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पांगी घाटी की 33 केवी विद्युत लाइन परियोजना पर सवाल बिना ‘वन स्वीकृति’ शुरू हुआ कार्य, विधायक डॉ. जनक राज ने सदन में उठाया मुद्दा; उच्च स्तरीय जांच की मांग शिमला/चंबा: जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में प्रस्तावित 33 केवी विद्युत लाइन परियोजना एक बार फिर विवादों में आ गई है। भरमौर-पांगी विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ. जनक राज ने आज विधानसभा के शून्य काल में यह गंभीर मामला उठाते हुए आरोप लगाया कि करोड़ों रुपये की इस महत्वपूर्ण परियोजना को आवश्यक वन स्वीकृति (Forest Clearance) के बिना ही शुरू करने का प्रयास किया गया, जिसके चलते अब काम अधर में लटक गया है। विधायक ने इस संबंध में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को पत्र लिखकर पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। बिना फॉरेस्ट क्लीयरेंस के शुरू हुआ कार्य, बीच में रोका गया डॉ. जनक राज ने अपने पत्र में खुलासा किया कि केंद्र सरकार से स्वीकृत यह विद्युत परियोजना पांगी घाटी की बिजली व्यवस्था सुदृढ़ करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन विभागीय स्तर पर आवश्यक वन स्वीकृति प्राप्त किए बिना ही कार्य प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। नियमों की अनदेखी सामने आने के बाद परियोजना को बीच में ही रोकना पड़ा, जिससे न केवल सरकारी धन और समय की हानि हुई, बल्कि स्थानीय जनता को भी भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने इसे प्रशासनिक लापरवाही और समन्वय की कमी का स्पष्ट उदाहरण बताते हुए कहा कि इस प्रकार की चूक से राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगता है। विधायक की प्रमुख मांगें विधायक ने मुख्यमंत्री के समक्ष निम्नलिखित मांगें रखीं— पूरे मामले की उच्च स्तरीय एवं स्वतंत्र जांच तत्काल प्रारंभ की जाए। परियोजना में देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों व विभागों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। पांगी की दुर्गम भौगोलिक एवं सामरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए परियोजना को विशेष प्राथमिकता के आधार पर शीघ्र पूर्ण किया जाए। सरकार सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे कि देरी और नियमों के उल्लंघन के लिए उत्तरदायी कौन है। विधानसभा में मुद्दा उठाने की चेतावनी डॉ. जनक राज ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने इस गंभीर जनहित के विषय पर टालमटोल की नीति अपनाई, तो वे इस मुद्दे को और मजबूती से विधानसभा के पटल पर उठाने के साथ-साथ जनता के बीच भी ले जाएंगे। उन्होंने कहा कि पांगी घाटी के लोग लंबे समय से बिजली की समस्या से जूझ रहे हैं। सर्दियों के महीनों में हालात और भी चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं, ऐसे में इस महत्वपूर्ण परियोजना का ठप होना क्षेत्र के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। क्षेत्रवासियों में रोष स्थानीय लोगों का कहना है कि दुर्गम जनजातीय क्षेत्र होने के कारण पांगी में बुनियादी सुविधाओं का विकास पहले ही धीमी गति से होता है। ऐसे में यदि स्वीकृत परियोजनाएं भी प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ेंगी, तो क्षेत्र की समस्याएं और बढ़ेंगी। अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या वास्तव में जांच के बाद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है या नहीं। यह मुद्दा आने वाले समय में राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बन सकता है।

2 hrs ago
user_PANGI NEWS 24
PANGI NEWS 24
Social Media Manager Pangi, Chamba•
2 hrs ago
67294162-d97e-4d42-bcbb-49ab011c328f

पांगी घाटी की 33 केवी विद्युत लाइन परियोजना पर सवाल बिना ‘वन स्वीकृति’ शुरू हुआ कार्य, विधायक डॉ. जनक राज ने सदन में उठाया मुद्दा; उच्च स्तरीय जांच की मांग शिमला/चंबा: जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में प्रस्तावित 33 केवी विद्युत लाइन परियोजना एक बार फिर विवादों में आ गई है। भरमौर-पांगी विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ. जनक राज ने आज विधानसभा के शून्य काल में यह गंभीर मामला उठाते हुए आरोप लगाया कि करोड़ों रुपये की इस महत्वपूर्ण परियोजना को आवश्यक वन स्वीकृति (Forest Clearance) के बिना ही शुरू करने का प्रयास किया गया, जिसके चलते अब काम अधर में लटक गया है। विधायक ने इस संबंध में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को पत्र लिखकर पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। बिना फॉरेस्ट क्लीयरेंस के शुरू हुआ कार्य, बीच में रोका गया डॉ. जनक राज ने अपने पत्र में खुलासा किया कि केंद्र सरकार से स्वीकृत यह विद्युत परियोजना पांगी घाटी की बिजली व्यवस्था सुदृढ़ करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन विभागीय स्तर पर आवश्यक वन स्वीकृति प्राप्त किए बिना ही कार्य प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। नियमों की अनदेखी सामने आने के बाद परियोजना को बीच में ही रोकना पड़ा, जिससे न केवल सरकारी धन और समय की हानि हुई, बल्कि स्थानीय जनता को भी भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने इसे प्रशासनिक लापरवाही और समन्वय की कमी का स्पष्ट उदाहरण बताते हुए कहा कि इस प्रकार की चूक से राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगता है। विधायक की प्रमुख मांगें विधायक ने मुख्यमंत्री के समक्ष निम्नलिखित मांगें रखीं— पूरे मामले की उच्च स्तरीय एवं स्वतंत्र जांच तत्काल प्रारंभ की जाए। परियोजना में देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों व विभागों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। पांगी की दुर्गम भौगोलिक एवं सामरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए परियोजना को विशेष प्राथमिकता के आधार पर शीघ्र पूर्ण किया जाए। सरकार सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे कि देरी और नियमों के उल्लंघन के लिए उत्तरदायी कौन है। विधानसभा में मुद्दा उठाने की चेतावनी डॉ. जनक राज ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने इस गंभीर जनहित के विषय पर टालमटोल की नीति अपनाई, तो वे इस मुद्दे को और मजबूती से विधानसभा के पटल पर उठाने के साथ-साथ जनता के बीच भी ले जाएंगे। उन्होंने कहा कि पांगी घाटी के लोग लंबे समय से बिजली की समस्या से जूझ रहे हैं। सर्दियों के महीनों में हालात और भी चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं, ऐसे में इस महत्वपूर्ण परियोजना का ठप होना क्षेत्र के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। क्षेत्रवासियों में रोष स्थानीय लोगों का कहना है कि दुर्गम जनजातीय क्षेत्र होने के कारण पांगी में बुनियादी सुविधाओं का विकास पहले ही धीमी गति से होता है। ऐसे में यदि स्वीकृत परियोजनाएं भी प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ेंगी, तो क्षेत्र की समस्याएं और बढ़ेंगी। अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या वास्तव में जांच के बाद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है या नहीं। यह मुद्दा आने वाले समय में राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बन सकता है।

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  • Dr. B. R. Ambedkar Retired Employees And Senior Citizen Association ने उपायुक्त को सौंपा ज्ञापन सुरेंद्र ठाकुर चंबा: 18 फरवरी डॉ. बी. आर. आंबेडकर रिटायर्ड एम्प्लॉइज एंड सीनियर सिटीजन एसोसिएशन, चंबा (हिमाचल प्रदेश) ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत एक मामले में सख्त कार्रवाई की मांग को लेकर उपायुक्त चंबा के माध्यम से ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन में एसोसिएशन ने आरोप लगाया है कि एक व्यक्ति द्वारा सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी/पोस्ट साझा कर अनुसूचित जाति समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई है। संगठन ने इसे गंभीर मामला बताते हुए संबंधित धाराओं के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज कर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की है। एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कहा कि संविधान लागू होने के दशकों बाद भी इस प्रकार की घटनाएं चिंताजनक हैं और समाज में सौहार्द बनाए रखने के लिए कानून का सख्ती से पालन होना आवश्यक है। उन्होंने प्रशासन से निष्पक्ष जांच कर दोषी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का आग्रह किया है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते उचित कार्रवाई नहीं की गई तो वे आगामी रणनीति पर विचार करेंगे।
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    Dr. B. R. Ambedkar Retired Employees And Senior Citizen Association ने उपायुक्त को सौंपा ज्ञापन
सुरेंद्र ठाकुर 
चंबा: 18 फरवरी 
डॉ. बी. आर. आंबेडकर रिटायर्ड एम्प्लॉइज एंड सीनियर सिटीजन एसोसिएशन, चंबा (हिमाचल प्रदेश) ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत एक मामले में सख्त कार्रवाई की मांग को लेकर उपायुक्त चंबा के माध्यम से ज्ञापन सौंपा है।
ज्ञापन में एसोसिएशन ने आरोप लगाया है कि एक व्यक्ति द्वारा सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी/पोस्ट साझा कर अनुसूचित जाति समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई है। संगठन ने इसे गंभीर मामला बताते हुए संबंधित धाराओं के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज कर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की है।
एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कहा कि संविधान लागू होने के दशकों बाद भी इस प्रकार की घटनाएं चिंताजनक हैं और समाज में सौहार्द बनाए रखने के लिए कानून का सख्ती से पालन होना आवश्यक है। उन्होंने प्रशासन से निष्पक्ष जांच कर दोषी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का आग्रह किया है।
संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते उचित कार्रवाई नहीं की गई तो वे आगामी रणनीति पर विचार करेंगे।
    user_Surender Thakur
    Surender Thakur
    Social Media Manager पांगी, चंबा, हिमाचल प्रदेश•
    44 min ago
  • किलाड़ (पांगी घाटी): जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में बुधवार को पंगवाल समुदाय का प्रमुख लोकपर्व ‘जुकारू’ एवं ‘पड़ीद’ पूरे हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। अमावस्या की रात्रि को ‘सिल्ल’ के रूप में जुकारू उत्सव की शुरुआत होती है, जबकि अमावस्या के अगले दिन चंद्रमा की प्रथम तिथि को पड़ीद मनाया जाता है। यह दिन विशेष रूप से पितरों को समर्पित माना जाता है। सूर्य अर्घ्य से होता है पड़ीद का शुभारंभ पड़ीद के दिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात लोग भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर पर्व का शुभारंभ करते हैं। इसके बाद छोटे सदस्य घर के बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। चरण स्पर्श से पहले ‘जेवरा’ के फूल एक-दूसरे को भेंट करने की परंपरा निभाई जाती है। जेवरा गेहूं या मक्की के दानों से तैयार की गई कोमल कलियां होती हैं, जिन्हें जुकारू से लगभग 10–15 दिन पूर्व विशेष विधि से उगाया जाता है। घर का मुखिया ‘राजावली’ के समक्ष माथा टेककर प्रार्थना करता है कि समस्त नकारात्मक शक्तियां नाग लोक को प्रस्थान करें और धरती पर सुख-शांति बनी रहे। पितरों की पूजा और सूर्य अर्घ्य के बाद पशुधन को भी पकवान खिलाकर जुकारू किया जाता है। घर लौटते समय शुभ वचन कहे जाते हैं, जिनका उत्तर गृहलक्ष्मी ‘शगुन’ के रूप में देती हैं। पारिवारिक मिलन और सामूहिक उत्सव पर्व के अवसर पर पूरा परिवार एक-दूसरे के चरण स्पर्श कर गले मिलता है। घर में तैयार घी मंडे और अन्य पारंपरिक व्यंजन परोसे जाते हैं। इसके बाद परिवार के सदस्य, गृहस्वामिनी को छोड़कर, भोजपत्र में पकवान सजाकर गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के घर ‘जुकारू भेंट’ लेकर जाते हैं। जेवरा के फूल अर्पित कर आशीर्वाद लिया जाता है। मेजबान परिवार अतिथियों का स्वागत पारंपरिक पकवानों, मांस और स्थानीय पेय से करता है। किलाड़ में रात दो बजे से परंपरा पांगी मुख्यालय किलाड़ में पड़ीद उत्सव की शुरुआत रात दो बजे से ही हो जाती है। प्रातःकाल लोग समीपवर्ती प्राचीन शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ और नाग देवता को जुकारू भेंट अर्पित करते हैं। परंपरा के अनुसार, मंदिर में पूजा के बाद चौकी किलाड़ स्थित ऐतिहासिक राजकोठी में जाकर राजा को भी जुकारू भेंट किया जाता है। यह परंपरा राजतंत्र काल से चली आ रही है। मान्यता है कि पूर्व समय में धरवास और किरयूनी क्षेत्र के लोग भी इस अवसर पर किलाड़ पहुंचते थे, किंतु एक बार भारी हिमपात के कारण वे शामिल नहीं हो सके। तब से किलाड़ के लोगों ने इस परंपरा को अपने स्तर पर निरंतर बनाए रखा है। जेवरा फूल का विशेष महत्व जुकारू पर्व में ‘जेवरा’ का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। माघ पूर्णिमा के तीसरे दिन मिट्टी में भेड़-बकरियों के बारीक गोबर को मिलाकर उसमें गेहूं और मक्की के बीज डाले जाते हैं। लगभग 10–12 दिनों में तैयार हुई इन कलियों का उपयोग 12 दिनों तक फूल के रूप में किया जाता है। स्थानीय पुजारी जयराम के अनुसार, जेवरा की कलियां जितनी अच्छी और शीघ्र तैयार होती हैं, उसे आने वाले वर्ष में अच्छी फसल का संकेत माना जाता है। पड़ीद के दिन सूर्य भगवान को भोग लगाने के बाद बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है। पौराणिक और लोकमान्यताएं जुकारू पर्व से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन अवतार में महादानी राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। राजा बलि के त्याग से प्रसन्न होकर भगवान ने वरदान दिया कि माघ और फाल्गुन मास की विशेष अमावस्याओं पर पृथ्वी पर उनकी पूजा होगी। पांगी का जुकारू पर्व इसी मान्यता से जुड़ा माना जाता है। एक अन्य लोककथा के अनुसार, क्षेत्र में राणा और ठाकुरों के बीच लंबे समय तक संघर्ष रहता था। आपसी वैमनस्य को समाप्त करने और सामाजिक मेल-मिलाप को बढ़ावा देने के लिए वर्ष में कुछ विशेष दिन आपसी मिलन के लिए निर्धारित किए गए, जिन्हें बाद में ‘जुकारू’ नाम दिया गया। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि कड़ाके की सर्दियों में सामाजिक संपर्क सीमित होने के कारण, विशेषकर विवाहित बेटियों को मायके आने का अवसर देने के उद्देश्य से यह पर्व प्रारंभ हुआ। आस्था, संस्कृति और एकता का प्रतीक जुकारू और पड़ीद केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पंगवाल समुदाय की सांस्कृतिक पहचान, पारिवारिक एकता और सामाजिक समरसता के प्रतीक हैं। पितरों की श्रद्धा, देव पूजन, पारिवारिक मिलन और सामूहिक उत्सव की यह परंपरा आज भी पांगी घाटी की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है। लेख एवं प्रस्तुति कृष्ण चंद राणा लेखक देवभूमि पांगी दर्शन एवं सम्पादक पांगी न्यूज़ टुडे। #पांगीघाटी #किलाड़ #जुकारू #पड़ीद #पंगवालसमुदाय #जनजातीयसंस्कृति #हिमाचलप्रदेश #हिमाचलकीसंस्कृति #लोकपर्व #पारंपरिकत्योहार #देवसंस्कृति #सूर्यअर्घ्य #पितृसमर्पण #संस्कृतिकीझलक #IncredibleHimachal लेख एवं प्रस्तुति कृष्ण चंद राणा लेखक देवभूमि पांगी दर्शन एवं सम्पादक पांगी न्यूज़ टुडे।
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    किलाड़ (पांगी घाटी): जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में बुधवार को पंगवाल समुदाय का प्रमुख लोकपर्व ‘जुकारू’ एवं ‘पड़ीद’ पूरे हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। अमावस्या की रात्रि को ‘सिल्ल’ के रूप में जुकारू उत्सव की शुरुआत होती है, जबकि अमावस्या के अगले दिन चंद्रमा की प्रथम तिथि को पड़ीद मनाया जाता है। यह दिन विशेष रूप से पितरों को समर्पित माना जाता है।
सूर्य अर्घ्य से होता है पड़ीद का शुभारंभ
पड़ीद के दिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात लोग भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर पर्व का शुभारंभ करते हैं। इसके बाद छोटे सदस्य घर के बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। चरण स्पर्श से पहले ‘जेवरा’ के फूल एक-दूसरे को भेंट करने की परंपरा निभाई जाती है। जेवरा गेहूं या मक्की के दानों से तैयार की गई कोमल कलियां होती हैं, जिन्हें जुकारू से लगभग 10–15 दिन पूर्व विशेष विधि से उगाया जाता है।
घर का मुखिया ‘राजावली’ के समक्ष माथा टेककर प्रार्थना करता है कि समस्त नकारात्मक शक्तियां नाग लोक को प्रस्थान करें और धरती पर सुख-शांति बनी रहे। पितरों की पूजा और सूर्य अर्घ्य के बाद पशुधन को भी पकवान खिलाकर जुकारू किया जाता है। घर लौटते समय शुभ वचन कहे जाते हैं, जिनका उत्तर गृहलक्ष्मी ‘शगुन’ के रूप में देती हैं।
पारिवारिक मिलन और सामूहिक उत्सव
पर्व के अवसर पर पूरा परिवार एक-दूसरे के चरण स्पर्श कर गले मिलता है। घर में तैयार घी मंडे और अन्य पारंपरिक व्यंजन परोसे जाते हैं। इसके बाद परिवार के सदस्य, गृहस्वामिनी को छोड़कर, भोजपत्र में पकवान सजाकर गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के घर ‘जुकारू भेंट’ लेकर जाते हैं। जेवरा के फूल अर्पित कर आशीर्वाद लिया जाता है। मेजबान परिवार अतिथियों का स्वागत पारंपरिक पकवानों, मांस और स्थानीय पेय से करता है।
किलाड़ में रात दो बजे से परंपरा
पांगी मुख्यालय किलाड़ में पड़ीद उत्सव की शुरुआत रात दो बजे से ही हो जाती है। प्रातःकाल लोग समीपवर्ती प्राचीन शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ और नाग देवता को जुकारू भेंट अर्पित करते हैं। परंपरा के अनुसार, मंदिर में पूजा के बाद चौकी किलाड़ स्थित ऐतिहासिक राजकोठी में जाकर राजा को भी जुकारू भेंट किया जाता है। यह परंपरा राजतंत्र काल से चली आ रही है।
मान्यता है कि पूर्व समय में धरवास और किरयूनी क्षेत्र के लोग भी इस अवसर पर किलाड़ पहुंचते थे, किंतु एक बार भारी हिमपात के कारण वे शामिल नहीं हो सके। तब से किलाड़ के लोगों ने इस परंपरा को अपने स्तर पर निरंतर बनाए रखा है।
जेवरा फूल का विशेष महत्व
जुकारू पर्व में ‘जेवरा’ का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। माघ पूर्णिमा के तीसरे दिन मिट्टी में भेड़-बकरियों के बारीक गोबर को मिलाकर उसमें गेहूं और मक्की के बीज डाले जाते हैं। लगभग 10–12 दिनों में तैयार हुई इन कलियों का उपयोग 12 दिनों तक फूल के रूप में किया जाता है।
स्थानीय पुजारी जयराम के अनुसार, जेवरा की कलियां जितनी अच्छी और शीघ्र तैयार होती हैं, उसे आने वाले वर्ष में अच्छी फसल का संकेत माना जाता है। पड़ीद के दिन सूर्य भगवान को भोग लगाने के बाद बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है।
पौराणिक और लोकमान्यताएं
जुकारू पर्व से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन अवतार में महादानी राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। राजा बलि के त्याग से प्रसन्न होकर भगवान ने वरदान दिया कि माघ और फाल्गुन मास की विशेष अमावस्याओं पर पृथ्वी पर उनकी पूजा होगी। पांगी का जुकारू पर्व इसी मान्यता से जुड़ा माना जाता है।
एक अन्य लोककथा के अनुसार, क्षेत्र में राणा और ठाकुरों के बीच लंबे समय तक संघर्ष रहता था। आपसी वैमनस्य को समाप्त करने और सामाजिक मेल-मिलाप को बढ़ावा देने के लिए वर्ष में कुछ विशेष दिन आपसी मिलन के लिए निर्धारित किए गए, जिन्हें बाद में ‘जुकारू’ नाम दिया गया।
कुछ लोग यह भी मानते हैं कि कड़ाके की सर्दियों में सामाजिक संपर्क सीमित होने के कारण, विशेषकर विवाहित बेटियों को मायके आने का अवसर देने के उद्देश्य से यह पर्व प्रारंभ हुआ।
आस्था, संस्कृति और एकता का प्रतीक
जुकारू और पड़ीद केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पंगवाल समुदाय की सांस्कृतिक पहचान, पारिवारिक एकता और सामाजिक समरसता के प्रतीक हैं। पितरों की श्रद्धा, देव पूजन, पारिवारिक मिलन और सामूहिक उत्सव की यह परंपरा आज भी पांगी घाटी की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।
लेख एवं प्रस्तुति कृष्ण चंद राणा लेखक देवभूमि पांगी दर्शन एवं सम्पादक पांगी न्यूज़ टुडे। 
#पांगीघाटी #किलाड़ #जुकारू #पड़ीद #पंगवालसमुदाय
#जनजातीयसंस्कृति #हिमाचलप्रदेश #हिमाचलकीसंस्कृति
#लोकपर्व #पारंपरिकत्योहार #देवसंस्कृति #सूर्यअर्घ्य
#पितृसमर्पण #संस्कृतिकीझलक #IncredibleHimachal
लेख एवं प्रस्तुति कृष्ण चंद राणा लेखक देवभूमि पांगी दर्शन एवं सम्पादक पांगी न्यूज़ टुडे।
    user_PANGI NEWS TODAY
    PANGI NEWS TODAY
    Book Shop पांगी, चंबा, हिमाचल प्रदेश•
    5 hrs ago
  • हिम संदेश जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी इन दिनों पूर्णतः हिमाच्छादित है। चारों ओर बर्फ की सफेद चादर ओढ़े पहाड़, शांत वातावरण और ठंडी हवाओं के बीच जब लोक संस्कृति की मधुर गूंज सुनाई देती है, तो यह संकेत होता है पांगी के ऐतिहासिक और पारंपरिक ‘सिहल–जुकारू’ पर्व का। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पंगवाला समाज की सांस्कृतिक पहचान, आस्था और सामूहिक एकता का जीवंत प्रतीक है। फागुन मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व तीन प्रमुख चरणों सिलह, पड़ीद और मांगल में संपन्न होता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है, जितनी पूर्वजों के समय में निभाई जाती थी। तैयारियों में झलकती है लोक संस्कृति की छटा। ‘सिहल–जुकारू’ की तैयारियां कई दिन पूर्व आरंभ हो जाती हैं। घरों की विशेष साफ-सफाई की जाती है, दीवारों पर पारंपरिक लोक शैली में चित्रांकन और लिखावट की जाती है। यह लिखावट केवल सजावट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम है। घरों में विशेष पकवान ‘मंण्डे’ बनाए जाते हैं, साथ ही अन्य पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। महिलाएं और बुजुर्ग पारंपरिक रीति-रिवाजों को निभाते हुए बच्चों को इनकी महत्ता समझाते हैं, जिससे नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। ‘सिलह’ : आस्था और अनुशासन का दिन। पहले दिन ‘सिलह’ मनाया जाता है। इस दिन घरों में बलिराज के चित्र बनाए जाते हैं और रात्रि में उनकी विधिवत पूजा की जाती है। दिन में बनाए गए सभी पकवान तथा एक दीपक राजा बलि के चित्र के समक्ष अर्पित किए जाते हैं। इस दिन चरखा कातना बंद कर दिया जाता है और सभी लोग संयम और श्रद्धा के साथ दिन व्यतीत करते हैं। लोक मान्यता के अनुसार इस दिन अनुशासन और शुद्धता का विशेष महत्व है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पोते राजा बलि ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। तब भगवान विष्णु को वामन अवतार धारण करना पड़ा। राजा बलि ने वामन को तीन पग भूमि दान में दी, जिससे प्रसन्न होकर विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वर्ष में एक दिन पृथ्वी लोक में उनकी पूजा की जाएगी। इसी विश्वास के साथ पांगी घाटी के लोग आज भी राजा बलि की पूजा-अर्चना करते हैं। ‘पड़ीद’ : सम्मान, संस्कार और सामाजिक एकता दूसरा दिन ‘पड़ीद’ का होता है। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर लोग स्नान करते हैं और राजा बलि के समक्ष नतमस्तक होते हैं। घर के छोटे सदस्य बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह परंपरा पारिवारिक मूल्यों और सम्मान की भावना को सुदृढ़ करती है। पनघट से जल लाकर अर्पित किया जाता है और जल देवता की पूजा की जाती है। घर का मुखिया ‘चूर’ (हल चलाने के औजार) की पूजा करता है, जो कृषि प्रधान जीवनशैली का प्रतीक है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि प्रकृति और कृषि से जुड़ा उत्सव भी है। ‘जुकारू’ : मिलन, प्रेम और भाईचारे का उत्सव। ‘पड़ीद’ की सुबह से ही ‘जुकारू’ आरंभ हो जाता है। ‘जुकारू’ शब्द का अर्थ है—बड़ों का आदर और परस्पर सम्मान। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण महीनों तक लोग अपने घरों में सीमित रहते हैं। जब मौसम कुछ अनुकूल होता है, तो इस पर्व के माध्यम से लोग एक-दूसरे के घर जाकर गले मिलते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। लोग एक-दूसरे से मिलते समय ‘तकड़ा थिया न’ कहकर कुशल-क्षेम पूछते हैं और विदा लेते समय ‘मठे-मठे विश’ कहते हैं। सबसे पहले बड़े भाई या परिवार के वरिष्ठ सदस्य के घर जाकर सम्मान प्रकट करने की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। यह दिन सामाजिक मेल-मिलाप, आपसी मनमुटाव दूर करने और रिश्तों को सुदृढ़ करने का अवसर भी होता है। सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण आवश्यक। ‘सिहल–जुकारू’ पर्व पांगी घाटी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। आधुनिकता के इस दौर में भी जिस प्रकार स्थानीय लोग अपनी परंपराओं को सहेजकर रखे हुए हैं, वह सराहनीय है। यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, लोककथाओं और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन रहा है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति सम्मान और पारिवारिक एकता का संदेश देने वाला महोत्सव है। पांगी न्यूज 24 की ओर से पांगी की आन, बान और शान को संजोने वाले इस पावन पर्व ‘सिहल–जुकारू’ की समस्त पांगीवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। यह त्योहार हमारी संस्कृति, परंपराओं और भाईचारे की अद्भुत मिसाल बना रहे और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखे — यही कामना है।
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    हिम संदेश 
जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी इन दिनों पूर्णतः हिमाच्छादित है। चारों ओर बर्फ की सफेद चादर ओढ़े पहाड़, शांत वातावरण और ठंडी हवाओं के बीच जब लोक संस्कृति की मधुर गूंज सुनाई देती है, तो यह संकेत होता है पांगी के ऐतिहासिक और पारंपरिक ‘सिहल–जुकारू’ पर्व का। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पंगवाला समाज की सांस्कृतिक पहचान, आस्था और सामूहिक एकता का जीवंत प्रतीक है।
फागुन मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व तीन प्रमुख चरणों सिलह, पड़ीद और मांगल में संपन्न होता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है, जितनी पूर्वजों के समय में निभाई जाती थी।
तैयारियों में झलकती है लोक संस्कृति की छटा।
‘सिहल–जुकारू’ की तैयारियां कई दिन पूर्व आरंभ हो जाती हैं। घरों की विशेष साफ-सफाई की जाती है, दीवारों पर पारंपरिक लोक शैली में चित्रांकन और लिखावट की जाती है। यह लिखावट केवल सजावट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम है।
घरों में विशेष पकवान ‘मंण्डे’ बनाए जाते हैं, साथ ही अन्य पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। महिलाएं और बुजुर्ग पारंपरिक रीति-रिवाजों को निभाते हुए बच्चों को इनकी महत्ता समझाते हैं, जिससे नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे।
‘सिलह’ : आस्था और अनुशासन का दिन।
पहले दिन ‘सिलह’ मनाया जाता है। इस दिन घरों में बलिराज के चित्र बनाए जाते हैं और रात्रि में उनकी विधिवत पूजा की जाती है। दिन में बनाए गए सभी पकवान तथा एक दीपक राजा बलि के चित्र के समक्ष अर्पित किए जाते हैं।
इस दिन चरखा कातना बंद कर दिया जाता है और सभी लोग संयम और श्रद्धा के साथ दिन व्यतीत करते हैं। लोक मान्यता के अनुसार इस दिन अनुशासन और शुद्धता का विशेष महत्व है।
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पोते राजा बलि ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। तब भगवान विष्णु को वामन अवतार धारण करना पड़ा। राजा बलि ने वामन को तीन पग भूमि दान में दी, जिससे प्रसन्न होकर विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वर्ष में एक दिन पृथ्वी लोक में उनकी पूजा की जाएगी। इसी विश्वास के साथ पांगी घाटी के लोग आज भी राजा बलि की पूजा-अर्चना करते हैं।
‘पड़ीद’ : सम्मान, संस्कार और सामाजिक एकता
दूसरा दिन ‘पड़ीद’ का होता है। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर लोग स्नान करते हैं और राजा बलि के समक्ष नतमस्तक होते हैं। घर के छोटे सदस्य बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह परंपरा पारिवारिक मूल्यों और सम्मान की भावना को सुदृढ़ करती है।
पनघट से जल लाकर अर्पित किया जाता है और जल देवता की पूजा की जाती है। घर का मुखिया ‘चूर’ (हल चलाने के औजार) की पूजा करता है, जो कृषि प्रधान जीवनशैली का प्रतीक है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि प्रकृति और कृषि से जुड़ा उत्सव भी है।
‘जुकारू’ : मिलन, प्रेम और भाईचारे का उत्सव।
‘पड़ीद’ की सुबह से ही ‘जुकारू’ आरंभ हो जाता है। ‘जुकारू’ शब्द का अर्थ है—बड़ों का आदर और परस्पर सम्मान। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण महीनों तक लोग अपने घरों में सीमित रहते हैं। जब मौसम कुछ अनुकूल होता है, तो इस पर्व के माध्यम से लोग एक-दूसरे के घर जाकर गले मिलते हैं और शुभकामनाएं देते हैं।
लोग एक-दूसरे से मिलते समय ‘तकड़ा थिया न’ कहकर कुशल-क्षेम पूछते हैं और विदा लेते समय ‘मठे-मठे विश’ कहते हैं। सबसे पहले बड़े भाई या परिवार के वरिष्ठ सदस्य के घर जाकर सम्मान प्रकट करने की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
यह दिन सामाजिक मेल-मिलाप, आपसी मनमुटाव दूर करने और रिश्तों को सुदृढ़ करने का अवसर भी होता है।
सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण आवश्यक।
‘सिहल–जुकारू’ पर्व पांगी घाटी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। आधुनिकता के इस दौर में भी जिस प्रकार स्थानीय लोग अपनी परंपराओं को सहेजकर रखे हुए हैं, वह सराहनीय है। यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, लोककथाओं और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन रहा है।
यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति सम्मान और पारिवारिक एकता का संदेश देने वाला महोत्सव है।
पांगी न्यूज 24 की ओर से पांगी की आन, बान और शान को संजोने वाले इस पावन पर्व ‘सिहल–जुकारू’ की समस्त पांगीवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। यह त्योहार हमारी संस्कृति, परंपराओं और भाईचारे की अद्भुत मिसाल बना रहे और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखे — यही कामना है।
    user_PANGI NEWS 24
    PANGI NEWS 24
    Social Media Manager Pangi, Chamba•
    10 hrs ago
  • चंबा: सनसनीखेज वारदात: लोथल में पति-पत्नी की मौत, पुलिस जांच में जुटी। मोहम्मद आशिक चंबा हिमाचल प्रदेश चंबा । भरमौर विधानसभा क्षेत्र की उपतहसील धरवाला के अंतर्गत ग्राम पंचायत लोथल के गांव लोथल में एक हृदयविदारक घटना सामने आई है। यहां एक व्यक्ति द्वारा पत्नी की हत्या करने के बाद स्वयं आत्महत्या करने का मामला सामने आया है। घटना से पूरे क्षेत्र में दहशत और सनसनी फैल गई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार मृतक की पहचान सरवन कुमार पुत्र तानी के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि देर रात पति-पत्नी के बीच विवाद हुआ, जो काफी बढ़ गया। इसी दौरान महिला की मौत हो गई और बाद में व्यक्ति ने भी फांसी लगाकर जान दे दी। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और मामले की जांच शुरू कर दी। साथ ही फॉरेंसिक टीम ने भी घटनास्थल पर पहुंचकर आवश्यक साक्ष्य एकत्र किए हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार व्यक्ति का व्यवहार अक्सर हिंसक रहता था और वह पत्नी के साथ मारपीट करता था। पुलिस ने दोनों शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच पूरी होने के बाद ही घटना के वास्तविक कारणों का स्पष्ट खुलासा हो सकेगा। फिलहाल मामले की विस्तृत जांच जारी है।
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    चंबा: सनसनीखेज वारदात: लोथल में पति-पत्नी की मौत, पुलिस जांच में जुटी।
मोहम्मद आशिक 
चंबा हिमाचल प्रदेश
चंबा । भरमौर विधानसभा क्षेत्र की उपतहसील धरवाला के अंतर्गत ग्राम पंचायत लोथल के गांव लोथल में एक हृदयविदारक घटना सामने आई है। यहां एक व्यक्ति द्वारा पत्नी की हत्या करने के बाद स्वयं आत्महत्या करने का मामला सामने आया है। घटना से पूरे क्षेत्र में दहशत और सनसनी फैल गई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार मृतक की पहचान सरवन कुमार पुत्र तानी के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि देर रात पति-पत्नी के बीच विवाद हुआ, जो काफी बढ़ गया। इसी दौरान महिला की मौत हो गई और बाद में व्यक्ति ने भी फांसी लगाकर जान दे दी।
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और मामले की जांच शुरू कर दी। साथ ही फॉरेंसिक टीम ने भी घटनास्थल पर पहुंचकर आवश्यक साक्ष्य एकत्र किए हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार व्यक्ति का व्यवहार अक्सर हिंसक रहता था और वह पत्नी के साथ मारपीट करता था। पुलिस ने दोनों शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच पूरी होने के बाद ही घटना के वास्तविक कारणों का स्पष्ट खुलासा हो सकेगा। फिलहाल मामले की विस्तृत जांच जारी है।
    user_Mohd Ashiq
    Mohd Ashiq
    Journalist Chamba, Himachal Pradesh•
    1 hr ago
  • धीमान टूर & ट्रैवलर Delhi 9816896161
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    धीमान टूर & ट्रैवलर
Delhi
9816896161
    user_Dhiman Taxi
    Dhiman Taxi
    नूरपुर, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश•
    3 hrs ago
  • प्रदेश सरकार पर हमलावार हुए भाजपा विधायक प्रकाश राणा, बोले- आप कर्ज लेकर घी पी रहे, हम आपके साथ क्यों चलें?
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    प्रदेश सरकार पर हमलावार हुए भाजपा विधायक प्रकाश राणा, बोले- आप कर्ज लेकर घी पी रहे, हम आपके साथ क्यों चलें?
    user_Ankit Kumar
    Ankit Kumar
    Local News Reporter जोगिंदरनगर, मंडी, हिमाचल प्रदेश•
    18 min ago
  • सुजानपुर सुजानपुर के ऐतिहासिक मैदान में आयोजित होने वाले राष्ट्रीय होली महोत्सव की तैयारीया शुरू हो गई है यहां मैदान में सजने वाली दुकानदारी के लिए मार्किंग का कार्य सुजानपुर प्रशासन ने शुरू करवाया है बताते चले कि मैदान के भीतर दुकानदारी सजाने के लिए नियम निर्धारित किए गए हैं जिसमें खान-पान की दुकानों के साथ-साथ अन्य फूड स्टॉल कहां लगाए जाएंगे रोजमर्रा की वस्तुएं कहां पर बिक्री होगी अन्य उत्पाद कहां बेचे जाएंगे इसके साथ-साथ दुकानों के मध्य और दुकानदारी के बीच आने-जाने के लिए रास्ता जितना निर्धारित किया गया है उसे हिसाब से यह मार्किंग करवाई जा रही है मेला ग्राउंड के भीतर आपातकाल की स्थिति के दौरान रोगी वाहन दमकल वाहन की बड़ी और छोटी गाड़ियां कूड़ा करकट उठाने वाली गाड़ियां आसानी से प्रवेश कर सके जिस रास्ते से यह गाड़ियां आनी है उन रास्तों की व्यवस्था सही हो उनके मध्य किसी भी तरह की दुकानदारी को ना सजाया जाए किसी भी तरह का अतिक्रमण न हो तमाम बातों को ध्यान में रखकर तमाम कार्रवाई करवाई जा रही है मेला ग्राउंड के भीतर झूले कहां लगाए जाएंगे डोम बाजार कहां सजेगा अन्य क्राफ्ट मेले कहां लगाए जाएंगे विभागीय प्रदर्शनी कहां लगेगी सांस्कृतिक कार्यक्रम कहां पर होंगे अन्य क्राकरी बाजार कहां सजेगा पुरानी संस्कृति के तहत बिकने वाले मिट्टी के उत्पाद कहां पर बिक्री होंगे तमाम स्थान मार्क करवाए जा रहे हैं पार्किंग स्थल का एरिया कहां से कहां तक होगा यहां वाहन किस तरफ से आएंगे और किस तरफ से बाहर जाएंगे इसको लेकर भी व्यवस्था करवाई जा रही है मेले के दौरान हर तरफ मोबाइल टॉयलेट स्थापित करवाने की व्यवस्था करवाई जा रही है यह सभी टॉयलेट सीवरेज के साथ कनेक्ट होंगे तमाम बातों को लेकर तैयारियां शुरू की गई है। उधर मेला ग्राउंड की दुकानदारी के लिए प्लाट बेचने का कार्य भी शुरू हो गया है उपमंडल कार्यालय के रूम नंबर 105 में जिस व्यक्ति ने मेला ग्राउंड की बोली को अपने नाम किया है उनके कर्मी वहां पर बैठकर प्लाट आवंटन का कार्य कर रहे हैं
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    सुजानपुर
सुजानपुर के ऐतिहासिक मैदान में आयोजित होने वाले राष्ट्रीय होली महोत्सव की तैयारीया शुरू हो गई है यहां मैदान में सजने वाली दुकानदारी के लिए मार्किंग का कार्य सुजानपुर प्रशासन ने शुरू करवाया है बताते चले कि मैदान के भीतर दुकानदारी सजाने के लिए नियम निर्धारित किए गए हैं जिसमें खान-पान की दुकानों के साथ-साथ अन्य फूड स्टॉल कहां लगाए जाएंगे रोजमर्रा की वस्तुएं कहां पर बिक्री होगी अन्य उत्पाद कहां बेचे जाएंगे इसके साथ-साथ दुकानों के मध्य और दुकानदारी के बीच आने-जाने के लिए रास्ता जितना निर्धारित किया गया है उसे हिसाब से यह मार्किंग करवाई जा रही है मेला ग्राउंड के भीतर आपातकाल की स्थिति के दौरान रोगी वाहन दमकल वाहन की बड़ी और छोटी गाड़ियां कूड़ा करकट उठाने वाली गाड़ियां आसानी से प्रवेश कर सके जिस रास्ते से यह गाड़ियां आनी है उन रास्तों की व्यवस्था सही हो उनके मध्य किसी भी तरह की दुकानदारी को ना सजाया जाए किसी भी तरह का अतिक्रमण न हो तमाम बातों को ध्यान में रखकर तमाम कार्रवाई करवाई जा रही है मेला ग्राउंड के भीतर झूले कहां लगाए जाएंगे डोम बाजार कहां सजेगा अन्य क्राफ्ट मेले कहां लगाए जाएंगे विभागीय प्रदर्शनी कहां लगेगी सांस्कृतिक कार्यक्रम कहां पर होंगे अन्य क्राकरी बाजार कहां सजेगा पुरानी संस्कृति के तहत बिकने वाले मिट्टी के उत्पाद कहां पर बिक्री होंगे तमाम स्थान मार्क करवाए जा रहे हैं पार्किंग स्थल का एरिया कहां से कहां तक होगा यहां वाहन किस तरफ से आएंगे और किस तरफ से बाहर जाएंगे इसको लेकर भी व्यवस्था करवाई जा रही है मेले के दौरान हर तरफ मोबाइल टॉयलेट स्थापित करवाने की व्यवस्था करवाई जा रही है यह सभी टॉयलेट सीवरेज के साथ कनेक्ट होंगे तमाम बातों को लेकर तैयारियां शुरू की गई है।
उधर मेला ग्राउंड की दुकानदारी के लिए प्लाट बेचने का कार्य भी शुरू हो गया है उपमंडल कार्यालय के रूम नंबर 105 में जिस व्यक्ति ने मेला ग्राउंड की बोली को अपने नाम किया है उनके कर्मी वहां पर बैठकर प्लाट आवंटन का कार्य कर रहे हैं
    user_Ranjna Kumari
    Ranjna Kumari
    टीरा सुजानपुर, हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश•
    3 hrs ago
  • राजा बली की पूजा से हुआ शुभारंभ, जनजातीय क्षेत्र में एक ही तिथि पर सामूहिक आयोजन; बेटियों के सम्मान और सांस्कृतिक एकता का अनूठा पर्व जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में पंगवाल समुदाय का पारंपरिक जुकारू उत्सव हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ आरंभ हो गया है। 15 दिनों तक चलने वाला यह लोकपर्व माघ मास की पूर्णिमा के बाद आने वाली अमावस्या से शुरू होता है और आपसी मिलन, भाईचारे व सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष विशेष बात यह है कि पूरे पांगी में पर्व एक ही तिथि पर सामूहिक रूप से मनाया जा रहा है। गत वर्ष देवलुओं के तालमेल के अभाव में अलग-अलग तिथियों पर आयोजन हुआ था। राजा बली की पूजा से शुरुआत फाल्गुन अमावस्या की रात ‘सिल्ल’ के नाम से जानी जाती है। इस दिन पूरे पांगी में राजा बली की विधिवत पूजा कर पहला भोग अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने वामन अवतार में राजा बली को वरदान दिया था कि वे माघ और फाल्गुन मास की अमावस्या को पृथ्वी पर आकर अपने भक्तों से प्रसाद ग्रहण करेंगे। इसी आस्था के साथ पांगी, लाहुल और कुल्लू क्षेत्रों में यह पर्व श्रद्धा से मनाया जाता है। बारह दिनों का विशेष महत्व जुकारू उत्सव लगभग एक माह तक विभिन्न रूपों में मनाया जाता है, किंतु प्रारंभिक 12 दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। माघ पूर्णिमा – ‘खाहुल/चजगी’ अमावस्या – ‘सिल्ल’ (राजा बली को अर्पण) शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि – ‘पड़िद’ (पितरों को समर्पित) द्वितीय, तृतीय व पंचमी – धरती माता की पूजा षष्ठी से द्वादशी – देवी-देवताओं की पूजा व मेलों का आयोजन मान्यता है कि धरती माता की पूजा से खेतों में उत्तम फसल होती है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में एकता की मिसाल करीब 1601 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली पांगी घाटी के सुदूर गांव — संसारी नाला से हिलूटवान, चस्क भटोरी से सुराल भटोरी तक — एक साथ इस पर्व को मनाते हैं। समुद्र तल से लगभग 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित चस्क भटोरी गांव में भी लोग पूरे उत्साह से भाग लेते हैं। जनश्रुतियों के अनुसार, सदियों पूर्व जब संचार साधन और पंचांग उपलब्ध नहीं थे, तब बुजुर्गों की सूझबूझ से पूरे क्षेत्र के लिए एक तिथि निर्धारित की गई थी, ताकि आपसी द्वेष समाप्त कर मेल-मिलाप को बढ़ावा दिया जा सके। बेटियों को विशेष सम्मान पंगवाल संस्कृति में बेटियों को विशेष स्थान प्राप्त है। जुकारू के अवसर पर विवाहित बेटियां मायके आती हैं और उनका विशेष सत्कार किया जाता है। इस पर्व को सामाजिक समरसता और पारिवारिक स्नेह का उत्सव भी कहा जाता है। पारंपरिक व्यंजन और लोक-आस्था उत्सव से एक सप्ताह पूर्व घरों की लिपाई-पुताई की जाती है। अमावस्या से पूर्व भंगड़ी और गेहूं के आटे से प्रतीकात्मक बकरे बनाए जाते हैं। ‘सिल्ल’ की रात घर के दक्षिण-पश्चिम कोने में राजा बली का भित्ति चित्र बनाकर घी, शहद, मंडे (स्थानीय डोसा), सतु, मांस, शराब और अन्य पकवान अर्पित किए जाते हैं। दीवारों पर चिड़िया, देवी-देवताओं और विभिन्न आकृतियों का चित्रण कर काले-सफेद रंगों से ‘चौक’ सजाया जाता है। जुकारू उत्सव की समस्त पांगी वासियों को शुभकामनाएं देता हूं यह पर्व पांगी की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। “जुकारू केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, आपसी भाईचारे और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देने वाला लोकपर्व है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी पंगवाल समाज ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को जिस प्रकार सहेज कर रखा है, वह सराहनीय है। आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी जड़ों और लोक परंपराओं से जुड़े रहने की प्रेरणा इस पर्व से मिलती है।” पूर्व वन मंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी जुकारू उत्सव पांगी की सांस्कृतिक आत्मा है। “यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और नई पीढ़ी को परंपराओं के संरक्षण का संदेश देता है। सरकार भी जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।” डॉ. जनक राज विधायक भरमौरी-पांगी जुकारू पर्व पर समस्त पांगी वासियों और प्रदेश वासियों शुभकामनायें जुकारू पर्व पंगवाल समुदाय का आपसी भाईचारे का पर्व है जिसके लिए लोग साल भर इंतजार करते है। पांगी के लोग जहां भी रहते है इस पर्व को धूमधाम के साथ मनाते हैं पंगवाल संस्कृति की अपनी अलग पहचान है जिसको बचाए रखना हम सब का कर्तव्य है। सतीश शर्मा सदस्य जनजातीय सलाहकार समिति पांगी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद पंगवाल समाज ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर रखा है, जो पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा है। सतीश कुमार राणा अध्यक्ष भाजपा मंडल पांगी जुकारू को सामाजिक समरसता का पर्व है यह त्योहार आपसी भाईचारे और मेल-मिलाप को मजबूत करता है। हमारे पूर्वजों ने आपसी भाईचारे और पांगी की संस्कृति को जीवत रखने के लिए मेलो त्योहारों का आयोजन किया था जो आज तक जिन्दा है और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेणा स्त्रोत भी है सुभाष चौहान पूर्व अध्यक्ष ब्लॉक कांग्रेस कमेटी पांगी जुकारू केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है। प्रशासन की ओर से क्षेत्रवासियों को शुभकामनाएं, पर्व के सफल आयोजन के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं। अमनदीप सिंह उपमंडल अधिकारी पांगी आधुनिकता के दौर में भी पंगवाल समाज अपनी परंपराओं को जीवित रखे हुए है, जो गर्व की बात है। जुकारू उत्सव एक बार फिर यह संदेश देता है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद सामूहिकता, भाईचारे और सांस्कृतिक एकता की भावना से समाज को सशक्त बनाया जा सकता है। इन्द्र प्रकाश शर्मा अध्यक्ष पांगी फर्स्ट पंगवाल फर्स्ट। आपसी भाई चारे के प्रतीक जुकारू पर्व पांगी वासी सदियों से मनाते आ रहे है यह एक ऐसा पर्व जिस दिन सभी लोग साल भर के आपसी भेदभाव को भुलाकर एक साथ मिल कर एक दूसरे के गले मिलते हैं तरह तरह के पकवान बांट के खुशी मनाते हैं देवराज राणा पूर्व महासचिव ब्लॉक कांग्रेस कमेटी पांगी। प्रस्तुति :- कृष्ण चंद राणा सम्पादक पांगी न्यूज़ टुडे।
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    राजा बली की पूजा से हुआ शुभारंभ, जनजातीय क्षेत्र में एक ही तिथि पर सामूहिक आयोजन; बेटियों के सम्मान और सांस्कृतिक एकता का अनूठा पर्व
जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में पंगवाल समुदाय का पारंपरिक जुकारू उत्सव हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ आरंभ हो गया है। 15 दिनों तक चलने वाला यह लोकपर्व माघ मास की पूर्णिमा के बाद आने वाली अमावस्या से शुरू होता है और आपसी मिलन, भाईचारे व सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष विशेष बात यह है कि पूरे पांगी में पर्व एक ही तिथि पर सामूहिक रूप से मनाया जा रहा है। गत वर्ष देवलुओं के तालमेल के अभाव में अलग-अलग तिथियों पर आयोजन हुआ था।
राजा बली की पूजा से शुरुआत
फाल्गुन अमावस्या की रात ‘सिल्ल’ के नाम से जानी जाती है। इस दिन पूरे पांगी में राजा बली की विधिवत पूजा कर पहला भोग अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने वामन अवतार में राजा बली को वरदान दिया था कि वे माघ और फाल्गुन मास की अमावस्या को पृथ्वी पर आकर अपने भक्तों से प्रसाद ग्रहण करेंगे। इसी आस्था के साथ पांगी, लाहुल और कुल्लू क्षेत्रों में यह पर्व श्रद्धा से मनाया जाता है।
बारह दिनों का विशेष महत्व
जुकारू उत्सव लगभग एक माह तक विभिन्न रूपों में मनाया जाता है, किंतु प्रारंभिक 12 दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
माघ पूर्णिमा – ‘खाहुल/चजगी’
अमावस्या – ‘सिल्ल’ (राजा बली को अर्पण)
शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि – ‘पड़िद’ (पितरों को समर्पित)
द्वितीय, तृतीय व पंचमी – धरती माता की पूजा
षष्ठी से द्वादशी – देवी-देवताओं की पूजा व मेलों का आयोजन
मान्यता है कि धरती माता की पूजा से खेतों में उत्तम फसल होती है।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में एकता की मिसाल
करीब 1601 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली पांगी घाटी के सुदूर गांव — संसारी नाला से हिलूटवान, चस्क भटोरी से सुराल भटोरी तक — एक साथ इस पर्व को मनाते हैं। समुद्र तल से लगभग 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित चस्क भटोरी गांव में भी लोग पूरे उत्साह से भाग लेते हैं। जनश्रुतियों के अनुसार, सदियों पूर्व जब संचार साधन और पंचांग उपलब्ध नहीं थे, तब बुजुर्गों की सूझबूझ से पूरे क्षेत्र के लिए एक तिथि निर्धारित की गई थी, ताकि आपसी द्वेष समाप्त कर मेल-मिलाप को बढ़ावा दिया जा सके।
बेटियों को विशेष सम्मान
पंगवाल संस्कृति में बेटियों को विशेष स्थान प्राप्त है। जुकारू के अवसर पर विवाहित बेटियां मायके आती हैं और उनका विशेष सत्कार किया जाता है। इस पर्व को सामाजिक समरसता और पारिवारिक स्नेह का उत्सव भी कहा जाता है।
पारंपरिक व्यंजन और लोक-आस्था
उत्सव से एक सप्ताह पूर्व घरों की लिपाई-पुताई की जाती है। अमावस्या से पूर्व भंगड़ी और गेहूं के आटे से प्रतीकात्मक बकरे बनाए जाते हैं। ‘सिल्ल’ की रात घर के दक्षिण-पश्चिम कोने में राजा बली का भित्ति चित्र बनाकर घी, शहद, मंडे (स्थानीय डोसा), सतु, मांस, शराब और अन्य पकवान अर्पित किए जाते हैं।
दीवारों पर चिड़िया, देवी-देवताओं और विभिन्न आकृतियों का चित्रण कर काले-सफेद रंगों से ‘चौक’ सजाया जाता है।
जुकारू उत्सव की समस्त पांगी वासियों को शुभकामनाएं देता हूं यह पर्व पांगी की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। “जुकारू केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, आपसी भाईचारे और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देने वाला लोकपर्व है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी पंगवाल समाज ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को जिस प्रकार सहेज कर रखा है, वह सराहनीय है। आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी जड़ों और लोक परंपराओं से जुड़े रहने की प्रेरणा इस पर्व से मिलती है।” पूर्व वन मंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी 
जुकारू उत्सव पांगी की सांस्कृतिक आत्मा है। “यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और नई पीढ़ी को परंपराओं के संरक्षण का संदेश देता है। सरकार भी जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।”  डॉ. जनक राज विधायक भरमौरी-पांगी 
जुकारू पर्व पर समस्त पांगी वासियों और प्रदेश वासियों शुभकामनायें जुकारू पर्व पंगवाल समुदाय का आपसी भाईचारे का पर्व है जिसके लिए लोग साल भर इंतजार करते है। पांगी के लोग जहां भी रहते है इस पर्व को धूमधाम के साथ मनाते हैं पंगवाल संस्कृति की अपनी अलग पहचान है जिसको बचाए रखना हम सब का कर्तव्य है।
सतीश शर्मा सदस्य जनजातीय सलाहकार समिति पांगी 
कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद पंगवाल समाज ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर रखा है, जो पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा है। सतीश कुमार राणा अध्यक्ष भाजपा मंडल पांगी 
जुकारू को सामाजिक समरसता का पर्व है यह त्योहार आपसी भाईचारे और मेल-मिलाप को मजबूत करता है। हमारे पूर्वजों ने आपसी भाईचारे और पांगी की संस्कृति को जीवत रखने के लिए मेलो त्योहारों का आयोजन किया था जो आज तक जिन्दा है और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेणा स्त्रोत भी है सुभाष चौहान पूर्व अध्यक्ष ब्लॉक कांग्रेस कमेटी पांगी 
जुकारू केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है। प्रशासन की ओर से क्षेत्रवासियों को शुभकामनाएं, पर्व के सफल आयोजन के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं। अमनदीप सिंह उपमंडल अधिकारी पांगी 
आधुनिकता के दौर में भी पंगवाल समाज अपनी परंपराओं को जीवित रखे हुए है, जो गर्व की बात है।
जुकारू उत्सव एक बार फिर यह संदेश देता है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद सामूहिकता, भाईचारे और सांस्कृतिक एकता की भावना से समाज को सशक्त बनाया जा सकता है। इन्द्र प्रकाश शर्मा अध्यक्ष पांगी फर्स्ट पंगवाल फर्स्ट।
आपसी भाई चारे के प्रतीक जुकारू पर्व पांगी वासी सदियों से मनाते आ रहे है यह एक ऐसा पर्व जिस दिन सभी लोग साल भर के आपसी भेदभाव को भुलाकर एक साथ मिल कर एक दूसरे के गले मिलते हैं तरह तरह के पकवान बांट के खुशी मनाते हैं देवराज राणा पूर्व महासचिव ब्लॉक कांग्रेस कमेटी पांगी।
प्रस्तुति :- कृष्ण चंद राणा सम्पादक पांगी न्यूज़ टुडे।
    user_PANGI NEWS TODAY
    PANGI NEWS TODAY
    Book Shop पांगी, चंबा, हिमाचल प्रदेश•
    21 hrs ago
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