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Vinod Shrivastava
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- खागा फतेहपुर ::- संदेश साफ था-वरदान या शक्ति का दुरुपयोग अंततः विनाश ही लाता है, जबकि सच्ची आस्था की रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं. उसी स्मृति में हर साल होलिका दहन किया जाता है. अगले दिन रंगों का उत्सव मनाया जाता है, जिसे होली कहा जाता है. मान्यता है कि होलिका की अग्नि से बचने की खुशी में लोगों ने रंग-गुलाल उड़ाकर उत्सव मनाया था. होली मनाने की विस्तृत प्रक्रिया: होलिका दहन (पूर्व संध्या): लोग शाम को इकट्ठे होकर लकड़ी, सूखे पत्तों और टहनियों से अलाव (होलिका) जलाते हैं, जो बुराई के अंत का प्रतीक है। इसके चारों ओर पूजा और परिक्रमा की जाती है। रंगों का उत्सव (मुख्य दिन): सुबह से ही लोग एक-दूसरे को रंग (अबीर-गुलाल) लगाते हैं और गले मिलते हैं। इस दिन पानी की बंदूकें (पिचकारी), पानी के गुब्बारे और गीतों के साथ होली खेली जाती है। विशेष व्यंजन: होली में गुझिया, ठंडाई, दही वड़े और कई तरह के स्नैक्स जैसे पारंपरिक व्यंजन परोसे जाते हैं। सांस्कृतिक और पारंपरिक विविधता: ब्रज की होली: वृंदावन और बरसाना में लट्ठमार होली और फूलों वाली होली विशेष रूप से प्रसिद्ध है। बंगाल/ओडिशा: यहाँ इसे 'दोल पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है। सामाजिक मिलन: लोग पुरानी कड़वाहट भूलकर दोस्तों, परिवार और पड़ोसियों के घर जाते हैं और शुभकामनाएं देते हैं।4
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