showroom | च्छाता चौक, मुजफ्फरपुर खास ऑफर्स: 60% छूट सोने के आभूषण की बनाई पर 0% मेकिंग चार्ज डायमंड ज्वेलरी पर 100% शुद्धता & 100% वापसी की गारंटी BIS 916 Hallmark अपने खूबसूरत पलों को और भी यादगार बनाएं Trisha Jewellers के साथ 💖 📍 च्छाता चौक, मुजफ्फरपुर 📞 9608860933 DM करें या कॉल करें अभी! #TrishaJewellers #MuzaffarpurJewellery #GoldJewellery #DiamondJewellery #HallmarkJewellery #JewellerySale #60PercentOff #MakingChargeFree
    1
    🔥 नई शुरुआत के साथ चमकदार ऑफर! ✨
💎 TRISHA JEWELLERS
Hallmark Jewellery Showroom | च्छाता चौक, मुजफ्फरपुर
खास ऑफर्स:
60% छूट सोने के आभूषण की बनाई पर
0% मेकिंग चार्ज डायमंड ज्वेलरी पर
100% शुद्धता & 100% वापसी की गारंटी
BIS 916 Hallmark
अपने खूबसूरत पलों को और भी यादगार बनाएं Trisha Jewellers के साथ 💖
📍 च्छाता चौक, मुजफ्फरपुर
📞 9608860933
DM करें या कॉल करें अभी!
🔥 नई शुरुआत के साथ चमकदार ऑफर! ✨
💎 TRISHA JEWELLERS
Hallmark Jewellery Showroom | च्छाता चौक, मुजफ्फरपुर
खास ऑफर्स:
60% छूट सोने के आभूषण की बनाई पर
0% मेकिंग चार्ज डायमंड ज्वेलरी पर
100% शुद्धता & 100% वापसी की गारंटी
BIS 916 Hallmark
अपने खूबसूरत पलों को और भी यादगार बनाएं Trisha Jewellers के साथ 💖
📍 च्छाता चौक, मुजफ्फरपुर
📞 9608860933
DM करें या कॉल करें अभी!
#TrishaJewellers #MuzaffarpurJewellery #GoldJewellery #DiamondJewellery #HallmarkJewellery #JewellerySale #60PercentOff #MakingChargeFree
    user_Vikash Kumar
    Vikash Kumar
    Local News Reporter बोचहा, मुजफ्फरपुर, बिहार•
    1 hr ago
  • lalit kashyap tufan channel subscriber kar do lalit kashyap benipur channel subscriber kar do
    1
    lalit kashyap tufan channel subscriber kar do lalit kashyap benipur channel subscriber kar do
    user_Lalit Kashyap Tufan
    Lalit Kashyap Tufan
    Security Guard औराई, मुजफ्फरपुर, बिहार•
    14 min ago
  • औराई थाना क्षेत्र के अमनौर चौक स्थित उज्जवल मोबाइल दुकान में देर रात चोरों ने बड़ी चोरी की वारदात को अंजाम देकर इलाके में सनसनी फैला दी
    1
    औराई थाना क्षेत्र के अमनौर चौक स्थित उज्जवल मोबाइल दुकान में देर रात चोरों ने बड़ी चोरी की वारदात को अंजाम देकर इलाके में सनसनी फैला दी
    user_RITIK RAJPUT
    RITIK RAJPUT
    Yoga instructor Aurai, Muzaffarpur•
    46 min ago
  • दरभंगा के आनंद बेकर्स में कर्मी की संदिग्ध मौत दरभंगा जिले के सदर थाना क्षेत्र स्थित दोनार इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित आनंद बेकर्स में कार्यरत एक कर्मी की संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो गई। मृतक की पहचान मधुबनी जिले के बिस्फी थाना क्षेत्र अंतर्गत छापरिया गांव निवासी राजेंद्र मंडल के रूप में हुई है। घटना के बाद परिजनों ने कई सवाल खड़े किए हैं और मौत की वजह पर संदेह जताया है। बताया जाता है कि राजेंद्र मंडल पिछले कई वर्षों से आनंद बेकर्स में स्टाफ के लिए खाना बनाने का काम करते थे। परिजनों के अनुसार शनिवार सुबह करीब 8:30 बजे राजेंद्र मंडल ने अपनी पुत्री से फोन पर बात की थी और घर आने की जानकारी दी थी। लेकिन देर रात करीब 2 बजे आनंद बेकर्स के गार्ड द्वारा परिवार को उनकी मौत की सूचना दी गई। रविवार सुबह करीब 6 बजे परिजन आनंद बेकर्स पहुंचे, जहां उन्होंने राजेंद्र मंडल का शव देखा। सूचना मिलने के बाद सदर थाना की पुलिस भी मौके पर पहुंची और मामले की जांच शुरू कर दी। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए डीएमसीएच भेज दिया। मृतक की पत्नी ने कहा कि उनके पति पूरी तरह स्वस्थ थे। यदि उनकी तबीयत खराब थी तो परिवार को समय रहते सूचना क्यों नहीं दी गई। उन्होंने मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। वहीं आनंद बेकर्स के मालिक चिराग कृपलानी ने बताया कि राजेंद्र मंडल की तबीयत खराब थी और रात में उन्हें बुखार आया था। उन्होंने कहा कि परिवार को सूचना दे दी गई थी तथा पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है। परिजनों का कहना है कि राजेंद्र मंडल लंबे समय से संस्थान में काम कर रहे थे और प्रतिदिन करीब दो से ढाई सौ लोगों का खाना बनाते थे। फिलहाल पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के सही कारणों का खुलासा हो सकेगा।
    1
    दरभंगा के आनंद बेकर्स में कर्मी की संदिग्ध मौत
दरभंगा जिले के सदर थाना क्षेत्र स्थित दोनार इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित आनंद बेकर्स में कार्यरत एक कर्मी की संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो गई। मृतक की पहचान मधुबनी जिले के बिस्फी थाना क्षेत्र अंतर्गत छापरिया गांव निवासी राजेंद्र मंडल के रूप में हुई है। घटना के बाद परिजनों ने कई सवाल खड़े किए हैं और मौत की वजह पर संदेह जताया है।
बताया जाता है कि राजेंद्र मंडल पिछले कई वर्षों से आनंद बेकर्स में स्टाफ के लिए खाना बनाने का काम करते थे। परिजनों के अनुसार शनिवार सुबह करीब 8:30 बजे राजेंद्र मंडल ने अपनी पुत्री से फोन पर बात की थी और घर आने की जानकारी दी थी। लेकिन देर रात करीब 2 बजे आनंद बेकर्स के गार्ड द्वारा परिवार को उनकी मौत की सूचना दी गई।
रविवार सुबह करीब 6 बजे परिजन आनंद बेकर्स पहुंचे, जहां उन्होंने राजेंद्र मंडल का शव देखा। सूचना मिलने के बाद सदर थाना की पुलिस भी मौके पर पहुंची और मामले की जांच शुरू कर दी। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए डीएमसीएच भेज दिया।
मृतक की पत्नी ने कहा कि उनके पति पूरी तरह स्वस्थ थे। यदि उनकी तबीयत खराब थी तो परिवार को समय रहते सूचना क्यों नहीं दी गई। उन्होंने मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
वहीं आनंद बेकर्स के मालिक चिराग कृपलानी ने बताया कि राजेंद्र मंडल की तबीयत खराब थी और रात में उन्हें बुखार आया था। उन्होंने कहा कि परिवार को सूचना दे दी गई थी तथा पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है।
परिजनों का कहना है कि राजेंद्र मंडल लंबे समय से संस्थान में काम कर रहे थे और प्रतिदिन करीब दो से ढाई सौ लोगों का खाना बनाते थे। फिलहाल पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के सही कारणों का खुलासा हो सकेगा।
    user_Raman kumar Darbhanga Tak
    Raman kumar Darbhanga Tak
    हयाघाट, दरभंगा, बिहार•
    1 hr ago
  • अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम की कहानी हमें सत्य, कर्तव्य और करुणा का मार्ग दिखाती है। रावण का अंत कर वे अयोध्या लौटे, जिनकी गाथा सत्य की विजय और धर्म पालन का सबसे बड़ा कर्तव्य सिखाती है। यह केवल एक उद्घोष नहीं, बल्कि धर्म, साहस और मर्यादा का अमर प्रतीक है।
    2
    अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम की कहानी हमें सत्य, कर्तव्य और करुणा का मार्ग दिखाती है। रावण का अंत कर वे अयोध्या लौटे, जिनकी गाथा सत्य की विजय और धर्म पालन का सबसे बड़ा कर्तव्य सिखाती है। यह केवल एक उद्घोष नहीं, बल्कि धर्म, साहस और मर्यादा का अमर प्रतीक है।
    user_Raju Kumar
    Raju Kumar
    Bokhara, Sitamarhi•
    6 hrs ago
  • बिहार के दरभंगा में राष्ट्रीय लोक अदालत का सफल आयोजन हुआ, जिसका उद्देश्य आपसी सहमति से विवादों का त्वरित समाधान था। इस दौरान विभिन्न प्रकार के सैकड़ों मामलों, जिनमें 444 ट्रैफिक चालान भी शामिल थे, का निपटारा किया गया। जनता को शीघ्र न्याय दिलाने के लिए कुल 35 बेंचें बनाई गईं।
    1
    बिहार के दरभंगा में राष्ट्रीय लोक अदालत का सफल आयोजन हुआ, जिसका उद्देश्य आपसी सहमति से विवादों का त्वरित समाधान था। इस दौरान विभिन्न प्रकार के सैकड़ों मामलों, जिनमें 444 ट्रैफिक चालान भी शामिल थे, का निपटारा किया गया। जनता को शीघ्र न्याय दिलाने के लिए कुल 35 बेंचें बनाई गईं।
    user_JAN PAD Digital News
    JAN PAD Digital News
    Media company Darbhanga, Bihar•
    16 hrs ago
  • दरभंगा के युवाओं के लिए दुबई की AZIZI और ALEMCO कंपनियों में नौकरी का बड़ा मौका आया है। इसमें अच्छी सैलरी, ओवरटाइम और खाने जैसी शानदार सुविधाएं मिलेंगी। यह विदेश में करियर बनाने का सुनहरा अवसर है।
    1
    दरभंगा के युवाओं के लिए दुबई की AZIZI और ALEMCO कंपनियों में नौकरी का बड़ा मौका आया है। इसमें अच्छी सैलरी, ओवरटाइम और खाने जैसी शानदार सुविधाएं मिलेंगी। यह विदेश में करियर बनाने का सुनहरा अवसर है।
    user_24 Dainik Bihar Gramin
    24 Dainik Bihar Gramin
    Darbhanga, Bokaro•
    18 hrs ago
  • lalit kashyap tufan channel subscriber kar do lalit kashyap benipur channel subscriber do
    1
    lalit kashyap tufan channel subscriber kar do lalit kashyap benipur channel subscriber do
    user_Lalit Kashyap Tufan
    Lalit Kashyap Tufan
    Security Guard औराई, मुजफ्फरपुर, बिहार•
    25 min ago
View latest news on Shuru App
Download_Android
  • Terms & Conditions
  • Career
  • Privacy Policy
  • Blogs
Shuru, a product of Close App Private Limited.