स्कन्दपुराण के मानसखंड के आठवें अध्याय में वर्णित एक अत्यंत पवित्र और रहस्यों से भरा संवाद, साक्षात् विष्णु के अवतार स्वरूप महामना दत्तात्रेय और देव-ब्राह्मणों के पूजक काशीराज धन्वन्तरि के बीच घटित हुआ। व्यास जी के अनुसार, जब योगीश्रेष्ठ दत्तात्रेय विभिन्न तीर्थों से लौटे, तो पराक्रमी राजा धन्वन्तरि ने उनका भव्य स्वागत किया। राजा ने आदरपूर्वक उन्हें भोजन कराकर अपनी जिज्ञासा प्रकट की, जहाँ उन्होंने दत्तात्रेय से वाराणसी सहित अनेक पुण्यस्थलों के गोपनीय रहस्यों के बारे में प्रश्न पूछे। इस पर दत्तात्रेय जी ने सहर्ष उत्तर देने का आश्वासन दिया। राजा धन्वन्तरि ने सर्वप्रथम उस तीर्थ के बारे में पूछा जिससे दैवीय संपत्ति सहज ही प्राप्त हो सके। इसके उत्तर में भगवान दत्तात्रेय ने काशी नगरी की महिमा का गुणगान करते हुए कहा कि इस भूमण्डल पर काशी की समता करने वाला कोई दूसरा तीर्थ नहीं है और करोड़ों तीर्थ भी इसके सामने कुछ नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अन्य तीर्थ केवल शरीर को कष्ट देने वाले हैं, जबकि काशी वह परम प्रिय नगरी है जहाँ साक्षात् भगवान विश्वनाथ सदा जाग्रत रहते हैं। यहाँ तक कि यदि कोई कीड़ा-मकोड़ा भी काशी में मरता है, तो वह इंद्रलोक का त्याग कर सीधे शिवलोक को प्राप्त होता है। भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न त्रिपथगा गंगा तीनों कालों में यहीं व्याप्त रहती हैं, इसीलिए दत्तात्रेय ने राजा को काशी में निश्चल होकर रहने का उपदेश दिया। हालांकि, जिज्ञासा यहीं समाप्त नहीं हुई और राजा धन्वन्तरि ने एक गूढ़ प्रश्न पूछा कि क्या काशी से भी अधिक महत्वपूर्ण कोई ऐसा स्थान है, जिसके केवल दर्शन मात्र से मनुष्य देह त्यागे बिना अक्षय स्वर्ग या दुर्लभ विष्णुलोक प्राप्त कर सके और जहाँ से पुनरागमन न हो। राजा यह भी जानना चाहते थे कि पूर्वकाल के राजाओं ने किस मार्ग से सदेह स्वर्ग प्राप्त किया था। राजा के इस कल्याणकारी प्रश्न को सुनकर दत्तात्रेय जी ने उत्तर दिया कि ऋषियों और देवताओं को भी कठिनाई से मिलने वाली मुक्ति का एक महारहस्य हिमाचल पर्वत में छिपा है। उन्होंने बताया कि हिम कणों से सिंचित, गिरजा के पिता और हिम से परिपूर्ण हिमाचल को बिना देखे भी, यदि कोई व्यक्ति दस हजार योजन की दूरी से केवल उसका स्मरण मात्र कर ले, तो उसे साक्षात् काशीवास के समान ही परम फल की प्राप्ति हो जाती है। दत्तात्रेय जी ने इस बर्फीले साम्राज्य के रहस्यों को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा कि दस हजार योजन की दूरी से भी यदि कोई प्राणी केवल 'हिम' शब्द का उच्चारण करता है, तो वह अपने समस्त पापों से विमुक्त होकर विष्णु-स्वरूप हो जाता है। मृत्युकाल में भी हिम का स्मरण करना चाहिए, क्योंकि नारद आदि ऋषियों ने इसी हिमाचल के दर्शन, स्मरण और ध्यान से परम दुर्लभ विष्णुलोक प्राप्त किया था। दत्तात्रेय जी देवताओं के सौ वर्षों में भी हिमाचल के पुण्यों का पूर्ण वर्णन करने में असमर्थ हैं। इसी पावन क्षेत्र में भगवान विष्णु के चरणों से निकली गंगा कमल-नाल के धागों की तरह चार भागों में विभक्त होती है, और इस भूमण्डल में हिमाचल जैसा कोई दूसरा स्थान नहीं है, क्योंकि इसके कण-कण में, जल-थल और गुफाओं में देवाधिदेव शंकर निवास करते हैं। विंध्य और मलय जैसे पर्वत भी इसकी समता नहीं कर सकते। इसी पावन पर्वतराज पर एक परम गोपनीय रहस्य मानस नामक सरोवर के रूप में प्रकाशित है, जहाँ भगवान शिव स्वयं राजहंस के रूप में साक्षात् विराजमान रहते हैं। सृष्टि के इस सबसे पवित्र मानसरोवर की महिमा का अद्भुत चित्रण करते हुए बताया गया कि ब्रह्मा जी द्वारा अपने मन से निर्मित यह सरोवर तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ और पावन माना गया है। ध्रुव, नारद और मार्कण्डेय जैसे परम ज्ञानियों ने इस महातीर्थ की स्तुति करके विष्णुलोक प्राप्त किया, और वेणु के पुत्र राजा पृथु जैसे प्रतापी राजा यहाँ सदेह पहुंचे थे। इस सरोवर का प्रभाव इतना चमत्कारी है कि इसकी मिट्टी या बालू का शरीर पर लेप करने मात्र से मनुष्य देवताओं के समान पूज्य हो जाता है। यहाँ स्नान करके शरीर त्यागने वाले परम ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं, और इसका केवल जल पीने मात्र से प्राणी शिवलोक के अधिकारी बन जाते हैं। दत्तात्रेय जी के अनुसार, इस मानसरोवर के जल की एक बूंद का स्पर्श भी मनुष्य के सैकड़ों जन्मों के पापों को नष्ट कर देता है, और इसके जल कणों से सिंचित होकर स्नान करने वाले को साक्षात् गंगास्नान से भी बढ़कर फल मिलता है। इस अलौकिक क्षेत्र के चमत्कारों की कथा में आगे बताया गया है कि मानसरोवर का जल किसी कीमती मोती की तरह चमकता है और उसकी बालू तांबे के समान चमकीली दिखाई देती है। सम्पूर्ण विष्णुलोक में इसके समान दूसरा कोई क्षेत्र नहीं है। यहीं पर परम पावन कैलाश पर्वत और मानसरोवर स्थित हैं, जहाँ सत्ययुग में अनेक राजा केवल स्मरण मात्र से सदेह ब्रह्मलोक चले गए थे। यहाँ भगवान शिव साक्षात् माता पार्वती और अपने गणों के साथ शयन करते हैं। केदारमार्ग से योगभ्रष्ट हुए योगी भी इसी उत्तर-पर्वत को प्राप्त कर शिवलिंग स्वरूप हो गए। हिमाचल के मूल भाग पर पैर पड़ने मात्र से मनुष्य के पाप वैसे ही विलीन हो जाते हैं जैसे सूर्योदय होने पर बर्फ पिघल जाती है। यहाँ तक कि पापी व्याध और शिकारी भी इस पर्वतराज के स्पर्श मात्र से परम पद को प्राप्त कर लेते हैं। इसका संपूर्ण महात्म्य कह पाने में स्वयं ब्रह्मा और देवराज इंद्र भी पूरी तरह असमर्थ हैं। इस दिव्य वृत्तांत का समापन करते हुए दत्तात्रेय जी बताते हैं कि ब्रह्मा के मन से उत्पन्न इस मानसरोवर और कैलाश-हिमाचल की चोटियों का महत्व वर्णन करने में स्वयं भगवान शंकर, देवगुरु बृहस्पति और इंद्र भी असमर्थ हैं। इसी मानसरोवर की अगाध जलराशि से संसार की सर्वश्रेष्ठ नदियाँ निकलती हैं, जिनमें राजा भगीरथ द्वारा पृथ्वी पर लाई गई पुण्य जलराशि और महर्षि वसिष्ठ द्वारा निर्दिष्ट मार्ग से प्रादुर्भूत हुई परम कल्याणकारी सरयू नदी भी शामिल है। दत्तात्रेय जी अंत में इस परम पावन प्रदेश को मानस-खंड कहते हैं, जिसके मध्य में हिमालय के पाँच भव्य शिखर दिखाई देते हैं, जो विभिन्न खंडों के सुंदर विभाजक हैं। इस प्रकार स्कन्दपुराण के मानसखंड का यह आठवां अध्याय काशी की महत्ता से लेकर कैलाश, हिमाचल और मानसरोवर के उन अलौकिक रहस्यों से परिचित कराता है, जो मनुष्य को सहज ही इस नश्वर संसार के बंधनों से मुक्त कर परम आनंद की ओर ले जाते हैं।
स्कन्दपुराण के मानसखंड के आठवें अध्याय में वर्णित एक अत्यंत पवित्र और रहस्यों से भरा संवाद, साक्षात् विष्णु के अवतार स्वरूप महामना दत्तात्रेय और देव-ब्राह्मणों के पूजक काशीराज धन्वन्तरि के बीच घटित हुआ। व्यास जी के अनुसार, जब योगीश्रेष्ठ दत्तात्रेय विभिन्न तीर्थों से लौटे, तो पराक्रमी राजा धन्वन्तरि ने उनका भव्य स्वागत किया। राजा ने आदरपूर्वक उन्हें भोजन कराकर अपनी जिज्ञासा प्रकट की, जहाँ उन्होंने दत्तात्रेय से वाराणसी सहित अनेक पुण्यस्थलों के गोपनीय रहस्यों के बारे में प्रश्न पूछे। इस पर दत्तात्रेय जी ने सहर्ष उत्तर देने का आश्वासन दिया। राजा धन्वन्तरि ने सर्वप्रथम उस तीर्थ के बारे में पूछा जिससे दैवीय संपत्ति सहज ही प्राप्त हो सके। इसके उत्तर में भगवान दत्तात्रेय ने काशी नगरी की महिमा का गुणगान करते हुए कहा कि इस भूमण्डल पर काशी की समता करने वाला कोई दूसरा तीर्थ नहीं है और करोड़ों तीर्थ भी इसके सामने कुछ नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अन्य तीर्थ केवल शरीर को कष्ट देने वाले हैं, जबकि काशी वह परम प्रिय नगरी है जहाँ साक्षात् भगवान विश्वनाथ सदा जाग्रत रहते हैं। यहाँ तक कि यदि कोई कीड़ा-मकोड़ा भी काशी में मरता है, तो वह इंद्रलोक का त्याग कर सीधे शिवलोक को प्राप्त होता है। भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न त्रिपथगा गंगा तीनों कालों में यहीं व्याप्त रहती हैं, इसीलिए दत्तात्रेय ने राजा को काशी में निश्चल होकर रहने का उपदेश दिया। हालांकि, जिज्ञासा यहीं समाप्त नहीं हुई और राजा धन्वन्तरि ने एक गूढ़ प्रश्न पूछा कि क्या काशी से भी अधिक महत्वपूर्ण कोई ऐसा स्थान है, जिसके केवल दर्शन मात्र से मनुष्य देह त्यागे बिना अक्षय स्वर्ग या दुर्लभ विष्णुलोक प्राप्त कर सके और जहाँ से पुनरागमन न हो। राजा यह भी जानना चाहते थे कि पूर्वकाल के राजाओं ने किस मार्ग से सदेह स्वर्ग प्राप्त किया था। राजा के इस कल्याणकारी प्रश्न को सुनकर दत्तात्रेय जी ने उत्तर दिया कि ऋषियों और देवताओं को भी कठिनाई से मिलने वाली मुक्ति का एक महारहस्य हिमाचल पर्वत में छिपा है। उन्होंने बताया कि हिम कणों से सिंचित, गिरजा के पिता और हिम से परिपूर्ण हिमाचल को बिना देखे भी, यदि कोई व्यक्ति दस हजार योजन की दूरी से केवल उसका स्मरण मात्र कर ले, तो उसे साक्षात् काशीवास के समान ही परम फल की प्राप्ति हो जाती है। दत्तात्रेय जी ने इस बर्फीले साम्राज्य के रहस्यों को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा कि दस हजार योजन की दूरी से भी यदि कोई प्राणी केवल 'हिम' शब्द का उच्चारण करता है, तो वह अपने समस्त पापों से विमुक्त होकर विष्णु-स्वरूप हो जाता है। मृत्युकाल में भी हिम का स्मरण करना चाहिए, क्योंकि नारद आदि ऋषियों ने इसी हिमाचल के दर्शन, स्मरण और ध्यान से परम दुर्लभ विष्णुलोक प्राप्त किया था। दत्तात्रेय जी देवताओं के सौ वर्षों में भी हिमाचल के पुण्यों का पूर्ण वर्णन करने में असमर्थ हैं। इसी पावन क्षेत्र में भगवान विष्णु के चरणों से निकली गंगा कमल-नाल के धागों की तरह चार भागों में विभक्त होती है, और इस भूमण्डल में हिमाचल जैसा कोई दूसरा स्थान नहीं है, क्योंकि इसके कण-कण में, जल-थल और गुफाओं में देवाधिदेव शंकर निवास करते हैं। विंध्य और मलय जैसे पर्वत भी इसकी समता नहीं कर सकते। इसी पावन पर्वतराज पर एक परम गोपनीय रहस्य मानस नामक सरोवर के रूप में प्रकाशित है, जहाँ भगवान शिव स्वयं राजहंस के रूप में साक्षात् विराजमान रहते हैं। सृष्टि के इस सबसे पवित्र मानसरोवर की महिमा का अद्भुत चित्रण करते हुए बताया गया कि ब्रह्मा जी द्वारा अपने मन से निर्मित यह सरोवर तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ और पावन माना गया है। ध्रुव, नारद और मार्कण्डेय जैसे परम ज्ञानियों ने इस महातीर्थ की स्तुति करके विष्णुलोक प्राप्त किया, और वेणु के पुत्र राजा पृथु जैसे प्रतापी राजा यहाँ सदेह पहुंचे थे। इस सरोवर का प्रभाव इतना चमत्कारी है कि इसकी मिट्टी या बालू का शरीर पर लेप करने मात्र से मनुष्य देवताओं के समान पूज्य हो जाता है। यहाँ स्नान करके शरीर त्यागने वाले परम ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं, और इसका केवल जल पीने मात्र से प्राणी शिवलोक के अधिकारी बन जाते हैं। दत्तात्रेय जी के अनुसार, इस मानसरोवर के जल की एक बूंद का स्पर्श भी मनुष्य के सैकड़ों जन्मों के पापों को नष्ट कर देता है, और इसके जल कणों से सिंचित होकर स्नान करने वाले को साक्षात् गंगास्नान से भी बढ़कर फल मिलता है। इस अलौकिक क्षेत्र के चमत्कारों की कथा में आगे बताया गया है कि मानसरोवर का जल किसी कीमती मोती की तरह चमकता है और उसकी बालू तांबे के समान चमकीली दिखाई देती है। सम्पूर्ण विष्णुलोक में इसके समान दूसरा कोई क्षेत्र नहीं है। यहीं पर परम पावन कैलाश पर्वत और मानसरोवर स्थित हैं, जहाँ सत्ययुग में अनेक राजा केवल स्मरण मात्र से सदेह ब्रह्मलोक चले गए थे। यहाँ भगवान शिव साक्षात् माता पार्वती और अपने गणों के साथ शयन करते हैं। केदारमार्ग से योगभ्रष्ट हुए योगी भी इसी उत्तर-पर्वत को प्राप्त कर शिवलिंग स्वरूप हो गए। हिमाचल के मूल भाग पर पैर पड़ने मात्र से मनुष्य के पाप वैसे ही विलीन हो जाते हैं जैसे सूर्योदय होने पर बर्फ पिघल जाती है। यहाँ तक कि पापी व्याध और शिकारी भी इस पर्वतराज के स्पर्श मात्र से परम पद को प्राप्त कर लेते हैं। इसका संपूर्ण महात्म्य कह पाने में स्वयं ब्रह्मा और देवराज इंद्र भी पूरी तरह असमर्थ हैं। इस दिव्य वृत्तांत का समापन करते हुए दत्तात्रेय जी बताते हैं कि ब्रह्मा के मन से उत्पन्न इस मानसरोवर और कैलाश-हिमाचल की चोटियों का महत्व वर्णन करने में स्वयं भगवान शंकर, देवगुरु बृहस्पति और इंद्र भी असमर्थ हैं। इसी मानसरोवर की अगाध जलराशि से संसार की सर्वश्रेष्ठ नदियाँ निकलती हैं, जिनमें राजा भगीरथ द्वारा पृथ्वी पर लाई गई पुण्य जलराशि और महर्षि वसिष्ठ द्वारा निर्दिष्ट मार्ग से प्रादुर्भूत हुई परम कल्याणकारी सरयू नदी भी शामिल है। दत्तात्रेय जी अंत में इस परम पावन प्रदेश को मानस-खंड कहते हैं, जिसके मध्य में हिमालय के पाँच भव्य शिखर दिखाई देते हैं, जो विभिन्न खंडों के सुंदर विभाजक हैं। इस प्रकार स्कन्दपुराण के मानसखंड का यह आठवां अध्याय काशी की महत्ता से लेकर कैलाश, हिमाचल और मानसरोवर के उन अलौकिक रहस्यों से परिचित कराता है, जो मनुष्य को सहज ही इस नश्वर संसार के बंधनों से मुक्त कर परम आनंद की ओर ले जाते हैं।
- दीवानराम, नैनीताल उत्तराखंडधारी, नैनीताल, उत्तराखंडजय हो कैलाश मानसरोवर यात्रा3 hrs ago
- मल्लीताल पुलिस ने राजस्थान से आई एक महिला पर्यटक का खोया हुआ मंगलसूत्र सफलतापूर्वक बरामद कर उन्हें लौटा दिया। राजस्थान के पाली निवासी डॉ. टीना राव अपने पति राजेश राव के साथ नैनीताल और मसूरी के भ्रमण पर थीं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल कैंची धाम के दर्शन के बाद होटल लौटते समय उन्हें यह अहसास हुआ कि उनका कीमती मंगलसूत्र कहीं गिर गया है। काफी खोजबीन के बावजूद जब उन्हें मंगलसूत्र नहीं मिला और उम्मीद खोने लगीं, तब उन्होंने इसकी सूचना मल्लीताल कोतवाली पुलिस को दी। मामले की गंभीरता को देखते हुए, प्रभारी निरीक्षक राजेंद्र सिंह रावत और कांस्टेबल शाहिद अली ने तत्काल सक्रियता दिखाते हुए कार्रवाई शुरू की। पुलिस टीम के निरंतर प्रयासों और त्वरित खोजबीन के परिणामस्वरूप, खोया हुआ मंगलसूत्र सकुशल बरामद कर लिया गया। अपना मंगलसूत्र वापस पाकर डॉ. टीना राव भावुक हो उठीं और उन्होंने उत्तराखंड पुलिस का विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पुलिस के इस मददगार और संवेदनशील रवैये के कारण वे देवभूमि से बेहद सुखद यादें लेकर लौट रही हैं।1
- बलिदान दिवस के अवसर पर अमरिया ब्लॉक प्रमुख निशान सिंह ने पौधरोपण किया। इस दौरान उन्होंने लोगों से पेड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की।1
- Post by अशोक सरकार1
- उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में राज्य मंत्री संजय सिंह गंगवार ने एक विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा कि 'मियां को मियां न कहें तो क्या कहें'। अपने बयान को आगे बढ़ाते हुए राज्य मंत्री गंगवार ने कहा कि 'मियां छोड़कर हिंदू बन जाएं, तो मियां कहना छोड़ देंगे'।1
- उत्तराखंड परिवहन की एक बस में तीन सीनियर सिटीजन यात्रियों को श्रीनगर से देहरादून की यात्रा के दौरान उनके आधार कार्ड को लेकर अपमानित किया गया और बस में बैठने से मना कर दिया गया। इस घटना में, परिचालक ने एक यात्री का आधार कार्ड अपने पास रख लिया और उसे वापस नहीं लौटाया। यात्रा शुरू करने वाली महिला पहले रोडवेज बस से श्रीनगर पहुँची थी और वहाँ से देहरादून जाने के लिए उत्तराखंड परिवहन की बस (UK 07P, A6694) में बैठीं। बस में बैठने के बाद, परिचालक ने तीनों सीनियर सिटीजन यात्रियों से स्पष्ट रूप से कहा कि "आधार कार्ड वाले यात्री इस बस में नहीं बैठ सकते, हमें इसके ऑर्डर मिले हैं।" जब यात्रियों ने विनम्रतापूर्वक इस संबंध में सरकार के किसी आदेश के बारे में पूछा, क्योंकि आम जनता को ऐसी कोई सूचना नहीं थी, तो इस बात को लेकर बहस शुरू हो गई। इसी दौरान, बस में मौजूद एक अन्य व्यक्ति भी बिना किसी कारण के यात्रियों से उलझ गया और उन्हें डरा-धमका कर बस से उतरने को कहने लगा। इस व्यवहार से यात्री स्वयं को असुरक्षित और अपमानित महसूस करने लगे, जिसके बाद उन्हें पूरी घटना का वीडियो बनाना पड़ा ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके। हालांकि, कंडक्टर यात्रियों को ऋषिकेश तक ले आया, लेकिन एक यात्री का आधार कार्ड अपने पास रख लिया और उसे वापस नहीं किया। यात्रियों ने इस पूरे प्रकरण पर कड़ी चिंता व्यक्त करते हुए सवाल उठाया है कि सरकारी परिवहन में सुरक्षा, सम्मान और सुविधा की अपेक्षा करने वाले आम यात्रियों, विशेषकर महिलाओं और बुजुर्गों के साथ यदि इस प्रकार का व्यवहार होगा, तो उनका विश्वास कैसे बना रहेगा। उन्होंने उत्तराखंड परिवहन की बसों में यात्रियों के साथ होने वाले व्यवहार पर कड़ी निगरानी रखने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सुरक्षा एवं सम्मान सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। यात्रियों ने यह भी कहा कि ऐसी घटनाएँ आए दिन हो रही हैं और सवाल उठाया कि क्या पहाड़ी लोगों को घरों से बाहर ही नहीं निकलना चाहिए।1
- बरेली पुलिस ने मीरगंज थाना क्षेत्र में एक कुख्यात स्मैक तस्कर और दुराचारी के साथ-साथ उसके सह-अभियुक्त दुराचारी पुत्र के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। ग्राम गुलड़िया थाना मीरगंज के रहने वाले इन अभियुक्तों द्वारा स्मैक तस्करी करके लगभग 3 करोड़ 20 लाख 15 हजार रुपये की अवैध संपत्ति अर्जित की गई थी, जिसे पुलिस ने अब एनडीपीएस अधिनियम की धारा 68 F(2) के तहत फ्रीज कर दिया है। इस कार्रवाई के संबंध में एसपी साउथ श्रीमती अंशिका वर्मा ने जानकारी देते हुए बताया कि यह संपत्ति अवैध गतिविधियों से प्राप्त की गई थी।1
- मुहर्रम के अवसर पर टांडा में अशारा-ए-हुसैन कमेटी ने अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। इस दौरान कमेटी द्वारा राहगीरों को शरबत और लंगर वितरित किया गया।1
- उत्तर प्रदेश अग्निशमन विभाग में बुलेट मोटरसाइकिल की खरीद में बड़े घोटाले का आरोप लगा है। फायरमैन जितेंद्र राठौर ने लखनऊ में अग्निकांड स्थल पर पहुँचकर यह दावा किया कि विभाग को ₹11 लाख में एक बुलेट मोटरसाइकिल मिली है, जबकि उसकी वास्तविक कीमत केवल ₹3 लाख है। इस हिसाब से, राठौर के अनुसार, एक बुलेट की खरीद में ₹8 लाख का घोटाला किया गया है, जिसके लिए उन्होंने सीधे तौर पर डीजी (DG) को जिम्मेदार ठहराया है।1
- उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले की टांडा तहसील में भीषण गर्मी और लू के कारण आम जनजीवन बुरी तरह बेहाल है। इस तपती धूप से सड़कों पर निकलने वाले लोगों, खासकर यात्रियों और मेहनतकश मजदूरों को काफी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों और समाजसेवियों ने मिलकर सड़कों के किनारे राहगीरों को पानी पिलाने की व्यवस्था की है। इस चिलचिलाती धूप में मिल रही इस सेवा को राहगीरों ने किसी वरदान से कम नहीं बताया है।1