शव लेकर भी गांव नहीं पहुंची एंबुलेंस, लकड़ी के सहारे पार हुआ रेलवे ब्रिज केकराही की बदहाल सड़क ने खोली विकास की पोल, ग्रामीणों ने कहा—सड़क-पुल नहीं तो चुनाव में वोट भी नहीं देवसुंदर यादव। चंदवा। आजादी के 80 वर्ष गुजर गए, सरकारें बदलीं, जनप्रतिनिधि बदले और विकास के दावे भी होते रहे, लेकिन चंदवा प्रखंड के मालहन पंचायत अंतर्गत केकराही गांव की तस्वीर आज भी नहीं बदली। गांव तक पहुंचने के लिए न ढंग की सड़क है, न समुचित पुल और न ही ऐसा रास्ता, जिससे आपातकाल में एंबुलेंस भी आसानी से पहुंच सके। सोमवार को सामने आया एक मार्मिक दृश्य गांव की बदहाली की पूरी कहानी बयां कर गया। केकराही निवासी अनूप ठाकुर की पत्नी बबीता देवी का रांची सदर अस्पताल में पिछले कुछ दिनों से इलाज चल रहा था। सोमवार को उनका निधन हो गया। शव को एंबुलेंस से गांव लाया जा रहा था, लेकिन गांव के रास्ते में रेलवे ब्रिज के नीचे पहुंचते ही एंबुलेंस के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। अंततः ग्रामीणों ने लकड़ियां डालकर किसी तरह रास्ता तैयार किया और जान जोखिम में डालकर एंबुलेंस को रेलवे ब्रिज के नीचे से पार कराया। यह तस्वीर सिर्फ एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि उस गांव की वर्षों पुरानी बदहाली का आईना है। ग्रामीणों का कहना है कि जब मृतक का शव लेकर आने वाली एंबुलेंस को गांव तक पहुंचने के लिए लकड़ियों के सहारे रास्ता पार करना पड़े, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीमार मरीज, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को रोजमर्रा के आवागमन में किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता होगा। *दो रास्ते हैं, लेकिन दोनों ही जिंदगी के लिए चुनौती* ग्रामीणों के अनुसार केकराही गांव पहुंचने के दो प्रमुख मार्ग हैं, लेकिन दोनों ही समस्याओं से घिरे हुए हैं। पहला मार्ग एनएच-22 से दामोदर होकर रक्सी-जमीरा-महुआमिलान-मरमर होते हुए केकराही तक पहुंचता है। इस रास्ते में दो नदियां पड़ती हैं। ग्रामीणों के मुताबिक एक नदी पर करीब पांच वर्ष के इंतजार के बाद पुल का निर्माण हुआ, लेकिन वह भी वर्तमान में सुगम आवागमन के लिए पूरी तरह उपयोगी नहीं है। दूसरी नदी पर अब तक पुल नहीं बनने के कारण बरसात में आवागमन बेहद कठिन हो जाता है। दूसरा मार्ग चंदवा-मालहन-मैक्लुस्कीगंज रोड से केंदुआटांड़ पुलिस पिकेट होते हुए केकराही तक जाता है। लेकिन बीच में रेलवे लाइन और रेलवे ब्रिज के नीचे की स्थिति चारपहिया वाहनों के लिए बड़ी बाधा बनी हुई है। यही कारण है कि एंबुलेंस और अन्य चारपहिया वाहन गांव के अंदर तक नहीं पहुंच पाते। *बीमारी हो या मौत, रास्ता बन जाता है सबसे बड़ी मुसीबत* ग्रामीणों का कहना है कि सड़क और पुल की समस्या केवल आवागमन की समस्या नहीं है, बल्कि यह सीधे लोगों की जिंदगी और स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है। आपात स्थिति में मरीज को अस्पताल पहुंचाने में देरी हो सकती है। बरसात के दिनों में समस्या और गंभीर हो जाती है। ग्रामीण सवाल करते हैं कि जिस गांव में आज भी मरीज और शव को रास्ता पार कराने के लिए ग्रामीणों को खुद व्यवस्था करनी पड़े, वहां विकास की योजनाओं का लाभ आखिर किसे मिल रहा है? *वोट के समय याद आता है गांव, विकास के समय क्यों नहीं?* केकराही के ग्रामीणों में सड़क और पुल की बदहाली को लेकर अब आक्रोश बढ़ता जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता और प्रत्याशी गांव में पहुंचकर वोट मांगते हैं, विकास के वादे करते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही गांव की समस्याएं भी जैसे फाइलों में बंद हो जाती हैं। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि सड़क, पुल और सुरक्षित आवागमन की स्थायी व्यवस्था नहीं की गई तो आगामी चुनाव में पूर्ण वोट बहिष्कार किया जाएगा। ग्रामीणों का कहना है—“जब हमारे गांव तक विकास की सड़क नहीं पहुंच सकती, तो हमारा वोट भी नेताओं तक नहीं पहुंचेगा।” *अब प्रशासन से सवाल, आखिर कब बदलेगी तस्वीर?* केकराही की समस्या किसी एक दिन की नहीं है। वर्षों से ग्रामीण सड़क, पुल और सुरक्षित आवागमन की मांग करते आ रहे हैं। बावजूद इसके समस्या जस की तस बनी हुई है। सोमवार को एंबुलेंस को लकड़ियों के सहारे रेलवे ब्रिज पार कराने की तस्वीर ने एक बार फिर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी बड़ी दुर्घटना या किसी मरीज की जान जाने के बाद प्रशासन जागेगा? क्या ग्रामीणों को सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भी आंदोलन और वोट बहिष्कार का रास्ता अपनाना पड़ेगा? अब जरूरत आश्वासन की नहीं, बल्कि स्थायी समाधान की है। जिला प्रशासन, पथ निर्माण विभाग, ग्रामीण कार्य विभाग एवं संबंधित रेलवे अधिकारियों को केकराही गांव की जमीनी स्थिति का तत्काल निरीक्षण कर सड़क, पुल-पुलिया और रेलवे ब्रिज के नीचे सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। यही ग्रामीणों के लिए वास्तविक विकास होगा।
शव लेकर भी गांव नहीं पहुंची एंबुलेंस, लकड़ी के सहारे पार हुआ रेलवे ब्रिज केकराही की बदहाल सड़क ने खोली विकास की पोल, ग्रामीणों ने कहा—सड़क-पुल नहीं तो चुनाव में वोट भी नहीं देवसुंदर यादव। चंदवा। आजादी के 80 वर्ष गुजर गए, सरकारें बदलीं, जनप्रतिनिधि बदले और विकास के दावे भी होते रहे, लेकिन चंदवा प्रखंड के मालहन पंचायत अंतर्गत केकराही गांव की तस्वीर आज भी नहीं बदली। गांव तक पहुंचने के लिए न ढंग की सड़क है, न समुचित पुल और न ही ऐसा रास्ता, जिससे आपातकाल में एंबुलेंस भी आसानी से पहुंच सके। सोमवार को सामने आया एक मार्मिक दृश्य गांव की बदहाली की पूरी कहानी बयां कर गया। केकराही निवासी अनूप ठाकुर की पत्नी बबीता देवी का रांची सदर अस्पताल में पिछले कुछ दिनों से इलाज चल रहा था। सोमवार को उनका निधन हो गया। शव को एंबुलेंस से गांव लाया जा रहा था, लेकिन गांव के रास्ते में रेलवे ब्रिज के नीचे पहुंचते ही एंबुलेंस के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। अंततः ग्रामीणों ने लकड़ियां डालकर किसी तरह रास्ता तैयार किया और जान जोखिम में डालकर एंबुलेंस को रेलवे ब्रिज के नीचे से पार कराया। यह तस्वीर सिर्फ
एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि उस गांव की वर्षों पुरानी बदहाली का आईना है। ग्रामीणों का कहना है कि जब मृतक का शव लेकर आने वाली एंबुलेंस को गांव तक पहुंचने के लिए लकड़ियों के सहारे रास्ता पार करना पड़े, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीमार मरीज, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को रोजमर्रा के आवागमन में किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता होगा। *दो रास्ते हैं, लेकिन दोनों ही जिंदगी के लिए चुनौती* ग्रामीणों के अनुसार केकराही गांव पहुंचने के दो प्रमुख मार्ग हैं, लेकिन दोनों ही समस्याओं से घिरे हुए हैं। पहला मार्ग एनएच-22 से दामोदर होकर रक्सी-जमीरा-महुआमिलान-मरमर होते हुए केकराही तक पहुंचता है। इस रास्ते में दो नदियां पड़ती हैं। ग्रामीणों के मुताबिक एक नदी पर करीब पांच वर्ष के इंतजार के बाद पुल का निर्माण हुआ, लेकिन वह भी वर्तमान में सुगम आवागमन के लिए पूरी तरह उपयोगी नहीं है। दूसरी नदी पर अब तक पुल नहीं बनने के कारण बरसात में आवागमन बेहद कठिन हो जाता है। दूसरा मार्ग चंदवा-मालहन-मैक्लुस्कीगंज रोड से केंदुआटांड़ पुलिस पिकेट होते हुए केकराही तक जाता है। लेकिन बीच में रेलवे लाइन और रेलवे ब्रिज के नीचे की स्थिति चारपहिया वाहनों
के लिए बड़ी बाधा बनी हुई है। यही कारण है कि एंबुलेंस और अन्य चारपहिया वाहन गांव के अंदर तक नहीं पहुंच पाते। *बीमारी हो या मौत, रास्ता बन जाता है सबसे बड़ी मुसीबत* ग्रामीणों का कहना है कि सड़क और पुल की समस्या केवल आवागमन की समस्या नहीं है, बल्कि यह सीधे लोगों की जिंदगी और स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है। आपात स्थिति में मरीज को अस्पताल पहुंचाने में देरी हो सकती है। बरसात के दिनों में समस्या और गंभीर हो जाती है। ग्रामीण सवाल करते हैं कि जिस गांव में आज भी मरीज और शव को रास्ता पार कराने के लिए ग्रामीणों को खुद व्यवस्था करनी पड़े, वहां विकास की योजनाओं का लाभ आखिर किसे मिल रहा है? *वोट के समय याद आता है गांव, विकास के समय क्यों नहीं?* केकराही के ग्रामीणों में सड़क और पुल की बदहाली को लेकर अब आक्रोश बढ़ता जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता और प्रत्याशी गांव में पहुंचकर वोट मांगते हैं, विकास के वादे करते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही गांव की समस्याएं भी जैसे फाइलों में बंद हो जाती हैं। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि
सड़क, पुल और सुरक्षित आवागमन की स्थायी व्यवस्था नहीं की गई तो आगामी चुनाव में पूर्ण वोट बहिष्कार किया जाएगा। ग्रामीणों का कहना है—“जब हमारे गांव तक विकास की सड़क नहीं पहुंच सकती, तो हमारा वोट भी नेताओं तक नहीं पहुंचेगा।” *अब प्रशासन से सवाल, आखिर कब बदलेगी तस्वीर?* केकराही की समस्या किसी एक दिन की नहीं है। वर्षों से ग्रामीण सड़क, पुल और सुरक्षित आवागमन की मांग करते आ रहे हैं। बावजूद इसके समस्या जस की तस बनी हुई है। सोमवार को एंबुलेंस को लकड़ियों के सहारे रेलवे ब्रिज पार कराने की तस्वीर ने एक बार फिर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी बड़ी दुर्घटना या किसी मरीज की जान जाने के बाद प्रशासन जागेगा? क्या ग्रामीणों को सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भी आंदोलन और वोट बहिष्कार का रास्ता अपनाना पड़ेगा? अब जरूरत आश्वासन की नहीं, बल्कि स्थायी समाधान की है। जिला प्रशासन, पथ निर्माण विभाग, ग्रामीण कार्य विभाग एवं संबंधित रेलवे अधिकारियों को केकराही गांव की जमीनी स्थिति का तत्काल निरीक्षण कर सड़क, पुल-पुलिया और रेलवे ब्रिज के नीचे सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। यही ग्रामीणों के लिए वास्तविक विकास होगा।
- शव लेकर भी गांव नहीं पहुंची एंबुलेंस, लकड़ी के सहारे पार हुआ रेलवे ब्रिज केकराही की बदहाल सड़क ने खोली विकास की पोल, ग्रामीणों ने कहा—सड़क-पुल नहीं तो चुनाव में वोट भी नहीं देवसुंदर यादव। चंदवा। आजादी के 80 वर्ष गुजर गए, सरकारें बदलीं, जनप्रतिनिधि बदले और विकास के दावे भी होते रहे, लेकिन चंदवा प्रखंड के मालहन पंचायत अंतर्गत केकराही गांव की तस्वीर आज भी नहीं बदली। गांव तक पहुंचने के लिए न ढंग की सड़क है, न समुचित पुल और न ही ऐसा रास्ता, जिससे आपातकाल में एंबुलेंस भी आसानी से पहुंच सके। सोमवार को सामने आया एक मार्मिक दृश्य गांव की बदहाली की पूरी कहानी बयां कर गया। केकराही निवासी अनूप ठाकुर की पत्नी बबीता देवी का रांची सदर अस्पताल में पिछले कुछ दिनों से इलाज चल रहा था। सोमवार को उनका निधन हो गया। शव को एंबुलेंस से गांव लाया जा रहा था, लेकिन गांव के रास्ते में रेलवे ब्रिज के नीचे पहुंचते ही एंबुलेंस के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। अंततः ग्रामीणों ने लकड़ियां डालकर किसी तरह रास्ता तैयार किया और जान जोखिम में डालकर एंबुलेंस को रेलवे ब्रिज के नीचे से पार कराया। यह तस्वीर सिर्फ एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि उस गांव की वर्षों पुरानी बदहाली का आईना है। ग्रामीणों का कहना है कि जब मृतक का शव लेकर आने वाली एंबुलेंस को गांव तक पहुंचने के लिए लकड़ियों के सहारे रास्ता पार करना पड़े, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीमार मरीज, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को रोजमर्रा के आवागमन में किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता होगा। *दो रास्ते हैं, लेकिन दोनों ही जिंदगी के लिए चुनौती* ग्रामीणों के अनुसार केकराही गांव पहुंचने के दो प्रमुख मार्ग हैं, लेकिन दोनों ही समस्याओं से घिरे हुए हैं। पहला मार्ग एनएच-22 से दामोदर होकर रक्सी-जमीरा-महुआमिलान-मरमर होते हुए केकराही तक पहुंचता है। इस रास्ते में दो नदियां पड़ती हैं। ग्रामीणों के मुताबिक एक नदी पर करीब पांच वर्ष के इंतजार के बाद पुल का निर्माण हुआ, लेकिन वह भी वर्तमान में सुगम आवागमन के लिए पूरी तरह उपयोगी नहीं है। दूसरी नदी पर अब तक पुल नहीं बनने के कारण बरसात में आवागमन बेहद कठिन हो जाता है। दूसरा मार्ग चंदवा-मालहन-मैक्लुस्कीगंज रोड से केंदुआटांड़ पुलिस पिकेट होते हुए केकराही तक जाता है। लेकिन बीच में रेलवे लाइन और रेलवे ब्रिज के नीचे की स्थिति चारपहिया वाहनों के लिए बड़ी बाधा बनी हुई है। यही कारण है कि एंबुलेंस और अन्य चारपहिया वाहन गांव के अंदर तक नहीं पहुंच पाते। *बीमारी हो या मौत, रास्ता बन जाता है सबसे बड़ी मुसीबत* ग्रामीणों का कहना है कि सड़क और पुल की समस्या केवल आवागमन की समस्या नहीं है, बल्कि यह सीधे लोगों की जिंदगी और स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है। आपात स्थिति में मरीज को अस्पताल पहुंचाने में देरी हो सकती है। बरसात के दिनों में समस्या और गंभीर हो जाती है। ग्रामीण सवाल करते हैं कि जिस गांव में आज भी मरीज और शव को रास्ता पार कराने के लिए ग्रामीणों को खुद व्यवस्था करनी पड़े, वहां विकास की योजनाओं का लाभ आखिर किसे मिल रहा है? *वोट के समय याद आता है गांव, विकास के समय क्यों नहीं?* केकराही के ग्रामीणों में सड़क और पुल की बदहाली को लेकर अब आक्रोश बढ़ता जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता और प्रत्याशी गांव में पहुंचकर वोट मांगते हैं, विकास के वादे करते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही गांव की समस्याएं भी जैसे फाइलों में बंद हो जाती हैं। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि सड़क, पुल और सुरक्षित आवागमन की स्थायी व्यवस्था नहीं की गई तो आगामी चुनाव में पूर्ण वोट बहिष्कार किया जाएगा। ग्रामीणों का कहना है—“जब हमारे गांव तक विकास की सड़क नहीं पहुंच सकती, तो हमारा वोट भी नेताओं तक नहीं पहुंचेगा।” *अब प्रशासन से सवाल, आखिर कब बदलेगी तस्वीर?* केकराही की समस्या किसी एक दिन की नहीं है। वर्षों से ग्रामीण सड़क, पुल और सुरक्षित आवागमन की मांग करते आ रहे हैं। बावजूद इसके समस्या जस की तस बनी हुई है। सोमवार को एंबुलेंस को लकड़ियों के सहारे रेलवे ब्रिज पार कराने की तस्वीर ने एक बार फिर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी बड़ी दुर्घटना या किसी मरीज की जान जाने के बाद प्रशासन जागेगा? क्या ग्रामीणों को सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भी आंदोलन और वोट बहिष्कार का रास्ता अपनाना पड़ेगा? अब जरूरत आश्वासन की नहीं, बल्कि स्थायी समाधान की है। जिला प्रशासन, पथ निर्माण विभाग, ग्रामीण कार्य विभाग एवं संबंधित रेलवे अधिकारियों को केकराही गांव की जमीनी स्थिति का तत्काल निरीक्षण कर सड़क, पुल-पुलिया और रेलवे ब्रिज के नीचे सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। यही ग्रामीणों के लिए वास्तविक विकास होगा।4
- *चकला में ग्रामसभा रद्द: दाले उरांव और रामचंद्र उरांव के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामीणों का प्रदर्शन* *हिंडालको पर बिना ग्राम सभा खनन का आरोप, चकला पंचायत में ग्रामीणों का प्रदर्शन* *लातेहार/चंदवा* ओरिसा एलॉय स्टील की *चितरपुर (रिवाइज्ड) कोल माइंस* के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर सोमवार को ग्रामीणों और कंपनी के बीच सहमति की प्रक्रिया होनी थी। इसके लिए *चितरपुर और बरवा टोली समेत आसपास के गांवों से सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण* पहुंचे। हालांकि, ग्रामीणों के पहुंचने के बावजूद कंपनी और जिला प्रशासन के संबंधित अधिकारियों की अनुपस्थिति को लेकर सवाल खड़े हो गए। ग्रामीणों का नेतृत्व चितरपुर के *दाले उरांव और बरवा टोली के रामचंद्र उरांव* ने किया। ग्रामीणों ने चकला पंचायत की मुखिया से सवाल किया कि जब जमीन अधिग्रहण को लेकर ग्रामीणों की सहमति की प्रक्रिया निर्धारित थी, तो कंपनी और जिला प्रशासन के अधिकारी मौके पर क्यों नहीं पहुंचे। ग्रामीणों के अनुसार, मुखिया ने अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए सभा की कार्यवाही को रद्द कर दिया। सभा स्थल पर ग्रामीणों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि *किसी भी कंपनी के लिए अपनी जमीन नहीं देंगे, चाहे इसके लिए उन्हें कितना भी संघर्ष क्यों न करना पड़े।* ग्रामीणों ने क्षेत्र में कंपनियों द्वारा कथित रूप से किए जा रहे अवैध कार्यों का भी विरोध करने और उनके खिलाफ आवाज उठाने की बात कही। *‘कंपनी काम निकलने के बाद पहचानती तक नहीं’* ग्रामीण नेता *रामचंद्र उरांव* ने कंपनी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि कंपनियां ग्रामीणों को सिर्फ अपने हित के लिए इस्तेमाल करती हैं। उन्होंने कहा, “कंपनी सिर्फ लोगों को बेवकूफ बनाने का काम करती है। काम निकल जाने के बाद लोगों को पहचानती तक नहीं है। मुझे कंपनी में नौकरी मिली है, लेकिन आज कोई पहचान नहीं है। अगर भविष्य में कोई विकट परिस्थिति आती है तो कंपनी हमें पहचानने से भी इंकार कर सकती है।” ग्रामीणों ने कहा कि जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि उनकी आजीविका, जंगल और भविष्य से जुड़ी हुई है। इसलिए जमीन अधिग्रहण के किसी भी प्रयास का विरोध जारी रहेगा। ग्रामीणों का कहना है कि जमीन अधिग्रहण से पहले उनकी सहमति, अधिकार और हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सोमवार को प्रस्तावित प्रक्रिया के दौरान कंपनी और जिला प्रशासन के अधिकारियों की अनुपस्थिति ने ग्रामीणों के बीच नाराजगी को और बढ़ा दिया। ग्रामीणों ने संकेत दिया कि आने वाले दिनों में भी वे एकजुट होकर जमीन अधिग्रहण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करेंगे। *हिंडालको की ओर से यह बात स्पष्ट नहीं हो पाई है कि ग्राम सभा हुई है या नहीं।*4
- जल-जंगल-जमीन के लिए चकला में फूटा जन-आक्रोश, कोयला कंपनी के खिलाफ आदिवासियों ने फूंका बगावत का बिगुल जल-जंगल-जमीन के लिए चकला में फूटा जन-आक्रोश, कोयला कंपनी के खिलाफ आदिवासियों ने फूंका बगावत का बिगुल लातेहार संवाददाता चंदवा (लातेहार)। कोल ब्लॉक के नाम पर आदिवासी अस्मिता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं होगा। सोमवार को चकला में प्रस्तावित ग्राम सभा के विरोध में यही हुंकार सुनाई दी। प्रशासन ने ओडिशा एलायंस स्टील प्राइवेट लिमिटेड को आवंटित हिंडालको कोल ब्लॉक की रिवाइज्ड माइंस के लिए भूमि अधिग्रहण को लेकर चकला गांव में ग्राम सभा का आदेश जारी किया था। ग्रामीणों को भनक लगी कि सभा रद्द कर दी गई है और उन्हें सूचना तक नहीं दी गई, तो आक्रोश फूट पड़ा। चकला, बरवाटोली, भुकुटोला समेत दर्जन भर प्रभावित गांवों के सैकड़ों ग्रामीण पंचायत भवन के सामने जमा हो गए। हाथों में तख्तियां और जुबां पर जल-जंगल-जमीन हमारा है, कंपनी वापस जाओ और ओडिशा एलायंस मुर्दाबाद के नारे गूंज उठे। मुखिया पूनम रंजिता एक्का ने कहा कि हिंडालको सहित कंपनियां बिना ग्राम सभा की सहमति के काम कर रही हैं, जो पेसा कानून और ग्राम सभा के अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। ग्रामीणों ने दो टूक कहा, जमीन केवल टुकड़ा नहीं, हमारी रोजी-रोटी, पहचान और पीढ़ियों का भविष्य है, इसे नहीं देंगे। विरोध को देखते हुए कंपनी प्रतिनिधि और भू-अर्जन पदाधिकारी मौके पर नहीं पहुंचे, जिससे आक्रोश और बढ़ गया। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि बिना सहमति अधिग्रहण हुआ तो आंदोलन तेज होगा। हालांकि खबर लिखे जाने तक ग्राम सभा के विषय में कंपनी की तरफ से स्पष्ट नहीं हुआ है।3
- लातेहार में जयराम महतो के खिलाफ पुलिस एसोसिएशन और IRB एसोसिएशन ने जताया विरोध1
- हुदू गांव की बदहाल स्थिति कौन है जिम्मेवार आज तक गांव में अच्छे पीसीसी सड़क नहीं बन पाई है आदिवासी बहुल गांव की जमीनी हकीकत! 😢 तीन कार्यकाल तक कांग्रेस को वोट दिया, लेकिन गांव को मिला सिर्फ आश्वासन!...1
- छात्रों एवं ग्रामीणों ने महुआडार गारु पथ स्थित राजडंडा ग्राम के समीप वर्ष से क्षतिग्रस्त पुल को राहगीरों के लिए दुरुस्त करने का प्रयास किया मंगलवार की दोपहर 3:00 बजे। ताकि इस पथ पर पैदल यात्रा करने वाले छात्र-छात्रा एवं ग्रामीणों को क्षतिग्रस्त पुल से कुछ राहत मिल सके। ज्ञात हो की 29 अगस्त की रात को लगातार हो रही वर्षा से राजडंडा नदी का पानी पुल के ऊपर ऊफान से बहने लगा था। जिससे पुल पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था। जिससे आम ग्रामीण एवं छात्र छात्राओं को इस पथ पर चलने में काफी मशक्कत का सामना करना पड़ रहा था।1
- लातेहार लातेहार में जयराम महतो के खिलाफ पुलिस एसोसिएशन और IRB एसोसिएशन ने जताया विरोध लातेहार लातेहार में जयराम महतो के खिलाफ पुलिस एसोसिएशन और IRB एसोसिएशन ने जताया विरोध धनबाद जिले के बरवा अड्डा थाने में जेएलकेएम सुप्रीमो जयराम महतो और थाना प्रभारी के बीच हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह मामला अब पूरे झारखंड में तूल पकड़ता जा रहा है। इसको लेकर राज्य भर के पुलिस एसोसिएशन ने विरोध शुरू कर दिया है। इसी क्रम में लातेहार पुलिस एसोसिएशन और IRB की इकाई ने पुलिस एसोसिएशन कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विरोध जताया। एसोसिएशन के अध्यक्ष राजकुमार लकड़ा ने कहा कि जिस तरह से एक जनप्रतिनिधि ने थाना प्रभारी को गंदी-गंदी गाली दी और अभद्र व्यवहार किया, वह बेहद निंदनीय है। उन्होंने कहा कि पुलिस का मनोबल तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। एसोसिएशन ने सरकार से जनप्रतिनिधि पर ठोस कार्रवाई करने की मांग की है। साथ ही चेतावनी दी है कि अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो पूरे राज्य में पुलिस एसोसिएशन आंदोलन करने को बाध्य होगा।1
- सदन में सवाल, सड़क पर जलजमाव! चंदवा पूछ रहा—गायत्री मंदिर रोड का समाधान कब? देवसुंदर यादव। चंदवा/लातेहार। विधानसभा में जनता की आवाज उठी, सवाल भी हुआ, लेकिन सड़क पर हालात जस के तस हैं। चंदवा के गायत्री मंदिर रोड पर बरसात के करीब तीन महीने तक जमा रहने वाला पानी अब सिर्फ जलजमाव नहीं, बल्कि व्यवस्था पर बड़ा सवाल बन चुका है। अगस्त 2025 में विधायक प्रकाश राम ने इस समस्या को विधानसभा में उठाया था। करीब एक साल बीतने को है, लेकिन धरातल पर स्थायी समाधान नजर नहीं आने से लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। बरसात आते ही गायत्री मंदिर रोड का बड़ा हिस्सा जलजमाव की चपेट में आ जाता है। सड़क पर जमा पानी के बीच से होकर राहगीर, महिलाएं, बुजुर्ग और स्कूली बच्चे गुजरने को मजबूर होते हैं। दोपहिया वाहन चालकों के लिए फिसलने और दुर्घटना का खतरा बना रहता है। लंबे समय तक पानी जमा रहने से सड़क की स्थिति खराब होने के साथ आसपास गंदगी और दुर्गंध की समस्या भी बढ़ जाती है। विधानसभा में सवाल उठा, फिर कार्रवाई कहां अटकी? सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब समस्या स्थानीय स्तर से निकलकर विधानसभा तक पहुंच चुकी है, तो फिर करीब एक साल बाद भी इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं हुआ? झारखंड मुक्ति मोर्चा युवा मोर्चा के जिला उपाध्यक्ष अंकित तिवारी ने विधायक प्रकाश राम पर सवाल उठाते हुए कहा कि विधानसभा में समस्या उठाना निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन जनता अब यह जानना चाहती है कि उस सवाल के बाद कार्रवाई कितनी आगे बढ़ी? उन्होंने कहा कि यदि अधिकारियों को समस्या की जानकारी है, निरीक्षण हुआ है और मामला विधानसभा में भी उठ चुका है, तो फिर गायत्री मंदिर रोड के जलजमाव का समाधान किस स्तर पर अटका हुआ है? जनता अब केवल सवाल उठाए जाने की जानकारी नहीं, बल्कि जमीन पर काम शुरू होता देखना चाहती है। तीन महीने पानी में सड़क, आखिर कब तक? अंकित तिवारी ने कहा कि हर साल बरसात में करीब तीन महीने तक सड़क पर पानी जमा रहना सामान्य स्थिति नहीं है। इसका सीधा असर लोगों के आवागमन, स्थानीय दुकानदारों के कारोबार और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि हर वर्ष बरसात आए, सड़क डूबे, लोग परेशान हों और फिर समस्या अगले साल तक टल जाए—इसे स्थायी समाधान नहीं कहा जा सकता। उन्होंने मांग की कि यदि किसी तकनीकी स्वीकृति, विभागीय प्रक्रिया या प्रशासनिक कारण से कार्य लंबित है, तो इसकी स्पष्ट जानकारी जनता के सामने रखी जाए और समाधान की समयसीमा तय की जाए। “जनता को अब बयान नहीं, समाधान चाहिए” अंकित तिवारी ने कहा कि यह किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ राजनीतिक द्वेष का मामला नहीं, बल्कि चंदवा की जनता की वर्षों पुरानी परेशानी का सवाल है। जनप्रतिनिधि से सवाल पूछना जनता का अधिकार है और उस सवाल का जवाब देना जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी है। उन्होंने विधायक प्रकाश राम से कहा— “विधायक जी, विधानसभा में आवाज आपकी थी, अब जनता समाधान देखना चाहती है। करीब एक साल बाद भी अगर गायत्री मंदिर रोड बरसात में पानी में डूब रही है, तो जनता पूछेगी जरूर कि आखिर उस विधानसभा वाले सवाल का हुआ क्या?” उन्होंने गायत्री मंदिर रोड के जलजमाव की समस्या का स्थायी समाधान और प्रभावी जल निकासी व्यवस्था सुनिश्चित कराने की मांग की, ताकि हर बरसात में लोगों को उसी परेशानी से दोबारा न गुजरना पड़े। अब जनता का सीधा सवाल सदन में सवाल उठे एक साल होने को आया, फिर सड़क पर पानी क्यों? आखिर गायत्री मंदिर रोड के जलजमाव का स्थायी समाधान कब होगा?2