हिमाच्छादित वादियों में आस्था, परंपरा और भाईचारे का महापर्व : पांगी में ‘सिहल–जुकारू’ हर्षोल्लास के साथ हुआ आरंभ। हिम संदेश जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी इन दिनों पूर्णतः हिमाच्छादित है। चारों ओर बर्फ की सफेद चादर ओढ़े पहाड़, शांत वातावरण और ठंडी हवाओं के बीच जब लोक संस्कृति की मधुर गूंज सुनाई देती है, तो यह संकेत होता है पांगी के ऐतिहासिक और पारंपरिक ‘सिहल–जुकारू’ पर्व का। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पंगवाला समाज की सांस्कृतिक पहचान, आस्था और सामूहिक एकता का जीवंत प्रतीक है। फागुन मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व तीन प्रमुख चरणों सिलह, पड़ीद और मांगल में संपन्न होता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है, जितनी पूर्वजों के समय में निभाई जाती थी। तैयारियों में झलकती है लोक संस्कृति की छटा। ‘सिहल–जुकारू’ की तैयारियां कई दिन पूर्व आरंभ हो जाती हैं। घरों की विशेष साफ-सफाई की जाती है, दीवारों पर पारंपरिक लोक शैली में चित्रांकन और लिखावट की जाती है। यह लिखावट केवल सजावट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम है। घरों में विशेष पकवान ‘मंण्डे’ बनाए जाते हैं, साथ ही अन्य पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। महिलाएं और बुजुर्ग पारंपरिक रीति-रिवाजों को निभाते हुए बच्चों को इनकी महत्ता समझाते हैं, जिससे नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। ‘सिलह’ : आस्था और अनुशासन का दिन। पहले दिन ‘सिलह’ मनाया जाता है। इस दिन घरों में बलिराज के चित्र बनाए जाते हैं और रात्रि में उनकी विधिवत पूजा की जाती है। दिन में बनाए गए सभी पकवान तथा एक दीपक राजा बलि के चित्र के समक्ष अर्पित किए जाते हैं। इस दिन चरखा कातना बंद कर दिया जाता है और सभी लोग संयम और श्रद्धा के साथ दिन व्यतीत करते हैं। लोक मान्यता के अनुसार इस दिन अनुशासन और शुद्धता का विशेष महत्व है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पोते राजा बलि ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। तब भगवान विष्णु को वामन अवतार धारण करना पड़ा। राजा बलि ने वामन को तीन पग भूमि दान में दी, जिससे प्रसन्न होकर विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वर्ष में एक दिन पृथ्वी लोक में उनकी पूजा की जाएगी। इसी विश्वास के साथ पांगी घाटी के लोग आज भी राजा बलि की पूजा-अर्चना करते हैं। ‘पड़ीद’ : सम्मान, संस्कार और सामाजिक एकता दूसरा दिन ‘पड़ीद’ का होता है। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर लोग स्नान करते हैं और राजा बलि के समक्ष नतमस्तक होते हैं। घर के छोटे सदस्य बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह परंपरा पारिवारिक मूल्यों और सम्मान की भावना को सुदृढ़ करती है। पनघट से जल लाकर अर्पित किया जाता है और जल देवता की पूजा की जाती है। घर का मुखिया ‘चूर’ (हल चलाने के औजार) की पूजा करता है, जो कृषि प्रधान जीवनशैली का प्रतीक है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि प्रकृति और कृषि से जुड़ा उत्सव भी है। ‘जुकारू’ : मिलन, प्रेम और भाईचारे का उत्सव। ‘पड़ीद’ की सुबह से ही ‘जुकारू’ आरंभ हो जाता है। ‘जुकारू’ शब्द का अर्थ है—बड़ों का आदर और परस्पर सम्मान। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण महीनों तक लोग अपने घरों में सीमित रहते हैं। जब मौसम कुछ अनुकूल होता है, तो इस पर्व के माध्यम से लोग एक-दूसरे के घर जाकर गले मिलते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। लोग एक-दूसरे से मिलते समय ‘तकड़ा थिया न’ कहकर कुशल-क्षेम पूछते हैं और विदा लेते समय ‘मठे-मठे विश’ कहते हैं। सबसे पहले बड़े भाई या परिवार के वरिष्ठ सदस्य के घर जाकर सम्मान प्रकट करने की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। यह दिन सामाजिक मेल-मिलाप, आपसी मनमुटाव दूर करने और रिश्तों को सुदृढ़ करने का अवसर भी होता है। सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण आवश्यक। ‘सिहल–जुकारू’ पर्व पांगी घाटी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। आधुनिकता के इस दौर में भी जिस प्रकार स्थानीय लोग अपनी परंपराओं को सहेजकर रखे हुए हैं, वह सराहनीय है। यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, लोककथाओं और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन रहा है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति सम्मान और पारिवारिक एकता का संदेश देने वाला महोत्सव है। पांगी न्यूज 24 की ओर से पांगी की आन, बान और शान को संजोने वाले इस पावन पर्व ‘सिहल–जुकारू’ की समस्त पांगीवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। यह त्योहार हमारी संस्कृति, परंपराओं और भाईचारे की अद्भुत मिसाल बना रहे और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखे — यही कामना है।
हिमाच्छादित वादियों में आस्था, परंपरा और भाईचारे का महापर्व : पांगी में ‘सिहल–जुकारू’ हर्षोल्लास के साथ हुआ आरंभ। हिम संदेश जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी इन दिनों पूर्णतः हिमाच्छादित है। चारों ओर बर्फ की सफेद चादर ओढ़े पहाड़, शांत वातावरण और ठंडी हवाओं के बीच जब लोक संस्कृति की मधुर गूंज सुनाई देती है, तो यह संकेत होता है पांगी के ऐतिहासिक और पारंपरिक ‘सिहल–जुकारू’ पर्व का। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पंगवाला समाज की सांस्कृतिक पहचान, आस्था और सामूहिक एकता का जीवंत प्रतीक है। फागुन मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व तीन प्रमुख चरणों सिलह, पड़ीद और मांगल में संपन्न होता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है, जितनी पूर्वजों के समय में निभाई जाती थी। तैयारियों में झलकती है लोक संस्कृति की छटा। ‘सिहल–जुकारू’ की तैयारियां कई दिन पूर्व आरंभ हो जाती हैं। घरों की विशेष साफ-सफाई की जाती है, दीवारों पर पारंपरिक लोक शैली में चित्रांकन और लिखावट की जाती है। यह लिखावट केवल सजावट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम है। घरों में विशेष पकवान ‘मंण्डे’ बनाए जाते हैं, साथ ही अन्य पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। महिलाएं और बुजुर्ग पारंपरिक रीति-रिवाजों को निभाते हुए बच्चों को इनकी महत्ता समझाते हैं, जिससे नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। ‘सिलह’ : आस्था और अनुशासन का दिन। पहले दिन ‘सिलह’ मनाया जाता है। इस दिन घरों में बलिराज के चित्र बनाए जाते हैं और रात्रि में उनकी विधिवत पूजा की जाती है। दिन में बनाए गए सभी पकवान तथा एक दीपक राजा बलि के चित्र के समक्ष अर्पित किए जाते हैं। इस दिन चरखा कातना बंद कर दिया जाता है और सभी लोग संयम और श्रद्धा के साथ दिन व्यतीत करते हैं। लोक मान्यता के अनुसार इस दिन अनुशासन और शुद्धता का विशेष महत्व है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पोते राजा बलि ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। तब भगवान विष्णु को वामन अवतार धारण करना पड़ा। राजा बलि ने वामन को तीन पग भूमि दान में दी, जिससे प्रसन्न होकर विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वर्ष में एक दिन पृथ्वी लोक में उनकी पूजा की जाएगी। इसी विश्वास के साथ पांगी घाटी के लोग आज भी राजा बलि की पूजा-अर्चना करते हैं। ‘पड़ीद’ : सम्मान, संस्कार और सामाजिक एकता दूसरा दिन ‘पड़ीद’ का होता है। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर लोग स्नान करते हैं और राजा बलि के समक्ष नतमस्तक होते हैं। घर के छोटे सदस्य बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह परंपरा पारिवारिक मूल्यों और सम्मान की भावना को सुदृढ़ करती है। पनघट से जल लाकर अर्पित किया जाता है और जल देवता की पूजा की जाती है। घर का मुखिया ‘चूर’ (हल चलाने के औजार) की पूजा करता है, जो कृषि प्रधान जीवनशैली का प्रतीक है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि प्रकृति और कृषि से जुड़ा उत्सव भी है। ‘जुकारू’ : मिलन, प्रेम और भाईचारे का उत्सव। ‘पड़ीद’ की सुबह से ही ‘जुकारू’ आरंभ हो जाता है। ‘जुकारू’ शब्द का अर्थ है—बड़ों का आदर और परस्पर सम्मान। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण महीनों तक लोग अपने घरों में सीमित रहते हैं। जब मौसम कुछ अनुकूल होता है, तो इस पर्व के माध्यम से लोग एक-दूसरे के घर जाकर गले मिलते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। लोग एक-दूसरे से मिलते समय ‘तकड़ा थिया न’ कहकर कुशल-क्षेम पूछते हैं और विदा लेते समय ‘मठे-मठे विश’ कहते हैं। सबसे पहले बड़े भाई या परिवार के वरिष्ठ सदस्य के घर जाकर सम्मान प्रकट करने की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। यह दिन सामाजिक मेल-मिलाप, आपसी मनमुटाव दूर करने और रिश्तों को सुदृढ़ करने का अवसर भी होता है। सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण आवश्यक। ‘सिहल–जुकारू’ पर्व पांगी घाटी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। आधुनिकता के इस दौर में भी जिस प्रकार स्थानीय लोग अपनी परंपराओं को सहेजकर रखे हुए हैं, वह सराहनीय है। यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, लोककथाओं और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन रहा है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति सम्मान और पारिवारिक एकता का संदेश देने वाला महोत्सव है। पांगी न्यूज 24 की ओर से पांगी की आन, बान और शान को संजोने वाले इस पावन पर्व ‘सिहल–जुकारू’ की समस्त पांगीवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। यह त्योहार हमारी संस्कृति, परंपराओं और भाईचारे की अद्भुत मिसाल बना रहे और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखे — यही कामना है।
- हिम संदेश जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी इन दिनों पूर्णतः हिमाच्छादित है। चारों ओर बर्फ की सफेद चादर ओढ़े पहाड़, शांत वातावरण और ठंडी हवाओं के बीच जब लोक संस्कृति की मधुर गूंज सुनाई देती है, तो यह संकेत होता है पांगी के ऐतिहासिक और पारंपरिक ‘सिहल–जुकारू’ पर्व का। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पंगवाला समाज की सांस्कृतिक पहचान, आस्था और सामूहिक एकता का जीवंत प्रतीक है। फागुन मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व तीन प्रमुख चरणों सिलह, पड़ीद और मांगल में संपन्न होता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है, जितनी पूर्वजों के समय में निभाई जाती थी। तैयारियों में झलकती है लोक संस्कृति की छटा। ‘सिहल–जुकारू’ की तैयारियां कई दिन पूर्व आरंभ हो जाती हैं। घरों की विशेष साफ-सफाई की जाती है, दीवारों पर पारंपरिक लोक शैली में चित्रांकन और लिखावट की जाती है। यह लिखावट केवल सजावट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम है। घरों में विशेष पकवान ‘मंण्डे’ बनाए जाते हैं, साथ ही अन्य पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। महिलाएं और बुजुर्ग पारंपरिक रीति-रिवाजों को निभाते हुए बच्चों को इनकी महत्ता समझाते हैं, जिससे नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। ‘सिलह’ : आस्था और अनुशासन का दिन। पहले दिन ‘सिलह’ मनाया जाता है। इस दिन घरों में बलिराज के चित्र बनाए जाते हैं और रात्रि में उनकी विधिवत पूजा की जाती है। दिन में बनाए गए सभी पकवान तथा एक दीपक राजा बलि के चित्र के समक्ष अर्पित किए जाते हैं। इस दिन चरखा कातना बंद कर दिया जाता है और सभी लोग संयम और श्रद्धा के साथ दिन व्यतीत करते हैं। लोक मान्यता के अनुसार इस दिन अनुशासन और शुद्धता का विशेष महत्व है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पोते राजा बलि ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। तब भगवान विष्णु को वामन अवतार धारण करना पड़ा। राजा बलि ने वामन को तीन पग भूमि दान में दी, जिससे प्रसन्न होकर विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वर्ष में एक दिन पृथ्वी लोक में उनकी पूजा की जाएगी। इसी विश्वास के साथ पांगी घाटी के लोग आज भी राजा बलि की पूजा-अर्चना करते हैं। ‘पड़ीद’ : सम्मान, संस्कार और सामाजिक एकता दूसरा दिन ‘पड़ीद’ का होता है। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर लोग स्नान करते हैं और राजा बलि के समक्ष नतमस्तक होते हैं। घर के छोटे सदस्य बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह परंपरा पारिवारिक मूल्यों और सम्मान की भावना को सुदृढ़ करती है। पनघट से जल लाकर अर्पित किया जाता है और जल देवता की पूजा की जाती है। घर का मुखिया ‘चूर’ (हल चलाने के औजार) की पूजा करता है, जो कृषि प्रधान जीवनशैली का प्रतीक है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि प्रकृति और कृषि से जुड़ा उत्सव भी है। ‘जुकारू’ : मिलन, प्रेम और भाईचारे का उत्सव। ‘पड़ीद’ की सुबह से ही ‘जुकारू’ आरंभ हो जाता है। ‘जुकारू’ शब्द का अर्थ है—बड़ों का आदर और परस्पर सम्मान। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण महीनों तक लोग अपने घरों में सीमित रहते हैं। जब मौसम कुछ अनुकूल होता है, तो इस पर्व के माध्यम से लोग एक-दूसरे के घर जाकर गले मिलते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। लोग एक-दूसरे से मिलते समय ‘तकड़ा थिया न’ कहकर कुशल-क्षेम पूछते हैं और विदा लेते समय ‘मठे-मठे विश’ कहते हैं। सबसे पहले बड़े भाई या परिवार के वरिष्ठ सदस्य के घर जाकर सम्मान प्रकट करने की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। यह दिन सामाजिक मेल-मिलाप, आपसी मनमुटाव दूर करने और रिश्तों को सुदृढ़ करने का अवसर भी होता है। सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण आवश्यक। ‘सिहल–जुकारू’ पर्व पांगी घाटी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। आधुनिकता के इस दौर में भी जिस प्रकार स्थानीय लोग अपनी परंपराओं को सहेजकर रखे हुए हैं, वह सराहनीय है। यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, लोककथाओं और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन रहा है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति सम्मान और पारिवारिक एकता का संदेश देने वाला महोत्सव है। पांगी न्यूज 24 की ओर से पांगी की आन, बान और शान को संजोने वाले इस पावन पर्व ‘सिहल–जुकारू’ की समस्त पांगीवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। यह त्योहार हमारी संस्कृति, परंपराओं और भाईचारे की अद्भुत मिसाल बना रहे और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखे — यही कामना है।1
- राजा बली की पूजा से हुआ शुभारंभ, जनजातीय क्षेत्र में एक ही तिथि पर सामूहिक आयोजन; बेटियों के सम्मान और सांस्कृतिक एकता का अनूठा पर्व जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में पंगवाल समुदाय का पारंपरिक जुकारू उत्सव हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ आरंभ हो गया है। 15 दिनों तक चलने वाला यह लोकपर्व माघ मास की पूर्णिमा के बाद आने वाली अमावस्या से शुरू होता है और आपसी मिलन, भाईचारे व सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष विशेष बात यह है कि पूरे पांगी में पर्व एक ही तिथि पर सामूहिक रूप से मनाया जा रहा है। गत वर्ष देवलुओं के तालमेल के अभाव में अलग-अलग तिथियों पर आयोजन हुआ था। राजा बली की पूजा से शुरुआत फाल्गुन अमावस्या की रात ‘सिल्ल’ के नाम से जानी जाती है। इस दिन पूरे पांगी में राजा बली की विधिवत पूजा कर पहला भोग अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने वामन अवतार में राजा बली को वरदान दिया था कि वे माघ और फाल्गुन मास की अमावस्या को पृथ्वी पर आकर अपने भक्तों से प्रसाद ग्रहण करेंगे। इसी आस्था के साथ पांगी, लाहुल और कुल्लू क्षेत्रों में यह पर्व श्रद्धा से मनाया जाता है। बारह दिनों का विशेष महत्व जुकारू उत्सव लगभग एक माह तक विभिन्न रूपों में मनाया जाता है, किंतु प्रारंभिक 12 दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। माघ पूर्णिमा – ‘खाहुल/चजगी’ अमावस्या – ‘सिल्ल’ (राजा बली को अर्पण) शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि – ‘पड़िद’ (पितरों को समर्पित) द्वितीय, तृतीय व पंचमी – धरती माता की पूजा षष्ठी से द्वादशी – देवी-देवताओं की पूजा व मेलों का आयोजन मान्यता है कि धरती माता की पूजा से खेतों में उत्तम फसल होती है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में एकता की मिसाल करीब 1601 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली पांगी घाटी के सुदूर गांव — संसारी नाला से हिलूटवान, चस्क भटोरी से सुराल भटोरी तक — एक साथ इस पर्व को मनाते हैं। समुद्र तल से लगभग 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित चस्क भटोरी गांव में भी लोग पूरे उत्साह से भाग लेते हैं। जनश्रुतियों के अनुसार, सदियों पूर्व जब संचार साधन और पंचांग उपलब्ध नहीं थे, तब बुजुर्गों की सूझबूझ से पूरे क्षेत्र के लिए एक तिथि निर्धारित की गई थी, ताकि आपसी द्वेष समाप्त कर मेल-मिलाप को बढ़ावा दिया जा सके। बेटियों को विशेष सम्मान पंगवाल संस्कृति में बेटियों को विशेष स्थान प्राप्त है। जुकारू के अवसर पर विवाहित बेटियां मायके आती हैं और उनका विशेष सत्कार किया जाता है। इस पर्व को सामाजिक समरसता और पारिवारिक स्नेह का उत्सव भी कहा जाता है। पारंपरिक व्यंजन और लोक-आस्था उत्सव से एक सप्ताह पूर्व घरों की लिपाई-पुताई की जाती है। अमावस्या से पूर्व भंगड़ी और गेहूं के आटे से प्रतीकात्मक बकरे बनाए जाते हैं। ‘सिल्ल’ की रात घर के दक्षिण-पश्चिम कोने में राजा बली का भित्ति चित्र बनाकर घी, शहद, मंडे (स्थानीय डोसा), सतु, मांस, शराब और अन्य पकवान अर्पित किए जाते हैं। दीवारों पर चिड़िया, देवी-देवताओं और विभिन्न आकृतियों का चित्रण कर काले-सफेद रंगों से ‘चौक’ सजाया जाता है। जुकारू उत्सव की समस्त पांगी वासियों को शुभकामनाएं देता हूं यह पर्व पांगी की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। “जुकारू केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, आपसी भाईचारे और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देने वाला लोकपर्व है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी पंगवाल समाज ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को जिस प्रकार सहेज कर रखा है, वह सराहनीय है। आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी जड़ों और लोक परंपराओं से जुड़े रहने की प्रेरणा इस पर्व से मिलती है।” पूर्व वन मंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी जुकारू उत्सव पांगी की सांस्कृतिक आत्मा है। “यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और नई पीढ़ी को परंपराओं के संरक्षण का संदेश देता है। सरकार भी जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।” डॉ. जनक राज विधायक भरमौरी-पांगी जुकारू पर्व पर समस्त पांगी वासियों और प्रदेश वासियों शुभकामनायें जुकारू पर्व पंगवाल समुदाय का आपसी भाईचारे का पर्व है जिसके लिए लोग साल भर इंतजार करते है। पांगी के लोग जहां भी रहते है इस पर्व को धूमधाम के साथ मनाते हैं पंगवाल संस्कृति की अपनी अलग पहचान है जिसको बचाए रखना हम सब का कर्तव्य है। सतीश शर्मा सदस्य जनजातीय सलाहकार समिति पांगी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद पंगवाल समाज ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर रखा है, जो पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा है। सतीश कुमार राणा अध्यक्ष भाजपा मंडल पांगी जुकारू को सामाजिक समरसता का पर्व है यह त्योहार आपसी भाईचारे और मेल-मिलाप को मजबूत करता है। हमारे पूर्वजों ने आपसी भाईचारे और पांगी की संस्कृति को जीवत रखने के लिए मेलो त्योहारों का आयोजन किया था जो आज तक जिन्दा है और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेणा स्त्रोत भी है सुभाष चौहान पूर्व अध्यक्ष ब्लॉक कांग्रेस कमेटी पांगी जुकारू केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है। प्रशासन की ओर से क्षेत्रवासियों को शुभकामनाएं, पर्व के सफल आयोजन के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं। अमनदीप सिंह उपमंडल अधिकारी पांगी आधुनिकता के दौर में भी पंगवाल समाज अपनी परंपराओं को जीवित रखे हुए है, जो गर्व की बात है। जुकारू उत्सव एक बार फिर यह संदेश देता है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद सामूहिकता, भाईचारे और सांस्कृतिक एकता की भावना से समाज को सशक्त बनाया जा सकता है। इन्द्र प्रकाश शर्मा अध्यक्ष पांगी फर्स्ट पंगवाल फर्स्ट। आपसी भाई चारे के प्रतीक जुकारू पर्व पांगी वासी सदियों से मनाते आ रहे है यह एक ऐसा पर्व जिस दिन सभी लोग साल भर के आपसी भेदभाव को भुलाकर एक साथ मिल कर एक दूसरे के गले मिलते हैं तरह तरह के पकवान बांट के खुशी मनाते हैं देवराज राणा पूर्व महासचिव ब्लॉक कांग्रेस कमेटी पांगी। प्रस्तुति :- कृष्ण चंद राणा सम्पादक पांगी न्यूज़ टुडे।1
- चंबा: बोर्ड परीक्षा को लेकर डीसी मुकेश रेप्सवाल ने विद्यार्थियों को दी शुभकामनाएं, उज्ज्वल भविष्य की कामना। मोहम्मद आशिक चंबा हिमाचल प्रदेश जिला चंबा में बोर्ड परीक्षाओं के शुभारंभ को लेकर उपायुक्त चंबा मुकेश रेप्सवाल ने सभी विद्यार्थियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि बोर्ड परीक्षाएं विद्यार्थियों के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होती हैं, जिसमें मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास से सफलता प्राप्त की जा सकती है। उपायुक्त ने विद्यार्थियों से अपील की कि वे परीक्षा के दौरान तनावमुक्त रहकर सकारात्मक सोच के साथ परीक्षा दें और समय का सही प्रबंधन करें। उन्होंने कहा कि माता-पिता एवं शिक्षक भी बच्चों का मनोबल बढ़ाएं ताकि वे बेहतर प्रदर्शन कर सकें। डीसी मुकेश रेप्सवाल ने सभी परीक्षार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि प्रशासन द्वारा परीक्षा संचालन को शांतिपूर्ण एवं सुचारू ढंग से संपन्न करवाने के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को संदेश दिया कि ईमानदारी और लगन से किया गया प्रयास ही सफलता की कुंजी है। बाइट डीसी चंबा मुकेश रेप्सवाल।1
- Post by Till The End News1
- राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला भरवाईं में फेयरवेल पार्टी का आयोजन किया गया । मृदुल मिस्टर व शगुन मिस फेयरवेल बने । भरवाईं ,अकी रतन ऊना,हिमाचल प्रदेश हिमाचल प्रदेश के ऊना जिला के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला भरवाईं में मंगलवार को फेयरवेल पार्टी का आयोजन किया गया। फेयरवेल में छात्राओं ने हिमाचल की खूबसूरत पारंपरिक परिधान साड़ी में सजधज कर कैटवॉक किया तथा छात्रों ने भी मॉडल की वेशभूषा में अपनी प्रतिभा दिखाई। स्कूल के प्रधानाचार्य निर्मल कुमार ने बतौर मुख्यातिथी शिरकत कर विद्यार्थियों का हौंसला बढ़ाया। मंगलवार सुबह करीब 10 बजे से 3 बजे तक चले इस कार्यक्रम में 11वीं व 12वीं कक्षा के पचहत्तर से अधिक विद्यार्थियों ने हिस्सा लेकर अपने हुनर को दर्शाया । अपने संबोधन में स्कूल प्रधानाचार्य निर्मल कुमार ने बताया कि स्कूल में विद्यार्थियों को गुणवतावान पढ़ाई दिलाने के अलावा अन्य मंचों में भी अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन स्कूल में किया जाता है तथा विद्यार्थियों को उनके निर्धारित लक्ष्य पर कड़ी मेहनत करने पर प्रोत्साहित किया। समारोह के दौरान मृदुल को मिस्टर फेयरवैल और शगुन मिस फेयरवैल के ताज से सम्मानित हुई।इस अवसर पर स्कूल के समस्त अध्यापक मौजूद रहे।6
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- सुजानपुर हिमाचल प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ता एवं सुजानपुर के पूर्व विधायक राजेंद्र राणा ने राज्य की कांग्रेस सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि झूठ और भ्रम की राजनीति के सहारे प्रदेश नहीं चल सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू बार-बार रिवेन्यू डिफिसिट ग्रांट (आर.डी.जी ) को लेकर केंद्र सरकार पर निराधार आरोप लगा रहे हैं, जबकि 15वें वित्त आयोग ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि यह ग्रांट चरणबद्ध तरीके से समाप्त की जाएगी और राज्यों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। आज यहां जारी एक बयान में राजेंद्र राणा ने कहा कि जिन 17 राज्यों को इस संबंध में पहले से सचेत किया गया था, उनमें से 11 राज्य भाजपा शासित हैं, लेकिन वहां की सरकारों ने केंद्र पर दोषारोपण करने के बजाय अपने संसाधन बढ़ाने और वित्तीय प्रबंधन सुधारने पर ध्यान दिया। हिमाचल प्रदेश को भी इसी दिशा में काम करना चाहिए था, लेकिन सुक्खू सरकार बहानेबाजी की राजनीति में उलझी हुई है। उन्होंने कहा कि पूर्व यूपीए सरकार के कार्यकाल में हिमाचल को लगभग 18,000 करोड़ रुपये की रिवेन्यू डिफिसिट ग्रांट मिली थी, जबकि पिछले 10 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने प्रदेश को लगभग 88,000 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री द्वारा केंद्र पर लगातार आरोप लगाना पूरी तरह राजनीतिक और तथ्यों से परे है। राजेंद्र राणा ने कहा कि राज्य सरकार का दायित्व होता है कि वह प्रदेश की आय बढ़ाने के लिए ठोस नीतियां बनाए, नए राजस्व स्रोत विकसित करे और वित्तीय अनुशासन लागू करे। लेकिन वर्तमान सरकार का रवैया ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रशासन चलाने के बजाय छात्र संगठन की राजनीति की जा रही हो, जिसका खामियाजा प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने विधानसभा बजट सत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्यपाल द्वारा सरकार के अभिभाषण को पढ़ने से इनकार करना प्रदेश के इतिहास की अभूतपूर्व घटना है। यह सरकार की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यदि सरकार के दावों में दम होता, तो ऐसी स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती। राजेंद्र राणा ने आरोप लगाया कि पिछले तीन वर्षों में वित्तीय संसाधनों के दुरुपयोग ने प्रदेश की आर्थिक स्थिति को और कमजोर किया है। महंगाई, बेरोजगारी और विकास कार्यों की धीमी गति से जनता त्रस्त है और अब सरकार से जवाब मांग रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश हित में आवश्यक है कि सरकार आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति छोड़कर आत्मनिर्भरता, राजस्व वृद्धि और सुशासन पर ध्यान केंद्रित करे। हिमाचल प्रदेश की जनता एक जिम्मेदार, पारदर्शी और दूरदर्शी नेतृत्व की अपेक्षा रखती है1
- चंबा: उपमंडल स्तर पर पहुंचे सेब के पौधे, बर्फबारी के बाद बागवानों को मिली बड़ी राहत। मोहम्मद आशिक चंबा हिमाचल प्रदेश जिले के विभिन्न उपमंडलों में सेब के पौधों की खेप पहुंचने से बागवानों के चेहरे खिल उठे हैं। हाल ही में हुई बर्फबारी के बाद जहां मौसम में ठंड बढ़ गई थी, वहीं अब सेब के पौधे समय पर उपलब्ध होने से बागवानी कार्यों को गति मिल गई है। जानकारी के अनुसार कृषि एवं बागवानी विभाग द्वारा उपमंडल स्तर पर सेब के उन्नत किस्मों के पौधे उपलब्ध करवाए गए हैं, जिससे स्थानीय बागवानों को बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पौधों के वितरण की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है ताकि अधिक से अधिक किसानों और बागवानों को इसका लाभ मिल सके। बागवानों का कहना है कि बर्फबारी के बाद भूमि में पर्याप्त नमी होने के कारण पौधारोपण के लिए यह समय बेहद उपयुक्त है। ऐसे में पौधों की समय पर आपूर्ति से उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी और भविष्य में आर्थिक रूप से भी लाभ होगा। विभागीय अधिकारियों ने बताया कि इस वर्ष बागवानी को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से सेब सहित अन्य फलदार पौधों की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। साथ ही बागवानों को तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जा रहा है ताकि पौधारोपण सही तरीके से किया जा सके। सेब के पौधे पहुंचने से क्षेत्र में बागवानी गतिविधियां तेज होंगी और बागवानों को बेहतर उत्पादन की उम्मीद जगी है। बाइट डॉ प्रमोद शाह उद्यान उपनिदेशक चंबा।1