ई-रजिस्ट्रेशन एवं निबंधन मित्र व्यवस्था के विरोध में हरदोई के शाहाबाद में अधिवक्ताओं, दस्तावेज लेखकों और स्टाम्प विक्रेताओं का आंदोलन ज़िले के चर्चित आंदोलनों में से एक बन गया है। पहले 15 से 17 जून तक घोषित कलमबंद हड़ताल को अब 20 जून तक बढ़ा दिया गया है, जिसका समर्थन ज़िले की अन्य तहसीलों में भी किए जाने की बात कही जा रही है। बार एसोसिएशन शाहाबाद ने 12 जून को आम सभा में इस व्यवस्था के विरोध में संघर्ष का ऐलान किया था। आंदोलन के दूसरे दिन, 16 जून को अधिवक्ताओं ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतीकात्मक शव यात्रा निकाली, जो तहसील से निबंधन कार्यालय तक नगर के प्रमुख मार्गों से गुज़री। इस दौरान सरकार विरोधी नारे लगाए गए और बाद में प्रतीकात्मक शव पुलिस को सौंप दिया गया। इस घटना का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें पुलिसकर्मी प्रतीकात्मक शव को सीओ कार्यालय की ओर ले जाते हुए दिखाई दिए, जिससे पुलिस की भूमिका और विरोध प्रदर्शन को लेकर उसके कथित उदार रुख पर बहस छिड़ गई। तीसरे दिन, 17 जून को मामले ने तब और दिलचस्प मोड़ ले लिया जब बार एसोसिएशन संयुक्त मोर्चा सीधे सीओ कार्यालय पहुँच गया। उन्होंने अपर पुलिस अधीक्षक को संबोधित एक आधिकारिक मांग-पत्र में अनुरोध किया कि 16 जून को पुलिस को सौंपा गया 'उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री योगी का प्रतीकात्मक शव' अंतिम संस्कार के लिए वापस किया जाए। इस पत्र में व्यंग्यात्मक रूप से उल्लेख किया गया कि पुलिस ने उस समय 'शव का पोस्टमार्टम कराने की बात' कही थी, जबकि अब अधिवक्ता उसका अंतिम संस्कार करना चाहते हैं। इस मांग-पत्र ने आंदोलन को और अधिक चर्चा में ला दिया। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान शाहाबाद क्षेत्राधिकारी आलोक राज नारायण की भूमिका पर भी सवाल उठे। सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो और तस्वीरों को लेकर स्थानीय लोगों ने यह सवाल उठाया कि मुख्यमंत्री की प्रतीकात्मक शव यात्रा जैसे संवेदनशील विरोध कार्यक्रम के दौरान पुलिस ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष सौरभ मिश्रा 'नीरज' ने भी इस घटना पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन मुख्यमंत्री की शव यात्रा निकालना निंदनीय है, क्योंकि मुख्यमंत्री एक संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति और करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र हैं। उन्होंने आईपीएस आलोक राज नारायण की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए और भाजपा से जुड़े लोगों की ऐसी गतिविधियों में शामिल होने को भी अनुचित बताया। बार एसोसिएशन, दस्तावेज लेखक संघ और स्टाम्प विक्रेताओं ने स्पष्ट किया है कि जब तक ई-रजिस्ट्रेशन व्यवस्था पर पुनर्विचार नहीं किया जाता, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। 20 जून तक कलमबंद हड़ताल और विरोध कार्यक्रम जारी रखने की घोषणा की गई है। इस घटनाक्रम ने पूरे मामले को ज़िला ही नहीं बल्कि प्रदेश स्तर पर भी चर्चा का विषय बना दिया है।
ई-रजिस्ट्रेशन एवं निबंधन मित्र व्यवस्था के विरोध में हरदोई के शाहाबाद में अधिवक्ताओं, दस्तावेज लेखकों और स्टाम्प विक्रेताओं का आंदोलन ज़िले के चर्चित आंदोलनों में से एक बन गया है। पहले 15 से 17 जून तक घोषित कलमबंद हड़ताल को अब 20 जून तक बढ़ा दिया गया है, जिसका समर्थन ज़िले की अन्य तहसीलों में भी किए जाने की बात कही जा रही है। बार एसोसिएशन शाहाबाद ने 12 जून को आम सभा में इस व्यवस्था के विरोध में संघर्ष का ऐलान किया था। आंदोलन के दूसरे दिन, 16 जून को अधिवक्ताओं ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतीकात्मक शव यात्रा निकाली, जो तहसील से निबंधन कार्यालय तक नगर के प्रमुख मार्गों से गुज़री। इस दौरान
सरकार विरोधी नारे लगाए गए और बाद में प्रतीकात्मक शव पुलिस को सौंप दिया गया। इस घटना का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें पुलिसकर्मी प्रतीकात्मक शव को सीओ कार्यालय की ओर ले जाते हुए दिखाई दिए, जिससे पुलिस की भूमिका और विरोध प्रदर्शन को लेकर उसके कथित उदार रुख पर बहस छिड़ गई। तीसरे दिन, 17 जून को मामले ने तब और दिलचस्प मोड़ ले लिया जब बार एसोसिएशन संयुक्त मोर्चा सीधे सीओ कार्यालय पहुँच गया। उन्होंने अपर पुलिस अधीक्षक को संबोधित एक आधिकारिक मांग-पत्र में अनुरोध किया कि 16 जून को पुलिस को सौंपा गया 'उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री योगी का प्रतीकात्मक शव' अंतिम संस्कार के लिए वापस किया जाए। इस पत्र में
व्यंग्यात्मक रूप से उल्लेख किया गया कि पुलिस ने उस समय 'शव का पोस्टमार्टम कराने की बात' कही थी, जबकि अब अधिवक्ता उसका अंतिम संस्कार करना चाहते हैं। इस मांग-पत्र ने आंदोलन को और अधिक चर्चा में ला दिया। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान शाहाबाद क्षेत्राधिकारी आलोक राज नारायण की भूमिका पर भी सवाल उठे। सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो और तस्वीरों को लेकर स्थानीय लोगों ने यह सवाल उठाया कि मुख्यमंत्री की प्रतीकात्मक शव यात्रा जैसे संवेदनशील विरोध कार्यक्रम के दौरान पुलिस ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष सौरभ मिश्रा 'नीरज' ने भी इस घटना पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है,
लेकिन मुख्यमंत्री की शव यात्रा निकालना निंदनीय है, क्योंकि मुख्यमंत्री एक संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति और करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र हैं। उन्होंने आईपीएस आलोक राज नारायण की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए और भाजपा से जुड़े लोगों की ऐसी गतिविधियों में शामिल होने को भी अनुचित बताया। बार एसोसिएशन, दस्तावेज लेखक संघ और स्टाम्प विक्रेताओं ने स्पष्ट किया है कि जब तक ई-रजिस्ट्रेशन व्यवस्था पर पुनर्विचार नहीं किया जाता, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। 20 जून तक कलमबंद हड़ताल और विरोध कार्यक्रम जारी रखने की घोषणा की गई है। इस घटनाक्रम ने पूरे मामले को ज़िला ही नहीं बल्कि प्रदेश स्तर पर भी चर्चा का विषय बना दिया है।
- एक नागरिक ने टेबनापुर गाँव की मुख्य सड़क की अत्यंत खराब स्थिति पर संबंधित अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने बताया है कि सड़क इतनी जर्जर हो चुकी है कि ग्रामीणों को दैनिक आवागमन में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इस गंभीर समस्या के मद्देनजर, नागरिक ने अधिकारियों से विनम्र निवेदन किया है कि वे इस विषय पर तत्काल ध्यान दें और टेबनापुर की इस मुख्य सड़क की मरम्मत का कार्य जल्द से जल्द शुरू करवाएं।1
- नोएडा एयरपोर्ट परियोजना के संबंध में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को किसानों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। किसानों ने इस दौरान स्पष्ट रूप से कहा था कि वे अपनी जमीन नहीं देंगे।1
- बुधवार की शुभ प्रभात पर सुन्नी धाम में दिव्य आशीर्वाद प्राप्त हुआ। मां महिषासुर मर्दिनी के पावन धाम में आज भगवान भोलेनाथ के मनोहारी श्रृंगार दर्शन ने श्रद्धालुओं का मन पूरी तरह मोह लिया। भक्ति, श्रद्धा और विश्वास से सराबोर इस दिव्य वातावरण में भक्तों ने महादेव के चरणों में शीश नवाकर सुख, शांति और समृद्धि की कामना की, जिससे सुन्नी धाम में एक दिव्य आनंद का अनुभव हुआ।3
- ई-स्टाम्प और निबंधन मित्र व्यवस्था के विरोध में अधिवक्ताओं द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतीकात्मक शव यात्रा निकाले जाने का मामला अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का एक गंभीर मुद्दा बन गया है। हरदोई के शाहाबाद तहसील परिसर से शुरू हुआ यह विरोध जुलूस नगर के मुख्य मार्गों से होते हुए निबंधन कार्यालय तक पहुंचा, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने प्रतीकात्मक अर्थी पुलिस को सौंप दी। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान पुलिस बल और क्षेत्राधिकारी पद पर तैनात आईपीएस एएसपी आलोक राज नारायण मौके पर मौजूद रहे। हालांकि, उन्होंने जुलूस को रोकने या आपत्तिजनक प्रतीकों तथा नारेबाजी पर किसी भी तरह का प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया, जिसके बाद पुलिस की भूमिका को लेकर नगर में तरह-तरह की चर्चाएँ शुरू हो गई हैं। पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ मिश्रा 'नीरज' ने इस घटना की सार्वजनिक रूप से निंदा की है। सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार से असहमति और विरोध का अधिकार हर नागरिक को है, लेकिन विरोध की आड़ में दलगत एजेंडा साधने के लिए मुख्यमंत्री की शव यात्रा निकालना अत्यंत निंदनीय है। उन्होंने इस बात पर भी कड़ी आपत्ति जताई कि इस जुलूस में भाजपा से संबंध रखने वाले लोग भी शामिल थे। सौरभ मिश्रा ने शाहाबाद के क्षेत्राधिकारी आलोक राज नारायण की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सीओ का पूरा जोर गरीबों पर लाठी चलाने में रहता है, जबकि उन्होंने मुख्यमंत्री की शव यात्रा को खड़े-खड़े निकलने दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक मुख्यमंत्री केवल राजनीतिक व्यक्ति नहीं होते, बल्कि एक संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति, एक धार्मिक पीठ के महंत और करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र भी होते हैं। ऐसे में इस प्रकार का प्रदर्शन लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं है। उन्होंने अधिवक्ता समुदाय से भी अपील की कि वे अधिवक्ताओं के हितों और पेशेवर गरिमा के बीच किसी भी दलगत एजेंडे को स्थान न दें। मुख्यमंत्री की प्रतीकात्मक शव यात्रा और पुतला प्रदर्शन के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। इन वीडियो में पुलिस की मौजूदगी स्पष्ट दिखने के बाद स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि ऐसा ही प्रदर्शन किसी अन्य संगठन या आम नागरिक द्वारा किया जाता, तो क्या पुलिस का रवैया इतना ही उदार रहता। नगर में अब मुख्य चर्चा यही है कि मुख्यमंत्री की प्रतीकात्मक शव यात्रा जैसे संवेदनशील विरोध कार्यक्रम के दौरान पुलिस ने सक्रिय हस्तक्षेप क्यों नहीं किया और इस पूरे घटनाक्रम में प्रशासन की भूमिका क्या रही। कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सीओ "सपाई मानसिकता" के व्यक्ति हों, जबकि भाजपा के लोगों ने सीओ की कार्यशैली को "भाजपा विरोधी" बताया है।4
- हरदोई जनपद में आगामी त्योहारों को देखते हुए शांति, सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए बुधवार को पुलिस अधीक्षक महोदय ने थाना पिहानी क्षेत्र में पैदल गश्त की। इस दौरान पर्याप्त पुलिस बल के साथ मुख्य मार्गों, बाजारों और भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा का जायजा लिया गया। पुलिस अधीक्षक महोदय ने आमजनमानस को सुरक्षा का भरोसा दिलाते हुए कानून व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखने का संदेश दिया।1
- उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में सवायजपुर बाजार से पाली मार्ग तक मदनापुर गांव के पास बन रही करोड़ों रुपये की सड़क निर्माण परियोजना में मानकों की अनदेखी का गंभीर मामला सामने आया है। ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क निर्माण में गुणवत्ता संबंधी नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है और घटिया सामग्री का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे सड़क की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि संबंधित जेई (जूनियर इंजीनियर) और ठेकेदार की मिलीभगत से मानक विहीन निर्माण कार्य कराया जा रहा है। स्थानीय लोगों ने सड़क निर्माण में बरती जा रही इन अनियमितताओं की शिकायत लखनऊ स्थित लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के अधिकारियों से की है। ग्रामीणों ने मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने और निर्माण कार्य को निर्धारित मानकों के अनुरूप कराने की मांग की है। इस मामले में अभी तक विभागीय अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते जांच नहीं हुई तो सरकारी धन की बर्बादी के साथ-साथ क्षेत्रवासियों को भी खराब सड़क का खामियाजा भुगतना पड़ेगा।3
- यह एक वीडियो बघौली बाजार स्टेशन से संबंधित है। इसमें दर्शकों से आग्रह किया गया है कि वे इस वीडियो को अधिक से अधिक संख्या में देखें, इसे लाइक करें और ज्यादा से ज्यादा लोगों के साथ साझा करें।1