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जलती होलिका से पार हुआ फलन का पंडा, हजारों की संख्या में पहुंचे भक्त और श्रद्धालु मथुरा थाना कोसीकला क्षेत्र के अंतर्गत गांव फलेंन में विगत वर्षों की बात इस साल भी पंडा होली की ऊंची ऊंची लपटों के बीच से गुजरता दिखाई दिया। बताया जाता है भक्त प्रहलाद की शक्ति समाहित होती है तब आज के दरिया को पार किया जाता है पुजारी के बाहर निकलते ही लोगों के मुंह से वक्त प्रहलाद के जय जयकारे उड़ घोषित किए गए
Murli Thakur Reporter
जलती होलिका से पार हुआ फलन का पंडा, हजारों की संख्या में पहुंचे भक्त और श्रद्धालु मथुरा थाना कोसीकला क्षेत्र के अंतर्गत गांव फलेंन में विगत वर्षों की बात इस साल भी पंडा होली की ऊंची ऊंची लपटों के बीच से गुजरता दिखाई दिया। बताया जाता है भक्त प्रहलाद की शक्ति समाहित होती है तब आज के दरिया को पार किया जाता है पुजारी के बाहर निकलते ही लोगों के मुंह से वक्त प्रहलाद के जय जयकारे उड़ घोषित किए गए
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- मथुरा थाना कोसीकला क्षेत्र के अंतर्गत गांव फलेंन में विगत वर्षों की बात इस साल भी पंडा होली की ऊंची ऊंची लपटों के बीच से गुजरता दिखाई दिया। बताया जाता है भक्त प्रहलाद की शक्ति समाहित होती है तब आज के दरिया को पार किया जाता है पुजारी के बाहर निकलते ही लोगों के मुंह से वक्त प्रहलाद के जय जयकारे उड़ घोषित किए गए4
- मथुरा, 3 मार्च 2026: उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित फालेन गांव, जो भक्त प्रह्लाद की नगरी के रूप में जाना जाता है, ने एक बार फिर अपनी अनोखी होलिका दहन परंपरा को जीवंत किया. यहां पंडा समाज के सदस्य संजू पंडा ने धधकते अंगारों के बीच से नंगे पांव गुजरकर हजारों श्रद्धालुओं को आश्चर्यचकित कर दिया. यह परंपरा कथित तौर पर 5300 वर्ष पुरानी है और प्रह्लाद-होलिका की कथा से जुड़ी हुई है. सोमवार देर रात फालेन गांव में होलिका दहन का आयोजन हुआ. होलिका की विशाल संरचना लगभग 20 फीट ऊंची और 30 फीट लंबी थी, जिसे गांववासियों ने मिलकर तैयार किया था. शुभ मुहूर्त में संजू पंडा ने प्रह्लाद मंदिर में हवन किया, प्रह्लाद कुंड में स्नान किया और फिर आग के बीच से सुरक्षित निकल आए. इस दौरान उनके शरीर पर कोई खरोंच तक नहीं आई. हजारों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने प्रह्लाद के जयकारे लगाए और ढोल-नगाड़ों के साथ उत्सव मनाया। फालेन गांव मथुरा शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर छाता तहसील में स्थित है. यहां मान्यता है कि यह भक्त प्रह्लाद का जन्मस्थान है, जहां होलिका ने प्रह्लाद को जलाने की कोशिश की थी लेकिन खुद जल गईं. इस घटना की स्मृति में हर वर्ष पंडा समाज का एक सदस्य इस रिवाज को निभाता है. संजू पंडा पिछले दो वर्षों से यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, इससे पहले उनके पिता और भाई यह करते थे. परंपरा निभाने के लिए संजू पंडा ने 45 दिनों की कठोर तपस्या की, जिसमें एक समय का फलाहार और मंदिर परिसर में एकांतवास शामिल था. तपस्या के दौरान किसी से मिलना वर्जित होता है. होलिका दहन से पहले उनकी बहन दूध की धार से रास्ता बनाती हैं, फिर वे अंगारों से गुजरते हैं. इस आयोजन को देखने के लिए भारत भर से और विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं. जिला प्रशासन द्वारा सुरक्षा व्यवस्थाएं की जाती हैं, ताकि कोई दुर्घटना न हो. इस वर्ष भी सबकुछ सुचारू रूप से संपन्न हुआ. यह परंपरा ब्रज क्षेत्र की होली की विविधता को दर्शाती है, जहां लठमार होली, फूलों की होली और अन्य रिवाज भी प्रचलित हैं. फालेन का पंडा न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है.1
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