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निगरानी के हत्थे चढ़े बीडियो साहब मोटी रकम लेते थे,50 हजार घुस लेते हुए रंगे हाथ धरा गए।
क्रिएटर बाबा
निगरानी के हत्थे चढ़े बीडियो साहब मोटी रकम लेते थे,50 हजार घुस लेते हुए रंगे हाथ धरा गए।
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- कैलाश के वासी, भस्म-विभूषित भालेधारी, डमरू की धुन में नाचे सृष्टि सारी। भोलेनाथ की कृपा जहाँ बरसे अपार वहीं मिटे सब शोक, हो जीवन साकार। 🔱 हर हर महादेव 🔱1
- विभूतिपुर में सादगी की मिसाल: बिना शोर-शराबे और आडंबर के बौद्ध रीति-रिवाज से परिणय सूत्र में बंधे रोशन और बबली समस्तीपुर । आज के दौर में जहां शादियां फिजूलखर्ची और दिखावे का पर्याय बनती जा रही हैं, वहीं समस्तीपुर जिले के विभूतिपुर प्रखंड अंतर्गत आलमपुर कोदरिया पंचायत में एक ऐसी शादी संपन्न हुई, जिसकी चर्चा हर जुबान पर है। रविवार की रात वार्ड संख्या 13 निवासी राम कुमार महतो के पुत्र रोशन कुमार और वार्ड संख्या 4 निवासी राम विलास की पुत्री बबली कुमारी ने पारंपरिक रूढ़ियों को दरकिनार कर बौद्ध रीति-रिवाज से विवाह कर समाज को एक नई दिशा दी है। *शांति और सद्भाव का संकल्प* यह विवाह न केवल अपनी सादगी के लिए, बल्कि अपनी पवित्रता के लिए भी खास रहा। नेशनल एंड इंटरनेशनल बुद्धिष्ट सोसाइटी के भंते शांति मित्र और भंते शांति रक्षित के सानिध्य में विवाह की रस्में पूरी की गईं। कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान गौतम बुद्ध की प्रतिमा, सम्राट अशोक के तैलचित्र और पंचशील कलश की स्थापना के साथ हुआ। अत्यंत सादगी भरे माहौल में वर-वधु को कच्चे सूत के घेरे में बिठाकर त्रिशरण पंचशील ग्रहण कराया गया। मंत्रोच्चार के बीच भगवान बुद्ध की वंदना की गई और नवदंपति ने जीवन भर शांति, करुणा और सद्भाव के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। *रूढ़ियों को मात:* माता-पिता ने खुद सौंपा हाथ इस विवाह का सबसे प्रेरक क्षण वह था, जब स्टेज पर किसी कर्मकांडी आडंबर के बजाय वर-वधु के माता-पिता स्वयं मौजूद रहे। पुरानी परंपराओं और रूढ़ियों को तोड़ते हुए माता-पिता ने खुद आगे आकर बरातियों और ग्रामीणों की उपस्थिति में अपने बच्चों का हाथ एक-दूसरे को सौंपा। इस भावुक दृश्य ने उपस्थित जनसमूह का दिल जीत लिया। ग्रामीणों का कहना था कि यह दृश्य आधुनिक समाज की उस प्रगतिशील सोच को दर्शाता है, जिसकी आज सख्त जरूरत है। *समाज के लिए प्रेरणास्रोत* विवाह की सादगी और इसके पीछे के संदेश की क्षेत्र के बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जमकर सराहना की है। लोगों का मानना है कि इस तरह की पहल से न केवल आर्थिक बोझ कम होता है, बल्कि समाज में व्याप्त प्रथा और दिखावे जैसी कुरीतियों पर भी करारी चोट पहुँचती है। इस अनोखी शादी को देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचे। विदाई के वक्त माहौल में भारी भरकम बैंड-बाजे के शोर के बजाय एक शांत गरिमा थी, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए निश्चित रूप से एक प्रेरणास्रोत बनेगी।1
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