*श्मशान घाट की रोड बनाने ग्राम बडझिर की महिलाओं ने संभाली कमान* *श्मशान घाट/शांति धाम तक रास्ते के लिए ग्राम बड़झिर में नाराज ग्रामीणों महिलाओं ने खुद संभाली कमान भाजपा नेता नीलकंठ तिवारी जो जिला संगठन मंत्री है उस पर लगाया रोड न बनने देने का आरोप* *ग्राम बड़झिर में सड़क के अभाव से नाराज ग्रामीणों का अनोखा विरोध — महिलाओं ने भी हाथों में फावड़ा, गैंती और तसला लेकर शुरू किया रास्ता बनाने का काम* बड़झिर/मोहगांव सड़क। ग्राम पंचायत मोहगांव सड़क के अंतर्गत आने वाले ग्राम बड़झिर में श्मशान घाट “शांति धाम” तक पहुंचने के लिए समुचित सड़क नहीं होने का मामला अब ग्रामीणों के आक्रोश का कारण बन गया है। ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के लगभग 80 वर्ष बाद भी गांव के लोगों को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए व्यवस्थित मार्ग उपलब्ध नहीं हो पाया है। बरसात के दिनों में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है तथा कीचड़, पानी और खराब रास्ते के कारण शवयात्रा लेकर श्मशान घाट तक पहुंचना ग्रामीणों के लिए बेहद कठिन हो जाता है। *भाजपा नेता नीलकंठ तिवारी पर ग्रामीणों के आरोप निष्पक्ष जांच की मांग* *ग्रामीणों ने भाजपा नेता नीलकंठ तिवारी को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। कुछ ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें राजनीतिक प्रभाव का हवाला देकर डराने या दबाव बनाने का प्रयास किया जाता है।* ग्रामीणों द्वारा कथित रूप से यह भी कहा जा रहा है कि राजनीतिक पद और सामाजिक पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रास्ते के मामले में विशेष अधिकार नहीं मिल सकता। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। नीलकंठ तिवारी का पक्ष इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण है और उनके द्वारा यदि भूमि संबंधी दस्तावेज, राजस्व रिकॉर्ड या रास्ते पर आपत्ति का कोई वैधानिक आधार प्रस्तुत किया जाता है तो उसे भी सार्वजनिक रूप से सामने रखा जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि समस्या का समाधान प्रशासन और पंचायत से होने की प्रतीक्षा करने के बजाय ग्रामीणों ने स्वयं ही रास्ता बनाने का बीड़ा उठा लिया। ग्राम सभा की बैठक में ग्रामीणों के बीच चर्चा और निर्णय के बाद गांव की महिलाओं एवं ग्रामीणों ने हाथों में गैंती, कुदारी, फावड़ा और तसले उठाए और शांति धाम तक पहुंचने वाले रास्ते पर श्रमदान शुरू कर दिया। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल सड़क बनाने का काम नहीं है, बल्कि यह उनके मूलभूत अधिकार, सम्मान और अंतिम संस्कार के अधिकार की आवाज है। “जीते-जी रास्ता नहीं तो कम से कम अंतिम यात्रा का रास्ता तो मिले” ग्रामीणों का कहना है कि गांव में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जीवन के अंतिम पड़ाव पर श्मशान घाट तक पहुंचने का अधिकार है। इसके लिए किसी व्यक्ति विशेष की कृपा या अनुमति पर निर्भरता नहीं होनी चाहिए। ग्रामीण महिलाओं ने कहा कि जब घर का कोई सदस्य दुनिया से विदा होता है, तब परिवार पहले ही दुख में डूबा होता है। ऐसे समय में शवयात्रा को खराब और कच्चे रास्ते से ले जाना अत्यंत पीड़ादायक हो जाता है। बरसात में रास्ते की स्थिति और खराब हो जाती है। इसी पीड़ा के चलते ग्रामीणों ने कहा कि यदि शासन-प्रशासन और ग्राम पंचायत सड़क बनाने में असमर्थ हैं, तो गांव के लोग स्वयं श्रमदान करके रास्ता बनाएंगे। ग्राम सभा के बाद ग्रामीणों ने खुद उठाए औजार प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम सभा की बैठक में श्मशान घाट तक सड़क निर्माण को लेकर चर्चा हुई। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से इस मार्ग की समस्या पंचायत और संबंधित अधिकारियों के सामने रखी जा रही है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं हुआ। बैठक के बाद ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया कि अब वे किसी के भरोसे नहीं बैठेंगे। इसके बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाएं और पुरुष खेतों की ओर पहुंचे और गैंती, फावड़ा, कुदारी तथा तसले लेकर रास्ते को तैयार करने के काम में जुट गए। महिलाओं का इस तरह आगे आना ग्रामीणों के लिए विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि जब जनप्रतिनिधि और पंचायत व्यवस्था समस्या का समाधान नहीं कर पा रही है, तब गांव की मातृशक्ति ने स्वयं आगे आकर जिम्मेदारी संभाली है। जमीन को लेकर विवाद, ग्रामीणों ने लगाए गंभीर आरोप ग्रामीणों ने भाजपा नेता नीलकंठ तिवारी, जिन्हें ग्रामीण भाजपा जिला संगठन मंत्री के पद पर होना बता रहे हैं, पर श्मशान घाट तक जाने वाले रास्ते में बाधा उत्पन्न करने के आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि शांति धाम तक पहुंचने वाले रास्ते का एक हिस्सा उनकी जमीन से होकर गुजरता है और वे ग्रामीणों को उस ओर से जाने से रोकते हैं। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि जिस भूमि को लेकर विवाद बताया जा रहा है, उसमें से कुछ भूमि पूर्व में गांव में स्कूल निर्माण के लिए दान किए जाने की बात कही जाती है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से राजस्व अभिलेखों एवं संबंधित दस्तावेजों के आधार पर पुष्टि किया जाना आवश्यक है। यदि भूमि वास्तव में दान की गई थी तो उसकी वैधानिक स्थिति, दानपत्र, राजस्व रिकॉर्ड और वर्तमान स्वामित्व की जांच किए जाने की मांग ग्रामीणों द्वारा की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि श्मशान घाट तक जाने के लिए आगे किसानों की जमीन भी आती है और संबंधित किसान कथित तौर पर रास्ते के लिए जमीन देने को तैयार हैं। ऐसे में उनका सवाल है कि यदि अन्य ग्रामीण अपनी जमीन देने को तैयार हैं तो रास्ते की समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं किया जा रहा? “गांव वाले जमीन देने को तैयार, फिर रास्ता क्यों नहीं?” ग्रामीणों का कहना है कि शांति धाम तक पहुंचने के लिए जिस मार्ग की आवश्यकता है, उसमें कई किसान सहयोग करने को तैयार हैं। ग्रामीणों के अनुसार यदि प्रशासन मौके पर पहुंचकर सीमांकन कराए और उपलब्ध भूमि तथा सरकारी भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे, तो रास्ते का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले का राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर निष्पक्ष सीमांकन कराया जाए। यह भी स्पष्ट किया जाए कि श्मशान घाट तक जाने वाला रास्ता किस भूमि से होकर गुजरता है, रास्ते की चौड़ाई कितनी है तथा पंचायत अथवा शासन की ओर से इस मार्ग के निर्माण के लिए क्या प्रावधान किया जा सकता है। सुदूर सड़क योजना का एस्टीमेट भी अधर में? ग्रामीणों ने संबंधित तकनीकी अमले की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों के अनुसार इंजीनियर योगेन्द्र कुमरे द्वारा श्मशान घाट तक पहुंच मार्ग के लिए सुदूर सड़क अथवा एप्रोच रोड का एस्टीमेट तैयार करने की बात सामने आई थी, लेकिन अभी तक सड़क का निर्माण धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि संबंधित अधिकारी से संपर्क करने में भी परेशानी होती है और कई बार अधिकारी क्षेत्र में उपलब्ध नहीं रहते। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि इस मामले में केवल कागजी कार्रवाई न हो बल्कि अधिकारी मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति देखें और सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू करें। यदि सड़क निर्माण के लिए पहले से कोई प्रस्ताव, एस्टीमेट या स्वीकृति जारी हुई है तो उसकी वर्तमान स्थिति भी सार्वजनिक की जानी चाहिए। पंचायत की भूमिका पर भी उठे सवाल ग्राम पंचायत मोहगांव सड़क की कार्यप्रणाली को लेकर भी ग्रामीणों में नाराजगी देखी जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत का मूल दायित्व गांव की बुनियादी समस्याओं का समाधान करना है। सड़क, नाली, पेयजल और सार्वजनिक उपयोग की भूमि जैसे विषय पंचायत व्यवस्था के सामने लगातार आते हैं। लेकिन श्मशान घाट जैसे अत्यंत आवश्यक सार्वजनिक स्थल तक पहुंचने के लिए भी यदि ग्रामीणों को स्वयं सड़क बनानी पड़े तो यह पंचायत व्यवस्था की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों का कहना है कि शांति धाम कोई निजी स्थान नहीं है। यहां गांव के प्रत्येक परिवार को अंतिम संस्कार के लिए जाना पड़ता है। इसलिए वहां तक पहुंचने का मार्ग भी सार्वजनिक सुविधा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। महिलाओं ने कहा — “अब हम पीछे नहीं हटेंगे” रास्ता निर्माण के दौरान गांव की महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से दिखाई दी। महिलाओं ने अपने हाथों में फावड़ा और तसला लेकर मिट्टी हटाने तथा रास्ता बनाने के कार्य में सहयोग किया। महिलाओं का कहना था कि वे किसी से विवाद नहीं चाहतीं। उनकी मांग केवल इतनी है कि गांव के लोगों को श्मशान घाट तक सम्मानपूर्वक पहुंचने के लिए रास्ता मिले। ग्रामीण महिलाओं ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति रास्ते में आपत्ति करता है तो प्रशासन को मौके पर आकर राजस्व रिकॉर्ड देखना चाहिए और निष्पक्ष निर्णय लेना चाहिए। गांव के लोगों को कानून हाथ में लेने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन प्रशासन को भी उनकी समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए। ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन दोनों पक्षों को बुलाकर सुनवाई करे और दस्तावेजों के आधार पर निर्णय ले। “किसी की जमीन पर जबरन कब्जा नहीं, लेकिन सार्वजनिक रास्ता भी जरूरी” ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी व्यक्ति की निजी भूमि पर अवैध कब्जा करने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि यदि रास्ते को लेकर भूमि विवाद है तो उसका समाधान कानून और राजस्व नियमों के अनुसार किया जाए। ग्रामीणों की मुख्य मांग यह है कि शांति धाम तक पहुंचने के लिए वैधानिक और स्थायी रास्ता उपलब्ध कराया जाए। यदि संबंधित भूमि निजी है तो प्रशासन वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराने की संभावनाएं तलाश सकता है। यदि रास्ता सरकारी अथवा सार्वजनिक उपयोग की भूमि में आता है तो उसकी स्थिति स्पष्ट कर रास्ते को अतिक्रमणमुक्त किया जा सकता है। इसीलिए ग्रामीणों ने कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदार, जनपद पंचायत एवं ग्राम पंचायत से संयुक्त रूप से मौके का निरीक्षण कर समस्या का स्थायी समाधान करने की मांग की है। ग्रामीणों का श्रमदान बना प्रशासन के लिए आईना आज ग्रामीणों द्वारा किया गया श्रमदान केवल मिट्टी खोदने का कार्य नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के सामने एक सवाल के रूप में देखा जा रहा है। एक तरफ गांव के लोग वर्षों से श्मशान घाट तक सड़क की मांग कर रहे हैं और दूसरी तरफ जब समस्या का समाधान नहीं हुआ तो ग्रामीणों ने स्वयं ही रास्ता बनाने का निर्णय लिया। गांव की महिलाओं का खेतों में उतरकर गैंती-फावड़ा चलाना इस बात का प्रतीक है कि ग्रामीण अब अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए संगठित होकर आवाज उठाने लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे सड़क निर्माण का कार्य किसी राजनीतिक दल के विरोध में नहीं बल्कि अपने गांव और अपने शांति धाम के सम्मान के लिए कर रहे हैं। प्रशासन से सात प्रमुख मांगें ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि— 1. शांति धाम तक जाने वाले पूरे मार्ग का तत्काल राजस्व सीमांकन कराया जाए। 2. रास्ते में आने वाली सरकारी, निजी एवं सार्वजनिक उपयोग की भूमि की स्थिति स्पष्ट की जाए। 3. संबंधित भूमि के दान, स्वामित्व एवं राजस्व रिकॉर्ड की जांच की जाए। 4. यदि कोई व्यक्ति रास्ते में आपत्ति कर रहा है तो दोनों पक्षों की सुनवाई कर वैधानिक समाधान निकाला जाए। 5. सुदूर सड़क/एप्रोच रोड के प्रस्ताव एवं एस्टीमेट की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की जाए। 6. संबंधित इंजीनियर एवं पंचायत अधिकारियों को मौके पर भेजकर सड़क निर्माण की कार्यवाही शुरू कराई जाए। 7. शांति धाम तक स्थायी, सर्वसुलभ और बरसात में भी उपयोग योग्य सड़क का निर्माण कराया जाए। “अब शांति धाम तक रास्ता बनाकर ही दम लेंगे” ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी व्यक्ति विशेष से संघर्ष नहीं चाहते। उनका संघर्ष केवल उस समस्या से है जिसने गांव के लोगों को वर्षों से परेशान कर रखा है। ग्रामीणों ने कहा कि अंतिम यात्रा किसी जाति, धर्म, दल या व्यक्ति की नहीं होती। मृत्यु के बाद प्रत्येक व्यक्ति को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट तक ले जाना पड़ता है। इसलिए श्मशान घाट तक रास्ता होना किसी भी गांव की बुनियादी आवश्यकता है। ग्रामीणों का कहना है कि वे प्रशासन से न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं। यदि प्रशासन मौके पर आकर राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर रास्ता निर्धारित करता है और सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू करता है तो ग्रामीण हर संभव सहयोग करने को तैयार हैं। अब देखना होगा प्रशासन क्या कदम उठाता है बड़झिर की यह तस्वीर अब केवल एक गांव की समस्या नहीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा सवाल बन गई है। एक ओर ग्रामीण महिलाएं और पुरुष अपने हाथों में गैंती, फावड़ा और तसला लेकर शांति धाम तक रास्ता बनाने में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर पंचायत और प्रशासन के सामने यह चुनौती है कि वे इस समस्या का स्थायी और वैधानिक समाधान कब तक करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे चाहते हैं कि यह मामला किसी राजनीतिक टकराव का रूप न ले। प्रशासन निष्पक्ष जांच करे, भूमि और रास्ते की वास्तविक स्थिति सामने लाए और सभी पक्षों को सुनकर निर्णय करे। श्मशान घाट तक रास्ता किसी व्यक्ति की कृपा नहीं, बल्कि गांव की मूलभूत आवश्यकता है। अब सवाल यही है कि क्या ग्राम पंचायत, जनपद और प्रशासन ग्रामीणों की इस आवाज को सुनकर शांति धाम तक स्थायी सड़क उपलब्ध कराएगा, या फिर ग्रामीणों को अपनी बुनियादी जरूरत के लिए इसी तरह स्वयं गैंती-फावड़ा लेकर सड़क बनानी पड़ेगी? ग्रामीणों की स्पष्ट मांग “हमें किसी से लड़ाई नहीं चाहिए, हमें सिर्फ शांति धाम तक जाने का सम्मानजनक रास्ता चाहिए। राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर जांच कराइए, रास्ता निर्धारित कराइए और सड़क बनाइए।”
*श्मशान घाट की रोड बनाने ग्राम बडझिर की महिलाओं ने संभाली कमान* *श्मशान घाट/शांति धाम तक रास्ते के लिए ग्राम बड़झिर में नाराज ग्रामीणों महिलाओं ने खुद संभाली कमान भाजपा नेता नीलकंठ तिवारी जो जिला संगठन मंत्री है उस पर लगाया रोड न बनने देने का आरोप* *ग्राम बड़झिर में सड़क के अभाव से नाराज ग्रामीणों का अनोखा विरोध — महिलाओं ने भी हाथों में फावड़ा, गैंती और तसला लेकर शुरू किया रास्ता बनाने का काम* बड़झिर/मोहगांव सड़क। ग्राम पंचायत मोहगांव सड़क के अंतर्गत आने वाले ग्राम बड़झिर में श्मशान घाट “शांति धाम” तक पहुंचने के लिए समुचित सड़क नहीं होने का मामला अब ग्रामीणों के आक्रोश का कारण बन गया है। ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के लगभग 80 वर्ष बाद भी गांव के लोगों को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए व्यवस्थित मार्ग उपलब्ध नहीं हो पाया है। बरसात के दिनों में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है तथा कीचड़, पानी और खराब रास्ते के कारण शवयात्रा लेकर श्मशान घाट तक पहुंचना ग्रामीणों के लिए बेहद कठिन हो जाता है। *भाजपा नेता नीलकंठ तिवारी पर ग्रामीणों के आरोप निष्पक्ष जांच की मांग* *ग्रामीणों ने भाजपा नेता नीलकंठ तिवारी को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। कुछ ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें राजनीतिक प्रभाव का हवाला देकर डराने या दबाव बनाने का प्रयास किया जाता है।* ग्रामीणों द्वारा कथित रूप से यह भी कहा जा रहा है कि राजनीतिक पद और सामाजिक पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रास्ते के मामले में विशेष अधिकार नहीं मिल सकता। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। नीलकंठ तिवारी का पक्ष इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण है और उनके द्वारा यदि भूमि संबंधी दस्तावेज, राजस्व रिकॉर्ड या रास्ते पर आपत्ति का कोई वैधानिक आधार प्रस्तुत किया जाता है तो उसे भी सार्वजनिक रूप से सामने रखा जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि समस्या का समाधान प्रशासन और पंचायत से होने की प्रतीक्षा करने के बजाय ग्रामीणों ने स्वयं ही रास्ता बनाने का बीड़ा उठा लिया। ग्राम सभा की बैठक में ग्रामीणों के बीच चर्चा और निर्णय के बाद गांव की महिलाओं एवं ग्रामीणों ने हाथों में गैंती, कुदारी, फावड़ा और तसले उठाए और शांति धाम तक पहुंचने वाले रास्ते पर श्रमदान शुरू कर दिया। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल सड़क बनाने का काम नहीं है, बल्कि यह उनके मूलभूत अधिकार, सम्मान और अंतिम संस्कार के अधिकार की आवाज है। “जीते-जी रास्ता नहीं तो कम से कम अंतिम यात्रा का रास्ता तो मिले” ग्रामीणों का कहना है कि गांव में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जीवन के अंतिम पड़ाव पर श्मशान घाट तक पहुंचने का अधिकार है। इसके लिए किसी व्यक्ति विशेष की कृपा या अनुमति पर निर्भरता नहीं होनी चाहिए। ग्रामीण महिलाओं ने कहा कि जब घर का कोई सदस्य दुनिया से विदा होता है, तब परिवार पहले ही दुख में डूबा होता है। ऐसे समय में शवयात्रा को खराब और कच्चे रास्ते से ले जाना अत्यंत पीड़ादायक हो जाता है। बरसात में रास्ते की स्थिति और खराब हो जाती है। इसी पीड़ा के चलते ग्रामीणों ने कहा कि यदि शासन-प्रशासन और ग्राम पंचायत सड़क बनाने में असमर्थ हैं, तो गांव के लोग स्वयं श्रमदान करके रास्ता बनाएंगे। ग्राम सभा के बाद ग्रामीणों ने खुद उठाए औजार प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम सभा की बैठक में श्मशान घाट तक सड़क निर्माण को लेकर चर्चा हुई। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से इस मार्ग की समस्या पंचायत और संबंधित अधिकारियों के सामने रखी जा रही है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं हुआ। बैठक के बाद ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया कि अब वे किसी के भरोसे नहीं बैठेंगे। इसके बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाएं और पुरुष खेतों की ओर पहुंचे और गैंती, फावड़ा, कुदारी तथा तसले लेकर रास्ते को तैयार करने के काम में जुट गए। महिलाओं का इस तरह आगे आना ग्रामीणों के लिए विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि जब जनप्रतिनिधि और पंचायत व्यवस्था समस्या का समाधान नहीं कर पा रही है, तब गांव की मातृशक्ति ने स्वयं आगे आकर जिम्मेदारी संभाली है। जमीन को लेकर विवाद, ग्रामीणों ने लगाए गंभीर आरोप ग्रामीणों ने भाजपा नेता नीलकंठ तिवारी, जिन्हें ग्रामीण भाजपा जिला संगठन मंत्री के पद पर होना बता रहे हैं, पर श्मशान घाट तक जाने वाले रास्ते में बाधा उत्पन्न करने के आरोप
लगाए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि शांति धाम तक पहुंचने वाले रास्ते का एक हिस्सा उनकी जमीन से होकर गुजरता है और वे ग्रामीणों को उस ओर से जाने से रोकते हैं। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि जिस भूमि को लेकर विवाद बताया जा रहा है, उसमें से कुछ भूमि पूर्व में गांव में स्कूल निर्माण के लिए दान किए जाने की बात कही जाती है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से राजस्व अभिलेखों एवं संबंधित दस्तावेजों के आधार पर पुष्टि किया जाना आवश्यक है। यदि भूमि वास्तव में दान की गई थी तो उसकी वैधानिक स्थिति, दानपत्र, राजस्व रिकॉर्ड और वर्तमान स्वामित्व की जांच किए जाने की मांग ग्रामीणों द्वारा की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि श्मशान घाट तक जाने के लिए आगे किसानों की जमीन भी आती है और संबंधित किसान कथित तौर पर रास्ते के लिए जमीन देने को तैयार हैं। ऐसे में उनका सवाल है कि यदि अन्य ग्रामीण अपनी जमीन देने को तैयार हैं तो रास्ते की समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं किया जा रहा? “गांव वाले जमीन देने को तैयार, फिर रास्ता क्यों नहीं?” ग्रामीणों का कहना है कि शांति धाम तक पहुंचने के लिए जिस मार्ग की आवश्यकता है, उसमें कई किसान सहयोग करने को तैयार हैं। ग्रामीणों के अनुसार यदि प्रशासन मौके पर पहुंचकर सीमांकन कराए और उपलब्ध भूमि तथा सरकारी भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे, तो रास्ते का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले का राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर निष्पक्ष सीमांकन कराया जाए। यह भी स्पष्ट किया जाए कि श्मशान घाट तक जाने वाला रास्ता किस भूमि से होकर गुजरता है, रास्ते की चौड़ाई कितनी है तथा पंचायत अथवा शासन की ओर से इस मार्ग के निर्माण के लिए क्या प्रावधान किया जा सकता है। सुदूर सड़क योजना का एस्टीमेट भी अधर में? ग्रामीणों ने संबंधित तकनीकी अमले की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों के अनुसार इंजीनियर योगेन्द्र कुमरे द्वारा श्मशान घाट तक पहुंच मार्ग के लिए सुदूर सड़क अथवा एप्रोच रोड का एस्टीमेट तैयार करने की बात सामने आई थी, लेकिन अभी तक सड़क का निर्माण धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि संबंधित अधिकारी से संपर्क करने में भी परेशानी होती है और कई बार अधिकारी क्षेत्र में उपलब्ध नहीं रहते। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि इस मामले में केवल कागजी कार्रवाई न हो बल्कि अधिकारी मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति देखें और सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू करें। यदि सड़क निर्माण के लिए पहले से कोई प्रस्ताव, एस्टीमेट या स्वीकृति जारी हुई है तो उसकी वर्तमान स्थिति भी सार्वजनिक की जानी चाहिए। पंचायत की भूमिका पर भी उठे सवाल ग्राम पंचायत मोहगांव सड़क की कार्यप्रणाली को लेकर भी ग्रामीणों में नाराजगी देखी जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत का मूल दायित्व गांव की बुनियादी समस्याओं का समाधान करना है। सड़क, नाली, पेयजल और सार्वजनिक उपयोग की भूमि जैसे विषय पंचायत व्यवस्था के सामने लगातार आते हैं। लेकिन श्मशान घाट जैसे अत्यंत आवश्यक सार्वजनिक स्थल तक पहुंचने के लिए भी यदि ग्रामीणों को स्वयं सड़क बनानी पड़े तो यह पंचायत व्यवस्था की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों का कहना है कि शांति धाम कोई निजी स्थान नहीं है। यहां गांव के प्रत्येक परिवार को अंतिम संस्कार के लिए जाना पड़ता है। इसलिए वहां तक पहुंचने का मार्ग भी सार्वजनिक सुविधा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। महिलाओं ने कहा — “अब हम पीछे नहीं हटेंगे” रास्ता निर्माण के दौरान गांव की महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से दिखाई दी। महिलाओं ने अपने हाथों में फावड़ा और तसला लेकर मिट्टी हटाने तथा रास्ता बनाने के कार्य में सहयोग किया। महिलाओं का कहना था कि वे किसी से विवाद नहीं चाहतीं। उनकी मांग केवल इतनी है कि गांव के लोगों को श्मशान घाट तक सम्मानपूर्वक पहुंचने के लिए रास्ता मिले। ग्रामीण महिलाओं ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति रास्ते में आपत्ति करता है तो प्रशासन को मौके पर आकर राजस्व रिकॉर्ड देखना चाहिए और निष्पक्ष निर्णय लेना चाहिए। गांव के लोगों को कानून हाथ में लेने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन प्रशासन को भी उनकी समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए। ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन दोनों पक्षों को बुलाकर सुनवाई करे और दस्तावेजों के आधार पर निर्णय ले। “किसी की
जमीन पर जबरन कब्जा नहीं, लेकिन सार्वजनिक रास्ता भी जरूरी” ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी व्यक्ति की निजी भूमि पर अवैध कब्जा करने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि यदि रास्ते को लेकर भूमि विवाद है तो उसका समाधान कानून और राजस्व नियमों के अनुसार किया जाए। ग्रामीणों की मुख्य मांग यह है कि शांति धाम तक पहुंचने के लिए वैधानिक और स्थायी रास्ता उपलब्ध कराया जाए। यदि संबंधित भूमि निजी है तो प्रशासन वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराने की संभावनाएं तलाश सकता है। यदि रास्ता सरकारी अथवा सार्वजनिक उपयोग की भूमि में आता है तो उसकी स्थिति स्पष्ट कर रास्ते को अतिक्रमणमुक्त किया जा सकता है। इसीलिए ग्रामीणों ने कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदार, जनपद पंचायत एवं ग्राम पंचायत से संयुक्त रूप से मौके का निरीक्षण कर समस्या का स्थायी समाधान करने की मांग की है। ग्रामीणों का श्रमदान बना प्रशासन के लिए आईना आज ग्रामीणों द्वारा किया गया श्रमदान केवल मिट्टी खोदने का कार्य नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के सामने एक सवाल के रूप में देखा जा रहा है। एक तरफ गांव के लोग वर्षों से श्मशान घाट तक सड़क की मांग कर रहे हैं और दूसरी तरफ जब समस्या का समाधान नहीं हुआ तो ग्रामीणों ने स्वयं ही रास्ता बनाने का निर्णय लिया। गांव की महिलाओं का खेतों में उतरकर गैंती-फावड़ा चलाना इस बात का प्रतीक है कि ग्रामीण अब अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए संगठित होकर आवाज उठाने लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे सड़क निर्माण का कार्य किसी राजनीतिक दल के विरोध में नहीं बल्कि अपने गांव और अपने शांति धाम के सम्मान के लिए कर रहे हैं। प्रशासन से सात प्रमुख मांगें ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि— 1. शांति धाम तक जाने वाले पूरे मार्ग का तत्काल राजस्व सीमांकन कराया जाए। 2. रास्ते में आने वाली सरकारी, निजी एवं सार्वजनिक उपयोग की भूमि की स्थिति स्पष्ट की जाए। 3. संबंधित भूमि के दान, स्वामित्व एवं राजस्व रिकॉर्ड की जांच की जाए। 4. यदि कोई व्यक्ति रास्ते में आपत्ति कर रहा है तो दोनों पक्षों की सुनवाई कर वैधानिक समाधान निकाला जाए। 5. सुदूर सड़क/एप्रोच रोड के प्रस्ताव एवं एस्टीमेट की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की जाए। 6. संबंधित इंजीनियर एवं पंचायत अधिकारियों को मौके पर भेजकर सड़क निर्माण की कार्यवाही शुरू कराई जाए। 7. शांति धाम तक स्थायी, सर्वसुलभ और बरसात में भी उपयोग योग्य सड़क का निर्माण कराया जाए। “अब शांति धाम तक रास्ता बनाकर ही दम लेंगे” ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी व्यक्ति विशेष से संघर्ष नहीं चाहते। उनका संघर्ष केवल उस समस्या से है जिसने गांव के लोगों को वर्षों से परेशान कर रखा है। ग्रामीणों ने कहा कि अंतिम यात्रा किसी जाति, धर्म, दल या व्यक्ति की नहीं होती। मृत्यु के बाद प्रत्येक व्यक्ति को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट तक ले जाना पड़ता है। इसलिए श्मशान घाट तक रास्ता होना किसी भी गांव की बुनियादी आवश्यकता है। ग्रामीणों का कहना है कि वे प्रशासन से न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं। यदि प्रशासन मौके पर आकर राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर रास्ता निर्धारित करता है और सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू करता है तो ग्रामीण हर संभव सहयोग करने को तैयार हैं। अब देखना होगा प्रशासन क्या कदम उठाता है बड़झिर की यह तस्वीर अब केवल एक गांव की समस्या नहीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा सवाल बन गई है। एक ओर ग्रामीण महिलाएं और पुरुष अपने हाथों में गैंती, फावड़ा और तसला लेकर शांति धाम तक रास्ता बनाने में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर पंचायत और प्रशासन के सामने यह चुनौती है कि वे इस समस्या का स्थायी और वैधानिक समाधान कब तक करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे चाहते हैं कि यह मामला किसी राजनीतिक टकराव का रूप न ले। प्रशासन निष्पक्ष जांच करे, भूमि और रास्ते की वास्तविक स्थिति सामने लाए और सभी पक्षों को सुनकर निर्णय करे। श्मशान घाट तक रास्ता किसी व्यक्ति की कृपा नहीं, बल्कि गांव की मूलभूत आवश्यकता है। अब सवाल यही है कि क्या ग्राम पंचायत, जनपद और प्रशासन ग्रामीणों की इस आवाज को सुनकर शांति धाम तक स्थायी सड़क उपलब्ध कराएगा, या फिर ग्रामीणों को अपनी बुनियादी जरूरत के लिए इसी तरह स्वयं गैंती-फावड़ा लेकर सड़क बनानी पड़ेगी? ग्रामीणों की स्पष्ट मांग “हमें किसी से लड़ाई नहीं चाहिए, हमें सिर्फ शांति धाम तक जाने का सम्मानजनक रास्ता चाहिए। राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर जांच कराइए, रास्ता निर्धारित कराइए और सड़क बनाइए।”
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- मुंडारा से दिघौरी पहुंची भव्य ‘बम-बम भोले’ कावड़ यात्रा, स्फटिक शिवलिंग का हुआ जलाभिषेक भगवान शिव के प्रिय श्रावण मास में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली दो दिवसीय ‘बम-बम भोले’ कावड़ यात्रा का शुभारंभ 16 अगस्त को मां वैनगंगा के पवित्र उद्गम स्थल मुंडारा धाम से हुआ। सिवनी विधायक दिनेश राय मुनमुन द्वारा आयोजित इस यात्रा में बड़ी संख्या में शिवभक्त कावड़ लेकर शामिल हुए। पहले दिन कावड़ यात्री मां वैनगंगा का पवित्र जल लेकर मातृधाम कातलबोडी पहुंचे, जहां श्रद्धालुओं के लिए भोजन-प्रसाद की व्यवस्था की गई तथा रात्रि विश्राम किया गया। यात्रा के दूसरे दिन 17 अगस्त को कावड़ यात्री गुरु रत्नेश्वर धाम दिघौरी पहुंचे। यहां परिजनों एवं श्रद्धालुओं की उपस्थिति में सभी के उत्तम स्वास्थ्य, सुख-शांति, उन्नति एवं समृद्धि की मंगलकामना के साथ कांवड़ में लाए गए मां वैनगंगा के पवित्र जल से मंदिर में विराजमान विश्व प्रसिद्ध पारदर्शी स्फटिक शिवलिंग का जलाभिषेक एवं पूजन किया गया। इस अवसर पर यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं ने भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त किया। साथ ही यात्रा की व्यवस्थाओं और भोजन-प्रसाद व्यवस्था का भी जायजा लिया गया। दो दिवसीय कावड़ यात्रा के दौरान ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के जयघोष से पूरा वातावरण शिवमय बना रहा।1
- क्षेत्र में श्रद्धा के साथ मनाई गई नाग पंचमी,bकोसुम्बा विक्तु बाबा मंदिर में उमड़ा भक्तों का सैलाब1
- Seoni News: नाग पंचमी पर गणेशगंज के शेष नाग मंदिर में उमड़ा आस्था का सैलाब, अखंड रामायण पाठ का हुआ शुभारंभ1
- कंटेनर ट्रक की टक्कर से पुलिस वाहन दुर्घटनाग्रस्त, थाना प्रभारी सहित चार घायल, जिला अस्पताल में इलाज जारी सिवनी जिले के छपारा थाना क्षेत्र अंतर्गत बंजारी घाटी के पास नेशनल हाईवे-44 पर पुलिस वाहन को एक कंटेनर ट्रक ने जोरदार टक्कर मार दी। हादसे में थाना प्रभारी खेमेन्द्र जैतवार सहित चार पुलिसकर्मी घायल हो गए। सभी घायलों को उपचार के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनका इलाज जारी है। बताया जा रहा है कि पुलिस टीम नेशनल हाईवे-44 पर दुर्घटनाग्रस्त ट्रक और लगे जाम को खुलवाने के लिए मौके की ओर जा रही थी। इसी दौरान बंजारी घाटी के पास कंटेनर ट्रक ने पुलिस वाहन को टक्कर मार दी। हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी की स्थिति बन गई। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है।1
- युवा परिवर्तन संघ ने बिछुआ ब्लॉक के स्कूलों में बांटी किताबें और पेन अभिजीत मिंटू पटेल के नेतृत्व में बच्चों को दी गई शिक्षा सामग्री बिछुआ। युवा परिवर्तन संघ के नेतृत्व में सामाजिक कार्यकर्ता अभिजीत मिंटू पटेल ने बिछुआ ब्लॉक के प्रत्येक स्कूलों में जाकर बच्चों को पेन और किताबें गिफ्ट कीं।इस पहल का उद्देश्य शिक्षा को बढ़ावा देना और जरूरतमंद बच्चों की मदद करना था। संघ के सदस्यों ने स्कूल पहुंचकर बच्चों से मुलाकात की और उन्हें पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। कार्यक्रम के दौरान बच्चों के चेहरे पर खुशी साफ देखी गई। पेन और किताबें पाकर बच्चों ने खुशी-खुशी धन्यवाद कहा। शिक्षकों ने भी इस पहल की सराहना की और कहा कि ऐसी सामाजिक मदद से बच्चों का मनोबल बढ़ता है। अभिजीत मिंटू पटेल ने कहा कि "शिक्षा ही समाज की असली ताकत है। युवा परिवर्तन संघ का प्रयास है कि बिछुआ ब्लॉक का कोई भी बच्चा संसाधनों के अभाव में पढ़ाई से वंचित न रहे। आगे भी इस तरह के सेवा कार्य जारी रहेंगे।" संघ के पदाधिकारियों ने यहां भी कहा कि युवा परिवर्तन संघ के आगे में भी ऐसे कार्य किए जाएंगे।1
- *श्मशान घाट की रोड बनाने ग्राम बडझिर की महिलाओं ने संभाली कमान* *श्मशान घाट/शांति धाम तक रास्ते के लिए ग्राम बड़झिर में नाराज ग्रामीणों महिलाओं ने खुद संभाली कमान भाजपा नेता नीलकंठ तिवारी जो जिला संगठन मंत्री है उस पर लगाया रोड न बनने देने का आरोप* *ग्राम बड़झिर में सड़क के अभाव से नाराज ग्रामीणों का अनोखा विरोध — महिलाओं ने भी हाथों में फावड़ा, गैंती और तसला लेकर शुरू किया रास्ता बनाने का काम* बड़झिर/मोहगांव सड़क। ग्राम पंचायत मोहगांव सड़क के अंतर्गत आने वाले ग्राम बड़झिर में श्मशान घाट “शांति धाम” तक पहुंचने के लिए समुचित सड़क नहीं होने का मामला अब ग्रामीणों के आक्रोश का कारण बन गया है। ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के लगभग 80 वर्ष बाद भी गांव के लोगों को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए व्यवस्थित मार्ग उपलब्ध नहीं हो पाया है। बरसात के दिनों में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है तथा कीचड़, पानी और खराब रास्ते के कारण शवयात्रा लेकर श्मशान घाट तक पहुंचना ग्रामीणों के लिए बेहद कठिन हो जाता है। *भाजपा नेता नीलकंठ तिवारी पर ग्रामीणों के आरोप निष्पक्ष जांच की मांग* *ग्रामीणों ने भाजपा नेता नीलकंठ तिवारी को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। कुछ ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें राजनीतिक प्रभाव का हवाला देकर डराने या दबाव बनाने का प्रयास किया जाता है।* ग्रामीणों द्वारा कथित रूप से यह भी कहा जा रहा है कि राजनीतिक पद और सामाजिक पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रास्ते के मामले में विशेष अधिकार नहीं मिल सकता। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। नीलकंठ तिवारी का पक्ष इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण है और उनके द्वारा यदि भूमि संबंधी दस्तावेज, राजस्व रिकॉर्ड या रास्ते पर आपत्ति का कोई वैधानिक आधार प्रस्तुत किया जाता है तो उसे भी सार्वजनिक रूप से सामने रखा जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि समस्या का समाधान प्रशासन और पंचायत से होने की प्रतीक्षा करने के बजाय ग्रामीणों ने स्वयं ही रास्ता बनाने का बीड़ा उठा लिया। ग्राम सभा की बैठक में ग्रामीणों के बीच चर्चा और निर्णय के बाद गांव की महिलाओं एवं ग्रामीणों ने हाथों में गैंती, कुदारी, फावड़ा और तसले उठाए और शांति धाम तक पहुंचने वाले रास्ते पर श्रमदान शुरू कर दिया। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल सड़क बनाने का काम नहीं है, बल्कि यह उनके मूलभूत अधिकार, सम्मान और अंतिम संस्कार के अधिकार की आवाज है। “जीते-जी रास्ता नहीं तो कम से कम अंतिम यात्रा का रास्ता तो मिले” ग्रामीणों का कहना है कि गांव में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जीवन के अंतिम पड़ाव पर श्मशान घाट तक पहुंचने का अधिकार है। इसके लिए किसी व्यक्ति विशेष की कृपा या अनुमति पर निर्भरता नहीं होनी चाहिए। ग्रामीण महिलाओं ने कहा कि जब घर का कोई सदस्य दुनिया से विदा होता है, तब परिवार पहले ही दुख में डूबा होता है। ऐसे समय में शवयात्रा को खराब और कच्चे रास्ते से ले जाना अत्यंत पीड़ादायक हो जाता है। बरसात में रास्ते की स्थिति और खराब हो जाती है। इसी पीड़ा के चलते ग्रामीणों ने कहा कि यदि शासन-प्रशासन और ग्राम पंचायत सड़क बनाने में असमर्थ हैं, तो गांव के लोग स्वयं श्रमदान करके रास्ता बनाएंगे। ग्राम सभा के बाद ग्रामीणों ने खुद उठाए औजार प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम सभा की बैठक में श्मशान घाट तक सड़क निर्माण को लेकर चर्चा हुई। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से इस मार्ग की समस्या पंचायत और संबंधित अधिकारियों के सामने रखी जा रही है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं हुआ। बैठक के बाद ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया कि अब वे किसी के भरोसे नहीं बैठेंगे। इसके बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाएं और पुरुष खेतों की ओर पहुंचे और गैंती, फावड़ा, कुदारी तथा तसले लेकर रास्ते को तैयार करने के काम में जुट गए। महिलाओं का इस तरह आगे आना ग्रामीणों के लिए विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि जब जनप्रतिनिधि और पंचायत व्यवस्था समस्या का समाधान नहीं कर पा रही है, तब गांव की मातृशक्ति ने स्वयं आगे आकर जिम्मेदारी संभाली है। जमीन को लेकर विवाद, ग्रामीणों ने लगाए गंभीर आरोप ग्रामीणों ने भाजपा नेता नीलकंठ तिवारी, जिन्हें ग्रामीण भाजपा जिला संगठन मंत्री के पद पर होना बता रहे हैं, पर श्मशान घाट तक जाने वाले रास्ते में बाधा उत्पन्न करने के आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि शांति धाम तक पहुंचने वाले रास्ते का एक हिस्सा उनकी जमीन से होकर गुजरता है और वे ग्रामीणों को उस ओर से जाने से रोकते हैं। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि जिस भूमि को लेकर विवाद बताया जा रहा है, उसमें से कुछ भूमि पूर्व में गांव में स्कूल निर्माण के लिए दान किए जाने की बात कही जाती है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से राजस्व अभिलेखों एवं संबंधित दस्तावेजों के आधार पर पुष्टि किया जाना आवश्यक है। यदि भूमि वास्तव में दान की गई थी तो उसकी वैधानिक स्थिति, दानपत्र, राजस्व रिकॉर्ड और वर्तमान स्वामित्व की जांच किए जाने की मांग ग्रामीणों द्वारा की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि श्मशान घाट तक जाने के लिए आगे किसानों की जमीन भी आती है और संबंधित किसान कथित तौर पर रास्ते के लिए जमीन देने को तैयार हैं। ऐसे में उनका सवाल है कि यदि अन्य ग्रामीण अपनी जमीन देने को तैयार हैं तो रास्ते की समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं किया जा रहा? “गांव वाले जमीन देने को तैयार, फिर रास्ता क्यों नहीं?” ग्रामीणों का कहना है कि शांति धाम तक पहुंचने के लिए जिस मार्ग की आवश्यकता है, उसमें कई किसान सहयोग करने को तैयार हैं। ग्रामीणों के अनुसार यदि प्रशासन मौके पर पहुंचकर सीमांकन कराए और उपलब्ध भूमि तथा सरकारी भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे, तो रास्ते का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले का राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर निष्पक्ष सीमांकन कराया जाए। यह भी स्पष्ट किया जाए कि श्मशान घाट तक जाने वाला रास्ता किस भूमि से होकर गुजरता है, रास्ते की चौड़ाई कितनी है तथा पंचायत अथवा शासन की ओर से इस मार्ग के निर्माण के लिए क्या प्रावधान किया जा सकता है। सुदूर सड़क योजना का एस्टीमेट भी अधर में? ग्रामीणों ने संबंधित तकनीकी अमले की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों के अनुसार इंजीनियर योगेन्द्र कुमरे द्वारा श्मशान घाट तक पहुंच मार्ग के लिए सुदूर सड़क अथवा एप्रोच रोड का एस्टीमेट तैयार करने की बात सामने आई थी, लेकिन अभी तक सड़क का निर्माण धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि संबंधित अधिकारी से संपर्क करने में भी परेशानी होती है और कई बार अधिकारी क्षेत्र में उपलब्ध नहीं रहते। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि इस मामले में केवल कागजी कार्रवाई न हो बल्कि अधिकारी मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति देखें और सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू करें। यदि सड़क निर्माण के लिए पहले से कोई प्रस्ताव, एस्टीमेट या स्वीकृति जारी हुई है तो उसकी वर्तमान स्थिति भी सार्वजनिक की जानी चाहिए। पंचायत की भूमिका पर भी उठे सवाल ग्राम पंचायत मोहगांव सड़क की कार्यप्रणाली को लेकर भी ग्रामीणों में नाराजगी देखी जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत का मूल दायित्व गांव की बुनियादी समस्याओं का समाधान करना है। सड़क, नाली, पेयजल और सार्वजनिक उपयोग की भूमि जैसे विषय पंचायत व्यवस्था के सामने लगातार आते हैं। लेकिन श्मशान घाट जैसे अत्यंत आवश्यक सार्वजनिक स्थल तक पहुंचने के लिए भी यदि ग्रामीणों को स्वयं सड़क बनानी पड़े तो यह पंचायत व्यवस्था की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों का कहना है कि शांति धाम कोई निजी स्थान नहीं है। यहां गांव के प्रत्येक परिवार को अंतिम संस्कार के लिए जाना पड़ता है। इसलिए वहां तक पहुंचने का मार्ग भी सार्वजनिक सुविधा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। महिलाओं ने कहा — “अब हम पीछे नहीं हटेंगे” रास्ता निर्माण के दौरान गांव की महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से दिखाई दी। महिलाओं ने अपने हाथों में फावड़ा और तसला लेकर मिट्टी हटाने तथा रास्ता बनाने के कार्य में सहयोग किया। महिलाओं का कहना था कि वे किसी से विवाद नहीं चाहतीं। उनकी मांग केवल इतनी है कि गांव के लोगों को श्मशान घाट तक सम्मानपूर्वक पहुंचने के लिए रास्ता मिले। ग्रामीण महिलाओं ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति रास्ते में आपत्ति करता है तो प्रशासन को मौके पर आकर राजस्व रिकॉर्ड देखना चाहिए और निष्पक्ष निर्णय लेना चाहिए। गांव के लोगों को कानून हाथ में लेने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन प्रशासन को भी उनकी समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए। ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन दोनों पक्षों को बुलाकर सुनवाई करे और दस्तावेजों के आधार पर निर्णय ले। “किसी की जमीन पर जबरन कब्जा नहीं, लेकिन सार्वजनिक रास्ता भी जरूरी” ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी व्यक्ति की निजी भूमि पर अवैध कब्जा करने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि यदि रास्ते को लेकर भूमि विवाद है तो उसका समाधान कानून और राजस्व नियमों के अनुसार किया जाए। ग्रामीणों की मुख्य मांग यह है कि शांति धाम तक पहुंचने के लिए वैधानिक और स्थायी रास्ता उपलब्ध कराया जाए। यदि संबंधित भूमि निजी है तो प्रशासन वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराने की संभावनाएं तलाश सकता है। यदि रास्ता सरकारी अथवा सार्वजनिक उपयोग की भूमि में आता है तो उसकी स्थिति स्पष्ट कर रास्ते को अतिक्रमणमुक्त किया जा सकता है। इसीलिए ग्रामीणों ने कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदार, जनपद पंचायत एवं ग्राम पंचायत से संयुक्त रूप से मौके का निरीक्षण कर समस्या का स्थायी समाधान करने की मांग की है। ग्रामीणों का श्रमदान बना प्रशासन के लिए आईना आज ग्रामीणों द्वारा किया गया श्रमदान केवल मिट्टी खोदने का कार्य नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के सामने एक सवाल के रूप में देखा जा रहा है। एक तरफ गांव के लोग वर्षों से श्मशान घाट तक सड़क की मांग कर रहे हैं और दूसरी तरफ जब समस्या का समाधान नहीं हुआ तो ग्रामीणों ने स्वयं ही रास्ता बनाने का निर्णय लिया। गांव की महिलाओं का खेतों में उतरकर गैंती-फावड़ा चलाना इस बात का प्रतीक है कि ग्रामीण अब अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए संगठित होकर आवाज उठाने लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे सड़क निर्माण का कार्य किसी राजनीतिक दल के विरोध में नहीं बल्कि अपने गांव और अपने शांति धाम के सम्मान के लिए कर रहे हैं। प्रशासन से सात प्रमुख मांगें ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि— 1. शांति धाम तक जाने वाले पूरे मार्ग का तत्काल राजस्व सीमांकन कराया जाए। 2. रास्ते में आने वाली सरकारी, निजी एवं सार्वजनिक उपयोग की भूमि की स्थिति स्पष्ट की जाए। 3. संबंधित भूमि के दान, स्वामित्व एवं राजस्व रिकॉर्ड की जांच की जाए। 4. यदि कोई व्यक्ति रास्ते में आपत्ति कर रहा है तो दोनों पक्षों की सुनवाई कर वैधानिक समाधान निकाला जाए। 5. सुदूर सड़क/एप्रोच रोड के प्रस्ताव एवं एस्टीमेट की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की जाए। 6. संबंधित इंजीनियर एवं पंचायत अधिकारियों को मौके पर भेजकर सड़क निर्माण की कार्यवाही शुरू कराई जाए। 7. शांति धाम तक स्थायी, सर्वसुलभ और बरसात में भी उपयोग योग्य सड़क का निर्माण कराया जाए। “अब शांति धाम तक रास्ता बनाकर ही दम लेंगे” ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी व्यक्ति विशेष से संघर्ष नहीं चाहते। उनका संघर्ष केवल उस समस्या से है जिसने गांव के लोगों को वर्षों से परेशान कर रखा है। ग्रामीणों ने कहा कि अंतिम यात्रा किसी जाति, धर्म, दल या व्यक्ति की नहीं होती। मृत्यु के बाद प्रत्येक व्यक्ति को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट तक ले जाना पड़ता है। इसलिए श्मशान घाट तक रास्ता होना किसी भी गांव की बुनियादी आवश्यकता है। ग्रामीणों का कहना है कि वे प्रशासन से न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं। यदि प्रशासन मौके पर आकर राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर रास्ता निर्धारित करता है और सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू करता है तो ग्रामीण हर संभव सहयोग करने को तैयार हैं। अब देखना होगा प्रशासन क्या कदम उठाता है बड़झिर की यह तस्वीर अब केवल एक गांव की समस्या नहीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा सवाल बन गई है। एक ओर ग्रामीण महिलाएं और पुरुष अपने हाथों में गैंती, फावड़ा और तसला लेकर शांति धाम तक रास्ता बनाने में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर पंचायत और प्रशासन के सामने यह चुनौती है कि वे इस समस्या का स्थायी और वैधानिक समाधान कब तक करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे चाहते हैं कि यह मामला किसी राजनीतिक टकराव का रूप न ले। प्रशासन निष्पक्ष जांच करे, भूमि और रास्ते की वास्तविक स्थिति सामने लाए और सभी पक्षों को सुनकर निर्णय करे। श्मशान घाट तक रास्ता किसी व्यक्ति की कृपा नहीं, बल्कि गांव की मूलभूत आवश्यकता है। अब सवाल यही है कि क्या ग्राम पंचायत, जनपद और प्रशासन ग्रामीणों की इस आवाज को सुनकर शांति धाम तक स्थायी सड़क उपलब्ध कराएगा, या फिर ग्रामीणों को अपनी बुनियादी जरूरत के लिए इसी तरह स्वयं गैंती-फावड़ा लेकर सड़क बनानी पड़ेगी? ग्रामीणों की स्पष्ट मांग “हमें किसी से लड़ाई नहीं चाहिए, हमें सिर्फ शांति धाम तक जाने का सम्मानजनक रास्ता चाहिए। राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर जांच कराइए, रास्ता निर्धारित कराइए और सड़क बनाइए।”3