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उत्तराखण्ड के टिहरी जनपद के भिलंगना ब्लॉक के घनसाली क्षेत्र में स्थित बूढ़ा केदार मंदिर एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र तीर्थस्थल है। बाल गंगा और धर्म गंगा नदियों के संगम पर स्थित यह मंदिर पंच केदार (केदारनाथ) के प्रारंभिक या पाँचवें धाम के रूप में प्रतिष्ठित है, जो अपनी शांत और सुरम्य भौगोलिक स्थिति के लिए जाना जाता है। बूढ़ा केदार मंदिर समिति के सदस्य मनमोहन रावत के अनुसार, स्कन्द पुराण के छठवें अध्याय में वर्णित है कि बूढ़ा केदार का इतिहास क्षेत्र के कई अन्य प्रसिद्ध केदारनाथ तीर्थों से भी पुराना है। यहाँ तक कि चारों धाम की यात्रा को इस मंदिर के दर्शन के बिना अधूरा माना जाता है। महाभारत युद्ध के पश्चात् ब्रह्म और गोत्र हत्या के पापों से मुक्ति पाने के लिए पांडवों ने अपने गुरु वेदव्यास से मार्गदर्शन माँगा था। गुरु वेदव्यास ने उन्हें उत्तर हिमालय की दिशा में भगवान शिव के दर्शन से इन पापों से मुक्ति का मार्ग सुझाया। जब पांडव भगवान शिव का आशीर्वाद खोजते हुए हिमालय पहुँचे, तो शिव ने उन्हें दर्शन देने से बचने के लिए एक वृद्ध व्यक्ति का रूप धारण कर लिया। पांडवों के इस स्थान पर पहुँचने पर, वह वृद्ध व्यक्ति ध्यान में लीन हो गया और अचानक एक विशाल शिवलिंग प्रकट हुआ। इसी स्थान पर पांडवों ने शिवलिंग के रूप में भगवान शिव के दर्शन किए, जिसके कारण यह स्थान बूढ़ा केदार कहलाया। बूढ़ाकेदार मंदिर समिति के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह नेगी ने बताया कि इस मंदिर में स्थापित प्राकृतिक शिवलिंग उत्तर भारत का सबसे विशाल माना जाता है। इस शिवलिंग पर वृद्ध शिव, गणेश, नंदी के साथ-साथ पाँचों पांडवों और द्रौपदी की छवियाँ अंकित हैं। मंदिर पारंपरिक गढ़वाली वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो अपने जटिल शिल्प कौशल और नक्काशीदार लकड़ी व पत्थर के संयोजन के लिए विख्यात है। मंदिर के प्रांगण में नाथ संप्रदाय के आध्यात्मिक गुरुओं की समाधियाँ भी स्थित हैं, और मान्यता है कि स्वयं ऋषि गोरखनाथ ने एक बार इस स्थान पर ध्यान किया था। इस मंदिर की एक अनूठी विशेषता यह भी है कि यहाँ के पुजारी ब्राह्मण न होकर, नाथ संप्रदाय से शिक्षा प्राप्त राजपूत जाति के पंडित होते हैं। मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के छोटे मंदिर भी मौजूद हैं। यह मंदिर नई टिहरी मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर घनसाली क्षेत्र में स्थित है और समुद्र तल से 1,535 मीटर की ऊँचाई पर है। घने देवदार के जंगल और सीढ़ीदार खेत इसे घेरे हुए हैं, जो यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं। महाशिवरात्रि यहाँ का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है, जिसमें हजारों भक्त प्रार्थनाओं और उत्सवों में भाग लेते हैं। इसके अतिरिक्त, जुलाई माह की पूर्णिमा से शुरू होने वाला तीन दिवसीय मेला भी हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। 180 गाँवों के इष्ट देवता गुरु कैलापीर का भव्य मेला सामान्य दीपावली के एक माह बाद बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। मंदिर तक पहुँचने के लिए ऋषिकेश और नई टिहरी से घनसाली के लिए सीधी बसें उपलब्ध हैं, जिसके बाद निजी टैक्सी या अन्य वाहन से मंदिर तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। मुख्य बूढ़ा केदार सड़क पर स्थित लोहे के पुल से 1 किलोमीटर की आसान और मनोरम ट्रेकिंग के बाद मंदिर तक पहुँचा जा सकता है। मार्च से जून और सितंबर से नवंबर तक का समय मंदिर भ्रमण के लिए सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि इस दौरान मौसम सुहावना रहता है और गढ़वाल हिमालय के मनमोहक दृश्य दिखाई देते हैं। बूढ़ा केदार महासर ताल, सहस्त्र ताल, जरार ताल और मंझार ताल जैसे कई सुंदर और ऊँचे तालों की ट्रेकिंग के लिए भी एक मुख्य मार्ग है। हमारी यात्रा के दौरान हमें रावल अमरनाथ योगी से साक्षात्कार का सौभाग्य मिला, जिन्होंने बूढ़ा केदार मंदिर के इतिहास, पौराणिक महत्व और परंपराओं के विषय में अत्यंत सरल एवं गहन जानकारी साझा की थी। उनके शब्दों में इस पावन धाम की आस्था और अध्यात्म की जीवंत झलक स्पष्ट रूप से अनुभव की जा सकती थी, और यह भेंट इस दिव्य स्थल की सांस्कृतिक आत्मा को समझने का एक सशक्त माध्यम बनी। दुर्भाग्यवश, हाल ही में उनके स्वर्गवास का समाचार प्राप्त हुआ, जिससे यह स्मृति और भी अधिक भावुक एवं अविस्मरणीय हो गई है, और बूढ़ा केदार की यह यात्रा आज भी उनकी स्मृतियों और मार्गदर्शन के प्रकाश में जीवंत प्रतीत होती है। अंततः, बूढ़ा केदार केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक विरासत का एक जीवंत प्रतीक है, जो श्रद्धा, इतिहास और प्रकृति का एक अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

16 hrs ago
user_Uklive Uttrakhand
Uklive Uttrakhand
टिहरी, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड•
16 hrs ago

उत्तराखण्ड के टिहरी जनपद के भिलंगना ब्लॉक के घनसाली क्षेत्र में स्थित बूढ़ा केदार मंदिर एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र तीर्थस्थल है। बाल गंगा और धर्म गंगा नदियों के संगम पर स्थित यह मंदिर पंच केदार (केदारनाथ) के प्रारंभिक या पाँचवें धाम के रूप में प्रतिष्ठित है, जो अपनी शांत और सुरम्य भौगोलिक स्थिति के लिए जाना जाता है। बूढ़ा केदार मंदिर समिति के सदस्य मनमोहन रावत के अनुसार, स्कन्द पुराण के छठवें अध्याय में वर्णित है कि बूढ़ा केदार का इतिहास क्षेत्र के कई अन्य प्रसिद्ध केदारनाथ तीर्थों से भी पुराना है। यहाँ तक कि चारों धाम की यात्रा को इस मंदिर के दर्शन के बिना अधूरा माना जाता है। महाभारत युद्ध के पश्चात् ब्रह्म और गोत्र हत्या के पापों से मुक्ति पाने के लिए पांडवों ने अपने गुरु वेदव्यास से मार्गदर्शन माँगा था। गुरु वेदव्यास ने उन्हें उत्तर हिमालय की दिशा में भगवान शिव के दर्शन से इन पापों से मुक्ति का मार्ग सुझाया। जब पांडव भगवान शिव का आशीर्वाद खोजते हुए हिमालय पहुँचे, तो शिव ने उन्हें दर्शन देने से बचने के लिए एक वृद्ध व्यक्ति का रूप धारण कर लिया। पांडवों के इस स्थान पर पहुँचने पर, वह वृद्ध व्यक्ति ध्यान में लीन हो गया और अचानक एक विशाल शिवलिंग प्रकट हुआ। इसी स्थान पर पांडवों ने शिवलिंग के रूप में भगवान शिव के दर्शन किए, जिसके कारण यह स्थान बूढ़ा केदार कहलाया। बूढ़ाकेदार मंदिर समिति के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह नेगी ने बताया कि इस मंदिर में स्थापित प्राकृतिक शिवलिंग उत्तर भारत का सबसे विशाल माना जाता है। इस शिवलिंग पर वृद्ध शिव, गणेश, नंदी के साथ-साथ पाँचों पांडवों और द्रौपदी की छवियाँ अंकित हैं। मंदिर पारंपरिक गढ़वाली वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो अपने जटिल शिल्प कौशल और नक्काशीदार लकड़ी व पत्थर के संयोजन के लिए विख्यात है। मंदिर के प्रांगण में नाथ संप्रदाय के आध्यात्मिक गुरुओं की समाधियाँ भी स्थित हैं, और मान्यता है कि स्वयं ऋषि गोरखनाथ ने एक बार इस स्थान पर ध्यान किया था। इस मंदिर की एक अनूठी विशेषता यह भी है कि यहाँ के पुजारी ब्राह्मण न होकर, नाथ संप्रदाय से शिक्षा प्राप्त राजपूत जाति के पंडित होते हैं। मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के छोटे मंदिर भी मौजूद हैं। यह मंदिर नई टिहरी मुख्यालय से

लगभग 90 किलोमीटर दूर घनसाली क्षेत्र में स्थित है और समुद्र तल से 1,535 मीटर की ऊँचाई पर है। घने देवदार के जंगल और सीढ़ीदार खेत इसे घेरे हुए हैं, जो यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं। महाशिवरात्रि यहाँ का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है, जिसमें हजारों भक्त प्रार्थनाओं और उत्सवों में भाग लेते हैं। इसके अतिरिक्त, जुलाई माह की पूर्णिमा से शुरू होने वाला तीन दिवसीय मेला भी हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। 180 गाँवों के इष्ट देवता गुरु कैलापीर का भव्य मेला सामान्य दीपावली के एक माह बाद बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। मंदिर तक पहुँचने के लिए ऋषिकेश और नई टिहरी से घनसाली के लिए सीधी बसें उपलब्ध हैं, जिसके बाद निजी टैक्सी या अन्य वाहन से मंदिर तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। मुख्य बूढ़ा केदार सड़क पर स्थित लोहे के पुल से 1 किलोमीटर की आसान और मनोरम ट्रेकिंग के बाद मंदिर तक पहुँचा जा सकता है। मार्च से जून और सितंबर से नवंबर तक का समय मंदिर भ्रमण के लिए सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि इस दौरान मौसम सुहावना रहता है और गढ़वाल हिमालय के मनमोहक दृश्य दिखाई देते हैं। बूढ़ा केदार महासर ताल, सहस्त्र ताल, जरार ताल और मंझार ताल जैसे कई सुंदर और ऊँचे तालों की ट्रेकिंग के लिए भी एक मुख्य मार्ग है। हमारी यात्रा के दौरान हमें रावल अमरनाथ योगी से साक्षात्कार का सौभाग्य मिला, जिन्होंने बूढ़ा केदार मंदिर के इतिहास, पौराणिक महत्व और परंपराओं के विषय में अत्यंत सरल एवं गहन जानकारी साझा की थी। उनके शब्दों में इस पावन धाम की आस्था और अध्यात्म की जीवंत झलक स्पष्ट रूप से अनुभव की जा सकती थी, और यह भेंट इस दिव्य स्थल की सांस्कृतिक आत्मा को समझने का एक सशक्त माध्यम बनी। दुर्भाग्यवश, हाल ही में उनके स्वर्गवास का समाचार प्राप्त हुआ, जिससे यह स्मृति और भी अधिक भावुक एवं अविस्मरणीय हो गई है, और बूढ़ा केदार की यह यात्रा आज भी उनकी स्मृतियों और मार्गदर्शन के प्रकाश में जीवंत प्रतीत होती है। अंततः, बूढ़ा केदार केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक विरासत का एक जीवंत प्रतीक है, जो श्रद्धा, इतिहास और प्रकृति का एक अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

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    उत्तराखण्ड के टिहरी जनपद के भिलंगना ब्लॉक के घनसाली क्षेत्र में स्थित बूढ़ा केदार मंदिर एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र तीर्थस्थल है। बाल गंगा और धर्म गंगा नदियों के संगम पर स्थित यह मंदिर पंच केदार (केदारनाथ) के प्रारंभिक या पाँचवें धाम के रूप में प्रतिष्ठित है, जो अपनी शांत और सुरम्य भौगोलिक स्थिति के लिए जाना जाता है।

बूढ़ा केदार मंदिर समिति के सदस्य मनमोहन रावत के अनुसार, स्कन्द पुराण के छठवें अध्याय में वर्णित है कि बूढ़ा केदार का इतिहास क्षेत्र के कई अन्य प्रसिद्ध केदारनाथ तीर्थों से भी पुराना है। यहाँ तक कि चारों धाम की यात्रा को इस मंदिर के दर्शन के बिना अधूरा माना जाता है। महाभारत युद्ध के पश्चात् ब्रह्म और गोत्र हत्या के पापों से मुक्ति पाने के लिए पांडवों ने अपने गुरु वेदव्यास से मार्गदर्शन माँगा था। गुरु वेदव्यास ने उन्हें उत्तर हिमालय की दिशा में भगवान शिव के दर्शन से इन पापों से मुक्ति का मार्ग सुझाया। जब पांडव भगवान शिव का आशीर्वाद खोजते हुए हिमालय पहुँचे, तो शिव ने उन्हें दर्शन देने से बचने के लिए एक वृद्ध व्यक्ति का रूप धारण कर लिया। पांडवों के इस स्थान पर पहुँचने पर, वह वृद्ध व्यक्ति ध्यान में लीन हो गया और अचानक एक विशाल शिवलिंग प्रकट हुआ। इसी स्थान पर पांडवों ने शिवलिंग के रूप में भगवान शिव के दर्शन किए, जिसके कारण यह स्थान बूढ़ा केदार कहलाया।

बूढ़ाकेदार मंदिर समिति के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह नेगी ने बताया कि इस मंदिर में स्थापित प्राकृतिक शिवलिंग उत्तर भारत का सबसे विशाल माना जाता है। इस शिवलिंग पर वृद्ध शिव, गणेश, नंदी के साथ-साथ पाँचों पांडवों और द्रौपदी की छवियाँ अंकित हैं। मंदिर पारंपरिक गढ़वाली वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो अपने जटिल शिल्प कौशल और नक्काशीदार लकड़ी व पत्थर के संयोजन के लिए विख्यात है। मंदिर के प्रांगण में नाथ संप्रदाय के आध्यात्मिक गुरुओं की समाधियाँ भी स्थित हैं, और मान्यता है कि स्वयं ऋषि गोरखनाथ ने एक बार इस स्थान पर ध्यान किया था। इस मंदिर की एक अनूठी विशेषता यह भी है कि यहाँ के पुजारी ब्राह्मण न होकर, नाथ संप्रदाय से शिक्षा प्राप्त राजपूत जाति के पंडित होते हैं। मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के छोटे मंदिर भी मौजूद हैं।

यह मंदिर नई टिहरी मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर घनसाली क्षेत्र में स्थित है और समुद्र तल से 1,535 मीटर की ऊँचाई पर है। घने देवदार के जंगल और सीढ़ीदार खेत इसे घेरे हुए हैं, जो यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं। महाशिवरात्रि यहाँ का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है, जिसमें हजारों भक्त प्रार्थनाओं और उत्सवों में भाग लेते हैं। इसके अतिरिक्त, जुलाई माह की पूर्णिमा से शुरू होने वाला तीन दिवसीय मेला भी हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। 180 गाँवों के इष्ट देवता गुरु कैलापीर का भव्य मेला सामान्य दीपावली के एक माह बाद बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। मंदिर तक पहुँचने के लिए ऋषिकेश और नई टिहरी से घनसाली के लिए सीधी बसें उपलब्ध हैं, जिसके बाद निजी टैक्सी या अन्य वाहन से मंदिर तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। मुख्य बूढ़ा केदार सड़क पर स्थित लोहे के पुल से 1 किलोमीटर की आसान और मनोरम ट्रेकिंग के बाद मंदिर तक पहुँचा जा सकता है। मार्च से जून और सितंबर से नवंबर तक का समय मंदिर भ्रमण के लिए सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि इस दौरान मौसम सुहावना रहता है और गढ़वाल हिमालय के मनमोहक दृश्य दिखाई देते हैं। बूढ़ा केदार महासर ताल, सहस्त्र ताल, जरार ताल और मंझार ताल जैसे कई सुंदर और ऊँचे तालों की ट्रेकिंग के लिए भी एक मुख्य मार्ग है।

हमारी यात्रा के दौरान हमें रावल अमरनाथ योगी से साक्षात्कार का सौभाग्य मिला, जिन्होंने बूढ़ा केदार मंदिर के इतिहास, पौराणिक महत्व और परंपराओं के विषय में अत्यंत सरल एवं गहन जानकारी साझा की थी। उनके शब्दों में इस पावन धाम की आस्था और अध्यात्म की जीवंत झलक स्पष्ट रूप से अनुभव की जा सकती थी, और यह भेंट इस दिव्य स्थल की सांस्कृतिक आत्मा को समझने का एक सशक्त माध्यम बनी। दुर्भाग्यवश, हाल ही में उनके स्वर्गवास का समाचार प्राप्त हुआ, जिससे यह स्मृति और भी अधिक भावुक एवं अविस्मरणीय हो गई है, और बूढ़ा केदार की यह यात्रा आज भी उनकी स्मृतियों और मार्गदर्शन के प्रकाश में जीवंत प्रतीत होती है। अंततः, बूढ़ा केदार केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक विरासत का एक जीवंत प्रतीक है, जो श्रद्धा, इतिहास और प्रकृति का एक अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
    user_Uklive Uttrakhand
    Uklive Uttrakhand
    टिहरी, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड•
    16 hrs ago
  • उत्तराखंड के देहरादून स्थित पिट्ठूवाला के राजकीय पॉलिटेक्निक संस्थान में परीक्षा के दौरान नकल रोकने को लेकर जमकर हंगामा हुआ। आरोप है कि सिविल इंजीनियरिंग फाइनल ईयर के एक छात्र ने अपने दरोगा पिता, मामा और कुछ अन्य लोगों को बुला लिया, जिन्होंने संस्थान में घुसकर शिक्षकों और कर्मचारियों के साथ मारपीट की। वायरल हुए एक वीडियो में कंट्रोल रूम के अंदर हंगामा और कुर्सियों से मारपीट के आरोप भी सामने आए हैं। वहीं, दूसरी ओर छात्र के दरोगा पिता ने संस्थान के शिक्षकों पर ही अपने बेटे के साथ मारपीट करने का आरोप लगाया है। इस घटना के बाद दोनों पक्षों की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और पुलिस मामले की जांच में जुटी है। नकल रोकने जैसी बात पर इतना बड़ा बवाल हो जाना एक गंभीर मुद्दा बन गया है।
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    उत्तराखंड के देहरादून स्थित पिट्ठूवाला के राजकीय पॉलिटेक्निक संस्थान में परीक्षा के दौरान नकल रोकने को लेकर जमकर हंगामा हुआ। आरोप है कि सिविल इंजीनियरिंग फाइनल ईयर के एक छात्र ने अपने दरोगा पिता, मामा और कुछ अन्य लोगों को बुला लिया, जिन्होंने संस्थान में घुसकर शिक्षकों और कर्मचारियों के साथ मारपीट की।

वायरल हुए एक वीडियो में कंट्रोल रूम के अंदर हंगामा और कुर्सियों से मारपीट के आरोप भी सामने आए हैं। वहीं, दूसरी ओर छात्र के दरोगा पिता ने संस्थान के शिक्षकों पर ही अपने बेटे के साथ मारपीट करने का आरोप लगाया है।

इस घटना के बाद दोनों पक्षों की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और पुलिस मामले की जांच में जुटी है। नकल रोकने जैसी बात पर इतना बड़ा बवाल हो जाना एक गंभीर मुद्दा बन गया है।
    user_राजकुमार अग्रवाल डोईवाला रिपोर
    राजकुमार अग्रवाल डोईवाला रिपोर
    Lawyer डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड•
    46 min ago
  • प्रीकम, जिसे प्री-इजेकुलेट भी कहा जाता है, यौन उत्तेजना के दौरान लिंग के सिरे से निकलने वाला एक स्पष्ट और चिपचिपा तरल पदार्थ है। यह पूर्ण स्खलन होने से पहले ही निकलता है। इसका मुख्य कार्य प्राकृतिक चिकनाई प्रदान करना और मूत्रमार्ग के अम्लीय वातावरण को बेअसर करके शुक्राणु के लिए तैयार करना है। डॉ. सेव्ड बीयूएमएस (यूएयू) सेक्सोलॉजिस्ट और जनरल फिजिशियन का संपर्क नंबर 9411728392 है।
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    प्रीकम, जिसे प्री-इजेकुलेट भी कहा जाता है, यौन उत्तेजना के दौरान लिंग के सिरे से निकलने वाला एक स्पष्ट और चिपचिपा तरल पदार्थ है। यह पूर्ण स्खलन होने से पहले ही निकलता है। इसका मुख्य कार्य प्राकृतिक चिकनाई प्रदान करना और मूत्रमार्ग के अम्लीय वातावरण को बेअसर करके शुक्राणु के लिए तैयार करना है। डॉ. सेव्ड बीयूएमएस (यूएयू) सेक्सोलॉजिस्ट और जनरल फिजिशियन का संपर्क नंबर 9411728392 है।
    user_Dr Saved Malik
    Dr Saved Malik
    Doctor देहरादून, देहरादून, उत्तराखंड•
    8 hrs ago
  • दिल्ली में पेपर लीक के लगातार सामने आ रहे मामलों के विरोध में कॉकरोच पार्टी ने एक विरोध प्रदर्शन किया। शुरुआत में इस प्रदर्शन में भीड़ कम थी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, लोगों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई। तेज गर्मी के बावजूद भी प्रदर्शनकारियों का गुस्सा कम नहीं हो रहा था, क्योंकि बार-बार हो रहे पेपर लीक के कारण उनमें गहरा रोष व्याप्त था।
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    दिल्ली में पेपर लीक के लगातार सामने आ रहे मामलों के विरोध में कॉकरोच पार्टी ने एक विरोध प्रदर्शन किया। शुरुआत में इस प्रदर्शन में भीड़ कम थी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, लोगों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई। तेज गर्मी के बावजूद भी प्रदर्शनकारियों का गुस्सा कम नहीं हो रहा था, क्योंकि बार-बार हो रहे पेपर लीक के कारण उनमें गहरा रोष व्याप्त था।
    user_Rajkumar mehra press reporter
    Rajkumar mehra press reporter
    Real Estate Agent विकास नगर, देहरादून, उत्तराखंड•
    10 hrs ago
  • देहरादून के गणेशपुर स्थित शिवलोक कॉलोनी में एक बेहतरीन डबल साइड कॉर्नर प्लॉट बिक्री के लिए उपलब्ध है। यह प्लॉट मुख्य सड़क से मात्र 200 मीटर की दूरी पर स्थित है और इसे सपनों का घर बनाने के लिए एक आदर्श स्थान बताया जा रहा है। प्लॉट का आकार 40 × 53 फीट है, जो एक डबल साइड कॉर्नर प्लॉट होने का विशेष लाभ प्रदान करता है। यह चौड़ी सड़क कनेक्टिविटी, बेहतर वेंटिलेशन और खुले दृश्य के साथ एक शांत और विकसित आवासीय क्षेत्र में स्थित है। इस प्लॉट की कीमत ₹26,000 प्रति गज रखी गई है, जो कि नेगोशिएबल है। इसे बच्चों के बेहतर भविष्य और अपने घर के सपने की मजबूत नींव के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जहाँ आज का निवेश कल का प्रीमियम पता बन सकता है। आस-पास के महत्वपूर्ण स्थानों में जीडी गोयनका स्कूल, प्रेमनगर मार्केट, आईएसबीटी देहरादून, ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी, अस्पताल और दैनिक जरूरतों के बाजार शामिल हैं। इच्छुक व्यक्ति मिस ऋतु सिंह से 9528242511 पर या उत्तराखंड हाउसिंग डेवलपर्स से 8077606460 पर संपर्क कर सकते हैं। इस अवसर को तुरंत भुनाने की अपील की जा रही है, क्योंकि यह प्लॉट ज़्यादा समय तक उपलब्ध नहीं रह सकता।
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    देहरादून के गणेशपुर स्थित शिवलोक कॉलोनी में एक बेहतरीन डबल साइड कॉर्नर प्लॉट बिक्री के लिए उपलब्ध है। यह प्लॉट मुख्य सड़क से मात्र 200 मीटर की दूरी पर स्थित है और इसे सपनों का घर बनाने के लिए एक आदर्श स्थान बताया जा रहा है।

प्लॉट का आकार 40 × 53 फीट है, जो एक डबल साइड कॉर्नर प्लॉट होने का विशेष लाभ प्रदान करता है। यह चौड़ी सड़क कनेक्टिविटी, बेहतर वेंटिलेशन और खुले दृश्य के साथ एक शांत और विकसित आवासीय क्षेत्र में स्थित है।

इस प्लॉट की कीमत ₹26,000 प्रति गज रखी गई है, जो कि नेगोशिएबल है। इसे बच्चों के बेहतर भविष्य और अपने घर के सपने की मजबूत नींव के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जहाँ आज का निवेश कल का प्रीमियम पता बन सकता है।

आस-पास के महत्वपूर्ण स्थानों में जीडी गोयनका स्कूल, प्रेमनगर मार्केट, आईएसबीटी देहरादून, ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी, अस्पताल और दैनिक जरूरतों के बाजार शामिल हैं। इच्छुक व्यक्ति मिस ऋतु सिंह से 9528242511 पर या उत्तराखंड हाउसिंग डेवलपर्स से 8077606460 पर संपर्क कर सकते हैं। इस अवसर को तुरंत भुनाने की अपील की जा रही है, क्योंकि यह प्लॉट ज़्यादा समय तक उपलब्ध नहीं रह सकता।
    user_Uttarakhand Housing developers
    Uttarakhand Housing developers
    Real Estate Developer देहरादून, देहरादून, उत्तराखंड•
    11 hrs ago
  • देहरादून के थानो क्षेत्र में एक पुरानी मस्जिद को एमडीडीए (MDDA) द्वारा नक्शा न होने के आधार पर सील किए जाने के बाद से विवाद गहरा गया है। इस कार्रवाई के विरोध में मुस्लिम सेवा संगठन ने जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर जमकर प्रदर्शन किया। संगठन ने तत्काल मस्जिद को खोलने की मांग की है। मुस्लिम सेवा संगठन के अध्यक्ष नईम कुरैशी ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि मस्जिद के सौंदर्यीकरण के लिए सरकार ने स्वयं धनराशि दी थी और कार्यदायी संस्था एक सरकारी विभाग था। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे में, मस्जिद के नक्शे की जिम्मेदारी भी सरकार की ही बनती है।
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    देहरादून के थानो क्षेत्र में एक पुरानी मस्जिद को एमडीडीए (MDDA) द्वारा नक्शा न होने के आधार पर सील किए जाने के बाद से विवाद गहरा गया है। इस कार्रवाई के विरोध में मुस्लिम सेवा संगठन ने जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर जमकर प्रदर्शन किया।

संगठन ने तत्काल मस्जिद को खोलने की मांग की है। मुस्लिम सेवा संगठन के अध्यक्ष नईम कुरैशी ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि मस्जिद के सौंदर्यीकरण के लिए सरकार ने स्वयं धनराशि दी थी और कार्यदायी संस्था एक सरकारी विभाग था। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे में, मस्जिद के नक्शे की जिम्मेदारी भी सरकार की ही बनती है।
    user_Mukesh rawat
    Mukesh rawat
    Dehradun, Uttarakhand•
    12 hrs ago
  • कॉकरोच जनता पार्टी ने लोगों से उनके सोशल मीडिया पेज को फॉलो करने, कमेंट करने, शेयर करने और ज्यादा से ज्यादा लाइक करने की अपील की है।
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    कॉकरोच जनता पार्टी ने लोगों से उनके सोशल मीडिया पेज को फॉलो करने, कमेंट करने, शेयर करने और ज्यादा से ज्यादा लाइक करने की अपील की है।
    user_किसान मजदूर महासंग्राम संगठन युवा जिला सचिव जिला बिजनौर शादाब राणा
    किसान मजदूर महासंग्राम संगठन युवा जिला सचिव जिला बिजनौर शादाब राणा
    विकास नगर, देहरादून, उत्तराखंड•
    23 hrs ago
  • उत्तराखंड के राज्यपाल गुरमीत सिंह ने अपने दो दिवसीय मुनस्यारी भ्रमण के दौरान नंदा देवी मंदिर में पूजा-अर्चना की और प्रदेशवासियों के सुख-समृद्धि की कामना की। इस अवसर पर उन्होंने सरमोली के विश्वप्रसिद्ध होमस्टे मॉडल, महिला स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय पर्यटन गतिविधियों की विशेष रूप से सराहना की। राज्यपाल ने इन सभी को उत्तराखंड के सतत पर्यटन विकास का उत्कृष्ट उदाहरण बताते हुए यह भी कहा कि मुनस्यारी आज राज्य की पर्यटन पहचान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहा है।
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    उत्तराखंड के राज्यपाल गुरमीत सिंह ने अपने दो दिवसीय मुनस्यारी भ्रमण के दौरान नंदा देवी मंदिर में पूजा-अर्चना की और प्रदेशवासियों के सुख-समृद्धि की कामना की। इस अवसर पर उन्होंने सरमोली के विश्वप्रसिद्ध होमस्टे मॉडल, महिला स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय पर्यटन गतिविधियों की विशेष रूप से सराहना की। राज्यपाल ने इन सभी को उत्तराखंड के सतत पर्यटन विकास का उत्कृष्ट उदाहरण बताते हुए यह भी कहा कि मुनस्यारी आज राज्य की पर्यटन पहचान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहा है।
    user_Mukesh rawat
    Mukesh rawat
    Dehradun, Uttarakhand•
    12 hrs ago
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