रीवा में जर्जर छत, बाहर बैठे बच्चे और खामोश सिस्टम: अपनी ही सरकार में 'सुशासन' देख हक्के-बक्के रह गए विधायक जी! कागजों पर सरकारी स्कूलों को 'प्राइवेट स्कूलों की तर्ज' पर चमकाने के बड़े-बड़े दावे रोज किए जाते हैं, लेकिन हकीकत की जमीन पर ये दावे कैसे औंधे मुंह गिरते हैं, इसकी पोल तब खुल गई जब सत्ताधारी पार्टी के ही एक विधायक को अपनी विधानसभा का सच देखना पड़ा। मनगवां से बीजेपी विधायक नरेंद्र प्रजापति जब ग्राम पंचायत कदैला के शासकीय प्राथमिक विद्यालय का औचक निरीक्षण करने पहुंचे, तो वहां का 'सुशासन' देखकर उनके भी होश उड़ गए। छत के सरिये झांक रहे थे, प्लास्टर गिर रहा था और नौनिहाल अपनी जान के डर से खुले आसमान के नीचे बैठकर भविष्य गढ़ने को मजबूर थे। क्या यही है वह शिक्षा का 'मॉडल'? क्या इन्हीं जर्जर छतों के नीचे बैठकर हमारे बच्चे विश्वगुरु बनने का सपना देखेंगे? अधिकारी किस कुंभकर्णी नींद में थे? जब स्कूल की शिक्षिका ने वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित में जर्जर हालात की सूचना दे दी थी, तो उस फाइल को किस लाल फीते में बांधकर दबा दिया गया? क्या हादसे का इंतजार था? क्या शिक्षा विभाग के बाबुओं की नींद तभी टूटती जब यह छत किसी मासूम के ऊपर गिर जाती? मरम्मत के लिए भी 'VIP' एंट्री जरूरी है? क्या अब देश में एक स्कूल की टूटी छत ठीक कराने के लिए भी विधायक के 'औचक निरीक्षण' और 'वायरल वीडियो' की जरूरत पड़ेगी? आम आदमी और शिक्षकों की शिकायतों की कोई कीमत नहीं है? कहाँ जा रहा है बजट? शिक्षा के नाम पर हर साल आवंटित होने वाला करोड़ों का भारी-भरकम बजट आखिर किन 'जर्जर' फाइलों में दफन हो रहा है? विधायक जी का वीडियो बनाना और अधिकारियों को निर्देश देना तो ठीक है, लेकिन यह घटना इस बात का जीता-जागता सुबूत है कि सिस्टम को घुन लग चुका है। जब तक एसी कमरों में बैठे अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक मासूम बच्चे यूं ही गिरती छतों के साए में अपना भविष्य तलाशने को मजबूर रहेंगे।
रीवा में जर्जर छत, बाहर बैठे बच्चे और खामोश सिस्टम: अपनी ही सरकार में 'सुशासन' देख हक्के-बक्के रह गए विधायक जी! कागजों पर सरकारी स्कूलों को 'प्राइवेट स्कूलों की तर्ज' पर चमकाने के बड़े-बड़े दावे रोज किए जाते हैं, लेकिन हकीकत की जमीन पर ये दावे कैसे औंधे मुंह गिरते हैं, इसकी पोल तब खुल गई जब सत्ताधारी पार्टी के ही एक विधायक को अपनी विधानसभा का सच देखना पड़ा। मनगवां से बीजेपी विधायक नरेंद्र प्रजापति जब ग्राम पंचायत कदैला के शासकीय प्राथमिक विद्यालय का औचक निरीक्षण करने पहुंचे, तो वहां का 'सुशासन' देखकर उनके भी होश उड़ गए। छत के सरिये झांक रहे थे, प्लास्टर गिर रहा था और नौनिहाल अपनी जान के डर से खुले आसमान के नीचे बैठकर भविष्य गढ़ने को मजबूर थे। क्या यही है वह शिक्षा का 'मॉडल'? क्या इन्हीं जर्जर छतों के नीचे बैठकर हमारे बच्चे विश्वगुरु बनने का सपना देखेंगे? अधिकारी किस कुंभकर्णी नींद में थे? जब स्कूल की शिक्षिका ने वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित में जर्जर हालात की सूचना दे दी थी, तो उस फाइल को किस लाल फीते में बांधकर दबा दिया गया? क्या हादसे का इंतजार था? क्या शिक्षा विभाग के बाबुओं की नींद तभी टूटती जब यह छत किसी मासूम के ऊपर गिर जाती? मरम्मत के लिए भी 'VIP' एंट्री जरूरी है? क्या अब देश में एक स्कूल की टूटी छत ठीक कराने के लिए भी विधायक के 'औचक निरीक्षण' और 'वायरल वीडियो' की जरूरत पड़ेगी? आम आदमी और शिक्षकों की शिकायतों की कोई कीमत नहीं है? कहाँ जा रहा है बजट? शिक्षा के नाम पर हर साल आवंटित होने वाला करोड़ों का भारी-भरकम बजट आखिर किन 'जर्जर' फाइलों में दफन हो रहा है? विधायक जी का वीडियो बनाना और अधिकारियों को निर्देश देना तो ठीक है, लेकिन यह घटना इस बात का जीता-जागता सुबूत है कि सिस्टम को घुन लग चुका है। जब तक एसी कमरों में बैठे अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक मासूम बच्चे यूं ही गिरती छतों के साए में अपना भविष्य तलाशने को मजबूर रहेंगे।
- कागजों पर सरकारी स्कूलों को 'प्राइवेट स्कूलों की तर्ज' पर चमकाने के बड़े-बड़े दावे रोज किए जाते हैं, लेकिन हकीकत की जमीन पर ये दावे कैसे औंधे मुंह गिरते हैं, इसकी पोल तब खुल गई जब सत्ताधारी पार्टी के ही एक विधायक को अपनी विधानसभा का सच देखना पड़ा। मनगवां से बीजेपी विधायक नरेंद्र प्रजापति जब ग्राम पंचायत कदैला के शासकीय प्राथमिक विद्यालय का औचक निरीक्षण करने पहुंचे, तो वहां का 'सुशासन' देखकर उनके भी होश उड़ गए। छत के सरिये झांक रहे थे, प्लास्टर गिर रहा था और नौनिहाल अपनी जान के डर से खुले आसमान के नीचे बैठकर भविष्य गढ़ने को मजबूर थे। क्या यही है वह शिक्षा का 'मॉडल'? क्या इन्हीं जर्जर छतों के नीचे बैठकर हमारे बच्चे विश्वगुरु बनने का सपना देखेंगे? अधिकारी किस कुंभकर्णी नींद में थे? जब स्कूल की शिक्षिका ने वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित में जर्जर हालात की सूचना दे दी थी, तो उस फाइल को किस लाल फीते में बांधकर दबा दिया गया? क्या हादसे का इंतजार था? क्या शिक्षा विभाग के बाबुओं की नींद तभी टूटती जब यह छत किसी मासूम के ऊपर गिर जाती? मरम्मत के लिए भी 'VIP' एंट्री जरूरी है? क्या अब देश में एक स्कूल की टूटी छत ठीक कराने के लिए भी विधायक के 'औचक निरीक्षण' और 'वायरल वीडियो' की जरूरत पड़ेगी? आम आदमी और शिक्षकों की शिकायतों की कोई कीमत नहीं है? कहाँ जा रहा है बजट? शिक्षा के नाम पर हर साल आवंटित होने वाला करोड़ों का भारी-भरकम बजट आखिर किन 'जर्जर' फाइलों में दफन हो रहा है? विधायक जी का वीडियो बनाना और अधिकारियों को निर्देश देना तो ठीक है, लेकिन यह घटना इस बात का जीता-जागता सुबूत है कि सिस्टम को घुन लग चुका है। जब तक एसी कमरों में बैठे अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक मासूम बच्चे यूं ही गिरती छतों के साए में अपना भविष्य तलाशने को मजबूर रहेंगे।1
- Post by Bolti Divare1
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