कर्बला का दर्दनाक और रूहानी इतिहास: इमाम-ए-हुसैन की शहादत से चेहलुम तक इतिहास के पन्नों में जब-जब सच्चाई, न्याय और धर्म की रक्षा की मिसाल दी जाएगी, तब-तब कर्बला की उस पावन और गमगीन दास्तां को नम आँखों से याद किया जाएगा। यह कहानी है पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे (दोहिते), जिगर के टुकड़े, हजरत इमाम हुसैन (इमाम-ए-अली मकाम) और उनके परिवार व वफादार साथियों के उस महान बलिदान की, जिसे आज भी याद कर हर आँख छलक उठती है। 1. सत्य और असत्य का टकराव: बइअत से इनकार हजरत अली के विसाल के बाद जब राजनीतिक हालात बदले, तो यज़ीद बिन मुआविया ने खुद को मुस्लिम जगत का खलीफा घोषित कर दिया। यज़ीद चाहता था कि इमाम हुसैन उसकी सत्ता के आगे झुकें और उसके हक में 'बइअत' (निष्ठा की शपथ) दें। लेकिन इमाम हुसैन भली-भांति जानते थे कि यज़ीद का चरित्र और उसका शासन इस्लाम के मूल उसूलों, न्याय, और इंसानी नैतिकता के बिल्कुल खिलाफ है। इमाम हुसैन ने फरमाया कि "मुझ जैसा इंसान यज़ीद जैसे तानाशाह की बैअत कभी नहीं कर सकता।" उन्होंने दीन-ए-इस्लाम और इंसानियत को बचाने के लिए यज़ीद की तानाशाही के सामने अपनी गर्दन झुकाने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा। 2. मदीना से कर्बला का तन्हा सफर अपने नाना (पैगंबर साहब) के शहर मदीना में अपनी जान को खतरा देख और जुल्म से बचने के लिए, इमाम हुसैन ने अपने परिवार और कुछ चुनिंदा वफादार साथियों (जिनमें महिलाएं, छोटे-छोटे बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे) के साथ मदीना छोड़ा। कूफा के लोगों के लगातार बुलावा भेजने पर वे इрак की तरफ बढ़े। लेकिन रास्ते में हालात बदल चुके थे। यज़ीद की खूंखार और विशाल फौज ने उनके काफिले को कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान में घेर लिया। फरात नदी के बहते हुए पानी पर पाबंदी लगा दी गई। जरा सोचिए उस मंज़र को—जहाँ खेमों में मासूम बच्चे भूख और प्यास से तड़प रहे हों, हलक सूख रहे हों, लेकिन इन सबके बावजूद इमाम हुसैन और उनके साथियों के हौसले और ईमान में एक इंच की भी कमजोरी नहीं आई। 3. मुहर्रम की 10 तारीख (आशूरा): कर्बला का कत्लेआम मुहर्रम की 10वीं तारीख (आशूरा) का सूरज कयामत बनकर उभरा। एक तरफ यज़ीद की हजारों हथियारों से लैस फौज थी, और दूसरी तरफ मुट्ठीभर (महज 72) प्यासे और जांबाज लोग थे। एक-एक कर इमाम हुसैन के घर के जवान बेटों, भाइयों और साथियों ने मैदान-ए-जंग में कदम रखा। हजरत अब्बास की वफादारी, युवा हजरत अली अकबर की शहादत और गोद के छह महीने के मासूम अली असगर के सीने पर तीर लगने का वह दर्दनाक वाक़या आज भी सीने को छलनी कर देता है। जब परिवार का हर पुरुष शहीद हो गया, तब शाम के वक्त खुद इमाम-ए-हुसैन जख्मों से चूर, भूखे-प्यासे मैदान में उतरे। उन्होंने सजदे की हालत में, खुदा की इबादत करते हुए अपना सिर कटा लिया, लेकिन ظालिम (जालिम) के आगे अपना सिर नहीं झुकाया। उस रेत पर बिखरा हुआ खून गवाही दे रहा था कि जिस्म कट सकते हैं, लेकिन हक और सच कभी नहीं मर सकता। 4. ताजिया, मन्नत और अकीदे का सिलसिला उनकी इस महान शहादत की याद सिर्फ दिलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सदियों से यह गम और मोहब्बत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। ताजिये की स्थापना और जुलूस: मोहर्रम की 9वीं, 10वीं और उसके ठीक 40वें दिन (चेहलुम) पर इमाम बाड़ों से ताजिए निकाले जाते हैं और उन्हें बहुत अदब के साथ अपने-अपने स्थानों पर बैठाया जाता है। मान्यताओं का अटूट समंदर: लोगों का यह अटूट और पाक विश्वास है कि इमाम-ए-हुसैन और उनके परिवार की बारगाह में जो भी सच्ची नीयत से आता है, खाली गोदें भर जाती हैं और हर बीमारी व बला दूर होती है। ताजिये के नीचे से गुजरने की रस्म: इस मुबारक मौके पर बच्चे और बड़े अकीदत के साथ ताजिए के नीचे से होकर गुजरते हैं, जिसे कर्बला के शहीदों की बरकत और सलामती का जरिया माना जाता है। कुरान खानी और दुआएं: हर मजहब और हर वर्ग के लोग अपने-अपने तरीके से कलाम-पाक पढ़ते हैं, कुरान खानी करते हैं और इमाम-ए-अली मकाम की याद में आँखें नम करके फातिहा व दुआएं मांगते हैं। 5. चेहलुम और रूहानी पैगाम आज कर्बला की घटना को सदियां बीत चुकी हैं, लेकिन इमाम हुसैन का नाम आज भी जिंदा है। बीकानेर शहर से लेकर देश के हर कोने और मदीना शरीफ तक, आज चेहलुम के मौके पर हर आँख नम है और दिल में एक ही हूक उठती है— "या हुसैन!" आज का दिन सिर्फ एक मातम का दिन नहीं है, बल्कि यह हमें यह याद दिलाने के लिए है कि जब-जब दुनिया में जुल्म और अहंकार बढ़ेगा, तब-तब हुसैन का किरदार और कर्बला का सबक हमें यह सिखाएगा कि जान चली जाए तो जाए, लेकिन जुल्म के आगे कभी झुकना नहीं है। कर्बला का दर्दनाक और रूहानी इतिहास: इमाम-ए-हुसैन की शहादत से चेहलुम तक इतिहास के पन्नों में जब-जब सच्चाई, न्याय और धर्म की रक्षा की मिसाल दी जाएगी, तब-तब कर्बला की उस पावन और गमगीन दास्तां को नम आँखों से याद किया जाएगा। यह कहानी है पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे (दोहिते), जिगर के टुकड़े, हजरत इमाम हुसैन (इमाम-ए-अली मकाम) और उनके परिवार व वफादार साथियों के उस महान बलिदान की, जिसे आज भी याद कर हर आँख छलक उठती है। 1. सत्य और असत्य का टकराव: बइअत से इनकार हजरत अली के विसाल के बाद जब राजनीतिक हालात बदले, तो यज़ीद बिन मुआविया ने खुद को मुस्लिम जगत का खलीफा घोषित कर दिया। यज़ीद चाहता था कि इमाम हुसैन उसकी सत्ता के आगे झुकें और उसके हक में 'बइअत' (निष्ठा की शपथ) दें। लेकिन इमाम हुसैन भली-भांति जानते थे कि यज़ीद का चरित्र और उसका शासन इस्लाम के मूल उसूलों, न्याय, और इंसानी नैतिकता के बिल्कुल खिलाफ है। इमाम हुसैन ने फरमाया कि "मुझ जैसा इंसान यज़ीद जैसे तानाशाह की बैअत कभी नहीं कर सकता।" उन्होंने दीन-ए-इस्लाम और इंसानियत को बचाने के लिए यज़ीद की तानाशाही के सामने अपनी गर्दन झुकाने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा। 2. मदीना से कर्बला का तन्हा सफर अपने नाना (पैगंबर साहब) के शहर मदीना में अपनी जान को खतरा देख और जुल्म से बचने के लिए, इमाम हुसैन ने अपने परिवार और कुछ चुनिंदा वफादार साथियों (जिनमें महिलाएं, छोटे-छोटे बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे) के साथ मदीना छोड़ा। कूफा के लोगों के लगातार बुलावा भेजने पर वे इрак की तरफ बढ़े। लेकिन रास्ते में हालात बदल चुके थे। यज़ीद की खूंखार और विशाल फौज ने उनके काफिले को कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान में घेर लिया। फरात नदी के बहते हुए पानी पर पाबंदी लगा दी गई। जरा सोचिए उस मंज़र को—जहाँ खेमों में मासूम बच्चे भूख और प्यास से तड़प रहे हों, हलक सूख रहे हों, लेकिन इन सबके बावजूद इमाम हुसैन और उनके साथियों के हौसले और ईमान में एक इंच की भी कमजोरी नहीं आई। 3. मुहर्रम की 10 तारीख (आशूरा): कर्बला का कत्लेआम मुहर्रम की 10वीं तारीख (आशूरा) का सूरज कयामत बनकर उभरा। एक तरफ यज़ीद की हजारों हथियारों से लैस फौज थी, और दूसरी तरफ मुट्ठीभर (महज 72) प्यासे और जांबाज लोग थे। एक-एक कर इमाम हुसैन के घर के जवान बेटों, भाइयों और साथियों ने मैदान-ए-जंग में कदम रखा। हजरत अब्बास की वफादारी, युवा हजरत अली अकबर की शहादत और गोद के छह महीने के मासूम अली असगर के सीने पर तीर लगने का वह दर्दनाक वाक़या आज भी सीने को छलनी कर देता है। जब परिवार का हर पुरुष शहीद हो गया, तब शाम के वक्त खुद इमाम-ए-हुसैन जख्मों से चूर, भूखे-प्यासे मैदान में उतरे। उन्होंने सजदे की हालत में, खुदा की इबादत करते हुए अपना सिर कटा लिया, लेकिन ظालिम (जालिम) के आगे अपना सिर नहीं झुकाया। उस रेत पर बिखरा हुआ खून गवाही दे रहा था कि जिस्म कट सकते हैं, लेकिन हक और सच कभी नहीं मर सकता। 4. ताजिया, मन्नत और अकीदे का सिलसिला उनकी इस महान शहादत की याद सिर्फ दिलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सदियों से यह गम और मोहब्बत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। ताजिये की स्थापना और जुलूस: मोहर्रम की 9वीं, 10वीं और उसके ठीक 40वें दिन (चेहलुम) पर इमाम बाड़ों से ताजिए निकाले जाते हैं और उन्हें बहुत अदब के साथ अपने-अपने स्थानों पर बैठाया जाता है। मान्यताओं का अटूट समंदर: लोगों का यह अटूट और पाक विश्वास है कि इमाम-ए-हुसैन और उनके परिवार की बारगाह में जो भी सच्ची नीयत से आता है, खाली गोदें भर जाती हैं और हर बीमारी व बला दूर होती है। ताजिये के नीचे से गुजरने की रस्म: इस मुबारक मौके पर बच्चे और बड़े अकीदत के साथ ताजिए के नीचे से होकर गुजरते हैं, जिसे कर्बला के शहीदों की बरकत और सलामती का जरिया माना जाता है। कुरान खानी और दुआएं: हर मजहब और हर वर्ग के लोग अपने-अपने तरीके से कलाम-पाक पढ़ते हैं, कुरान खानी करते हैं और इमाम-ए-अली मकाम की याद में आँखें नम करके फातिहा व दुआएं मांगते हैं। 5. चेहलुम और रूहानी पैगाम आज कर्बला की घटना को सदियां बीत चुकी हैं, लेकिन इमाम हुसैन का नाम आज भी जिंदा है। बीकानेर शहर से लेकर देश के हर कोने और मदीना शरीफ तक, आज चेहलुम के मौके पर हर आँख नम है और दिल में एक ही हूक उठती है— "या हुसैन!" आज का दिन सिर्फ एक मातम का दिन नहीं है, बल्कि यह हमें यह याद दिलाने के लिए है कि जब-जब दुनिया में जुल्म और अहंकार बढ़ेगा, तब-तब हुसैन का किरदार और कर्बला का सबक हमें यह सिखाएगा कि जान चली जाए तो जाए, लेकिन जुल्म के आगे कभी झुकना नहीं है।
कर्बला का दर्दनाक और रूहानी इतिहास: इमाम-ए-हुसैन की शहादत से चेहलुम तक इतिहास के पन्नों में जब-जब सच्चाई, न्याय और धर्म की रक्षा की मिसाल दी जाएगी, तब-तब कर्बला की उस पावन और गमगीन दास्तां को नम आँखों से याद किया जाएगा। यह कहानी है पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे (दोहिते), जिगर के टुकड़े, हजरत इमाम हुसैन (इमाम-ए-अली मकाम) और उनके परिवार व वफादार साथियों के उस महान बलिदान की, जिसे आज भी याद कर हर आँख छलक उठती है। 1. सत्य और असत्य का टकराव: बइअत से इनकार हजरत अली के विसाल के बाद जब राजनीतिक हालात बदले, तो यज़ीद बिन मुआविया ने खुद को मुस्लिम जगत का खलीफा घोषित कर दिया। यज़ीद चाहता था कि इमाम हुसैन उसकी सत्ता के आगे झुकें और उसके हक में 'बइअत' (निष्ठा की शपथ) दें। लेकिन इमाम हुसैन भली-भांति जानते थे कि यज़ीद का चरित्र और उसका शासन इस्लाम के मूल उसूलों, न्याय, और इंसानी नैतिकता के बिल्कुल खिलाफ है। इमाम हुसैन ने फरमाया कि "मुझ जैसा इंसान यज़ीद जैसे तानाशाह की बैअत कभी नहीं कर सकता।" उन्होंने दीन-ए-इस्लाम और इंसानियत को बचाने के लिए यज़ीद की तानाशाही के सामने अपनी गर्दन झुकाने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा। 2. मदीना से कर्बला का तन्हा सफर अपने नाना (पैगंबर साहब) के शहर मदीना में अपनी जान को खतरा देख और जुल्म से बचने के लिए, इमाम हुसैन ने अपने परिवार और कुछ चुनिंदा वफादार साथियों (जिनमें महिलाएं, छोटे-छोटे बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे) के साथ मदीना छोड़ा। कूफा के लोगों के लगातार बुलावा भेजने पर वे इрак की तरफ बढ़े। लेकिन रास्ते में हालात बदल चुके थे। यज़ीद की खूंखार और विशाल फौज ने उनके काफिले को कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान में घेर लिया। फरात नदी के बहते हुए पानी पर पाबंदी लगा दी गई। जरा सोचिए उस मंज़र को—जहाँ खेमों में मासूम बच्चे भूख और प्यास से तड़प रहे हों, हलक सूख रहे हों, लेकिन इन सबके बावजूद इमाम हुसैन और उनके साथियों के हौसले और ईमान में एक इंच की भी कमजोरी नहीं आई। 3. मुहर्रम की 10 तारीख (आशूरा): कर्बला का कत्लेआम मुहर्रम की 10वीं तारीख (आशूरा) का सूरज कयामत बनकर उभरा। एक तरफ यज़ीद की हजारों हथियारों से लैस फौज थी, और दूसरी तरफ मुट्ठीभर (महज 72) प्यासे और जांबाज लोग थे। एक-एक कर इमाम हुसैन के घर के जवान बेटों, भाइयों और साथियों ने मैदान-ए-जंग में कदम रखा। हजरत अब्बास की वफादारी, युवा हजरत अली अकबर की शहादत और गोद के छह महीने के मासूम अली असगर के सीने पर तीर लगने का वह दर्दनाक वाक़या आज भी सीने को छलनी कर देता है। जब परिवार का हर पुरुष शहीद हो गया, तब शाम के वक्त खुद इमाम-ए-हुसैन जख्मों से चूर, भूखे-प्यासे मैदान में उतरे। उन्होंने सजदे की हालत में, खुदा की इबादत करते हुए अपना सिर कटा लिया, लेकिन ظालिम (जालिम) के आगे अपना सिर नहीं झुकाया। उस रेत पर बिखरा हुआ खून गवाही दे रहा था कि जिस्म कट सकते हैं, लेकिन हक और सच कभी नहीं मर सकता। 4. ताजिया, मन्नत और अकीदे का सिलसिला उनकी इस महान शहादत की याद सिर्फ दिलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सदियों से यह गम और मोहब्बत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। ताजिये की स्थापना और जुलूस: मोहर्रम की 9वीं, 10वीं और उसके ठीक 40वें दिन (चेहलुम) पर इमाम बाड़ों से ताजिए निकाले जाते हैं और उन्हें बहुत अदब के साथ अपने-अपने स्थानों पर बैठाया जाता है। मान्यताओं का अटूट समंदर: लोगों का यह अटूट और पाक विश्वास है कि इमाम-ए-हुसैन और उनके परिवार की बारगाह में जो भी सच्ची नीयत से आता है, खाली गोदें भर जाती हैं और हर बीमारी व बला दूर होती है। ताजिये के नीचे से गुजरने की रस्म: इस मुबारक मौके पर बच्चे और बड़े अकीदत के साथ ताजिए के नीचे से होकर गुजरते हैं, जिसे कर्बला के शहीदों की बरकत और सलामती का जरिया माना जाता है। कुरान खानी और दुआएं: हर मजहब और हर वर्ग के लोग अपने-अपने तरीके से कलाम-पाक पढ़ते हैं, कुरान खानी करते हैं और इमाम-ए-अली मकाम की याद में आँखें नम करके फातिहा व दुआएं मांगते हैं। 5. चेहलुम और रूहानी पैगाम आज कर्बला की घटना को सदियां बीत चुकी हैं, लेकिन इमाम हुसैन का नाम आज भी जिंदा है। बीकानेर शहर से लेकर देश के हर कोने और मदीना शरीफ तक, आज चेहलुम के मौके पर हर आँख नम है और दिल में एक ही हूक उठती है— "या हुसैन!" आज का दिन सिर्फ एक मातम का दिन नहीं है, बल्कि यह हमें यह याद दिलाने के लिए है कि जब-जब दुनिया में जुल्म और अहंकार बढ़ेगा, तब-तब हुसैन का किरदार और कर्बला का सबक हमें यह सिखाएगा कि जान चली जाए तो जाए, लेकिन जुल्म के आगे कभी झुकना नहीं है। कर्बला का दर्दनाक और रूहानी इतिहास: इमाम-ए-हुसैन की शहादत से चेहलुम तक इतिहास के पन्नों में जब-जब सच्चाई, न्याय और धर्म की रक्षा की मिसाल दी जाएगी, तब-तब कर्बला की उस पावन और गमगीन दास्तां को नम आँखों से याद किया जाएगा। यह कहानी है पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे (दोहिते), जिगर के टुकड़े, हजरत इमाम हुसैन (इमाम-ए-अली मकाम) और उनके परिवार व वफादार साथियों के उस महान बलिदान की, जिसे आज भी याद कर हर आँख छलक उठती है। 1. सत्य और असत्य का टकराव: बइअत से इनकार हजरत अली के विसाल के बाद जब राजनीतिक हालात बदले, तो यज़ीद बिन मुआविया ने खुद को मुस्लिम जगत का खलीफा घोषित कर दिया। यज़ीद चाहता था कि इमाम हुसैन उसकी सत्ता के आगे झुकें और उसके हक में 'बइअत' (निष्ठा की शपथ) दें। लेकिन इमाम हुसैन भली-भांति जानते थे कि यज़ीद का चरित्र और उसका शासन इस्लाम के मूल उसूलों, न्याय, और इंसानी नैतिकता के बिल्कुल खिलाफ है। इमाम हुसैन ने फरमाया कि "मुझ जैसा इंसान यज़ीद जैसे तानाशाह की बैअत कभी नहीं कर सकता।" उन्होंने दीन-ए-इस्लाम और इंसानियत को बचाने के लिए यज़ीद की तानाशाही के सामने अपनी गर्दन झुकाने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा। 2. मदीना से कर्बला का तन्हा सफर अपने नाना (पैगंबर साहब) के शहर मदीना में अपनी जान को खतरा देख और जुल्म से बचने के लिए, इमाम हुसैन ने अपने परिवार और कुछ चुनिंदा वफादार साथियों (जिनमें महिलाएं, छोटे-छोटे बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे) के साथ मदीना छोड़ा। कूफा के लोगों के लगातार बुलावा भेजने पर वे इрак की तरफ बढ़े। लेकिन रास्ते में हालात बदल चुके थे। यज़ीद की खूंखार और विशाल फौज ने उनके काफिले को कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान में घेर लिया। फरात नदी के बहते हुए पानी पर पाबंदी लगा दी गई। जरा सोचिए उस मंज़र को—जहाँ खेमों में मासूम बच्चे भूख और प्यास से तड़प रहे हों, हलक सूख रहे हों, लेकिन इन सबके बावजूद इमाम हुसैन और उनके साथियों के हौसले और ईमान में एक इंच की भी कमजोरी नहीं आई। 3. मुहर्रम की 10 तारीख (आशूरा): कर्बला का कत्लेआम मुहर्रम की 10वीं तारीख (आशूरा) का सूरज कयामत बनकर उभरा। एक तरफ यज़ीद की हजारों हथियारों से लैस फौज थी, और दूसरी तरफ मुट्ठीभर (महज 72) प्यासे और जांबाज लोग थे। एक-एक कर इमाम हुसैन के घर के जवान बेटों, भाइयों और साथियों ने मैदान-ए-जंग में कदम रखा। हजरत अब्बास की वफादारी, युवा हजरत अली अकबर की शहादत और गोद के छह महीने के मासूम अली असगर के सीने पर तीर लगने का वह दर्दनाक वाक़या आज भी सीने को छलनी कर देता है। जब परिवार का हर पुरुष शहीद हो गया, तब शाम के वक्त खुद इमाम-ए-हुसैन जख्मों से चूर, भूखे-प्यासे मैदान में उतरे। उन्होंने सजदे की हालत में, खुदा की इबादत करते हुए अपना सिर कटा लिया, लेकिन ظालिम (जालिम) के आगे अपना सिर नहीं झुकाया। उस रेत पर बिखरा हुआ खून गवाही दे रहा था कि जिस्म कट सकते हैं, लेकिन हक और सच कभी नहीं मर सकता। 4. ताजिया, मन्नत और अकीदे का सिलसिला उनकी इस महान शहादत की याद सिर्फ दिलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सदियों से यह गम और मोहब्बत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। ताजिये की स्थापना और जुलूस: मोहर्रम की 9वीं, 10वीं और उसके ठीक 40वें दिन (चेहलुम) पर इमाम बाड़ों से ताजिए निकाले जाते हैं और उन्हें बहुत अदब के साथ अपने-अपने स्थानों पर बैठाया जाता है। मान्यताओं का अटूट समंदर: लोगों का यह अटूट और पाक विश्वास है कि इमाम-ए-हुसैन और उनके परिवार की बारगाह में जो भी सच्ची नीयत से आता है, खाली गोदें भर जाती हैं और हर बीमारी व बला दूर होती है। ताजिये के नीचे से गुजरने की रस्म: इस मुबारक मौके पर बच्चे और बड़े अकीदत के साथ ताजिए के नीचे से होकर गुजरते हैं, जिसे कर्बला के शहीदों की बरकत और सलामती का जरिया माना जाता है। कुरान खानी और दुआएं: हर मजहब और हर वर्ग के लोग अपने-अपने तरीके से कलाम-पाक पढ़ते हैं, कुरान खानी करते हैं और इमाम-ए-अली मकाम की याद में आँखें नम करके फातिहा व दुआएं मांगते हैं। 5. चेहलुम और रूहानी पैगाम आज कर्बला की घटना को सदियां बीत चुकी हैं, लेकिन इमाम हुसैन का नाम आज भी जिंदा है। बीकानेर शहर से लेकर देश के हर कोने और मदीना शरीफ तक, आज चेहलुम के मौके पर हर आँख नम है और दिल में एक ही हूक उठती है— "या हुसैन!" आज का दिन सिर्फ एक मातम का दिन नहीं है, बल्कि यह हमें यह याद दिलाने के लिए है कि जब-जब दुनिया में जुल्म और अहंकार बढ़ेगा, तब-तब हुसैन का किरदार और कर्बला का सबक हमें यह सिखाएगा कि जान चली जाए तो जाए, लेकिन जुल्म के आगे कभी झुकना नहीं है।
- राहुल गांधी का केंद्र पर बड़ा हमला छात्रों को माफी नहीं सरकार से सच न्याय और माफी चाहिए तमिलनाडु दौरे के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने नीट प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा रद्द होने के बाद जान गंवाने वाले तीन मेडिकल अभ्यर्थियों—गोपिका, रोशिनी और वेत्री आनंदन—के परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि हर परिवार का एक ही सवाल था कि ईमानदारी से मेहनत करने वाले छात्रों को भ्रष्ट व्यवस्था की सजा क्यों भुगतनी पड़ रही है। राहुल गांधी ने कहा कि प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा रद्द होने और दोबारा परीक्षा कराने से छात्रों पर असहनीय मानसिक दबाव पड़ा। उन्होंने कहा कि हर आंकड़े के पीछे एक छात्र का सपना और एक परिवार का दर्द छिपा है। उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई ऐसी शिक्षा व्यवस्था के लिए है जहां मेहनत का सम्मान हो, परीक्षाएं निष्पक्ष हों और किसी छात्र को संस्थागत विफलताओं की कीमत अपनी जान देकर न चुकानी पड़े। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि भारत के छात्रों को किसी माफी की जरूरत नहीं है। सरकार को छात्रों के सामने सच रखना चाहिए, उन्हें न्याय देना चाहिए और उनसे माफी मांगनी चाहिए।1
- कर्बला का दर्दनाक और रूहानी इतिहास: इमाम-ए-हुसैन की शहादत से चेहलुम तक इतिहास के पन्नों में जब-जब सच्चाई, न्याय और धर्म की रक्षा की मिसाल दी जाएगी, तब-तब कर्बला की उस पावन और गमगीन दास्तां को नम आँखों से याद किया जाएगा। यह कहानी है पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे (दोहिते), जिगर के टुकड़े, हजरत इमाम हुसैन (इमाम-ए-अली मकाम) और उनके परिवार व वफादार साथियों के उस महान बलिदान की, जिसे आज भी याद कर हर आँख छलक उठती है। 1. सत्य और असत्य का टकराव: बइअत से इनकार हजरत अली के विसाल के बाद जब राजनीतिक हालात बदले, तो यज़ीद बिन मुआविया ने खुद को मुस्लिम जगत का खलीफा घोषित कर दिया। यज़ीद चाहता था कि इमाम हुसैन उसकी सत्ता के आगे झुकें और उसके हक में 'बइअत' (निष्ठा की शपथ) दें। लेकिन इमाम हुसैन भली-भांति जानते थे कि यज़ीद का चरित्र और उसका शासन इस्लाम के मूल उसूलों, न्याय, और इंसानी नैतिकता के बिल्कुल खिलाफ है। इमाम हुसैन ने फरमाया कि "मुझ जैसा इंसान यज़ीद जैसे तानाशाह की बैअत कभी नहीं कर सकता।" उन्होंने दीन-ए-इस्लाम और इंसानियत को बचाने के लिए यज़ीद की तानाशाही के सामने अपनी गर्दन झुकाने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा। 2. मदीना से कर्बला का तन्हा सफर अपने नाना (पैगंबर साहब) के शहर मदीना में अपनी जान को खतरा देख और जुल्म से बचने के लिए, इमाम हुसैन ने अपने परिवार और कुछ चुनिंदा वफादार साथियों (जिनमें महिलाएं, छोटे-छोटे बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे) के साथ मदीना छोड़ा। कूफा के लोगों के लगातार बुलावा भेजने पर वे इрак की तरफ बढ़े। लेकिन रास्ते में हालात बदल चुके थे। यज़ीद की खूंखार और विशाल फौज ने उनके काफिले को कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान में घेर लिया। फरात नदी के बहते हुए पानी पर पाबंदी लगा दी गई। जरा सोचिए उस मंज़र को—जहाँ खेमों में मासूम बच्चे भूख और प्यास से तड़प रहे हों, हलक सूख रहे हों, लेकिन इन सबके बावजूद इमाम हुसैन और उनके साथियों के हौसले और ईमान में एक इंच की भी कमजोरी नहीं आई। 3. मुहर्रम की 10 तारीख (आशूरा): कर्बला का कत्लेआम मुहर्रम की 10वीं तारीख (आशूरा) का सूरज कयामत बनकर उभरा। एक तरफ यज़ीद की हजारों हथियारों से लैस फौज थी, और दूसरी तरफ मुट्ठीभर (महज 72) प्यासे और जांबाज लोग थे। एक-एक कर इमाम हुसैन के घर के जवान बेटों, भाइयों और साथियों ने मैदान-ए-जंग में कदम रखा। हजरत अब्बास की वफादारी, युवा हजरत अली अकबर की शहादत और गोद के छह महीने के मासूम अली असगर के सीने पर तीर लगने का वह दर्दनाक वाक़या आज भी सीने को छलनी कर देता है। जब परिवार का हर पुरुष शहीद हो गया, तब शाम के वक्त खुद इमाम-ए-हुसैन जख्मों से चूर, भूखे-प्यासे मैदान में उतरे। उन्होंने सजदे की हालत में, खुदा की इबादत करते हुए अपना सिर कटा लिया, लेकिन ظालिम (जालिम) के आगे अपना सिर नहीं झुकाया। उस रेत पर बिखरा हुआ खून गवाही दे रहा था कि जिस्म कट सकते हैं, लेकिन हक और सच कभी नहीं मर सकता। 4. ताजिया, मन्नत और अकीदे का सिलसिला उनकी इस महान शहादत की याद सिर्फ दिलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सदियों से यह गम और मोहब्बत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। ताजिये की स्थापना और जुलूस: मोहर्रम की 9वीं, 10वीं और उसके ठीक 40वें दिन (चेहलुम) पर इमाम बाड़ों से ताजिए निकाले जाते हैं और उन्हें बहुत अदब के साथ अपने-अपने स्थानों पर बैठाया जाता है। मान्यताओं का अटूट समंदर: लोगों का यह अटूट और पाक विश्वास है कि इमाम-ए-हुसैन और उनके परिवार की बारगाह में जो भी सच्ची नीयत से आता है, खाली गोदें भर जाती हैं और हर बीमारी व बला दूर होती है। ताजिये के नीचे से गुजरने की रस्म: इस मुबारक मौके पर बच्चे और बड़े अकीदत के साथ ताजिए के नीचे से होकर गुजरते हैं, जिसे कर्बला के शहीदों की बरकत और सलामती का जरिया माना जाता है। कुरान खानी और दुआएं: हर मजहब और हर वर्ग के लोग अपने-अपने तरीके से कलाम-पाक पढ़ते हैं, कुरान खानी करते हैं और इमाम-ए-अली मकाम की याद में आँखें नम करके फातिहा व दुआएं मांगते हैं। 5. चेहलुम और रूहानी पैगाम आज कर्बला की घटना को सदियां बीत चुकी हैं, लेकिन इमाम हुसैन का नाम आज भी जिंदा है। बीकानेर शहर से लेकर देश के हर कोने और मदीना शरीफ तक, आज चेहलुम के मौके पर हर आँख नम है और दिल में एक ही हूक उठती है— "या हुसैन!" आज का दिन सिर्फ एक मातम का दिन नहीं है, बल्कि यह हमें यह याद दिलाने के लिए है कि जब-जब दुनिया में जुल्म और अहंकार बढ़ेगा, तब-तब हुसैन का किरदार और कर्बला का सबक हमें यह सिखाएगा कि जान चली जाए तो जाए, लेकिन जुल्म के आगे कभी झुकना नहीं है। कर्बला का दर्दनाक और रूहानी इतिहास: इमाम-ए-हुसैन की शहादत से चेहलुम तक इतिहास के पन्नों में जब-जब सच्चाई, न्याय और धर्म की रक्षा की मिसाल दी जाएगी, तब-तब कर्बला की उस पावन और गमगीन दास्तां को नम आँखों से याद किया जाएगा। यह कहानी है पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे (दोहिते), जिगर के टुकड़े, हजरत इमाम हुसैन (इमाम-ए-अली मकाम) और उनके परिवार व वफादार साथियों के उस महान बलिदान की, जिसे आज भी याद कर हर आँख छलक उठती है। 1. सत्य और असत्य का टकराव: बइअत से इनकार हजरत अली के विसाल के बाद जब राजनीतिक हालात बदले, तो यज़ीद बिन मुआविया ने खुद को मुस्लिम जगत का खलीफा घोषित कर दिया। यज़ीद चाहता था कि इमाम हुसैन उसकी सत्ता के आगे झुकें और उसके हक में 'बइअत' (निष्ठा की शपथ) दें। लेकिन इमाम हुसैन भली-भांति जानते थे कि यज़ीद का चरित्र और उसका शासन इस्लाम के मूल उसूलों, न्याय, और इंसानी नैतिकता के बिल्कुल खिलाफ है। इमाम हुसैन ने फरमाया कि "मुझ जैसा इंसान यज़ीद जैसे तानाशाह की बैअत कभी नहीं कर सकता।" उन्होंने दीन-ए-इस्लाम और इंसानियत को बचाने के लिए यज़ीद की तानाशाही के सामने अपनी गर्दन झुकाने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा। 2. मदीना से कर्बला का तन्हा सफर अपने नाना (पैगंबर साहब) के शहर मदीना में अपनी जान को खतरा देख और जुल्म से बचने के लिए, इमाम हुसैन ने अपने परिवार और कुछ चुनिंदा वफादार साथियों (जिनमें महिलाएं, छोटे-छोटे बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे) के साथ मदीना छोड़ा। कूफा के लोगों के लगातार बुलावा भेजने पर वे इрак की तरफ बढ़े। लेकिन रास्ते में हालात बदल चुके थे। यज़ीद की खूंखार और विशाल फौज ने उनके काफिले को कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान में घेर लिया। फरात नदी के बहते हुए पानी पर पाबंदी लगा दी गई। जरा सोचिए उस मंज़र को—जहाँ खेमों में मासूम बच्चे भूख और प्यास से तड़प रहे हों, हलक सूख रहे हों, लेकिन इन सबके बावजूद इमाम हुसैन और उनके साथियों के हौसले और ईमान में एक इंच की भी कमजोरी नहीं आई। 3. मुहर्रम की 10 तारीख (आशूरा): कर्बला का कत्लेआम मुहर्रम की 10वीं तारीख (आशूरा) का सूरज कयामत बनकर उभरा। एक तरफ यज़ीद की हजारों हथियारों से लैस फौज थी, और दूसरी तरफ मुट्ठीभर (महज 72) प्यासे और जांबाज लोग थे। एक-एक कर इमाम हुसैन के घर के जवान बेटों, भाइयों और साथियों ने मैदान-ए-जंग में कदम रखा। हजरत अब्बास की वफादारी, युवा हजरत अली अकबर की शहादत और गोद के छह महीने के मासूम अली असगर के सीने पर तीर लगने का वह दर्दनाक वाक़या आज भी सीने को छलनी कर देता है। जब परिवार का हर पुरुष शहीद हो गया, तब शाम के वक्त खुद इमाम-ए-हुसैन जख्मों से चूर, भूखे-प्यासे मैदान में उतरे। उन्होंने सजदे की हालत में, खुदा की इबादत करते हुए अपना सिर कटा लिया, लेकिन ظालिम (जालिम) के आगे अपना सिर नहीं झुकाया। उस रेत पर बिखरा हुआ खून गवाही दे रहा था कि जिस्म कट सकते हैं, लेकिन हक और सच कभी नहीं मर सकता। 4. ताजिया, मन्नत और अकीदे का सिलसिला उनकी इस महान शहादत की याद सिर्फ दिलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सदियों से यह गम और मोहब्बत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। ताजिये की स्थापना और जुलूस: मोहर्रम की 9वीं, 10वीं और उसके ठीक 40वें दिन (चेहलुम) पर इमाम बाड़ों से ताजिए निकाले जाते हैं और उन्हें बहुत अदब के साथ अपने-अपने स्थानों पर बैठाया जाता है। मान्यताओं का अटूट समंदर: लोगों का यह अटूट और पाक विश्वास है कि इमाम-ए-हुसैन और उनके परिवार की बारगाह में जो भी सच्ची नीयत से आता है, खाली गोदें भर जाती हैं और हर बीमारी व बला दूर होती है। ताजिये के नीचे से गुजरने की रस्म: इस मुबारक मौके पर बच्चे और बड़े अकीदत के साथ ताजिए के नीचे से होकर गुजरते हैं, जिसे कर्बला के शहीदों की बरकत और सलामती का जरिया माना जाता है। कुरान खानी और दुआएं: हर मजहब और हर वर्ग के लोग अपने-अपने तरीके से कलाम-पाक पढ़ते हैं, कुरान खानी करते हैं और इमाम-ए-अली मकाम की याद में आँखें नम करके फातिहा व दुआएं मांगते हैं। 5. चेहलुम और रूहानी पैगाम आज कर्बला की घटना को सदियां बीत चुकी हैं, लेकिन इमाम हुसैन का नाम आज भी जिंदा है। बीकानेर शहर से लेकर देश के हर कोने और मदीना शरीफ तक, आज चेहलुम के मौके पर हर आँख नम है और दिल में एक ही हूक उठती है— "या हुसैन!" आज का दिन सिर्फ एक मातम का दिन नहीं है, बल्कि यह हमें यह याद दिलाने के लिए है कि जब-जब दुनिया में जुल्म और अहंकार बढ़ेगा, तब-तब हुसैन का किरदार और कर्बला का सबक हमें यह सिखाएगा कि जान चली जाए तो जाए, लेकिन जुल्म के आगे कभी झुकना नहीं है।1
- चक 7 DOBB में लंबे समय से बारिश नहीं होने के कारण किसानों की फसलों नष्ट हो रही हें आज भगवान इंद्र को खुश करने के लिए सभी किसानों ने मिलकर मीठी परशादी बनाई और हवन भी किया इस अवसर पर विसनाराम कडे़ला माणकासर मागीलाल पवार तुलछाराम कडे़ला इमाम खान भीयाराम प्यारे लाल जी चिनिया अर्जुन रेवंत राम चेनाराम गुले खान विशनाराम कडे़ला ने बताया कि 8 सालों से लागोतर हवन करते आए हैं आज तक की सफल हो वा हें मूंगफली की बिजाई हुई ने दो महीना हो चुके हैं लेकिन अभी तक अच्छी बारिश नहीं हुई टाइम पर बिजली भी नहीं मिल रही है किसानों को1
- राजनीति में जैसे जैसे हालात बदलते हैं, वैसे-वैसे कई चेहरों के रुख भी बदलने लगते हैं इकबाल खान,हाल ही में वरिष्ठ टीवी पत्रकार गरिमा सिंह ने न्यूज़24 से इस्तीफा दिया है। इसके बाद सोशल मीडिया पर तरह तरह की राजनीतिक चर्चाएं और अटकलें लगाई जा रही हैं। आज जो लोग सत्ता के सबसे बड़े समर्थक दिखाई देते हैं, वही बदलते राजनीतिक माहौल में सबसे पहले दूरी बनाते नजर आ सकते हैं। इस्तीफे, नए बयान और बदली हुई भाषा अक्सर बदलते समय का संकेत माने जाते हैं।हालांकि, किसी भी पत्रकार या एंकर के इस्तीफे के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं, यह संबंधित व्यक्ति या संस्थान ही बता सकता है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों का इंतजार करना जरूरी है।1
- बीकानेर के नाल में बारिश के बाद जलभराव | स्कूल से पंचायत भवन तक भरा पानी, निकासी व्यवस्था पर उठे सवाल~ बीकानेर के नाल कस्बे में मंगलवार शाम हुई बारिश के बाद राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, पंचायत भवन और आसपास की गलियों में जलभराव की स्थिति बन गई। पानी भरने से विद्यार्थियों, राहगीरों और स्थानीय लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। ग्रामीणों का कहना है कि शहर के नजदीक होने के बावजूद आज तक इस क्षेत्र में न तो सीवर लाइन की समुचित व्यवस्था है और न ही बारिश के पानी की निकासी का स्थायी समाधान। आखिर हर बारिश के बाद बनने वाले इन हालातों से लोगों को राहत कब मिलेगी? #Bikaner #Nal #news #breakingnews #bikanernews1