तीन माह के इंतजार के बाद खुले बलिन (टटन) माता मंदिर के कपाट… आस्था, परंपरा और विश्वास का संगम बना मओट मेला, जहां सैकड़ों श्रद्धालुओं ने माता के दरबार में हाजिरी लगाकर सुख-समृद्धि की कामना की। कृष्ण चंद राणा सम्पादक. पांगी न्यूज़ टुडे। पांगी, रविवार। ग्राम पंचायत करयास के अंतर्गत स्थित प्रसिद्ध बलिन (टटन) माता मंदिर में रविवार को पारंपरिक मओट मेले का आयोजन श्रद्धा और उल्लास के साथ किया गया। करीब तीन माह बाद माता के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए, जिसके चलते सुबह से ही मंदिर परिसर में भारी भीड़ उमड़ पड़ी। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने दिनभर माता के दर्शन कर सुख-शांति और समृद्धि की कामना की। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार बलिन माता को वलीन, टटन और जोतां वाली के नाम से भी जाना जाता है। क्षेत्र के लोगों का विश्वास है कि सच्चे मन से माता के दरबार में आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है। यही कारण है कि कपाट खुलते ही दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। जनश्रुति के अनुसार सतयुग में माता जम्मू-कश्मीर से साच पास होते हुए पांगी पहुंची थीं। कहा जाता है कि करयास में उनके भाई खंडवा नाग ने उन्हें टटन में रोक लिया, जहां माता शीला रूप में स्थापित हो गईं। उस समय वहां बसी भोट (बौद्ध) बस्ती के उजड़ने की कथा भी लोक आस्था में प्रचलित है। एक अन्य मान्यता के अनुसार माता ने भातवां खानदान में कन्या रूप में जन्म लिया था। जन्म के समय दो शेर विलाव रूप में घर में उपस्थित रहे। नौ वर्ष की आयु में माता ने टटन को अपना स्थायी निवास बनाने का संकेत दिया। इसी दौरान भंडारी खानदान के खेत में हल चलाते समय भूमि से एक दिव्य शीला प्रकट हुई, जिसे माता का स्वरूप मानकर वहीं पूजा-अर्चना शुरू की गई। तब से भातवां और भंडारी दोनों ही खानदान माता की सेवा करते आ रहे हैं। माता का मंदिर टटन गांव के ऊपर स्थित है और इसके ऊपर कोई बस्ती नहीं है। मान्यता है कि माता पूरे गांव की रक्षा करती हैं। साच पास में भी माता का एक भव्य मंदिर स्थित है, जहां श्रद्धालु विशेष आस्था के साथ दर्शन करने जाते हैं। बलिन माता को अपार शक्तियों की स्वामिनी माना जाता है। टटन और बलवास गांव में माता के आदेशानुसार शराब पर पूर्ण प्रतिबंध है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति शराब का सेवन कर मंदिर में प्रवेश करता है या नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसे दंड भुगतना पड़ता है। माता के पुजारी केसर सिंह और अन्य भक्तों के अनुसार, माता के दरबार में सच्ची श्रद्धा से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। मओट मेला क्षेत्र की धार्मिक आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है, जिसमें हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।
तीन माह के इंतजार के बाद खुले बलिन (टटन) माता मंदिर के कपाट… आस्था, परंपरा और विश्वास का संगम बना मओट मेला, जहां सैकड़ों श्रद्धालुओं ने माता के दरबार में हाजिरी लगाकर सुख-समृद्धि की कामना की। कृष्ण चंद राणा सम्पादक. पांगी न्यूज़ टुडे। पांगी, रविवार। ग्राम पंचायत करयास के अंतर्गत स्थित प्रसिद्ध बलिन (टटन) माता मंदिर में रविवार को पारंपरिक मओट मेले का आयोजन श्रद्धा और उल्लास के साथ किया गया। करीब तीन माह बाद माता के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए, जिसके चलते सुबह से ही मंदिर परिसर में भारी भीड़ उमड़ पड़ी। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने दिनभर माता के दर्शन कर सुख-शांति और समृद्धि की कामना की। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार बलिन माता को वलीन, टटन और जोतां वाली के नाम से भी जाना जाता है। क्षेत्र के लोगों का विश्वास है कि सच्चे मन से माता के दरबार में आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है। यही कारण है कि कपाट खुलते ही दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। जनश्रुति के अनुसार सतयुग में माता जम्मू-कश्मीर से साच पास होते हुए पांगी पहुंची थीं। कहा जाता है कि करयास में उनके भाई खंडवा नाग ने उन्हें टटन में रोक लिया, जहां माता शीला रूप में स्थापित हो गईं। उस समय वहां बसी भोट (बौद्ध) बस्ती के उजड़ने की कथा भी लोक आस्था में प्रचलित है। एक अन्य मान्यता के अनुसार माता ने भातवां
खानदान में कन्या रूप में जन्म लिया था। जन्म के समय दो शेर विलाव रूप में घर में उपस्थित रहे। नौ वर्ष की आयु में माता ने टटन को अपना स्थायी निवास बनाने का संकेत दिया। इसी दौरान भंडारी खानदान के खेत में हल चलाते समय भूमि से एक दिव्य शीला प्रकट हुई, जिसे माता का स्वरूप मानकर वहीं पूजा-अर्चना शुरू की गई। तब से भातवां और भंडारी दोनों ही खानदान माता की सेवा करते आ रहे हैं। माता का मंदिर टटन गांव के ऊपर स्थित है और इसके ऊपर कोई बस्ती नहीं है। मान्यता है कि माता पूरे गांव की रक्षा करती हैं। साच पास में भी माता का एक भव्य मंदिर स्थित है, जहां श्रद्धालु विशेष आस्था के साथ दर्शन करने जाते हैं। बलिन माता को अपार शक्तियों की स्वामिनी माना जाता है। टटन और बलवास गांव में माता के आदेशानुसार शराब पर पूर्ण प्रतिबंध है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति शराब का सेवन कर मंदिर में प्रवेश करता है या नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसे दंड भुगतना पड़ता है। माता के पुजारी केसर सिंह और अन्य भक्तों के अनुसार, माता के दरबार में सच्ची श्रद्धा से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। मओट मेला क्षेत्र की धार्मिक आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है, जिसमें हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।
- Post by Surender Thakur1
- पांगी घाटी के कुलाल गांव से शिक्षा व्यवस्था की एक बेहद चिंताजनक और शर्मनाक तस्वीर सामने आई है। यहां करोड़ों रुपये खर्च कर राजकीय माध्यमिक पाठशाला का भवन तो तैयार किया जा रहा है, लेकिन विडंबना यह है कि स्कूल में पढ़ाने के लिए पर्याप्त अध्यापक ही मौजूद नहीं हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि एकमात्र शास्त्री के सहारे स्कूल चलाने की कोशिश नाकाम साबित हो रही है। स्थानीय लोगों द्वारा कई बार प्रशासन और सरकार से अध्यापकों की नियुक्ति की मांग की गई, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला। शुरुआत में अच्छी संख्या में बच्चों ने इस स्कूल में प्रवेश लिया था, लेकिन लगातार अध्यापकों की कमी के चलते अभिभावकों ने अपने बच्चों को दूसरे स्कूलों में भेजना शुरू कर दिया। अब हालात यह हैं कि स्कूल का आंगन पूरी तरह सूना हो चुका है और आखिरी बचा छात्र भी स्कूल छोड़ने को मजबूर हो गया है। कुलाल गांव के वार्ड पंच कोल सिंह के अनुसार, बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए अभिभावकों को दूसरे स्थानों पर किराए के कमरे तक लेने पड़ रहे हैं। कुलाल से मिंधल की दूरी करीब 6 किलोमीटर है और गांव आज भी सड़क सुविधा से वंचित है, जिससे बच्चों का रोजाना सफर बेहद जोखिम भरा बन जाता है। स्थानीय लोगों ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कुलाल जैसे दुर्गम गांवों की लगातार अनदेखी की जा रही है। जब स्कूल में स्टाफ ही उपलब्ध नहीं है, तो ऐसे में स्कूल खोलने का क्या औचित्य रह जाता है? एक ओर सरकार शिक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है और ऑनलाइन संवाद के जरिए अपनी उपलब्धियां गिनाती है, वहीं जमीनी स्तर पर हकीकत बिल्कुल उलट नजर आ रही है। यह मामला सिर्फ एक गांव का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलता है। अब देखना यह है कि क्या सरकार इस गंभीर मुद्दे पर कोई ठोस कदम उठाती है या फिर कुलाल के बच्चों का भविष्य यूं ही अधर में लटका रहेगा।1
- Post by Ram chand1
- गगल:-(28 अप्रैल 2026) मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू गगल (कांगड़ा) हवाई अड्डे पर पहुंचे थे, लेकिन खराब मौसम के कारण उन्हें अपना शिमला जाने का कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। शिमला वापसी रद: खराब मौसम और दृश्यता (visibility) की कंशमी के चलते मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर उड़ान नहीं भर सका, जिसके कारण उन्हें धर्मशाला वापस लौटना पड़ा। राष्ट्रपति की अगवानी: इससे पहले, 27 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री सुक्खू ने शिमला में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का भव्य स्वागत किया था, जो हिमाचल प्रदेश के पांच दिवसीय दौरे पर आई हैं। मुख्यमंत्री हाल ही में कांगड़ा जिले के दो दिवसीय दौरे पर आए थे, जहाँ उन्होंने ज्वालामुखजी और गगल क्षेत्र के लोगों से मुलाकात की थी। गगल हवाई अड्डे पर रुकने के दौरान उन्होंने एयरपोर्ट विस्तार से प्रभावित होने वाले परिवारों से भी मुलाकात की और उन्हें उचित मुआवजा व भूमि नियमित करने का आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री वर्तमान में धर्मशाला में ही रुक सकते हैं जब तक मौसम में सुधार नहीं होता। 30 अप्रैल को राहुल गांधी के धर्मशाला दौरे के संबंध में एएसएल बैठक शाम 5:00 बजे गग्गल हवाई अड्डे पर कांगड़ा के वर्तमान उपायुक्त हेमराज बैरवा के नेतृत्व में संपन्न हुई। इस बैठक में विभिन्न विभागों के अधिकारियों ने भाग लिया, जिसमें राहुल गांधी के धर्मशाला दौरे की सुरक्षा के संबंध में विभिन्न पहलुओं पर बात करके हर एक विभाग को कड़े दिशानिर्देश दिए गए। गगल से तेजस्वी चौधरी की रिपोर्ट1
- Post by Rakesh Kumar4
- Post by Shivinder singh Bhadwal1
- बुधवार को दि जोगिंदर नगर उपमंडलीय सहकारी विपणन एवं उपभोक्ता संघ सीमित के अध्यक्ष पद के लिये चुनाव हुए। जिसमें 5 जोन से आए निदेशकों ने भाग लिया। निदेशक वर्ग में जगमोहन सिंह ठाकुर, मोहन सिंह ठाकुर, काहन सिंह ठाकुर, होशियार सिंह व भीम सिंह ठाकुर शामिल रहे। सर्व सम्मति से भीम सिंह ठाकुर को अध्यक्ष और काहन सिंह ठाकुर को उपाध्यक्ष चुना गया। भीम सिंह ठाकुर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि इस सोसाईटी को आगे बढ़ाने के लिये शीघ्र ही नई रूप रेखा तैयार होगी।1
- Post by Surender Thakur1