सिस्टम सोता रहा, टंकी पर सांसें अटकती रहीं: हेलीकॉप्टर ने बचाई दो जानें, पर एक मां की गोद हुई सूनी। अजीत मिश्रा (खोजी) सिद्धार्थनगर: विकास की 'सीढ़ी' ने ली मासूम की जान, सिस्टम की सुस्ती ने बढ़ाई सांसें! ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश सरकारी लापरवाही की इंतहा: जमीन पर नाकाम रहा प्रशासन, तो आसमान से उतारनी पड़ी जिंदगी! मौत की टंकी: क्या मासूमों की बलि लेने के लिए खड़ी की गई थीं ये इमारतें? सिस्टम सोता रहा, टंकी पर सांसें अटकती रहीं: हेलीकॉप्टर ने बचाई दो जानें, पर एक मां की गोद हुई सूनी। खौफनाक शनिवार: खेल-खेल में काल के गाल में समाया मासूम, घंटों लाचार खड़ा रहा प्रशासन। आसमान में रेस्क्यू, जमीन पर सिसकियां: सिद्धार्थनगर हादसे ने झकझोर दी बस्ती मंडल की रूह। SDRF फेल, हेलीकॉप्टर से हुआ खेल: आखिर कब तक घटिया निर्माण की कीमत चुकाएंगे मासूम? साहब! ये हादसा नहीं हत्या है: कांशीराम आवास की टूटी सीढ़ी ने खोली विकास की पोल। सिद्धार्थनगर की त्रासदी: कागजों पर मेंटेनेंस और हकीकत में मौत का जाल! सिद्धार्थनगर। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में शनिवार को जो हुआ, उसने सरकारी दावों और प्रशासन की कार्यकुशलता की पोल खोलकर रख दी है। कांशीराम आवास स्थित पानी की टंकी की सीढ़ी क्या टूटी, मानों भ्रष्टाचार और अनदेखी की जर्जर इमारत ढह गई। इस हादसे में एक मासूम की जान चली गई, जबकि दो जिंदगी और मौत के बीच मेडिकल कॉलेज में जूझ रहे हैं। सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि दो किशोरों को बचाने के लिए प्रशासन को आसमान की ओर ताकना पड़ा, क्योंकि जमीन पर हमारा 'सिस्टम' लाचार खड़ा था। हादसा या प्रशासनिक हत्या? यह महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही है। सवाल यह है कि: जिस पानी की टंकी की सीढ़ियां इतनी जर्जर थीं कि बच्चों का वजन तक न सह सकीं, उसकी मेंटेनेंस का बजट आखिर किसकी जेब में गया? रिहायशी इलाके में स्थित इस मौत के जाल (टंकी) की घेराबंदी क्यों नहीं की गई थी? क्या प्रशासन को किसी मासूम की बलि चढ़ने का इंतजार था? रेस्क्यू के नाम पर 'तमाशा' और SDRF की नाकामी शनिवार को हादसा हुआ, लेकिन गोरखपुर से पहुंची SDRF की टीम घंटों तक केवल "रास्ता न बन पाने" का बहाना बनाती रही। अत्याधुनिक उपकरणों का दम भरने वाली टीम एक अदद सीढ़ी या रेस्क्यू ब्रिज तक नहीं बना सकी। दो किशोर पूरी रात मौत के साये में टंकी के ऊपर भूखे-प्यासे फंसे रहे, और नीचे खड़ा प्रशासन सिर्फ फाइलों और फोन कॉल में उलझा रहा। "जब जमीन पर तैनात टीमें पंगु साबित हुईं, तब जाकर रविवार सुबह 5 बजे हेलीकॉप्टर मंगवाना पड़ा। जो काम घंटों पहले स्थानीय स्तर पर सूझबूझ से हो सकता था, उसके लिए करोड़ों का तामझाम जुटाना पड़ा। यह देरी सिस्टम की संवेदनहीनता का जीता-जागता सबूत है।" भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते कांशीराम आवास कांशीराम आवासों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। घटिया निर्माण सामग्री और रखरखाव के अभाव में ये इमारतें अब 'कब्रगाह' बनती जा रही हैं। शनिवार को टूटी वह सीढ़ी दरअसल उस भ्रष्टाचार की कड़ी है, जिसकी जांच कागजों से बाहर कभी निकलती ही नहीं। तीखे सवाल: मृतक बच्चे के परिवार की भरपाई क्या सिर्फ मुआवजे के चंद टुकड़ों से हो जाएगी? उन अधिकारियों पर एफआईआर (FIR) कब होगी, जिनकी निगरानी में यह जर्जर ढांचा खड़ा था? क्या जिले की अन्य पानी की टंकियों का सेफ्टी ऑडिट होगा, या अगले हादसे का इंतजार किया जाएगा? निष्कर्ष: सिद्धार्थनगर की यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि सिस्टम को आम आदमी की जान की परवाह नहीं है। हेलीकॉप्टर से रेस्क्यू कर लेना भले ही प्रशासन अपनी पीठ थपथपाने का जरिया बना ले, लेकिन सच तो यही है कि एक मां की गोद सूनी हो चुकी है और इसके जिम्मेदार सफेदपोश और लापरवाह इंजीनियर ही हैं। अब वक्त केवल सांत्वना का नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई और जवाबदेही तय करने का है।
सिस्टम सोता रहा, टंकी पर सांसें अटकती रहीं: हेलीकॉप्टर ने बचाई दो जानें, पर एक मां की गोद हुई सूनी। अजीत मिश्रा (खोजी) सिद्धार्थनगर: विकास की 'सीढ़ी' ने ली मासूम की जान, सिस्टम की सुस्ती ने बढ़ाई सांसें! ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश सरकारी लापरवाही की इंतहा: जमीन पर नाकाम रहा प्रशासन, तो आसमान से उतारनी पड़ी जिंदगी! मौत की टंकी: क्या मासूमों की बलि लेने के लिए खड़ी की गई थीं ये इमारतें? सिस्टम सोता रहा, टंकी पर सांसें अटकती रहीं: हेलीकॉप्टर ने बचाई दो जानें, पर एक मां की गोद हुई सूनी। खौफनाक शनिवार: खेल-खेल में काल के गाल में समाया मासूम, घंटों लाचार खड़ा रहा प्रशासन। आसमान में रेस्क्यू, जमीन पर सिसकियां: सिद्धार्थनगर हादसे ने झकझोर दी बस्ती मंडल की रूह। SDRF फेल, हेलीकॉप्टर से हुआ खेल: आखिर कब तक घटिया निर्माण की कीमत चुकाएंगे मासूम? साहब! ये हादसा नहीं हत्या है: कांशीराम आवास की टूटी सीढ़ी ने खोली विकास की पोल। सिद्धार्थनगर की त्रासदी: कागजों पर मेंटेनेंस और हकीकत में मौत का जाल! सिद्धार्थनगर। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में शनिवार को जो हुआ, उसने सरकारी दावों और प्रशासन की कार्यकुशलता की पोल खोलकर रख दी है। कांशीराम आवास स्थित पानी की टंकी की सीढ़ी क्या टूटी, मानों भ्रष्टाचार और अनदेखी की जर्जर इमारत ढह गई। इस हादसे में एक मासूम की जान चली गई, जबकि दो जिंदगी और मौत के बीच मेडिकल कॉलेज में जूझ रहे हैं। सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि दो किशोरों को बचाने के लिए प्रशासन को आसमान की ओर ताकना पड़ा, क्योंकि जमीन पर हमारा 'सिस्टम' लाचार खड़ा था। हादसा या प्रशासनिक हत्या? यह महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही है। सवाल यह है कि: जिस पानी की टंकी की सीढ़ियां इतनी जर्जर थीं कि बच्चों का वजन तक न सह सकीं, उसकी मेंटेनेंस का बजट आखिर किसकी जेब में गया? रिहायशी इलाके में स्थित इस मौत के जाल (टंकी) की घेराबंदी क्यों नहीं की गई थी? क्या प्रशासन को किसी मासूम की बलि चढ़ने का इंतजार था? रेस्क्यू के नाम पर 'तमाशा' और SDRF की नाकामी शनिवार को हादसा हुआ, लेकिन गोरखपुर से पहुंची SDRF की टीम घंटों तक केवल "रास्ता न बन पाने" का बहाना बनाती रही। अत्याधुनिक उपकरणों का दम भरने वाली टीम एक अदद सीढ़ी या रेस्क्यू ब्रिज तक नहीं बना सकी। दो किशोर पूरी रात मौत के साये में टंकी के ऊपर भूखे-प्यासे फंसे रहे, और नीचे खड़ा प्रशासन सिर्फ फाइलों और फोन कॉल में उलझा रहा। "जब जमीन पर तैनात टीमें पंगु साबित हुईं, तब जाकर रविवार सुबह 5 बजे हेलीकॉप्टर मंगवाना पड़ा। जो काम घंटों पहले स्थानीय स्तर पर सूझबूझ से हो सकता था, उसके लिए करोड़ों का तामझाम जुटाना पड़ा। यह देरी सिस्टम की संवेदनहीनता का जीता-जागता सबूत है।" भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते कांशीराम आवास कांशीराम आवासों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। घटिया निर्माण सामग्री और रखरखाव के अभाव में ये इमारतें अब 'कब्रगाह' बनती जा रही हैं। शनिवार को टूटी वह सीढ़ी दरअसल उस भ्रष्टाचार की कड़ी है, जिसकी जांच कागजों से बाहर कभी निकलती ही नहीं। तीखे सवाल: मृतक बच्चे के परिवार की भरपाई क्या सिर्फ मुआवजे के चंद टुकड़ों से हो जाएगी? उन अधिकारियों पर एफआईआर (FIR) कब होगी, जिनकी निगरानी में यह जर्जर ढांचा खड़ा था? क्या जिले की अन्य पानी की टंकियों का सेफ्टी ऑडिट होगा, या अगले हादसे का इंतजार किया जाएगा? निष्कर्ष: सिद्धार्थनगर की यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि सिस्टम को आम आदमी की जान की परवाह नहीं है। हेलीकॉप्टर से रेस्क्यू कर लेना भले ही प्रशासन अपनी पीठ थपथपाने का जरिया बना ले, लेकिन सच तो यही है कि एक मां की गोद सूनी हो चुकी है और इसके जिम्मेदार सफेदपोश और लापरवाह इंजीनियर ही हैं। अब वक्त केवल सांत्वना का नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई और जवाबदेही तय करने का है।
- यह कहते हुए रोशन आनंद की आंखें भर आईं। उस शाम वह परिवार के सात अन्य सदस्यों के साथ मध्य प्रदेश के जबलपुर में बरगी डैम के क्रूज पर सवार थे। उनका परिवार बच गया, लेकिन हर किसी की 13 में 9 लोगों की मौत हुई, जबकि 4 अब भी लापता हैं। कुछ परिवार अपनों की तलाश में हैं, कुछ के पास सिर्फ यादें और सदमा है। बचे लोग इसे चमत्कार मान रहे हैं, लेकिन उनकी बातों में उस शाम की दहशत साफ है।1
- धनघटा शनिचरा रोड पेट्रोल पंप पर दलाली करते हुए पकड़े गए लोग आप लोगों से यह निवेदन है कि जब भी आप पेट्रोल भरा है तो जीरो देखकर ही भराए 🙏 #जानताकेसाथ #धनघटा1
- *थाना कोतवाली खलीलाबाद अन्तर्गत एक महिला द्वारा फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेने व पुलिस द्वारा कृत कार्यवाही के सम्बन्ध में अपर पुलिस अधीक्षक संतकबीरनगर द्वारा दी गयी जानकारी1
- *अपर पुलिस अधीक्षक ने नवनियुक्त कांस्टेबलों को दिए बेहतर पुलिसिंग के गुर* संदीप कुमार मीणा के निर्देशन में थाना महुली परिसर में नवनियुक्त पुलिस कांस्टेबलों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में सुशील कुमार सिंह द्वारा नव नियुक्त पुलिस कर्मियों को बेहतर पुलिसिंग, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा एवं जनसेवा के मूल मंत्र बताए गए। बैठक के दौरान दुर्गेश कुमार पांडे सहित थाने के सभी स्टॉप भी उपस्थित रहे। अधिकारियों द्वारा नव नियुक्त कांस्टेबलों को बताया गया कि पुलिस सेवा केवल नौकरी नहीं बल्कि समाज की सुरक्षा, न्याय व्यवस्था बनाए रखने तथा आमजन में विश्वास स्थापित करने का महत्वपूर्ण दायित्व है। अपर पुलिस अधीक्षक ने सभी नव नियुक्त पुलिस कर्मियों को निर्देशित किया कि वे जनता से विनम्र व्यवहार करें, शिकायतों का त्वरित निस्तारण करें, कानून व्यवस्था बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभाएं तथा अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करें।* साथ ही उन्हें साइबर अपराध, महिला सुरक्षा, यातायात व्यवस्था, बीट पुलिसिंग एवं अपराध नियंत्रण के आधुनिक तरीकों की जानकारी देते हुए सतर्क एवं संवेदनशील पुलिसिंग अपनाने हेतु प्रेरित किया गया। बैठक के अंत में सभी नवनियुक्त कांस्टेबलों को निष्ठा, अनुशासन एवं समर्पण भाव से कार्य करने हेतु प्रेरित किया गया तथा उज्ज्वल सेवा जीवन की शुभकामनाएं दी गईं। थाना महुली पुलिस जनसेवा एवं सुरक्षा हेतु सतत प्रतिबद्ध है।4
- Post by BALRAM1
- अंबेडकर नगर में प्रेम प्रसंग के चलते एक युवक हाई टेंशन विद्युत पोल पर चढ़ गया और करीब एक घंटे तक हंगामा करता रहा। सूचना पर पहुंची पुलिस ने उसे सुरक्षित उतारकर हिरासत में लिया। नाबालिग से शादी के विवाद का मामला सामने आया, पुलिस जांच कर रही है।1
- अजीत मिश्रा (खोजी) गौर स्वास्थ्य विभाग का 'खूनी' खेल: आरोग्य मंदिरों को बनाया उगाही का अड्डा, मरीजों की जान से खेल रहे जिम्मेदार! ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश) मरीज बेहाल, अफसर मालामाल: गौर सीएचसी प्रभारी और बीसीपीएम की सरपरस्ती में फल-फूल रहा 'वसूली तंत्र'! योगी सरकार की मंशा पर पानी फेर रहे जिम्मेदार: इलाज के नाम पर 'तालेबंदी', वसूली के नाम पर 'खुली छूट'। क्या 'कमीशन' के बदले बिक रही है गरीबों की सेहत? गौर के आरोग्य मंदिरों की बदहाली खोल रही भ्रष्टाचार की पोल। मुफ्त दवा और जांच का सपना चकनाचूर: गौर में सीएचओ नदारद, प्रभारी ने साधी चुप्पी। साहब! ये आरोग्य मंदिर हैं या भ्रष्टाचार के अड्डे? बंद केंद्रों के नाम पर दवाओं की 'बंदरबांट' की बू। गौर (बस्ती)।। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां स्वास्थ्य व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए दिन-रात पसीना बहा रहे हैं, वहीं बस्ती जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गौर में बैठे कुछ 'सफेदपोश' अधिकारी सरकार की साख को बट्टा लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। यहाँ सरकारी आदेशों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं और 'आयुष्मान आरोग्य मंदिर' भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं।सूबे की सरकार भले ही 'अंतिम पायदान' तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुँचाने का दम भर रही हो, लेकिन बस्ती जनपद के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) गौर के जिम्मेदार अधिकारी सरकार की मंशा पर कालिख पोतने में जुटे हैं। गौर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले आयुष्मान आरोग्य मंदिर अब 'आरोग्य' देने के बजाय भ्रष्टाचार के अड्डे बन चुके हैं। ताले में बंद स्वास्थ्य व्यवस्था: मरीज बेहाल, अधिकारी मालामाल महादेवा (बघौड़ा), गयाजीतपुर और तेनुआ—ये तीन नाम उन केंद्रों के हैं जहाँ मीडिया की टीम ने जब दस्तक दी, तो वहां इलाज नहीं बल्कि भारी-भरकम सरकारी ताले लटकते मिले। सुबह के वक्त जब इन केंद्रों पर गरीबों का हुजूम होना चाहिए था, वहां सन्नाटा पसरा हुआ था। दूर-दराज के गांवों से तपती धूप और कठिनाइयों को पार कर पहुंचे मरीज और उनके तीमारदार गेट पर माथा पटक कर वापस लौट गए। यह केवल तालेबंदी नहीं, बल्कि गौर ब्लॉक की गरीब जनता के भरोसे का गला घोंटने जैसा है।हालिया मीडिया पड़ताल में महादेवा (बघौड़ा), गयाजीतपुर और तेनुआ आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (उप स्वास्थ्य केंद्रों) की हकीकत बेहद डरावनी मिली। इन तीनों केंद्रों पर सन्नाटा पसरा था और मुख्य द्वार पर ताला लटक रहा था। दूर-दराज से इलाज की आस लेकर आए गरीब मरीज घंटों इंतजार के बाद मायूस होकर वापस लौट गए। सवाल यह है कि जब केंद्र ही बंद रहेंगे, तो दवा और इलाज किसे मिलेगा? भ्रष्टाचार का 'गोरखधंधा': सुविधा शुल्क दो और ड्यूटी से गायब रहो! विश्वस्त सूत्रों के हवाले से जो खबर छनकर आ रही है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। चर्चा है कि सीएचसी गौर के प्रभारी डॉ० भास्कर यादव और बीसीपीएम अभिषेक कुमार ने स्वास्थ्य केंद्र को अपनी निजी जागीर बना लिया है।आरोप है कि यहाँ एक निश्चित 'रेट लिस्ट' तय है। जो सीएचओ (CHO) साहबों को प्रतिमाह 'सुविधा शुल्क' (कमीशन) पहुँचा देता है, उसे केंद्र से गायब रहने की खुली छूट मिल जाती है। बीसीपीएम और प्रभारी का मुख्य एजेंडा स्वास्थ्य सेवाएं देना नहीं, बल्कि सीएचओ से अवैध वसूली करना बन गया है। सवाल यह उठता है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था किसके भरोसे चलेगी? सूत्रों से प्राप्त सनसनीखेज जानकारी के अनुसार, गौर सीएचसी में भ्रष्टाचार का एक संगठित सिंडिकेट चल रहा है। आरोप है कि सीएचसी प्रभारी डॉ. भास्कर यादव और बीसीपीएम अभिषेक कुमार की सरपरस्ती में सीएचओ (CHO) से प्रतिमाह मोटा 'सुविधा शुल्क' वसूला जाता है। चर्चा है कि जो सीएचओ साहबों की जेब गरम कर देता है, उसे ड्यूटी से गायब रहने की 'अघोषित छूट' मिल जाती है। बीसीपीएम और प्रभारी का मुख्य उद्देश्य मरीजों की सेवा नहीं, बल्कि अवैध उगाही का लक्ष्य पूरा करना रह गया है। दवाइयों और जांच किट का 'अंधेरगर्दी' खेल सरकारी नियमों के अनुसार, इन आरोग्य मंदिरों में सुबह 08 से दोपहर 02 बजे तक मरीजों की निःशुल्क जांच (खून, पेशाब, शुगर, बलगम) और मुफ्त दवा वितरण होना चाहिए। लेकिन जब महीनों तक केंद्र खुलते ही नहीं, तो सरकार द्वारा भेजी जा रही दवाओं की खेप कहाँ जा रही है? क्या इन दवाओं को कागजों पर बांटकर खुले बाजार में बेचा जा रहा है? यदि शासन स्तर से इन केंद्रों के स्टॉक और उपस्थिति पंजिका की निष्पक्ष जांच (Audit) हो जाए, तो बीसीपीएम और प्रभारी के भ्रष्टाचार की परतें उधड़नी तय हैं।सरकारी नियमों के मुताबिक, इन आरोग्य मंदिरों को सुबह 08 बजे से दोपहर 02 बजे तक खुला रहना अनिवार्य है। यहां खून, पेशाब, शुगर और बलगम जैसी जांचें मुफ्त होनी चाहिए। लेकिन जब केंद्र खुलते ही नहीं, तो सरकार द्वारा भेजी जा रही लाखों की दवाइयां और मेडिकल किट आखिर जा कहां रही हैं? क्या इन दवाइयों को कागजों पर खपाकर बंदरबांट किया जा रहा है? यदि निष्पक्ष जांच हो जाए, तो गौर ब्लॉक में एक बड़ा घोटाला उजागर होना तय है। मीडिया के सवालों से भागते 'जिम्मेदार' जब इस पूरी अराजकता पर पक्ष जानने के लिए संबंधित केंद्रों के सीएचओ को फोन किया गया, तो किसी ने फोन उठाना मुनासिब नहीं समझा। विडंबना देखिए, पूरे ब्लॉक की जिम्मेदारी संभालने वाले प्रभारी डॉ० भास्कर यादव ने भी मीडिया के फोन को अनसुना कर दिया। अधिकारियों की यह 'रहस्यमयी चुप्पी' खुद-ब-खुद चीख-चीख कर घोटाले की कहानी बयां कर रही है।जब इस घोर लापरवाही और तालेबंदी के संबंध में संबंधित सीएचओ से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो किसी ने फोन नहीं उठाया। हद तो तब हो गई जब जिम्मेदार सीएचसी प्रभारी डॉ. भास्कर यादव ने भी मीडिया के फोन को रिसीव करना मुनासिब नहीं समझा। अधिकारियों की यह चुप्पी साफ दर्शाती है कि कहीं न कहीं दाल में काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। मुख्य बिंदु जो जांच के घेरे में हैं: नदारद कर्मचारी: ड्यूटी समय में केंद्रों पर ताला क्यों? अवैध वसूली: क्या बीसीपीएम और प्रभारी की शह पर चल रहा है 'सुविधा शुल्क' का खेल? दवा घोटाला: बंद केंद्रों के नाम पर जारी होने वाली सरकारी दवाइयां कहां गायब हो रही हैं? सीधी चेतावनी: कब जागेगा प्रशासन? सीएचओ, बीसीपीएम और प्रभारी की इस तिकड़ी ने प्रदेश सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति को ठेंगे पर रख दिया है। आखिर कब तक भ्रष्टाचार की इस आग में गरीब जनता झुलसती रहेगी? क्या बस्ती के आला अधिकारी इस 'लूटतंत्र' का संज्ञान लेंगे या फिर फाइलें दबाकर भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देना जारी रखेंगे? जनता जवाब मांग रही है!2
- अम्बेडकर नगर में हुए चार बच्चों के कत्ल का मामला जिसमे आरोपी बनी है कलयुगी मां1
- Post by सुधांशु श्रीवास्तव1