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पीरोमुर्शीद हज़रत सय्यद अब्दुल कदीर मियां कादरी जाजमऊ शरीफ कानपुर हुजूर बहारुल हिन्द का जियारत करें
Munna Ansari
पीरोमुर्शीद हज़रत सय्यद अब्दुल कदीर मियां कादरी जाजमऊ शरीफ कानपुर हुजूर बहारुल हिन्द का जियारत करें
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- शहनाइयों के बीच बरसी लाठियां! पडरौना में हल्दी समारोह पर हमला, मचा हड़कंप उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जनपद के पडरौना क्षेत्र से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। सरदार पटेल नगर में 10 फरवरी की रात हल्दी की रस्म के दौरान पुरानी रंजिश ने खूनी संघर्ष का रूप ले लिया। बताया जा रहा है कि मुसा कुरैशी और सोनू कुरैशी लाठी-डंडे और ईंट-पत्थर लेकर समारोह में पहुंचे और गाली-गलौज के बाद परिवार पर हमला कर दिया। इस दौरान महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया। बीच-बचाव करने आए विकास और सोनी को गंभीर चोटें आईं। घटना की सूचना मिलते ही भाजपा नेता नीरज सिंह बिट्टू पीड़ित परिवार के घर पहुंचे और प्रशासन से कड़ी कार्रवाई की मांग की। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। मामले की जांच जारी है और क्षेत्र में पुलिस बल तैनात है। 👉 ऐसे ही ताज़ा और सटीक खबरों के लिए चैनल को Subscribe करें। #Kushinagar #Padrauna #BreakingNews #UPNews #CrimeNews #WeddingAttack #HaldiCeremony #UttarPradesh #BJP #NeerajSinghBittu #PoliceAction #HindiNews #KushinagarKiKhabren #LatestNews #ViralNews1
- इंदिरा गांधी का भाषण — “परिवारवाद या जनसेवा?” प्रिय देशवासियों, आज राजनीति में एक शब्द बार-बार सुनने को मिलता है — परिवारवाद। लोग कहते हैं कि यदि किसी परिवार का व्यक्ति राजनीति में आता है तो वह लोकतंत्र के विरुद्ध है। मैं आपसे एक सीधा प्रश्न पूछना चाहती हूँ — क्या लोकतंत्र वंश से चलता है या जनता के विश्वास से? भारत में कोई भी व्यक्ति केवल अपने नाम से नेता नहीं बन सकता। यह देश राजशाही नहीं है, यह जनता का गणराज्य है। यहाँ अंतिम निर्णय जनता की उंगली पर लगी स्याही करती है — न कि किसी परिवार की पहचान। हाँ, यह सत्य है कि कुछ परिवारों के कई लोग राजनीति में आते हैं। लेकिन क्यों आते हैं? क्योंकि उन्होंने बचपन से संघर्ष देखा, सेवा देखी, जेल देखी, आंदोलन देखा। राजनीति उनके लिए सत्ता नहीं, संस्कार बन जाती है। और हमारे परिवार पर तो अक्सर आरोप लगाया जाता है — पर मैं देश से कहना चाहती हूँ, यह सत्ता की परंपरा नहीं, बलिदान की परंपरा है। मेरे परिवार में एक जाता है… दूसरा आ जाता है, एक के बाद एक इस देश के लिए शहादत देता है। कुर्सी के लिए नहीं — भारत की एकता और अखंडता के लिए। यदि डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बनता है तो कोई आपत्ति नहीं, यदि किसान का बेटा किसान बनता है तो कोई प्रश्न नहीं, लेकिन यदि जनसेवा करने वाले परिवार का बेटा या बेटी राजनीति में आए — तो उसे परिवारवाद कह दिया जाता है। मैं स्पष्ट कहना चाहती हूँ — नेतृत्व विरासत से नहीं, कुर्बानी से मिलता है। यदि जनता स्वीकार न करे तो सबसे बड़ा नाम भी पराजित हो जाता है। और यदि जनता स्वीकार कर ले तो एक साधारण व्यक्ति भी देश का नेतृत्व कर सकता है। भारत की राजनीति में असली प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि नेता किस परिवार से है, बल्कि यह होना चाहिए — क्या वह गरीब के साथ खड़ा है? क्या वह देश की एकता की रक्षा करता है? क्या वह कठिन निर्णय लेने का साहस रखता है? लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता है। जनता जिसे चाहे आगे बढ़ाए, जिसे चाहे हटा दे — यही भारत की ताकत है। इसलिए मैं कहती हूँ — परिवार नहीं, परिश्रम देखिए नाम नहीं, नीति देखिए और वंश नहीं, देशभक्ति देखिए।1
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